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पुस्तक चर्चा डॉ. अस्मिता सिंह की कलम से....

प्रेमचंद की अल्पचर्चित कहानियां: नया नज़रिया

           “प्रेमचंद की अल्पचर्चित कहानियाँ”, हिन्दी के अन्यतम आलोचक आनंद प्रकाश (संपादन, संयोजन और भूमिका) द्वारा प्रस्तुत नयी पुस्तक है। आनंद प्रकाश की आलोचना तटस्थ, निरपेक्ष और वैज्ञानिक दृष्टिबोध वाली होती है। साथ ही उनका इतिहास-बोध भी गहरा है। उनकी हर आलोचनात्मक पुस्तक में इतिहास की पृष्ठभूमि अवश्य देखने को मिलती है। इस पुस्तक में भी प्रेमचंद की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मिज़ाज को स्पष्ट करने के क्रम में लेखक ने उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के ऐतिहासिक संदर्भ की विवेचना की है।

साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दुर्दशा को रेखांकित करते हुए भारत की दुखद और त्रासद तस्वीर को पेश किया है। और उसी बहाने प्रेमचंद के साहित्य की भूमिका, अर्थवत्ता और उसके विशाल दायरे को रेखांकित करने की कोशिश की है।

आनंद प्रकाश की आलोचना की सबसे बड़ी ख़ूबी यह नज़र आती है कि वह चाहे जिस विषय को उठाएं, उसमें एक नवीन दृष्टिकोण अवश्य रहता है, जो पाठक की चेतना को कुरेदता है और उसके दृष्टि-विस्तार के साथ-साथ उसे सोचने पर मजबूर कर देता है। यही उनकी आलोचना की नवीनता है।

अब ज़रा इसकी भूमिका के शीर्षक पर ध्यान दें– “प्रेमचंद बदलाव के वक़्त का कहानीकार”। स्पष्ट है कि यह प्रेमचंद की लेखकीय ताक़त को उजागर करने वाला शीर्षक है। ‘बदलाव’ आलोचक की दृष्टि की विशिष्टता को तो दर्शाता ही है, साथ ही उस लंबे ऐतिहासिक दौर की भी याद दिलाता है, जो उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं सदी का संदर्भ सामने लाता है– वह दौर, जिसमें साम्राज्यवादी नीतियों के कारण भारत का समाज, ख़ासकर किसान और श्रम करने वाले वर्ग की अन्य श्रेणियाँ इस क़दर दुर्दशा की शिकार हो चली थीं कि उनका जीना हराम हो गया था। और ऐसी विषम परिस्थितियों में वे भाग्यवादी बनकर सब ज़ुल्म सहने को विवश हो चुके थे। भारत की आर्थिक स्थिति ख़स्ता हो चुकी थी। आनंद प्रकाश लिखते हैं:

“अगर हम अपने व्यापक सांस्कृतिक माहौल पर नज़र डालें, तो पाएंगे कि भारत की साम्राज्यवादी मुहिम में शिक्षा, भुखमरी और रूढ़िवादिता की चुनौतियों से निपटना आसान नहीं था। यह विशेषकर उत्तर भारत में महसूस किया जा रहा था, जहाँ किसानों और दलितों की जीवन-पद्धति सोचनीय थी। समाज के, जो तबके उन्नीसवीं सदी में आर्थिक शोषण, गैर-बराबरी, महामारी, और पिछड़ेपन की मार झेल रहे थे, वे बीसवीं सदी की शुरूआत में राजनीतिज्ञों, विचारकों और लेखकों से गंभीर हस्तक्षेप की उम्मीद करते थे। इससे उन्नीसवीं सदी के सुधारवादी आंदोलनों ने एक हद तक समझा भी था, जिसके चलते देश के एक बड़े हिस्से का ध्यान अचानक वैचारिक विकास की तरफ़ गया था। प्रेमचंद उसमें शामिल थे। गाँव, क़स्बा और छोटे शहर इस बात के गवाह थे कि जीवन का ढाँचा, उसका आंतरिक ताना-बाना दिन-ब-दिन शिथिल हो रहा था और उसके बीच निराशा और भाग्यवाद पनप रहा था। ये रूढ़िवादी व्यवहार और जड़ीभूत सोच समाज को अंदर से खोखला कर रही थी।”

