
- March 9, 2026
- आब-ओ-हवा
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पुस्तक चर्चा मधु सक्सेना की कलम से....
देह की अनसुनी भाषा
संसार में दुख कोई नयी बात नहीं है। हज़ारों तरह के दुख हज़ारो-हज़ार बार आये इंसान को तोड़ने। पता नहीं किस मिट्टी का बना मनुष्य टूट-टूट कर जुड़ता है। गिर-गिरकर उठता है।
मौन के साथ रहते हुए ध्वनि से रिश्ता रखता है। अनसुनी भाषा को लिख लेता है और देह की भाषा ही देर से समझ आती है। यूँ ही कुछ करने और न करने के बीच आह-सी निकल आती है। दर्द पुकार लेता है। क़दम कुछ देर को ठहर जाते हैं पर ठहर जाना चलते जाने के बीच विराम-चिह्न की तरह होता है, जो कुछ पल ठहरा ज़रूर लेता है पर रोक नहीं सकता।
‘देह एक पूरा ब्रह्मांड है जो अपनी मन-मर्ज़ी से चलता है।’ यही सिद्ध करती यह कैंसर डायरी है, जिसकी रचनाकार हैं रति सक्सेना। अपने विराट परिचय के होते हुए भी विराट कष्ट को शब्दों में बांधकर पटक देती हैं। यूँ लगता है कष्ट को भी अभिमंत्रित नागपाश से जकड़ दिया।
कैंसर शब्द ही भयानक लगता है। मन सिहर उठता है। तरह-तरह के दृश्य आँखों के सामने आने लगते हैं। तन-मन और धन सब पर एक साथ आक्रमण करने वाला यह रोग जब किसी के जीवन में आ जाता है, तो वो ख़ुद ही नहीं इष्ट, मित्र और परिवार के साथ अस्पताल की हर इकाई भी सहयोग करने लगती है।
‘आई.सी.यू. में ताओ’ पुस्तक रति सक्सेना जी के उन कठिन दिनों का दस्तावेज़ है, जब वे ख़ुद इस कर्क रोग से जूझ रही थीं। यह किताब एक भावनात्मक और प्रेरणादायक यात्रा है। जीवन के मूल्य, संघर्ष, और आशा के बारे में बात करती हैं। छोटे-छोटे पलों की महत्ता को समझाती है और हमें जीवन को जीने के लिए प्रेरित करती है।
किताब में लेखक ने अपने कैंसर के अनुभवों को बहुत ही खुलकर लिखा है, जैसे कि उन्होंने कैसे अपनी बीमारी को स्वीकार किया, कैसे उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों का साथ पाया, और कैसे उन्होंने जीवन के छोटे-छोटे पलों में ख़ुशी खोजी।
बीमारी के साथ लेखिका का चिंतन चलता रहता है। ‘देह कुछ कहने की कोशिश कर रही है लेकिन हम सुनते कहाँ हैं? उसे सुनो..! जब तक देह है तब तक तुहारा अस्तित्व है।’ डायरी सिर्फ़ दर्द की दास्तान नही है, ज़िंदगी और मौत के रिश्ते को भी परिभाषित करती है। कुछ शिकायतें हैं तो कुछ शुक्राने भी।
मात्र तीन अक्षरों से बना ‘कैंसर’ तीनो लोकों में घुमा देता है, धरती आकाश सब उलट-पलट-से लगते हैं। पूरी किताब छब्बीस शीर्षकों के अंतर्गत लिखी गयी है। हर शीर्षक अलग से नयी बात कहता है। दुख, संघर्ष और हौसले के अनुभवों की पोटली खुलती जाती है। पाठक साथ चल पड़ता है लेखिका के। संवेदना चरम पर पहुंच जाती है। कभी वह साथ होता है, कभी हाथ थाम लेता, कभी सहारा देता या कभी दर्द को ग़ुस्सा दिखाता, कभी सोचता कि यह दर्द कहीं हमारे हिस्से का तो नहीं था, जिसे लेखिका ने ख़ुद पर लिया?

कविता अंतरंग सखी की तरह साथ होती है, कभी सरस्वती-सी अंदर ही अंदर बहती है तो कभी गंगा-जमुना की तरह बाहर बहने लगती है। अन्दर का दर्द शब्द बन जाते हैं…
“क्या मुझे और जीने की चाह है?
क्या मैं पीड़ा से डरती हूं?
क्या मैं मौत को समझ नहीं सकी?
