
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
सेहत आयात नहीं होती: सही भोजन कैसे चुनें?
वेल्स में एक बार एक डॉक्टर ने कहा था, “एन एप्पल अ डे कीप्स डॉक्टर अवे।” यह सही है। बिल्कुल सही है। लेकिन एक ख़ास भौगोलिक क्षेत्र के लिए।
भारत में भी, जहाँ बहुत ठंड पड़ती है जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल- वहाँ के लिए यह बात समझ में आती है। लेकिन मध्य भारत या दक्षिण भारत के लिए इसकी कोई जैविक आवश्यकता नहीं है।
उदाहरण के लिए, मैंने सेब की तुलना शरीफ़ा और बैंगन से की और पाया कि समान मात्रा में ये दोनों उससे अधिक लाभकारी हैं।
हम सेब को या किसी भी फल, मसाले या पौधे को क्यों खाते हैं? उसके भीतर पाये जाने वाले ख़ास रसायनों के कारण- जैसे एल्कलॉइड, पॉलीफ़िनॉल, पिगमेंट आदि।
यही वे तत्व हैं, जो वास्तव में एंटीऑक्सिडेंट का काम करते हैं और उपापचय (metabolism) से होने वाले नुक़सान से शरीर की रक्षा करते हैं।
जहाँ तक विटामिन और मिनरल्स की बात है- वे तो हर पौधे में होते ही हैं। उनके बिना किसी पौधे का अस्तित्व भी संभव नहीं।
दिखावे का खाना नहीं
क्योंकि प्रकृति को यूँ ही माँ नहीं कहा गया। माँ इसलिए कि वह देती है वह जो सब कुछ जो आपके शरीर को चाहिए।
माँ आपसे ज़्यादा आपको जानती है।
उसे पता है किस मौसम में तुम्हारे शरीर में क्या कमी आएगी, किस तापमान में कौन-सी सूजन बढ़ेगी, किस इलाक़े में कौन-सा रोग आम होगा।
उसी हिसाब से वह तुम्हारे आसपास फल, सब्ज़ियाँ, अनाज उगाती है।
आज की समस्या यह नहीं है कि खाना कम है। समस्या यह है कि खाना अपनी ज़मीन से अलग हो गया है।
फल अब पोषण नहीं, प्रदर्शन बन चुके हैं। आज फल का चुनाव भूख या स्वास्थ्य, स्वाद से नहीं, तस्वीर से तय होता है।
लाल स्ट्रॉबेरी = क्लास
गुलाबी ड्रैगन फ्रूट = ट्रेंड
कीवी = “इंटरनेशनल टेस्ट”
रंग भी अनायास नहीं है, उनके भी कारण होते हैं। लेकिन शरीर न रंग पहचानता है, न ट्रेंड, और न देश।
शरीर पहचानता है – जैविक उपयुक्तता (biological compatibility)।
स्ट्रॉबेरी बनाम शहतूत – रंग बनाम गहराई
स्ट्रॉबेरी चमकती है। शहतूत गहरा है। यह फ़र्क केवल रंग का नहीं, रसायन का है।

शहतूत में एंथोसायनिन स्ट्रॉबेरी से 2-3 गुना अधिक होता है।
- – ये वही यौगिक हैं, जो कोशिकाओं की झिल्ली को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाते हैं।
- – क्रॉनिक सूजन (low-grade inflammation) को कम करते हैं।
- – उम्र से जुड़ी बीमारियों मधुमेह, हाइपरटेंशन, न्यूरोडिजेनेरेशन की गति धीमी करते हैं।
यानी शहतूत सिर्फ़ “एंटीऑक्सिडेंट” नहीं, एंटी-डिके भी है।
- – मधुमेह में शहतूत रक्त-शर्करा के तेज़ उतार-चढ़ाव को रोकता है।
- – इंसुलिन पर बोझ कम करता है।
- – यकृत (लिवर) में फैट जमा होने की प्रक्रिया को धीमा करता है।
आज जब NAFLD, अर्थात मद्यपान न करने वालों के यकृत में सूजन, प्रीडायबिटीज़ और मेटाबॉलिक सिंड्रोम “नॉर्मल” बन चुके हैं, शहतूत एक मौन इलाज है।
- – यह फल पेट में जलन नहीं पैदा करता