उपरोक्त पंक्तियों से दो निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, लेखक का इतिहास-बोध, और दूसरा प्रेमचंद के लेखन की विस्तृत ज़मीन, जो उस सोच और उस संवेदनशीलता को एक साथ स्थापित करती है। यानी प्रेमचंद की साहित्यिक भूमिका कितनी गंभीर और विवेकपूर्ण है, इसका खुलासा भी लेखक इन पंक्तियों के माध्यम से करता है।

चूँकि प्रेमचंद की सोच संस्कृति, समाज और राजनीति के अनोखे मिश्रण से बनी थी इसलिए संभावना के स्तर पर प्रेमचंद का वक़्त केवल साहित्य का नहीं, बल्कि देश की तारीख़ और सामान्य जन-जीवन का वक़्त नज़र आने लगा था। कहा जा सकता है कि वह ऐतिहासिक लम्हा असल में किसी बड़े बदलाव को इंगित करता था। यह एक ऐसा घटनाक्रम था, जिसके केंद्र में किसानों, मज़दूरों, और छोटे उद्यमियों की शारीरिक-मानसिक मेहनत झलकती थी।

प्रेमचंद के साहित्य और जीवन की यही पृष्ठभूमि थी। आप देखें कि उसका दायरा कितना विस्तृत और गहन है। मार्क्सवादी विचारों का भी भारत में प्रवेश हो चुका था। किसी भी प्रतिबद्ध लेखक या चिन्तक के लिए साहित्य का एक क्रांतिकारी हथियार होना लाज़िमी था, न कि परंपरागत साहित्यिक प्रवृतियों को नये निखार के साथ प्रस्तुत करने का। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों को सामाजिक परिवर्तन के लिए हथियार बनाया।

कुछ आलोचक प्रेमचंद की जन-जीवन की कहानियों पर प्रोपेगैंडा का आरोप भी लगाते हैं। प्रेमचंद का साहित्य महज़ साहित्य न होकर समाज को, उसकी अंधविश्वासी सोच को, उसकी रूढ़िवादिता को, उसकी कुंद होती जा रही सामाजिक और राजनितिक सोच को, जो बदहाली और जहालत की वजहें थीं… इस सबसे जन साधारण को मुक्ति दिलाने का औज़ार था।

प्रेमचंद के साहित्यिक विचारों को आगे बढ़ाने वाले साहित्यकार आज लगभग नहीं के बराबर हैं। उनकी परंपरा को सही मायनों में गिने-चुने लोगों ने ही आगे बढ़ाया। कुछ आलोचक और साहित्य प्रेमियों ने उनके साहित्य को सामान्य क़िस्म का रचनात्मक प्रयास मानकर नकार दिया और इसे पारंपरिक सौंदर्य-बोध से वंचित भी समझते रहे।

यह स्थिति न केवल प्रेमचंद के महत्व को सीमित करती है, बल्कि हिंदी साहित्य की उस कमज़ोरी को भी उजागर करती है, जिसके कारण आज का साहित्य और साहित्यकार बेअसर और बेजान होते जा रहे हैं। मुक्तिबोध की इन पंक्तियों पर ध्यान दें: “प्रेमचंद उत्थानशील भारतीय सामाजिक क्रांति के प्रथम और अन्तिम महान कलाकार थे- इस क्रांति का नेतृत्व पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के हाथ में था, और वह शहरों में रहता था।”

लेखक ने मुक्तिबोध की इन पंक्तियों को एक ख़ास मतलब से कोट किया है। प्रेमचंद एक प्रतिबद्ध लेखक थे और साहित्य ही उनका हथियार था जिसका उन्होंने भारतीय सामाजिक क्रांति के लिए मज़बूती से प्रयोग किया है। आज हम यक़ीनन कह सकते हैं कि साहित्य समाज का आईना होने के साथ-साथ जनमानस की रूढ़िवादिता को तोड़ने वाला, विकास की नयी चेतना जगाने वाला होना चाहिए, तभी उसकी सार्थकता है। प्रेमचंद का साहित्य इसका साक्षात प्रमाण है।

प्रेमचंद की परंपरा को आगे ले जाने वाले साहित्यकारों की संख्या गिनी-चुनी ही रही, वो मध्यवर्ग के नेतृत्व में चली गयी, जो एक तरह की दृष्टि संकीर्णता के कारण साहित्य को भी सिर्फ मध्यवर्गीय सोच के सीमित दायरे में रखने को विवश रहा। और साहित्य अपने मूल मक़सद से अलग होकर रह गया। आज उसका नतीजा हमारे सामने है।