जवाब मेरे पास भी नहीं है…
हर कीमो के बाद एक मौत आती है
देह सब कुछ नकार देती है
अन्न का कण हो या पानी का घूंट
नींद की बेहोशी में
बाल सर से उतर जाते हैं
रक्त मात्र लाल नहीं होता
श्वेत भी बीज होते हैं उनमें
दवा भी कहाँ भेद कर पाती है
दोस्तों और शत्रुओं में
सबको मारती जाती है
देह एक ऐसा युद्ध क्षेत्र
दोस्त-दुश्मन दोनों धराशाई हैं यहां…”
बीमारी में भी, दर्द की पहरेदारी में भी रति जी का चिंतन, मनन और लेखन चलता रहा है भले ही अवरोध आये, गति धीमी हुई पर रुका नहीं।
मिटती यादें, अस्पताल की बाबूगीरी, कीमो चक्र, ताबूत में बन्द सांसें, रेडियो थेरेपी, कोरोना की मार, चूहों के आतंक, ब्लेडर महोदय की धक्कम-धक्की, दर्द के घोंसले बुनती सांसें, कविता की दुनिया, चिकित्सा किसकी आदि शीर्षक से लिखे गये अनुभव बताते हैं मुसीबत कभी अकेली नहीं आती। छब्बीस शीर्षकों में अलग-अलग तरह की तकलीफ़ों को समेटे है, लगता है बीमारी पूरी बारात लेकर आयी है।
रति सक्सेना जी की डायरी का शीर्षक “आई.सी.यू. में ताओ” बुद्ध, आइंस्टीन और ताओ के सिद्धांत के साथ दुखों के संतुलन की पड़ताल है। प्रश्न में उलझते हुए उत्तर की खोज में ख़ुद को टटोलना होता है। सारा पढ़ा हुआ स्मरण करना, देह का ब्रह्मांड समझने का प्रयास करती लेखनी रास्ते तलाश करती है। दूसरे रोगियों के कष्ट भी शामिल हैं। मन उलझता है-
“बुद्ध आई.सी.यू. के कोने में बैठे हैं, जहां से वह सब दिखायी दे रहा है, जो उन्होंने बुद्ध बनने से पहले देखा था। बुद्ध बनने से क्या नियम बदल जाएंगे?”
“मकड़ी के जाल को हटाकर ताओ ने
नीचे झांका, मुस्कराकर कहा
पीड़ा में आनन्द की चुस्की लो
मृत्यु में जीवन खोजो”
*******
“वे बन चींटे
चढ़ गये देह पर
चट करने लगे माँस
अब मेरे पास बड़ा सुख है
ढेर से दुखों का ग्रास
बन पाने को।”
लेखक जब एक विषय मे लिखता है, तो स्वतः ही कई विषय शामिल हो जाते हैं। बीमारी की मार के साथ इलाज की सीमाएं, थेरेपी, अस्पतालों के नियम, कठिन प्रक्रियाएं, अलग-अलग विभागों की कार्यप्रणाली की पेचीदगियां आदि मरीज़ को और उनके परिजनों को अलग से मार देती हैं।
कीमो थेरेपी के बाद होने वाले कष्ट, फिर भी अगली कीमो के लिए ख़ुद को तैयार करना आसान नहीं पर सब करना होता है। जीवन का यह राग तोड़-तोड़कर जोड़ता है।
इस डायरी से समझ आता है कि हमारे देश में अस्पतालों की कमी, वहां बढ़ती भीड़, समय पर काम न होना, अव्यवस्था आदि समस्याओं से रोगी को अलग से भी लड़ना होता है। ज़रूरत है इस ओर ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के साथ स्वस्थ जीवन के लिए भी जागरूकता ज़रूरी है।
रति सक्सेना जी की यह डायरी समाज का आईना भी है। ज़रूर पढ़ें। प्रकति से जीवन का संबंध और संतुलन बनाकर रखना मनुष्य को कष्ट से मुक्ति दे सकता है। रति जी को बहुत शुभकामना। “आई.सी.यू. में ताओ” के माध्यम से लय में जीवन संगीत गूंजे और हौसला दे।

मधु सक्सेना
मूलत: कविता में मन रमता है और गाहे-ब-गाहे मधु सक्सेना गद्य लिखती हैं। कभी व्यंग्य तो कभी लेख, समीक्षा और कहानी का रुख़ करती हैं। तक़रीबन आधा दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और अनेक मंचों से काव्य पाठ कर चुकी हैं। समवेत संकलनों में कविता, कहानी संकलित हो चुकी हैं। कतिपय संकलनों के संपादन से भी आप संबद्ध हैं। अपने दिवंगत पति एवं परिजनों की स्मृति में आपने साहित्यिक/सामाजिक सम्मान भी स्थापित किये हैं।
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