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गणतंत्र की हिन्दू राजनीति और राज्यदर्शन को देन
‘प्राचीन भारत में जनतंत्र’, यह एक पुस्तक नहीं बल्कि जनतंत्र की खोज का दस्तावेज़ मालूम होता है। हिन्दी समिति, सूचना विभाग उत्तर प्रदेश से 1966 में प्रकाशित इस किताब की लंबी प्रस्तावना देवीदत्त शुक्ल ने लिखी थी। उपसंहार से पूर्व इस पुस्तक का अंतिम अध्याय (जनतंत्र की हिन्दू राजनीति और राज्यदर्शन को देन) एक लंबा लेख है और एक प्रकार से इस किताब का सार भी समाहित करता है। अवसर है 77वें भारतीय गणतंत्र दिवस का और इसलिए (उपयोगिता एवं प्रासंगिकता के मद्देनज़र) इस लेख का अंश साभार यहां प्रस्तुत किया जा रहा है…
शक्ति पृथक्करण
भारतीय मनीषियों ने आदर्श शासन के जिस रूप की कल्पना की थी, उसके मूल में ही शक्ति-पृथक्करण का सिद्धान्त निहित था। उनकी कल्पना के अनुसार सृष्टि का शासन ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन आदि देवों द्वारा चलाया जाता था। इन तीनों के कार्यक्षेत्र विभाजित माने गये थे। ब्रह्मा विधिनिर्माण और सृष्टि के, विष्णु पालन तथा रक्षा के और रुद्र घातक तत्वों के संहार के देवता माने गये थे।1
इसी सिद्धान्त पर देवजगत् के शासन में शासनशक्ति को वरुण, इन्द्र और यम, अथवा भारती, इड़ा और सरस्वती सभाओं में पृथक-पृथक विभाजित किया गया था। इस विभाजन में विधिनिर्माण और न्याय एक साथ होते थे तथा दण्ड-विभाग भी कार्यकारिणी से पृथक था। परन्तु व्यवहार में यह शक्ति-विभाजन परिवर्तित हो गया। विधि-निर्माण का कार्य शासन-तन्त्र से सर्वथा पृथक बना रहा, न्याय-विभाग भी अधिकांश में जनता अथवा सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय संस्थाओं के हाथ में रहा, जिसमें कार्यकारिणी का हस्तक्षप बहुत कम था, परन्तु दण्डविभाग सर्वथा कार्यकारिणी के अधीन आ गया।
वैदिक काल के शासन में राज्यसभा अथवा महानग्नि के विधि निर्माण करने के अधिकारों का कोई संकेत नहीं मिलता, न्याय कार्य इसका प्रमुख कार्य प्रतीत होता है। परन्तु यह जनता द्वारा निर्वाचित जनता के प्रतिनिधियों की सभा थी, और कार्यकारिणी का अध्यक्ष राजा भी इसके प्रति उत्तरदायी था। इस प्रकार न्याय-विभाग भी सर्वथा कार्यकारिणी से पृथक प्रतीत होता है।
विधि निर्माण का कार्य तो हिन्दू राजनीति में शासनक्षेत्र से सदैव पृथक ही माना गया। पौराणिक काल के गणराज्यों में न्यायविभाग अधिकांशत: सामाजिक, आार्थिक ओर क्षेत्रीय संस्थाओं में विभाजित या वितरित मिलता है, यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय राजा तथा राज्यसभा बनाती थी। इस प्रकार न्यायविभाग कार्यकारिणी से सर्वथा पृथक तो नहीं कहा जा सकता, तथापि उसको किसी सीमा तक पृथक रखने का प्रयास किया गया है।
अतः हम कह सकते हैं कि हिन्दू राजनीति में शक्ति-पृथक्करण के सिद्धान्त को आदिकाल से ही माना गया था और व्यवहार में भी बहुत कुछ इसके अनुसार किया जाता था। विधि-निर्माण का कार्य जिस प्रकार हिन्दू-राजनीति में कार्यकारिणी और न्यायपालिका से सर्वथा पृथक रखा गया, वैसा उदाहरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। क्योंकि हिन्दू-राज्यदर्शन विधि को ही सर्वोच्च प्रधानता देता है और विधि-निर्माण का कार्य जनसाधारण की योग्यता के बाहर समझता है। इसलिए यह कार्य केवल वीतराग दूरदर्शी मनीषियों को ही दिया गया था।
दो सदनों की कल्पना