प्रेमचंद का साहित्य वक़्त का तक़ाज़ा था। प्रेमचंद को बदलाव के वक्त का रचनाकार मानते हुए आनंद प्रकाश उन्हें बीसवीं सदी की आवाज़ के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। और इसको विश्लेषित करने के क्रम में प्रेमचंद के साहित्यिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सोच के सहारे प्रेमचंद की कहानियों की अर्थवत्ता को संपूर्ण रूप से स्थापित करते हैं। उनके साहित्य की सामाजिक आलोचना और प्रासंगिकता के पक्ष की मीमांसा तो की ही है, जिस पक्ष को आधार बनाकर आलोचकगण प्रेमचंद की कहानियों के महत्व को आंकते हैं, उसके साथ- साथ उस पक्ष की भी विस्तार से व्याख्या प्रस्तुत की है, जिस पक्ष पर आलोचकों की नज़र नहीं गयी थी।

सामान्य तौर पर आलोचकों ने प्रेमचंद के महत्व को साबित करने के लिए उनकी महज़ दस-बारह कहानियों की ही चर्चा की है। जैसे बड़े भाई साहब, पूस की रात, कफ़न, बडे़ घर की बेटी, दो बैलों की कथा, ईदगाह, सवा सेर गेहूँ, नमक का दरोग़ा, पंच परमेश्वर, आदि। जबकि प्रेमचंद की कुल प्रकाशित कहानियाँ तीन सौ हैं। आलोचकों ने ऐसी कुछ कहानियों को ही प्रासंगिकता और सामाजिक आलोचना के नज़रिये से देखा-परखा और उन कहानियों के महत्व को प्रतिपादित किया। निश्चित रूप से ये कहानियाँ समाज के अन्याय और उससे पैदा होने वाले दर्द का बयान करतीं हैं और कल्पनाशीलता और व्यापक मानव मूल्यों की ऊंचाईयां छूती हैं।

इस पुस्तक में संकलित कहानियाँ इस दायरे से बाहर की हैं। आलोचक इन कहानियों के महत्व को इस प्रकार अंकित करता है: “इस संकलन में प्रेमचंद की उन कहानियों को लिया गया है, जो अब तक प्रायः हिन्दी कथा आलोचना के केन्द्र में जगह न पा सकीं। इन कहानियों का विषय प्रचलित से हटकर हैं और एक दूसरे ही प्रेमचंद से हमारा सामना कराती हैं। प्रेमचंद की इच्छा थी कि भारत के विश्वासों, उसकी मान्यताओं आदि को इस तरह जाना और समझा जाये कि यहाँ का नागरिक अपने आभ्यंतर के आस्थाजन्य विचारों और संतों से मुख़ातिब हो। प्रचलित प्रेमचंद के सार्थक आग्रहों को फिर से फ़लसफ़े की नयी रोशनी में दिखलाती हैं।”

अभी तक प्रेमचंद की कहानियों को प्रासंगिकता और सामाजिक आलोचना के जिस नज़रिये से देखा गया है, उससे इतर यहाँ लेखक ने प्रेमचंद की कहानियों के दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखकर, उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के आयाम को विस्तार दिया है, यूँ कहें कि आनंद प्रकाश की इस पुस्तक ने प्रेमचंद की कहानी आलोचना को पूर्णता प्रदान की है।

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साहित्य समाज का दर्पण होता है। इस नज़रिये से प्रेमचंद की कहानियाँ तत्कालीन समाज का दर्पण होने के साथ-साथ ग़ुलाम भारत के एक लम्बे दौर से गुज़रती पीड़ित भारतीय-जन की दास्ताँ भी है और साथ ही अपने वक़्त से भी रू-बरू कराती है। लेखक लिखता है, “प्रेमचंद के समाज की तस्वीर अनेक अर्थों में हमारे समाज का ख़ाका है, जहाँ हम अपनी मुश्किलों पर सोचने को मजबूर होते हैं। प्रेमचंद के सामयिक होने और चर्चा में रहने का कारण शायद यही है.. प्रेमचंद के कथा लेखन को उसके समूचे में ऐसा सामाजिक इतिहास कहा जा सकता है जो पाठक की समझ को विकसित करने के साथ-साथ उसके लिए चिन्तन के नये आयाम खोलता है।”

