
- January 29, 2026
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हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....
खेद है - एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण
बड़े खेद की बात है कि इस संसार में दो ही चीज़ें सर्वत्र उपलब्ध हैं- सड़कों पर खुदा और लोगों की ज़ुबान पर खेद। आजकल खेद बड़ी ठसक के साथ प्रकट किया जा रहा है। जहाँ देखो, वहीं खेद। ट्रेन लेट हो जाये तो खेद, ट्रेन रद्द हो जाये तो गहरा खेद, और अगर समय पर आ जाये तो भी एहतियातन खेद क्योंकि इतनी चमत्कारी घटना पर शक होना स्वाभाविक है। रेलवे विभाग तो तब तक आपको डिब्बे में बैठने ही नहीं देता, जब तक सौ बार खेद प्रकट न कर ले। यात्री को भरोसा दिलाना ज़रूरी है कि लापरवाही हुई है, पर भावना सच्ची है।
सोशल मीडिया ने खेद को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले खेद करने के लिए घटना चाहिए थी, अब बस नेटवर्क चाहिए। कोरोना काल में तो खेद की ऐसी बाढ़ आयी कि कोई अगर ग़लती से मुस्कुराता हुआ फ़ोटो डाल दें, तो लोग टिप्पणी में RIP लिखकर अपनी संवेदनशीलता का प्रमाण दे देते थे। अब लंबा-चौड़ा शोक-प्रसंग लिखने की ज़रूरत नहीं। तीन अक्षरों का “RIP” लिखिए और आगे बढ़ जाइए। समय की बचत भी, संवेदना भी।
नेता लोग खेद के क्षेत्र में कृषि वैज्ञानिक हैं। वे जानते हैं किस मौसम में कौन-सा खेद बोना है। खेद ही बीज और खेद ही खाद। सुबह-सुबह पी.ए. उन्हें दिनभर का खेद-कार्यक्रम बता देता है- यहाँ हादसा, वहाँ दुर्घटना, उधर शिलान्यास, वहां कल हुए शिलान्यास के नीचे दबा नागरिक। खेद के बीज से वोटों की फसल उगायी जा रही है। नेता जी की गाड़ी में हमेशा पुष्पचक्र और चेहरे पर पूर्वाभ्यासित उदासी टंगी रहती है। भीड़ दिखी नहीं कि स्वर अपने आप निकलता है- “हमें गहरा खेद है…” फिर कान में पूछा जाता है, “मामला क्या है?” और वाक्य में ख़ाली जगह भर दी जाती है।
जनता भी नेताओं को खेद के पर्याप्त अवसर देती है। कभी रैली में दबकर, कभी सत्संग में कुचलकर, कभी फुटपाथ पर किसी रईस की गाड़ी के नीचे आकर। लोकतंत्र में भागीदारी का यही तो सौंदर्य है- आप अपनी पीड़ा देकर किसी को खेद प्रकट करने का अवसर देते हैं।
खेद की भी घुड़दौड़-सी लग रही है। कौन पहले पहुंचे, किसने बड़ा बयान दिया, किसका खेद ज़्यादा भावुक था। अगर विपक्ष पहले पहुँच गया, तो आपका खेद जेब में ही रह जाएगा। छोटे खेदों की कोई मार्केट वैल्यू नहीं।

खेद भी वीआईपी और बीपीएल श्रेणी का होता है। बीपीएल खेद मौसमी है- चुनाव के आसपास ही दिखायी देता है। बाक़ी समय देश में मानो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है। महंगाई, बेरोज़गारी, भूख- ये सब ऑफ़-सीज़न समस्याएँ हैं। चुनाव आते ही उन पर जमी धूल पोंछी जाती है और खेद की घुड़दौड़ शुरू हो जाती है। जो प्रत्याशी मगरमच्छी आँसू बहाने में ओलंपिक स्तर का हो, वही आगे निकलता है।
कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर खेद कभी पुराना नहीं पड़ता- संविधान, इमरजेंसी, नेहरू, गांधी, सावरकर। इन्हें राजनीतिक रसायनों में लपेटकर ममी बना दिया गया है ताकि ज़रूरत पड़ने पर निकालकर ताज़ा खेद प्रकट किया जा सके। आलू और पेट्रोल के दाम भी खेद के स्थायी संस्करण हैं।
वीआईपी खेद तो अलग ही क़िस्म का है। किसी रसूखदार को छींक आ जाये, तो दस लोग नाक रगड़ते हुए खेद प्रकट करने लगते हैं। पीएम साहब के चेहरे पर चिंता की एक लकीर दिख जाये, तो सेंसेक्स तक खेद प्रकट करते हुए गिरने लगता है। किसी वीआईपी का कुत्ता भी अगर स्वर्ग सिधार जाये, तो पूरा शहर संवेदना की परेड निकाल देता है।
सरकार को चाहिए कि एक राष्ट्रीय खेद दिवस घोषित कर दे। एक खेद स्मारक बने, एक खेद स्टेडियम भी। चुनाव में खेद प्रतियोगिता हो- जो सबसे ज़्यादा खेद स्कोर करे, वही विजेता। कम से कम ईवीएम पर हर बार खेद प्रकट करने की रस्म तो ख़त्म होगी।
अफ़सरशाही में खेद स्थायी मुद्रा है। “खेद है जनाब”, यह वाक्य फ़ाइल को वर्षों तक विश्राम देने के लिए पर्याप्त है। पुलिस और वकील खेद प्रकट नहीं करते, वे खेद करवाते हैं। डॉक्टर खेद प्रकट करते हैं कि मरीज़ नहीं बचा, और फिर मरीज़ के परिजन डॉक्टर को पीटने पर खेद प्रकट करते हैं। सब अपने-अपने तरीके से संवेदनशील हैं।
अख़बार वाले भी खेद के धंधे में पीछे नहीं। एक हाथ से संवेदना, दूसरे से विज्ञापन। संवेदनाओं की गंगा में अगर धंधे की जंग धुल जाये, तो क्या बुराई है?
मुझे भी आजकल खेद से गहरा परिचय हो गया है। रचना भेजो, जवाब आता है- “खेद है, प्रकाशित नहीं कर सकते।” उनके खेद से मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती है- क्यों मैं दूसरों से इतना खेद प्रकट करवाता हूँ? इसलिए अंत में मैं भी यही कहता हूँ- अगर यह लेख पढ़कर आपको कोई असुविधा हुई हो, तो… खेद है।
(कार्टून/ग्राफ़िक : मितेश द्वारा रचित)

डॉ. मुकेश असीमित
हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।
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