
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
ज्ञानप्रकाश विवेक: हिंदी ग़ज़ल का ऊटपटांगपन
ज्ञानप्रकाश विवेक हिन्दी साहित्य में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य की कई विधाओं को कलम-घसीटी से समृद्ध किया है। कथित ‘हिंदी ग़ज़ल’ पर ग़ौर करें तो भाषा का ऊटपटांगपन ही इनकी विशेषता है। इस लेख में इनकी हिन्दी ग़ज़लों पर चर्चा की जाएगी। ग़ज़ल की शाहराह पर चलकर जिन शायरों ने हिन्दी ग़ज़ल को गर्क़ाब किया तथा दुष्यंत की दुहाई दे-देकर हिन्दी ग़ज़ल के नाम पर कुछ भी खपाया, उनमें ज्ञानप्रकाश विवेक का नाम पहली सफ़ में है। उनकी ग़ज़लों में सामाजिक या जन सरोकार का एक ढोंग है, इनकी अपनी एक काव्य-भाषा और ख़ास नज़रिया है, जो इनके ऊटपटांगपन की गवाही देते हैं। संभवतः यही कारण है कि ये सबसे अलग दिखायी देते हैं। चलिए इनकी ग़ज़लों के सफ़र पर निकलते हैं।
ज्ञानप्रकाश विवेक ने एक-दो अच्छी ग़ज़लें और शेर ज़रूर कहे हैं, किन्तु इनकी बचकानी ग़ज़लों की संख्या के सामने उनका कोई वजूद ही नहीं है। इनके वाक्य विन्यास और शब्द प्रयोग प्रायः बड़े विवादास्पद हुआ करते हैं। बात इस शेर से शुरू की जाये:
ज़िन्दगी हमने तेरे दर्द को ऐसे रक्खा
प्यार में जिस तरह सीता को जनक रखता था
पहला मिसरा तो ठीक है, किन्तु दूसरा इतना बचकाना और असहमति योग्य है कि क्या कहा जाये! इस तरह की भाषा का प्रयोग इन्होंने यदि किसी थोड़े भी दक़ियानूसी धर्म के मिथकीय किरदार या पात्र के लिए किया होता तो सर तन से जुदा करने का फ़तवा ज़रूर जारी हो गया होता। ‘सीता को जनक रखता था’, ऐसी भाषा की अपेक्षा किसी वरिष्ठ रचनाकार से नहीं की जा सकती है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे सीता जनक की पुत्री न होकर कुछ और हों! अब ये देखिए:
ये रद्दी बीनते बच्चे जो फ़ुटपाथ पर सोये हैं
तू इनको कुछ नहीं देता तो अपनी मेह्रबानी दे
ऊपर के मिसरे में ‘रद्दी बीनते बच्चे’ अटपटा लग रहा है। क्या रद्दी बीनने का कार्य और सोने का कार्य एक साथ चल रहा है। अगर ‘रद्दी बीनने वाले बच्चे’ होता तो भाषा संप्रेषण का काम कर पाती। ‘कुछ नहीं देता तो मेह्रबानी दे’, यह बात भी समझ में नहीं आती। मेह्रबानी देने के बाद भला क्या देना बाक़ी रह जाएगा? मेह्रबानी ‘देना’ तो पता नहीं लेकिन मेह्रबानी करना ही तो सब कुछ दे देना है। फिर और एक बात कि मेह्रबानी क्यों, अधिकार क्यों नहीं? यहाँ विजय स्वर्णकार भाई याद आ रहे हैं। पिछली कड़ी में उनके इस शेर पर बात की थी:
