महात्मा, गांधी, mahatma, gandhi, art, anita dubey
शख़्सियत को जानिए विवेक मेहता की कलम से....

महात्मा गांधी: विचार दर विचार

              वर्षों पहले एक दुबला-पतला, श्यामवर्णी, सामान्य क़द-काठी का व्यक्ति जिसने अपनी ज़रूरतों को कम करते हुए शरीर पर एक धोती लपेटने का प्रण ले लिया था; कहकर गया था- “Earth provides enough to satisfy every man’s need but not anyone greed”। यही नहीं दूरदृष्टि का परिचय देते हुए कहा था- “हम जो भी प्रकृति से ले रहे हैं वह आने वाली पीढ़ियों द्वारा दिया गया उधार है।”

गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर सन 1869 में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी शिक्षा इंग्लैंड में प्राप्त की। रंगभेद और असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष दक्षिण अफ़्रीका में शुरू कर राजनीतिक दीक्षा ली। अपनी राजनीतिक लड़ाई भारत में लड़कर देश को स्वाधीन कराया और मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बन गया।

एक सामान्य व्यक्ति जिसमें हर तरह की कमज़ोरियां थीं। जिसने चुराकर बीड़ियों के ठुड्डों का आनंद लिया था। सोने के कड़ों में से सोना चुराकर बेचा था। घरवालों से छिपकर चोरी-छिपे मांसाहार किया था। जबसे अपनी ग़लतियों को समझने लगा, तो सत्य को मानने लगा। उसके पिता ने चार विवाह किये थे, मगर वह एक पत्नीव्रता धर्म का निर्वाह करता रहा। ज़िंदगी में तीन-चार बार परिस्थितिवश ललचाया भी, डोला भी। मगर अडिग रहा। नारी का सम्मान करना जानता था। अपनी पत्नी पर अपने विचारों को थोपने के प्रयास में सविनय अवज्ञा आंदोलन का पाठ पढ़ता है। एक शिक्षा और लेता है कि अपने विचारों का दूसरा पालन करे, यह प्रयास करें यहां तक तो ठीक है, मगर जब उन्हें पालन करवाने/लादने की भावना से काम करें, तो तानाशाही का जन्म होता है।

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कई स्थानों पर उसके ज़माने में बोर्ड लगे थे ‘डॉग्स एंड इंडियन्स नॉट अलाउड’। इससे अन्य भारतीयों को परेशानी नहीं होती थी, मगर गांधी को हुई। क्योंकि लोगों के आत्मसम्मान के लिए वह प्रयासरत था, उनके लिए जीता था। इस कारण उसने कहा था- “जब तक हममें से सर्वाधिक दीन व्यक्ति सुखी नहीं होगा, मैं सुखी नहीं हो सकता।”1

गांधी अपने पूर्वजों की सीख पर चले। जैन धर्म के सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह के सिद्धांतों का उन पर प्रभाव था। गीता पर उनकी श्रद्धा थी। व्यक्ति राम नहीं, भगवान राम उनके आराध्य थे। सत्य को वह अपना साध्य मानते थे और अहिंसा को साधन। उनका मानना था कि अच्छे साध्य के लिए अच्छे साधन का होना भी ज़रूरी है। अन्यथा जो फल मिलता है, वह क्षणिक होता है। उनकी बातों पर विश्वास तो होता है परन्तु उनके बतलाये रास्ते पर चलना कठिन होता है। इस कारण फिर लौट-लौटकर उनकी बातों पर आना पड़ता है।

विकसित देशों का हिंसा का अर्थशास्त्र, अपना फैलाव, अपना विकास है। वे ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब, बेलगाम दोहन कर बार-बार पृथ्वीवासियों को संकट में डाल देता है। आने वाली पीढ़ियों की क्या बात करें! गांधीजी का मानना था “जीवन जीने के संसाधन आप लोगों के हाथों में रहने दें, सार्थक और समृद्ध जीवन की रचना वे ख़ुद कर लेंगे।”2

ग़रीबी को वह निचले स्तर की हिंसा मानते थे। उनका कहना था “मेरे जिये सपनों का स्वराज ग़रीबों का स्वराज है। जीवन की अनिवार्य चीज़ें उन्हें भी उसी प्रकार उपलब्ध होनी चाहिए जैसे राजाओं और धन वालों को उपलब्ध हैं।”3 उनके अनुसार देश में एक भी व्यक्ति भूखा है तो उस देश की आज़ादी बेकार है।

वह सभी देशों को समान मानते थे। उन्होंने कहा भी था “मैं उस देशभक्ति को त्याग दूंगा जो अन्य राष्ट्रों को व्यथित करके अथवा शोषित करके अपनी प्रबलता सिद्ध करने का प्रयास करें।”4

वह यह भी कहते थे, “दृष्टिकोण की भिन्नता का अर्थ परस्पर युद्ध की स्थिति में होना नहीं होता है।” 5 उनके अनुसार अनैतिक व्यक्ति कायर होते हैं।

प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उसके विचार बहुत ही स्पष्ट थे। ज़रूरत से ज़्यादा वस्तुओं का उत्पादन, दोहन वे प्रकृति पर दबाव मानते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को कम संसाधनों के साथ रहने की आदत पड़ जाये, तो ज़िंदगी में कुछ भी कम नहीं पड़ता। समाज में सभी के श्रम का मूल्य बराबर है। चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक। पूंजी ख़राब नहीं होती है परंतु पूंजी का ग़लत उपयोग उसे ख़राब बनाता है। पूंजी का असली मालिक एक पूंजीपति नहीं बल्कि समाज है। उनके ट्रस्टीशिप के सिद्धांतों को मानते हुए जब कुछ उद्योगपति समाज के उत्थान में सहयोग देते हैं तो अच्छा लगता है। उसके कुटीर उद्योग, स्वदेशी के विचार से असहमत हुआ जा सकता है। जब वे इस बारे में बात करते हैं तो सब को रोज़गार मिले, यह मुख्य बात उनके ध्यान में रहती है।