डॉ. के.पी. जायसवाल ने पाणिनि के सूत्र ३-३-४२ और यूनानी लेखकों के वर्णन से यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत के अनेक गणराज्यों में दो सदन रखने की प्रथा थी। हमारे विचार में पाणिनि के सूत्र से आर्थिक और राजनीतिक संघ के गुणों का भेद प्रकट होता है। यूनानी लेखकों ने भी यह स्पष्ट नहीं किया कि शासन-कार्य दो सदनों द्वारा होता था। इसलिए हम डॉ. जायसवाल के मत से सहमत नहीं, और हमारे विचार से प्राचीन गणराज्य इतने छोटे थे कि उनको दो सदन रखने की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई। इस विषय पर विस्तृत विवेचन हम गत अध्याय सात में कर चुके हैं, इसलिए उसकी पुनरावृत्ति यहाँ आवश्यक प्रतीत नहीं होती।
सहिष्णुता
मिल के मतानुसार मानव-प्रगति के लिए विचार एवं भाषण की स्वतंत्रता अत्यावश्यक है। यह नहीं कहा जा सकता कि जो विचारधारा एक समय में प्रचलित है, वही सत्य है। प्रचलित विचारधारा के विपरीत किसी व्यक्ति की विचारधारा का दमन नहीं करना चाहिए। सम्भव है कि यह ही विचारधारा सत्य हो। ईसा और सुकरात की विचारधाराएं प्रचलित विचारधाराओं से विपरीत थीं। सत्ताधारियों ने उनके दमन का यथासम्भव प्रयत्न किया। दोनों को प्राण दण्ड दिया गया। परन्तु संसार को मानना पड़ा कि वे सनकी नहीं थे, अपितु महापुरुष थे। इसी लिए मिल का कहना था कि आज हम जिनको सनकी कहते हैं और उनके अनोखे विचारों की उपेक्षा करते हैं, वे भविष्य में विशिष्ट बृद्धिमान भी सिद्ध हो सकते हैं। डॉ. जॉनसन का विचार था कि दमन से सत्य छिप नहीं सकता। सत्य की दृढ़ता के लिए दमन एक कठोर कसौटी है, परन्तु मिल ने इस प्रकार के दमन को प्रगति में बाधक बताया है। मार्टिन लूथर के पूर्व धर्म-सुधार आन्दोलन यूरोप में अनेक बार आरम्भ हुआ था, परन्तु वह दमन द्वारा रोक दिया गया। यदि ऐसा न होता तो सम्भवतः यूरोप में सोलहवीं शताब्दी से पहले ही धर्म-सुधार आरम्भ हो गया होता। लूथर के धर्म-सुधार के फलस्वरूप कई महत्वपूर्ण विचारधाराओं का बीजारोपण हुआ। यदि उसको पूर्व दमन से न रोका गया होता तो उससे और शीघ्र प्रगति हुई होती। सत्य अवश्य ही अमर है और दमन से उसका अन्त नहीं होता, तथापि दमन से प्रचार में विलम्ब किया जा सकता है। यह विलम्ब समाज के लिए हानिकर होता है।
भारतीय राजनीति में विचार और भाषण की स्वतंत्रता का महत्व माना गया था। इस देश में चार्वाक, शून्यवादी, द्वैतवादी अद्वैतवादी आदि अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी दार्शनिक हुए हैं। उनमें विचार संघर्ष चलता रहा, परन्तु किसी के विचार या भाषण पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाता था। रामराज्य में एक रजक को जनरंजक राजा राम की परम साध्वी सीता के विरुद्ध भी विचार व्यक्त करने पर प्रतिबन्ध नहीं था। राम चाहते तो उसको दण्ड दे सकते थे। परन्तु राम ने यही सोचा होगा कि दण्ड के द्वारा एक मुख बन्द किया जायेगा तो हज़ारों मुखों से वही आवाज़ निकलेगी। व्यवहार द्वारा ही जनता या व्यक्ति के विचार बदले जा सकते थे, दण्ड द्वारा नहीं।

अत: हिन्दू राजनीति में सहिष्णुता का पाठ विशेष महत्व रखता है। राजपद और प्रभुत्व का लोभ स्वभावतः मनुष्य में शक्ति को केन्द्रित करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करते हैं। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए ही हिन्दू-राजनीति में विधि को सर्वोच्च माना गया है। साथ ही इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि सब लोग अपने-अपने धर्म का पालन करने में स्वतंत्र हैं। हिन्दू-साहित्य में धर्म शब्द के अन्तर्गत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि सभी प्रकार की विधियां आ जाती हैं, इसीलिए हम देख चुके हैं कि गणराज्यों में सभी सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थाओं को अपनी-अपनी व्यवस्था, विधियों और न्याय-कार्यों में अधिकतम स्वतंत्रता राज्य की ओर से दी गयी थी। राज्य को उन संस्थाओं की आन्तरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करने के बहुत कम अवसर प्राप्त होते थे। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राजनीति में सहिष्णुता का, सिद्धान्त और व्यवहार दोनों रूपों में पालन किया जाता था।
