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गूंज बाक़ी… शानी यानी गुलशेर ख़ान शानी (16 मई 1933—10 फ़रवरी 1995) हिंदोस्तानी साहित्य के बावक़ार नाम रहे हैं। काला जल, सांप और सीढ़ी, सब एक जगह जैसे अफ़सानों और उपन्यासों के साथ ही समकालीन भारतीय साहित्य के संपादक के रूप में ख्यात रहे। अकादमियों व सरकारों से पुरस्कृत भी हुए और कई भाषाओं में उनकी रचनाएं गयीं। याद को सलाम करते हुए उनके चर्चित निबंध का एक अंश नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा छापी गयी इसी शीर्षक की किताब से साभार…

एक शहर में सपने बिकते हैं… शानी का निबंध

….घर एक गलियारे से शुरू होता है- ऐसा गलियारा जो शुरू होते ही ख़त्म हो जाता है। दरवाज़े के पास ही जाफ़री से एक बकरी बंधी है- मेंगनियां फैलाती और हर आने वाले का मिमियाकर स्वागत करती हुई। उसकी डोर जहां ख़त्म भी नहीं होती, वहां पाखाना है- घर के ख़ास दरवाज़े के ऐन सामने। पाखाने का दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं होता, सिर्फ़ उढ़का होता है और एक-आध इंच की काली झिरी हमेशा बदबू की आंख से झांकती रहती है- उस डेढ़ कमरे के घर को जिसमें लोग अब भेड़ की तरह रहते हैं।

क्या ईंट-पत्थर के घर भी थककर बैठ जाते हैं? अंदर आकर बदबू से लड़ते हुए मैंने सोचा। विभाजन के पहले तक या उसके दस-पांच बरस बाद तक भी यही घर कछावर पेड़ की तरह खड़ा था। इसके कमरे बड़े थे, छतें ऊंची थीं और सहन बहुत कुशादा-इतना कुशादा कि गर्मियों की शामों को दो-दो तख़त बिछे होते थे, रात के खाने के लिए बहुत बड़ा दस्तरख़ान लगता था। और इशा की नमाज़ के लिए एक छोड़ तीन-तीन चौकियां होती थीं और फिर भी सहन बड़ा लगता था। वह सब सिमटकर डेढ़ कमरे में कैसे बदल गया? सहन में खेलने वाले बच्चों में से दो लड़कियां बुरादे की गुंगवाती सिगड़ी के हवाले हो गयीं, तीसरी मैले और तार-तार हो रहे गरारा-कुर्ते में ताड़-सी खड़ी है-संजीदा और उम्र से बड़ी लगती हुई। नीम-पढ़े-लिखे लड़के नाकारा होते हुए भी जवान हो गये और अब नौकरियां ढूंढ़ रहे हैं या वक़्त काट रहे हैं या उस वक़्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब कहीं से ‘खुल जा सिम सिम’ की आवाज़ आये-वह चाहे यहां हो या बंबई की तिलस्माती दुनिया। यह रजब महीने की बाईसवीं तारीख़ थी, यानी इमाम सादिक अलैस्सलाम की यौमे-पैदाइश। शहर के मुसलमान घरों में कूंडे की नज़र-नियाज़ की धूम थी।

इस नियाज़ के पीछे की एक चमत्कारपूर्ण कहानी है: किसी जंगल में एक ग़रीब लकड़हारा अपनी बीवी के साथ रहता था। एक दिन जो रजब महीने की बाईस तारीख़ थी, बीवी ने बताया कि घर पर खाने को कुछ भी नहीं है लिहाज़ा लकड़हारा लकड़ी काटने के लिए जंगल की ओर निकल गया। उसके जाते ही घर पर एक फ़क़ीर आया और उसने गुहार लगायी। बीवी ने शर्मिदा होकर माफ़ी मांगी और अपना हाल बताया। फ़क़ीर ने कहा कि ऐ बीबी, आज इमाम सादिक अलैस्सलाम की यौमे-पैदाइश है, जो उनके नाम से आज नज़र-नियाज़ कराये उसके घर में ख़ैरो-बरकत अपने आप आये। बीवी ने घर के कोने अत्रों से बचा-खुचा अनाज या गुड़ का एकाध टुकड़ा ढूंढ़ निकाला और इमाम की नज़र दिलायी। नतीजा यह हुआ कि उधर लकड़ी काट रहे लकड़हारे की कुल्हाड़ी नीचे ऐसी जगह गिरी जहां ख़ज़ाना गड़ा हुआ था। रातो-रात लकड़हारा इतना बड़ा अमीर हो गया कि उससे वज़ीर की बीवी तक जल-भुन गयी। उसने वज़ीर के कान भरकर लकड़हारे को जेल में बंद करवा दिया। लेकिन अल्लाह की मार ऐसी पड़ी कि देखते-ही-देखते वज़ीर खुद अपने किसी गुनाह के लिए बादशाह का कोप-भाजन बना और फांसी के तख़्ते तक पहुंच गया। यही वह मौक़ा था जहां उसे याद आया कि उसने एक बेगुनाह को बीवी के वरगलाने पर जेल में डलवा दिया था। उसने बादशह से माफ़ी मांगी, फांसी के तख़्ते से छूटा इस विश्वास के साथ कि उस दिन से वह भी इमाम सादिक के नाम से कूंडे की नज़र-नियाज़ दिलाएगा।