स्वच्छता के बारे में वे कहते हैं- “आपका पानी, भोजन और वायु स्वच्छ होनी चाहिए और आपको केवल व्यक्तिगत स्वच्छता से ही संतोष नहीं कर लेना चाहिए बल्कि अपने चारों ओर भी वही त्रिविध स्वच्छता सुनिश्चित करना चाहिए।”6

उनके अनुसार सबसे बड़ा धन सोना या चांदी नहीं है, स्वास्थ्य है। व्यक्ति की समानता के लिए, छुआ-छूत को हटाने के लिए वे आजन्म प्रयासरत रहे। हरिजन अख़बार भी निकाला। साबरमती आश्रम व्यवस्था उनके कार्यों का उदाहरण है। कस्तूरबा और अन्य लोगों से उनके कई बार मतभेद भी रहे। उसका कहना था- “We are not same in all ways but our diversity should never be used to to justify untouchability or in equality”।

दक्षिण अफ़्रीका में शुरू किये उनके रंगभेद के विरुद्ध आंदोलन ने वहां के भारतीयों को आत्मसम्मान से जीना सिखलाया। तो चंपारण के आंदोलन ने किसानों को शोषण, अत्याचार और ग़ुलामी से मुक्ति दिलाई। उनके अनुसार ग़ुलामी तब शुरू होती है जब आर्थिक संसाधनों का दोहन प्रारंभ हो जाता है। उसके अनुसार शक्तिशाली होने का अर्थ न ख़ुद का शोषण होने देना होता था न दूसरों का शोषण होने देना होता था। उनका मानना था, “अल्पसंख्यकों को इस बात की प्रतीति करायी जाना चाहिए कि जिस राज्य में वे रहते हैं। उसके वे उतने ही मूल्यवान नागरिक हैं जितने बहुसंख्यक।”7

गांधी जी कपट, शॉर्टकट और सुविधा के सरल रास्ते पर चलने के आदी नहीं थे। साधन की पवित्रता पर बहुत विश्वास करते थे। चंपारण आंदोलन के दौरान का एक क़िस्सा है- सरकार की ओर से गवाही देने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट की बात हुई। काक साहब तब ज़िला मजिस्ट्रेट थे। सीधे और ईमानदार व्यक्ति। उनकी रिपोर्ट किसानों के अनुकूल थी, दमनकारियों के विरुद्ध थी। रिपोर्ट की प्रति चोरी-छुपे उनके स्टेनोग्राफ़र ने आंदोलनकारियों को भिजवायी। सभी रिपोर्ट पाकर ख़ुश हुए। रिपोर्ट गांधी जी को दी गयी। गांधी जी ने पूछा- यह क्या है? लोगों ने सारी बात बतलायी। गांधी जी ने रिपोर्ट पढ़ने से मना कर दिया। उनका कहना था यह रिपोर्ट चोरी से मिली है। यदि स्टेनोग्राफ़र नौकरी छोड़कर खुले रुप में आये तो मैं सोचूंगा कि रिपोर्ट पढ़ूं या नहीं।8

गांधी अपने विचारों में विनम्र भी थे। महावीर के स्यादवाद पर उन्हें श्रद्धा थी। उनका कहना था “मैंने कोई नया सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया पुराने को प्रतिपादित किया है।”9

“गांधीवाद भ्रांति पर आधारित है और उसका नष्ट हो जाना ही उचित है। सत्य, अहिंसा कभी नष्ट नहीं होगी।”10

गांधी कम बोलते थे। ज़्यादा कर के दिखाते थे। SDG-30, गांधी जी की विचारों की ही पुनरावृति है। उनके अनुसार “जैसा साधन होगा वैसा साध्य मिलेगा। हिंसक साधनों से हिंसक स्वराज प्राप्त होता है।”11 देश यदि नियत और साधन सही रखेगा तो गांधी जी के अनुसार साध्य उन्हें प्राप्त हो ही जाएगा। हो सकता है थोड़ी देर लगे, थोड़ी कठिनाई आये।

सन्दर्भ-
1-यंग इंडिया,10/02/1927, पृष्ठ-44
2-हरिजन, 07/09/1947, पृष्ठ-317
3-यंग इंडिया,26/03/1931, पृष्ठ-46
4-यंग इंडिया,04/04/1929, पृष्ठ-107
5-यंग इंडिया,17/03/1927, पृष्ठ-42
6-कंस्ट्रक्टिव प्रोग्राम:इट्स मिनिंग एंड प्लेस-एम के गांधी, पृष्ठ 18-19
7-हरिजन,07/09/1947, पृष्ठ 310
8-गांधीमार्ग, मई-जून 1917,पृष्ठ 47
9-यंग इंडिया,02/12/1926, पृष्ठ 416
10-हरिजन, 02/03/1940, पृष्ठ 23
11-यंग इंडिया17/07/1924, पृष्ठ 236-237

(चित्र: प्रस्तर कलाकार अनिता दुबे रचित कलाकृति)

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

शिक्षा से सिविल इंजीनियर। पेशे से अध्यापक रहे। "क़िस्से बदरंग कोराना के संग", "बैताल कथाएं", "बेमतलब की" जैसे कॉलम थोड़े बहुत चर्चा में रहे। छुटपुट कहानी, कविता आकाशवाणी से प्रसारित होती रही और प्रकाशित भी होती रहती है। कोई पुस्तक, कोई पुरस्कार नहीं।

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