रह्म करने का दिल करे लेकिन
तू परेशान तो दिखायी दे
यहाँ विजय भाई से भी यही कहा था कि रह्म क्यों, मदद क्यों नहीं? इसे आत्ममुग्धता कहें या अटपटापन, हिंदी ग़ज़ल वालों के यहां इसकी भरमार दिखती है। और तुर्रा यह कि इस कुएं के बहुत सारे मशहूर नाम एक-दूसरे की टर्र में टर्र बेहिचक मिलाते हैं। विजय भाई अपने संवादों और लेखन में ज्ञानप्रकाश विवेक के एक पैरोकार की तरह पेश आते रहे हैं। आब-ओ-हवा के अपने कॉलम में ही देखिए, ज्ञानप्रकाश विवेक के शेर को किस तरह स्थापित करने की छटपटाहट जता बैठे थे:
“मैं सूटकेस पकड़कर खड़ा रहा यारो
कि बस चली गई सारी सवारियाँ लेकर
ऐसा क्या है इस चित्र में जो इसे विशिष्ट बनाता है। बस आयी और उसकी ओर सारे लोग भागे। ये वे लोग थे जिन्हें केवल अपने गंतव्य पर पहुँचने की चिंता थी। इनमें मज़दूर, कारीगर, चौकीदार, स्कूल के बच्चे आदि होंगे। लेकिन यह व्यक्ति जो सूटकेस के साथ है, इसे अपनी कमीज़ के मोह और दूसरों की तमीज़ से घृणा ने इस भीड़-भाड़ वाली बस में एक आम आदमी की तरह यात्रा करने से रोक लिया। ‘बस में सवारियां चली गईं’ में यह भी छुपा है कि व्यावसायिक या अन्य कारणों से बस वाले के लिए और यहाँ तक कि यात्रियों के लिए भी आदमी आदमी नहीं रह जाता, केवल सवारी बन जाता है। एक आंकड़ा बन जाता है। सूटकेस प्रतीक है उस आभिजात्य का जो हमें आम जन-जीवन का हिस्सा बनने से रोकता है। सूटकेस पकड़ने की अकड़, बस पकड़ने के लिए आवश्यक चपलता और स्ट्रीट स्मार्टनेस का विकल्प नहीं हो सकती।”
किसी शेर को क्या इस तरह पाठकों को समझना चाहिए? क्या आप दो कमज़ोर मिसरों से इस तरह अर्थ ढोने की अपेक्षा करेंगे? हिंदी ग़ज़ल ने समालोचकों ने न जाने कितने लंगड़े और अपाहिज शेरों को खड़ा करने, दौड़ाने का काम बाक़ायदा संगठित होकर किया है। ऐसी ही शीर्षासनी आलोचकीय कसरत का परिणाम है कि ज्ञानप्रकाश विवेक हिंदी ग़ज़ल के सर्वोच्च आसन पर विराजे बैठे हैं। इस लेख में आपको ऐसे शेर मिलेंगे, जो महानता के आडंबर की कलई खोलते हैं। यह शेर देखें:
हम ख़ानाबदोशों के नहीं होते ठिकाने
मत पूछ कि हम घर का पता क्यों नहीं देते
जब पहले मिसरे में आपने कह दिया कि ख़ानाबदोशों के ठिकाने नहीं होते तो फिर ये कहने की क्या ज़रूरत है कि ‘मत पूछ’। दोनों मिसरों में एक ही बात? कहीं विवेक जी दूसरी पंक्ति में व्याख्या करके कमअक़्ल पाठकों को समझाने की कोशिश तो नहीं कर रहे? यह तो मैं कैसे पूछ लूं कि ख़ानाबदोशों से पहले ‘हम’ यहां क्या कर रहा है? एक और शेर देखें:
मुझसे अहबाब भी मिलते रहे अनबन रखके
कभी लपटें तो कभी जेब में चंदन रखके
पहली बात यह कि जब ऊपर के मिसरे में स्पष्ट कह दिया गया है कि दोस्त ‘अनबन’ रखकर ही मिलते हैं तो फिर चंदन वाली बात आ कहाँ से आ है! दूसरी बात यह कि पूरे शेर में मानसिकता की बात है, मनःस्थिति की बात है, फिर ‘जेब’ शब्द की तो यहाँ कोई ज़रूरत ही नहीं। यहाँ भी विवेक साहब के वक़ार में इज़ाफ़ा करने के लिए जितना मेकअप इनके चमचों ने पोता था, सब पपरियाकर झड़ गया है।
ज़लज़लों मैंने तुम्हें अपना बनाया मेहमाँ
और तुम बैठ गये नींव में कंपन रखके
यहाँ भी भगई निपुकती। इतना बचकाना शेर बहुत कम ही देखने को मिलता है। विवेक जी ने ज़लज़लों से दोस्ती क्या ये सोचकर की थी कि इससे जीवन में शक्ति और स्थायित्व आएगा। ज़लज़ले अगर नींव में कंपन पैदा कर रहे हैं तो उसमें नया क्या है? अतिरिक्त प्रयोग के चक्कर में विवेक जी ने सब गुड़-गोबर कर दिया है।
इक शख़्स गुलेलों को यहाँ बेच रहा है
ये राज़ परिंदों को बता क्यों नहीं देते
इस शेर में राज़ ही राज़ है या व्याकरणिक भूल! व्यक्ति ‘गुलेलों’ को बेच रहा है या ‘गुलेलें’ बेच रहा है? इस शेर के लिए दाद-खाज, खुजली जो भी मिल सकता है, राजकमल वालों को ही मिलना चाहिए, जिन्होंने इस दर्जा वाहियात शेरों वाली पूरी किताब ही छाप डाली है। अभी थकिए मत, ‘बड़े’ शायर के बचकानेपन से और पहचान करिए:
मौसम मेरे शहर का चालाक हो गया था
बादल ख़रीदकर वो बरसात बेचता था
बूझे? मुझे समझ में नहीं आ रहा मौसम अगर बादल ख़रीदकर बरसात बेच रहा है तो इसमें चालाकी क्या है। बादल ख़रीदकर आग या फिर दूध या धूप बेची जाती तो चालाकी समझने की ज़हमत उठायी जाती। विवेक जी शायद कहना चाहते हैं ऊट और कह बैठते हैं पटांग!
बारिश के वक़्त सारी बस्ती के लोग ख़ुश थे
काग़ज़ का शामियाना सहमा हुआ खड़ा था
इसे कहते हैं फ़ितूरबाज़ी का शेर। विवेक जी की कमज़ोरी यह है कि उनके प्रतीक अपने आप को सिंबोलाइज़ नहीं कर पाते, बल्कि भाषा की भद्द कर देते हैं। यहाँ भैंस पानी में जाने के बजाय सीधे कीचड़ में कूद जाती है।
इसलिए ले नहीं जाता मुझे मेले में पिता
देख लूँगा मैं खिलौने तो मचल जाऊँगा
इस शेर का पहला मिसरा शब्दक्रम दोष से इस क़दर अलंकृत है कि पूछिए मत। दूसरी बात यह कि पिता के लिए इस तरह का वाक्य विवेक? ऐसा लग रहा है जैसे सौतेला बाप हो। कथ्य भी बड़ा बेसिरपैर का ही है, इस तरह तो दुनिया के सारे बच्चे मेले से महरूम हो जाएंगे!