मेरे दोपहर के खाने के लिए उसी सामने वाले कमरे में चटाई डाली गयी। उसका हर कोना दांत निपोर रहा था। उस पर एक दस्तरख़ान बिछाया गया जो छोटा और मैला गज़-भर का चीथड़ा था और जिस पर सालन के दाग़ थे। तामचीनी की प्लेटों में जो खाना लगा, वह उबले हुए चावल थे, सिर्फ़ एक सूखी और मौसम की सबसे सस्ती सब्ज़ी के साथ। दाल वहां कहीं नहीं थी। यों सलीक़े के लिए दस्तरख़ान के बगल से एक छोटी सिलापची रखी हुई थी अल्यूमीनियम की। इसी घर के दस्तरख़ान पर तांबे की इतनी बड़ी सिलापची रखी जाती थी जिसमें पूरे घर के हाथ धुलवाये जा सकते थे। तब इस घर में उर्दू बाज़ार दिल्ली की छपी हुई एक बहुत पुरानी किताब हुआ करती थी- रज़िया का शाही दस्तरख़ान। उसमें मुग़लई खाने पकाने की तरक़ीबें थीं। उन दिनों दस्तरख़ान पर जो खाने चुने जाते थे, उनमें बाकरखानी, वर्की रोटी, शीरमाल, रोग़नी रोटी, पठानी पराठे, मुतंजन पुलाव, नरगिसी कोफ़्ते, पसंदे, शामी कबाब, नहारी वग़ैरह के नाम आते थे और हर शाम का खाना जैसे शौक़ और एहतमाम के लिए पकता था।

अब रज़िया का शाही दस्तरख़ान पता नहीं, कहां बिला गया-इस खानदान के शजरे की तरह जिसे इस घर के बुज़ुर्ग कलेजे से लगाये-लगाये मरे थे। उस शजरे की शुरूआत रामपुर या रुहेलखंड के एक नामी-गिरामी पठान से शुरू होती थी और उसकी एक शाख़ दिल्ली में बहादुरशाह ज़फ़र की सल्तनत तक जाती थी। घर पर एक पुराना अलबम था जिसमें पीली पड़ती और टूटती तस्वीरें चिपकी हुई थीं-ये बादशाह के बड़े वज़ीर फ़लां ख़ां, ये फ़ौज के बहुत बड़े हाकिम फ़लां, ये बुज़ुर्ग दादा फ़लां-फ़लां ख़ां जो सल्तनत में…

मैं इसी घर का दामाद था जिसके दस्तरख़ान पर सूखी सब्ज़ी के साथ उबले हुए चावल रखे थे। वह खाना वर्तमान का कड़वा यथार्थ था। यहां तक तो ठीक, लेकिन थोड़ी ही देर में उसी दस्तरख़ान पर जो खाने चुने गये वे चौंकानेवाले और तकलीफ़देह थे। उनमें फीरनी थी, दूधपूरियां थीं, अंडों का हलवा था, बालूशाही थी और एकाध वे चीज़ें जो कूंडे की नियाज़ में रखी जाती हैं और जिनके सहारे हर मुसलमान घराना बेहतर ज़िंदगी और बरकत के सपने देखता है।

पता नहीं, उन्हें ये सपने कौन बेचता है!

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