लेखक ने प्रेमचंद के “साहित्य का आधार” लेख से इन पंक्तियों को विशेष रूप से उल्लिखित किया है, जो प्रेमचंद के नज़रिये से साहित्य की भूमिका होनी चाहिए, ज़रा पंक्तियों पर गौर करें: “जब साहित्य की सृष्टि भावोत्कर्ष पैदा करने वाली होती है, तो यह अनिवार्य है कि उसका कोई आधार हो। हमारे अन्त:करण का सामंजस्य जब तक बाहर के पदार्थों या वस्तुओं या प्रणियों से न होगा, जागृति हो ही नहीं सकती। भक्ति करने के लिए भी किसी पात्र की आवश्यकता है। तात्पर्य यह कि हमारे भावों को जगाने के लिए उनका बाहर की वस्तुओं से सामंजस्य होना चाहिए। अगर बाह्य प्रकृति का हमारे ऊपर असर न पड़े, अगर हम किसी को पुत्र-शोक में विलाप करते देखकर आंसू की चार बूंदें नहीं गिरा सकते, अगर हम किसी आनंदोत्सव में मिलकर आनंदित नहीं हो सकते, तो यह समझना चाहिए कि हमें निर्वाण प्राप्त हो चुका है। उस दशा में साहित्य का कोई मूल्य नहीं।”

महज़ चन्द पंक्तियों में साहित्य के उद्देश्य को कितनी स्पष्टता से बताया गया है। आनंद प्रकाश के अनुसार इन पंक्तियों में साहित्य की सामाजिक भूमिका में कितने सारे विचारों को शामिल किया गया है। वह भूमिका में लिखते हैं: “प्रेमचंद की कहानियों का हर वाक्य पाठक के सोच को इन्साफ़ और बराबरी की दिशा में ले जाता है। ख़ास तौर से इस नज़रिये के बरअक्स वह अपने सीमित वक़्त से बहुत आगे निकल जाते हैं।”

इस प्रकार इस पुस्तक में लेखक ने प्रेमचंद की कहानियों की विशिष्टता और महता को स्थापित किया है। प्रेमचंद की कहानियों के महत्व को संपूर्णता में प्रस्तुत करने के लिए ही शायद लेखक ने इस पुस्तक की कल्पना की है। इसमें अपनी पसंद की उन कहानियों को चुना है जो उनकी नज़र में प्रेमचंद की कहानियों को पूर्णता से समझने के लिए आवश्यक है। इस संग्रह में जिन कहानियों को चुना गया है, वे सभी कहानियाँ किसी न किसी सामाजिक मुद्दे को उठाने वाली हैं। बकौल लेखक:

“परंम्परा की जांच और उसकी विवेकपूर्ण व्याख्या, गाँव की समस्याएं, आज़ादी-आंदोलन के वक़्त लेखकीय रवैया, धार्मिक विश्वास का प्रसंग, त्योहारों के माहौल में लोगों की स्वभाविक एकजुटता, मध्यवर्गीय नज़रिये की काल्पनिक उडा़न, सामाजिक बदलाव की मानवीय कल्पना, हमदर्दी के बरअक्स उठने वाले सवाल, नारी द्वारा किये गये विरोध की ज़ेहनी शक्ल, विवाह, प्रेम और समाज की बनावट का उलझावपूर्ण पहलू और जाति से जुड़ा ख़तरनाक और डरावना नज़ारा।”

इन बातों की रोशनी में अगर हम इस पुस्तक में संकलित कहानियों की जांच करें तो पाएंगे कि हर कहानी किसी न किसी सामाजिक समस्या को उघाड़ती है। प्रत्येक कहानी धार्मिक अंधविश्वास और पाखण्ड, रूढ़िवादी सोच की विडम्बना को उजागर करती है। कुछ कहानियाँ मानव-मन की सहज प्रवृत्ति की वैज्ञानिक विवेचना भी करती हैं।

इसमें संकलित प्रत्येक कहानी का औचित्य आलोचक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सिद्ध करता है। ‘वेश्या’ कहानी लेखक की दृष्टि में एक अति महत्वपूर्ण कहानी है। वेश्या पर कई लेखकों ने लिखा है। ज़्यादातर ने उसकी बदहाली का ही वर्णन किया है पर प्रेमचंद का इन्साफ़ पसन्द नज़रिया समाज में’ वेश्या’ के तिरस्कारपूर्ण स्थान को दिखाने के साथ-साथ उसके प्रति समाज के नज़रिये और समाज के प्रति उसके नज़रिये को दिखाने के लिए माधुरी (वेश्या) को ही आधार बनाता है। आनंद प्रकाश मानते हैं कि वेश्या कहानी पीड़ित और असंतुष्ट माधुरी नाम की औरत को अपना आधार बनाती है। प्रेमचंद उसके बल पर अपना तर्क गढ़ते हैं। वह पाठक के लाभार्थ माधुरी के अनुभव उसकी तपिश के बरअक्स दयाकृष्ण, सिंगार सिंह और लीला के नज़रिये का जायज़ा लेते हैं।