काँच का फ़र्श बना के मुझे घर में न बुला
मैं अगर इसपे चलूँगा तो फिसल जाऊँगा
न कोई चित्र बन रहा है न कोई मुहावरा। कांच और फिसलने की बात विवेक जी जाने कहां से उठा लाये हैं। लोग टाइल्स पर भी फिसल जाते हैं तो सिर्फ़ किसी को फिसलाने के लिए काँच के फ़र्श बनाने जैसा दुष्कर कार्य कोई क्यों करेगा? एक बात और कि चाइना में तो काँच के ब्रिज भी बने हैं। फिर यह भी कि यदि विवेक जी फिसल जाएँगे तो क्या वो व्यक्ति स्वयं नहीं फिसल जाएगा जिसने काँच का फ़र्श बनवाया है। कहीं स्केटिंग के लिए तो नहीं बुला रहा? विजय भाई इस शेर पर ज़बरदस्ती अर्थ लादकर कोई रहस्य भले सुलझा लें, किन्तु सच तो यह है कि इसमें कतई स्वाभाविकता नहीं है।

छावनी डालके रुकते हैं शहर में लश्कर
मैं तो जोगी हूँ इसी शाम निकल जाऊँगा
इस शेर में बात इस काल में हो रही है और संदर्भ है उस काल का, इसका क्या मतलब है? स्वयं को इतना महान बनाने की क्या ज़रूरत है! कोरी आत्ममुग्धता है।
ऐ दोस्त तेरा बीजगणित अच्छा है लेकिन
क्यों प्यार के रिश्ते में इसे लेके खड़ा है
इस शेर में बीजगणित ही क्यों? अंकगणित क्यों नहीं? क्या ‘बीजगणित’ शब्द ज़बरदस्ती घुसेड़कर विवेक जी ने यह दिखाया है कि वे इस तरह का भी प्रयोग कर सकते हैं? यहाँ तो सिर्फ़ गणित से ही काम चल सकता था। यहाँ भी पँड़वा पगहा तुड़ा के धान के खेत में कूद गया है।
एक काग़ज़ के सफ़ीने से मुहब्बत कैसी
डूब जाएगा अभी तैर के जाने वाला
इस शेर का मतलब भी आप ही खोजिए। क्या कोई तैरकर सफ़ीना लेने जा रहा है, क्या कागज़ के सफ़ीने में सैर कर रहा है? बड़ी विचित्र सी बात लग रही है। विवेक जी अगर यहाँ यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नश्वर चीज़ों से प्रेम नहीं करना चाहिए, तो यह बात यहाँ ठीक से बन नहीं पा रही। इस संदर्भ में अख़्तर नज़्मी का यह शेर देखें, भले ही हिंदी ग़ज़ल वाले किसी कुंठा के चलते हिंदी ग़ज़ल में इसे जगह न दें पर कहन का कोई जवाब नहीं। किसी तरह का तीन-पाँच नहीं, कोई उलझाऊपन नहीं, कोई ऊटपटांगपन नहीं…
नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है
हिंदी ग़ज़ल के प्रकाशपुंज ज्ञानप्रकाश विवेक और कैसे शेर कहते हैं:
राहज़न हैं लुटेरे हैं, कई डॉन खड़े हैं
तू देख कि मैं ख़ुद को कहाँ बेच रहा हूँ
इस शेर के ऊपर वाले मिसरे में कमोबेश सभी शब्द समानार्थी हैं। इतने शब्द कहने से विवेक जी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ। और फिर विवेक जी कहना क्या चाह रहे हैं! कहीं विवेक जी ये तो नहीं कहना चाह रहे हैं कि अपने आप को शरीफ़ों के हाथ बेचते तो कुछ मूल्य मिल जाता। मगर ऐसी ऊटपटांग ग़ज़लें कहने वाले को ख़रीदेगा कोई? ऊलजलूल बातों से भरा एक और शेर:
क्या और कोई मुझसा बुरा होगा जहाँ में
मंडी में चिताओं का धुआँ बेच रहा हूँ