असांप्रदायिकता
वैदिक कालीन राजनीतिक संगठन यद्यपि आर्थिक और स्थानीय संस्थाओं द्वारा बनाया जाता था, तथापि उसमें पुरोहित का पद महत्वपूर्ण दिखायी देता है। इस पद का महत्व कालान्तर में बढ़ता गया, यहाँ तक कि रामायण-काल में इस पद का महत्व राजा से कम नहीं प्रतीत होता और राजनीति में पुरोहित का महत्वपूर्ण सक्रिय भाग रहता था। परन्तु रामायण-काल के बाद इस पद का महत्व कम होता दिखायी देता है और महाभारत कालीन राजतंत्र में भी पुरोहित का महत्व केवल धार्मिक कार्यों तक ही सीमित हो जाता है।
अत: हमको यह विचार करना आवश्यक है कि पुरोहित के पद की राजनीति में क्या आवश्यकता थी। वास्तव में हिन्दू राजनीति में प्रत्येक राज्य का पृथक संविधान नहीं बनाया जाता था। धर्म का ही एक अंग राजधर्म भी था और वही राजधर्म सभी राज्यों का समान संविधान माना जाता था। इस संविधान की व्याख्या करने के लिए एक धर्मज्ञ विद्वान् की आवश्यकता होती थी। अतः हमारे विचार से पुरोहित की आवश्यकता मुख्यतः इसी कार्य के लिए थी। पुरोहित धर्मंग्रन्थों में निहित संविधान के अनुसार ही राजा का पथ-प्रदर्शन करता था। वैदिक कालीन राज्यों में धर्म का स्वरूप मानवधर्म का ही था। अतः धर्मानुकूल शासन में भी साम्प्रदायिकता की भावना आने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। परन्तु सूत्रों और स्मृतियों में धर्म का विकास वर्णाश्रम धर्म के रूप में किया गया। वर्णाश्रम धर्म में विभिन्न वर्णों की विधियों और कर्मों में भेद उत्पन्न हो जाता है। अतः तदनुसार ही तत्कालीन राजतंत्र में विभिन्न वर्णों के लिए शासन और न्याय में विभिन्नता आ जाना स्वाभाविक था।
परन्तु गणतन्त्र में स्थिति इसके विपरीत दिखायी देती है। वैदिककालीन जनतंत्रीय राज्यों में पुरोहित का पद होते हुए भी साम्प्रदायिकता के आने का प्रश्न नहीं था, परन्तु जब राजतंत्र में वर्णाश्रम धर्म के आ जाने से साम्प्रदायिकता आने की सम्भावना उत्पन्न हो गयी, तब जनतंत्र से पुरोहित का पद लुप्त होता दिखायी देता है। महाभारत कालीन और उसके बाद के गणराज्यों में हमको पुरोहित-पद का उल्लेख राजनीति से सम्बन्धित नहीं मिलता। इससे स्पष्ट हो जाता है कि गणराज्यों में साम्प्रदायिकता का प्रभाव नहीं पड़ सका। महाभारत, शान्तिपर्व में गणराज्यों के सम्बन्ध में स्पष्टतः कहा गया है कि राजनीतिक दृष्टि से सभी कुलों और जातियों को समानता का अधिकार प्राप्त होने पर भी, उनमें रूप, धन, बुद्धि आदि की असमानता को राज्य नहीं मिटा सकता। इस विषय पर हम विस्तृत रूप से विचार कर चुके हैं कि गणराज्यों में सभी वर्ण के व्यक्ति शासन में माग लेते थे। इसका संकेत भारतीय साहित्य में मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ काल तक राजतंत्र और गणतंत्र में उपर्युक्त भेद चलता रहा था, जब कि अशोक ने स्पष्टत: इस भेद को मिटाने की घोषणा कर दी थी।2
अशोक ने राजनीति में जिस धर्म का प्रसार किया था वह वास्तव में मानवधर्म था। इस आधार पर कुछ विद्वान् यहाँ तक मानने को तैयार हैं कि अशोक का वैयक्तिक धर्म भी बौद्ध धर्म नहीं था।3
भारतीय साहित्य में उपलब्ध अर्थशास्त्र और नीतिथशास्त्र भी यह बात प्रमाणित करते हैं कि कालान्तर में राजतंत्र में भी राजनीति को धर्म से सर्वथा पृथक रखने के विचार प्रबल हो चुके थे।