इस कहानी में प्रेमचंद ने बड़े सवालों को उठाया है, जैसे सतीत्व जो नारी दासता की सबसे मज़बूत ज़ंजीर है और इसमें वर्ग-विभाजन के सवाल को भी उठाया गया है। प्रेमचंद का आशय प्रेम, देह, व्यापार और परिवार से जुड़ी सीमित नैतिकता को बौद्धिक शक्ल में पेश करना है। इन समस्याओं को बडे़ वितान पर परखा जाये, तो इस कहानी की विस्तृत ज़मीन और इसके महत्व को समझना आसान हो जाएगा।

मर्यादा की अवधारणा राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान रूढ़िवादी तबक़ों द्वारा निहित स्वार्थों की मदद करती थी, पर “मर्यादा की वेदी” कहानी में राजकुमारी प्रभा के मार्फ़त प्रेमचंद मर्यादा की एक नयी परिभाषा गढ़ते हैं। इस कहानी में विवाह, परंम्परा, प्रेम, वंश और परिवार सबको एक साथ प्रेमचंद आलोचना के घेरे में लाते हैं। आनंद प्रकाश मानते हैं मंदार राजकुमार और झालावाड़ की राजकुमारी प्रभा का इस्तेमाल यहाँ अद्भुत रचनात्मकता से हुआ है।

इस कहानी में राजकुमारी प्रभा जिस अंदाज़ में कुर्बानी को चुनती है, वह निजी प्रेम से ऊपर सामाजिक जिम्मेदारी को दर्शाता है। प्रेम के लिए अपना बलिदान तो करती है पर वह बलिदान क्षत्रिय-व्यवहार के बनिस्बत व्यापक ख़ूनी संघर्ष को रोकने वाला साबित होता है। प्रभा का बलिदान क्षत्रिय-व्यवहार के बजाय मनुष्यता केन्द्रित आदर्श है। यही प्रेमचंद की लेखनी का कमाल है… जिसे आनंद प्रकाश कथा का नया प्रतिमान मानते हैं और यही बात प्रेमचंद की इस कहानी को एक महत्वपूर्ण कहानी बना देती है।

‘दुर्गा का मंदिर’ जैसा कि नाम से स्पष्ट है, धर्म से जुड़ी कहानी है। इसमें दुर्गा की शक्ति और महिमा का वर्णन ही महत्वपूर्ण होता, ऐसा अनुमान होता है। पर प्रेमचंद के प्रसंग में यह सतही तौर पर असंगत प्रतीत होता है। 1917 में प्रकाशित यह कहानी लिखने का जो ख़ास मक़सद था, वह यह कि प्रेमचंद समाज में व्याप्त उन आदर्शों और विश्वासों को भी सामने लाना चाहते थे, जो प्रसंग विशेष या परिस्थिति विशेष में समाज की वास्तविक कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होते, बल्कि एक सकारात्मक नैतिक नियम के रूप में निष्पादित होते हैं- जो लोगों को संवेदना और सांत्वना का पाठ पढ़ाना चाहते हैं।

“लाटरी” कहानी में कर्मकांड और धार्मिक विश्वास पर चोट है, इसमें पूंजी से ग्रसित जन-साधारण पर व्यापार केन्द्रित सोच की गिरफ़्त कितनी कड़ी हो सकती है, इसको प्रत्यक्ष दिखाने की कोशिश है। “शिकारी राजकुमार” कहानी बाहर झांकने के साथ-साथ स्वामी वर्ग के शीर्ष पर बैठे निर्णायक व्यक्ति के भीतर भी झांकती है।

ऐसे ही “विचित्र होली” कहानी मानव व्यवहार के एक दूसरे पहलू को सामने लाती है। इसमें त्योहारों के माहौल में लोगों की स्वाभाविक एकजुटता की प्रवृत्ति को दिखलाया गया है। होली की तरंग में अंग्रेज़ों के मातहत (भारतीय) कर्मचारी अंग्रेज़ अफ़सर पर रंग डालकर एक अप्रत्याशित क़दम उठा डालते हैं, यहीं नहीं अंग्रेज़ों का एक चमचा भी जोश में आकर मालिक की बेअदबी कर बैठता है। होली के नाम पर उनका यह कृत्य दो बातों की तरफ़ इशारा करता है… पहला, जश्न की तरंग में एकजुट होने के कारण साहसी होने का बोध दूसरे, मालिक के प्रति मन में दबी नफ़रत, जो मौक़ा पाकर अचानक प्रकट हो जाती है।