- – आंतों को उत्तेजित नहीं करता
- – बल्कि माइक्रोबायोम को सहारा देता है।
पपीता बनाम ड्रैगन फ्रूट — असर बनाम आकर्षण
ड्रैगन फ्रूट देखने में आधुनिक है, पर शरीर के लिए सतही है।
पपीता देखने में साधारण है, पर अंदर से गहराई में काम करता है।
- – पपीते का विटामिन C सिर्फ़ इम्युनिटी बूस्टर ही नहीं है, यह सूजन को नियंत्रित करता है।
- – धमनियों की एंडोथेलियल परत को सुरक्षित रखता है।
- – कोलेजन संश्लेषण को सहारा देता है।
यानी दिल, त्वचा और जोड़- तीनों एक साथ।
पपीते का पेपेन, आज के सबसे आम रोग -पाचन की समस्या- का सीधा समाधान है।
आज का इंसान ज़्यादा खाता नहीं, जो खाता है वो भी ठीक से पचाता नहीं। ऐसिडिटी, गैस, भारीपन, कब्ज़ ये बीमारी नहीं, संकेत हैं। और पपीता उन संकेतों को बिना दवा के सिर्फ़ संतुलन से ठीक करता है।
कीवी बनाम अमरूद — आयात बनाम अनुकूलन
कीवी ठंडे देशों का फल है। अमरूद उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में होता है।
यह फ़र्क सिर्फ़ भूगोल का नहीं, शरीर विज्ञान का है।
अमरूद में अधिक विटामिन C इसलिए नहीं है कि वह “सुपरफ़ूड” है, बल्कि इसलिए कि उष्ण जलवायु में संक्रमण, सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस ज़्यादा होता है।
इसीलिए प्रकृति ने उसी हिसाब से अमरूद को डिज़ाइन किया।
- – यह कोलेस्ट्रॉल कम करता है
- – रक्त को स्थिर रखता है
- – संक्रमणों के ख़िलाफ़ आंतरिक सुरक्षा देता है।
उसी तरह कीवी पचाने में कई लोगों को समस्या देता है। अमरूद शरीर को “पराया” नहीं लगता।
बीमारी कहाँ से आती है? और क्यों स्थानीय फल काम करते हैं?
अधिकांश आधुनिक बीमारियाँ अचानक नहीं आतीं। बल्कि वे आती हैं लंबे समय की सूजन से, ग़लत माइक्रोबायोम से और जैविक असंगति से।
जब आप अपने शरीर से असंबंधित भोजन खाते हैं, तो शरीर उसे सहन करने में थोड़ी समस्या महसूस करता है। स्थानीय फल शरीर के साथ आसानी से सामंजस्य बना पाते हैं, वे उसके साथ काम करते हैं।
एक और पहलू है इसका, पर्यावरण और शरीर एक ही कहानी हैं। विदेशी फल हज़ारों किलोमीटर चलते हैं। ठंडे कंटेनर में, संरक्षित रसायन से लिप्त, प्लास्टिक के पैकेट में।
इस प्रक्रिया में पोषण घटता है, पर क़ीमत बढ़ती है। ठीक इसके विपरित स्थानीय फल पेड़ से सीधे शरीर तक आते हैं।
– कम हस्तक्षेप
– कम नुक़सान
जो धरती को नुक़सान पहुँचाता है, वह शरीर को भी पहुँचाता है।
आयुर्वेद कोई “वैकल्पिक ज्ञान” नहीं था। वह मूल्यांकन था सदियों लंबा, पीढ़ियों का।
शहतूत – रक्त और यकृत
पपीता – अग्नि और पाचन
अमरूद – प्रतिरक्षा और स्थिरता
आज विज्ञान बस उन बातों को दूसरी भाषा में दोहरा रहा है।
अंत में बस इतना ही…
- – सेहत दिखाने की चीज़ नहीं है। वह जीने की चीज़ है।
- – जो फल आपके घर के पास उगता है, वह आपके शरीर के पास होता है।
- – दिखावे का खाना छोड़ो।
क़ुदरत पर भरोसा रखो। वह माँ है। और माँ कभी ग़लत चीज़ नहीं देती।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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