
अली अब्बास उम्मीद के मिसरों पर कहे गये शेर
भोपाल। उस्ताद शायर ज़फ़र सहबाई की सदारत में “सुख़न-सराए” भोपाल के ज़ेरे-एहतमाम ब-यादे डॉक्टर अली अब्बास उम्मीद तरही बज़्म आरास्ता की गयी। 8 फरवरी 2026 को इस प्रोग्राम में उर्दू अदब की रिवायत को ज़िंदा रखते हुए अदबी शहर भोपाल के नौजवान उर्दू शोअरा ने इक़बाल लाइब्रेरी में कलाम पढ़े। कुछ हफ़्तों पहले शायरों को उम्मीद साहब के मिसरे दिये गये थे, जिन पर सभी शेर कहकर लाये थे।
इस महफ़िल में मुअज़्ज़ज़ मेहमानान-ए-ख़ुसूसी की हैसियत से हाजी हारून (अदबी शख़्सियत और मरहूम अली अब्बास उम्मीद के क़रीबी दोस्त), नायब क़ाज़ी शहर भोपाल अली क़दर हुसैनी (मरहूम के निहायत क़रीबी) इक़बाल मसूद (उर्दू शायर और अली अब्बास उम्मीद के ख़ैरख़्वाह), चेयरमैन इक़बाल लाइब्रेरी मुनव्वर अली (जो मोहब्बत से अली अब्बास उम्मीद को “अब्बा” कहा करते थे) और इनायत अब्बास (मौसूफ़ के साहबज़ादे) शरीक हुए। निज़ामत का फ़र्ज़ मशहूर नाज़िम बद्र वास्ती ने ब-हुस्न-ओ-ख़ूबी अंजाम दिया।
इस मौक़े पर एक नये अदबी ऐजाज़ी सिलसिला “याद-ए-रफ़्तगाँ” का बाक़ायदा आग़ाज़ किया गया, जो उन शख़्सियतों के लिए है, जिन्होंने उर्दू अदब के फ़रोग़़ में नुमायाँ ख़िदमात अंजाम दी हैं। इस सिलसिले के तहत कारनामा-ए-हयात का मेमेंटो सदर-ए-मुशायरा ज़फ़र सहबाई साहब को पेश किया गया।
इसी मौक़े पर नौजवान शोअरा के अदबी ग्रुप के नाम “सुख़न-सराए” का भी ऐलान किया गया, जो फ़िक्र, इज़हार और अदबी ज़िम्मेदारी की एक मुश्तरका कोशिश का आग़ाज़ है।

प्रोग्राम के आख़िरी हिस्से में तरही महफ़िल मुनअक़िद की गयी। मरहूम अली अब्बास उम्मीद के दो मिसरों पर शोअरा ने अपनी ख़ूबसूरत तख़्लीक़ात पेश कीं। तीस से ज़्यादा शोअरा-ओ-शाइरात ने शिरकत कर कलाम से महफ़िल को यादगार बना दिया। पेश किये गये अशआर में से जो ज़्यादा पसंद किये गये, वो (सब तो मुमकिन नहीं) यहां एक नज़र:
सबको क़ुदरत की तरफ़ से मिला करती है ढील
आँधियों में ख़स-ओ-ख़ाशाक़ के तेवर देखे
~ क़ाज़ी मलिक नवेद
जिसके दम से है मनाज़िर उसी चश्मे से तू
ऐन मुमकिन है कोई और ही मंज़र देखे
~ आमिर अज़हर
सबने पड़ते हुए जूते मेरे सर पर देखे
पापा ने जब मेरे एग़्ज़ाम के नंबर देखे
~ अनवर मोहम्मद शान
सिम्त-ए-लैला नहीं देखा है किसी ने मुड़कर
सबने बस क़ैस पे आते हुए पत्थर देखे
~ आदिल इमाद
आबले उसको दिखा देना मिरे पैरों के
जो भी हाथों की लकीरों में मुक़द्दर देखे
~ मुहम्मद इन्साफ़
आँख में एक भी क़तरा नहीं देखा जाता
देखने को तो कई बार समंदर देखे
~ अज़ीम असर
इस तरह वक़्त ने बर्बाद किया है मुझको
ढलता सूरज भी सर-ए-शाम ठहरकर देखे
~ इमरान ख़ान
चाहता है वो अगर सच में समंदर देखे
उससे कह दो मेरी आँखों में उतरकर देखे
~ रूपाली सक्सेना ग़ज़ल
भर ही जाएँगे मिरे ज़ख़्म हरे हैं जो अभी
वो मुझे प्यार से एक बार तो छूकर देखे
~ अरशद ख़ान
रूह में अपनी उतरते जाते ख़ंजर देखे
जब भी ख़बरों में फ़िलस्तीन के मंज़र देखे
~ सैयद ताहा अलहुसैनी
आज सड़कों पे लुटी इस्मतें सबने देखीं
काश कोई ज़रा घर में छुपे कायर देखे
~ डॉक्टर अमीश मिश्रा
क़ाबिल-ए-ज़िक्र ये भी रहा कि इस महफ़िल में बड़ी तादाद में सामईन मौजूद थे, वो सिर्फ़ अली अब्बास उम्मीद साहब से मोहब्बत, अक़ीदत और जज़्बाती वाबस्तगी के तहत इस प्रोग्राम में शरीक हुए।
प्रोग्राम में शिरकत करने वाले सामईन हज़रात में मेहताब आलम, आरिफ़ अली आरिफ़, ख़ालिद ग़नी, नज़र महमूद, डॉक्टर क़मर अली शाह, डॉक्टर नौमान, यूसुफ़ ख़ान, तसनीम राजा, सैफ़ मलिक, रईसा मलिक, शावेज़ सिकंदर, ख़ालिद ख़ान, इंसाफ़ रसूल, शुऐब अली ख़ान शाद, समीन-उज़-ज़फ़र, परवीन पारो, ए.एस.के. शहंशाह, नासिर जमाल, अतीक़ अहमद डॉक्टर अनस, अयान आज़म, मुहम्मद मुस्तफ़ा, मुहम्मद हुज़ैफ़ा, इंतिख़ाब ख़ान, साक़िब रज़ा, शकील रज़ा, अज़ीज़ ख़ान, हसन मुस्तफ़ा वग़ैरह आख़िर तक मौजूद रहे।
ये मुशायरा दरहक़ीक़त एक मुश्तरका ख़िराज-ए-अक़ीदत था, जहाँ शायरी, एहसास और यादों ने मिलकर भोपाल के एक अज़ीम अदबी सुतून को सलाम पेश किया। मुन्तज़िमीन ने इज़हार किया कि वो आगे भी इस तरह की अदबी सरगर्मियों के ज़रिये उर्दू और भोपाल की रिवायत को आगे बढ़ाते रहेंगे।
प्रोग्राम को अमली जामा पहनाने में शहर के नौजवान शोअरा एस.एम.मुबश्शिर, यूसुफ़ भोपाली, अरशद ख़ान, अनवर मोहम्मद शान, इमरान ख़ान, औरंगज़ेब आज़म, आदिल इमाद और मुहम्मद इंसाफ़ जैसे नौजवानों की मेहनत क़ाबिले-तारीफ़ रही।
-प्रेस विज्ञप्ति