“पशु से मनुष्य” कहानी में प्रेमचंद पूंजीवादी आर्थिक नीति की व्याख्या करते हैं, जो उनकी प्रतिबद्धता को सामने लाता है। “समस्या” कहानी पर आनंद प्रकाश लिखते हैं, “व्यक्ति अपने से ही सवाल करता दिखलाया गया है कि उसने जो किया वह सही था या नहीं? याने, उसकी ग़लती को ग़लती माना जाये या नहीं? क्या समस्या इसलिए तो पैदा नहीं हुई कि उसका सुधारवाद सतही विचार पर टिका हुआ था?”

“बारात” कहानी में सभी चीज़ें उलझी हैं। इस संकलन की आख़िरी कहानी “सद्गति” है। वैसे यह कहानी अब एक महत्वपूर्ण कहानी बन चुकी है। जबसे सत्यजीत राय ने इस पर फ़िल्म बनायी, तबसे आलोचकों की नज़र में यह महत्वपूर्ण हो गयी। उसके पहले इस कहानी पर किसी का ध्यान नहीं गया था। और यहीं से ‘गांठ’ की व्याख्या शुरू हुई तो गांठ की जड़ सदियों पीछे तक पहुँच गयी। आनंद प्रकाश लिखते हैं: “गांठ का प्रतीक विषम और अनपेक्षित शक्ल अख़्तियार करता है और कहानी के दायरे से स्वयं भी आज़ाद होता है। उस हालत में वह समाज के लंबे इतिहास पर टिप्पणी बनता है। दूसरी तरफ़, कहानी का रूपक लेखक की भूमिका को, उसकी यात्रा को भी समझाता है।”

इस पुस्तक में संकलित प्रत्येक कहानी का रचनाकाल भी बताया गया है। आनंद प्रकाश एक संतुलित और तार्किक आलोचक हैं, जिनकी लेखनी में विशेषकर आलोचना में एक भी फ़िज़ूल शब्द खोजना मुश्किल है। कहानियों के रचनाकाल को देने के पीछे भी उनका ख़ास मक़सद है। वह तर्क देते हैं, “रचनाकाल का महत्व इस चीज़ में है कि पाठक को पता हो, लेखक किस रचनात्मक स्तर पर अपने सांस्कृतिक माहौल का जायज़ा लेता है और किस तरह उस वक़्त की सच्चाई से मदद लेकर अपने कला मूल्य विकसित करता है।”

आनंद प्रकाश ने इस पुस्तक के मार्फ़त प्रेमचंद की प्रतिबद्धता को स्थापित करने के साथ ही कहानी के प्रति उनके विचारों को को भी स्पष्टता से स्थापित किया है। यह पुस्तक इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि प्रेमचंद की कहानियों का जो एकपक्षीय मूल्यांकन हो पाया, उसे व्यापक धरातल देकर प्रेमचंद की कहानियों को अर्थ-विस्तार दिया गया है। साथ ही, प्रेमचंद के विचारों को, उनकी प्रतिबद्धता को एक नये नज़रिये से परखा है। यह पुस्तक पाठक को एक नये प्रेमचंद से रू-ब-रू करवाती है, ऐसा लेखक का विश्वास है।

अस्मिता सिंह, asmita singh

अस्मिता सिंह

कहानीकार एवं आलोचक। लंबे समय तक मगध यूनिवर्सिटी और पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिन्दी-साहित्य का अध्यापन। प्रमुख पुस्तकों में 'रंग से बेरंग होती ज़िंदगी', 'इन्तज़ार तो ख़त्म हुआ' (कहानी-संग्रह), 'फुलिया' (उपन्यास), 'शमशेर: अभिव्यक्ति की कशमकश (आलोचना पुस्तक), नारी मुक्ति: दशा एवं दिशा (नारी विमर्श), दलित अनुभव का सच (दलित-विमर्श) हैं। साथ ही, लू-शुन के पत्रों के अनुवाद और अन्य संकलित व संपादित पुस्तकें भी। बहुपठित एवं बहुप्रकाशित लेखक अस्मिता सिंह इन दिनों एस.ए. डांगे इंस्टीट्यूट आफ सोशलिस्ट स्टडीज़ एंड रिसर्च में निदेशक-प्रमुख हैं।

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