यूरोपीय देशों ने राजनीति को असाम्प्रदायिक बनाने का सिद्धान्त सहस्नों बार रक्तपात करने के बाद सीखा। परन्तु भारतीय जनतंत्र में यह सिद्धान्त सदैव व्यवहार में लाया गया था, जब कि भारतीय राजतंत्र में इसको शान्तिपूर्वक स्वीकार कर लिया गया था। यह कहना अनुचित प्रतीत नहीं होता कि भारतीय राजतन्त्र न यह पाठ गणतंत्र से ही सीखा था।
समानता
भारतवर्ष के विस्तृत भूभागों में भौगोलिक विभिन्नता के कारण तथा इस देश के जलवायु के प्रभाव से भारतवासियों की प्रकृति ही कुछ विभिन्नता की ओर दिखायी देती है। इसके फलस्वरूप यहाँ पर विभिन्न जातियाँ, उपजातियाँ, प्रथाएं और विभित्र विचारधाराएं मिलती हैं। परन्तु भारतीय स्वभाव में सहिप्णुता का गुण होने के कारण ही, इतनी विभिन्नताओं के होते हए भी यहाँ के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अधिक अशान्ति नहीं दिखायी देती। इसका मुख्य कारण यह था कि भारतीय राजनीति में सब धर्मों को समानता का अधिकार प्राप्त था। हम असाम्प्रदायिकता के विवरण में ऊपर लिख चुके हैं कि भारतीय जनतंत्र में सभी जातियों और वर्णों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त दिखायी देते हैं। भारतीय इतिहास में पुष्यमित्र शुंग से पहले राजनीति में धार्मिक पक्षपात का कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं। समानता के अधिकार के कारण ही, यहाँ पर विभिन्न धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराओं की उत्पत्ति और प्रचार सम्भव हो सका था।
उच्च न्याय और विधि की सर्वोच्च सत्ता
हिन्दू राजनीति की महान् देन उच्च न्याय-व्यवस्था है, और उसकी सर्वोत्कृष्ट देन है-विधि की प्रधानता। न्याय व्यवस्था के सम्बन्ध में हम पिछले अध्याय में विचार कर चुके हैं। न्याय करने में पिता-पुत्र का भी पक्षपात न करना, न्याय की सीमा से किसी को भी बाहर न मानना, न्याय-कार्य में विलम्ब न करना, न्याय केवल विद्वानों द्वारा ही करवाना, न्याय-कार्य एकान्त में करने का निषेध, मुकदमों का क्रमानुसार लेना, न्यायाधीश के कार्य को कार्यकारिणी के हस्तक्षेप से रहित रखना, वकीलों का प्रयोग, न्याय की कार्यवाही को लेखनीबद्ध करना, पूर्व निर्णीत मुकदमों का लेखा रखना और उनका भविष्य के निर्णय में प्रयोग करना आदि हिन्दू न्याय-व्यवस्था के मुख्य गुण हैं।
विधि की प्रधानता तो हिन्दू-राजनीति की आत्मा है। इसका महत्व इतना अधिक समझा गया है कि राजतंत्र के राजा के लिए भी विधियों का पूर्णत: पालन करना आवश्यक समझा जाता था। राज्याभिषेक के समय इसकी शपथ खानी होती थी कि वह धर्म का उल्लंघन कभी नहीं करेगा। इतना ही नहीं, विधि को अत्यन्त पवित्र माना जाता था। इसी लिए उसकी उत्पत्ति विधाता अथवा ब्रह्मा से मानी गयी है। धर्म पर आत्मबलिदान करने की भावना प्राचीन हिन्दू-समाज में सर्वत्र व्याप्त दिखायी देती है।
राज्य को भी विधि-संशोधन का अधिकार न देकर हिन्दू-राजनीति ने जनता के अधिकारों की महान् रक्षा की है। इसी कारण शासन का रूप राजतंत्र होने पर भी उसमें जनतंत्र के अधिकांश गुण दृष्टिगोचर होते हैं। आज भी जनतंत्रीय राज्य का सर्वोच्च लक्षण विधि की प्रधानता को ही माना जाता है। इसका आदि स्रोत हिन्दू राजनीति में ही निहित है।
—संदर्भ—
1. सृज्यते ब्रह्ममूर्तिस्तु रक्षते पौरुषो तनु:।
रौद्रीभावेन शमयेत् तिस्रोवस्था: प्रजापते:।। -महाभारत वनपर्व 272-47
2. डॉ. बेनीप्रसाद, दि स्टेट इन एंशियण्ट इण्डिया, पृष्ठ 199
3. उपर्युक्त, पृष्ठ 203
(चित्र परिचय : ललित कला अकादमी की वीथिका में प्रदर्शित पार्थ मंडल रचित पेंटिंग)
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