बिल्कुल ऊल-जलूल बात है। अगर आपको पता है कि ये बुरी बात है तो आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। अगर विवेक जी बताना चाह रहे हैं कि वे दर्द बेच रहे हैं तो ऐसा कोई चित्र यहाँ नहीं बन रहा। प्रायः विवेक जी प्रयोग करते समय गच्चा खा जाते हैं। इनके शब्दों और में प्रायः साहित्यिक स्पंदन का अभाव है। इसी बात को बच्चन ने बड़े सलीक़े से कहा:
है चिता की राख कर में
माँगती सिंदूर दुनिया…
पर साहब, बच्चन कहां “ग़ज़ल विवेकी” थे, विवेक जी हैं। हम तो उन्हीं के शेर देखें:
इस क़दर ख़ुश था मेरी काग़ज़ की कश्ती देखकर
हाथ में जैसे समंदर के खिलौना आ गया
मैं समझता हूँ समुंदर के लिए हर कश्ती खिलौना ही है। यहाँ काग़ज़ लिखकर विवेक जी ने ख़ुद को उतना परेशान नहीं बताया है जितना परेशान इनकी ग़ज़लें पढ़ने वाले हो जाते हैं। समुंदर के साथ काग़ज़ की कश्ती मैच भी नहीं कर रही है। उपमाएं वहीं दी जानी चाहिए जो वास्तविक जीवन में होती हों। विवेक जी अगर अपनी कश्ती को काग़ज़ जैसा बताते और मौजों को और प्रबल बताते तो बात बन सकती थी। कहने का अर्थ ये है कि कश्ती रूपक की जगह उपमा होती तो फिर भी काम चल सकता था।
ले गया बचपन उठाकर भीग जाने का हुनर
आएगी बरसात तो सब छतरियाँ लाएँगे लोग
इस शेर के दूसरे मिसरे में ‘छतरियों’ के पहले आया ‘सब’ पदबंध भला क्यों आया है? लोग के लिए तो ज़रूरत है नहीं, अगर छतरियों के लिए ‘सब’ आया है तब तो और भी बेमतलब है। अतिरिक्त पद दोष का भी एक (लेख अनावश्यक लंबाई का शिकार न हो इसलिए) उदाहरण:
बादल को देके दावतें इस फ़िक्र में हूँ मैं
कागज़ के घर में उसको कहाँ ‘पर’ बिठाऊँगा
अब बेरब्त और अटपटेपन से लैस कुछ शेरों का जाएज़ा भी ले लीजिए:
मैं अपने हौसले को यक़ीनन बचाऊँगा
घर से निकल पड़ा हूँ तो फिर दूर जाऊँगा
अगर हम पहले मिसरे के ‘हौसला’ के साथ जोड़कर देखें तो ‘दूर तक जाऊँगा’ अर्थ ही अधिक स्पष्ट दिखता है। ‘दूर जाऊँगा’ पदबंध तो नाराज़गी का भाव पैदा कर रहा है। फिर हौसले को बचाने के लिए दूर जाने की ज़रूरत ही क्या है! बेरब्त-सा लग रहा है।
बन गया जो बड़ा अफ़सर वो मेरा बड़ा भाई है
मुझसे कहता है कि इज़्ज़त से बुलाऊँ उसको
विवेक जी को लगता है बड़े भाई को इज़्ज़त से नहीं बुलाया जाता या अफ़सर हो जाने के बाद बड़ा भाई इज़्ज़त चाह रहा है तब भी ग़लत है! विवेक जी को लगता है इज़्ज़त से बुलाने पर अपनापन ख़त्म हो जाएगा तो उनका भ्रम है। अपनेपन में भी इज़्ज़त तो होती ही है। कथ्य ही नहीं, विवेक जी के यहां बहर भी लड़खड़ा जाती है, मिसाल के तौर पर यहां कुछ ऐसे शेर देखिए:
दरख़्तों का वही तो ख़ैरख़्वाह अब बन गया यारो
कि जिसके हाथ में देखी हैं अक्सर आरियाँ हमने
ऊला मिसरा ‘ख़ैरख़्वाह’ तक पहुँचते-पहुँचते लड़खड़ा गया है।
सजाया मेमना चाकू तराशा, ढोल बजवाये
बलि के वास्ते निपटा ली सब तैयारियाँ हमने
सानी मिसरे का प्रारंभ ही लंगड़ा गया है। ‘बलि’ पद की वजह से ‘मुफ़ाईलुन’ (ISSS) रुक्न नहीं बन पाया। बेबहर कई मिसरे हैं, फिर क़ाफ़िये के भी दोष हैं और अन्य कई और तरह के भी लेकिन कुछ और बचकाने शेरों पर फ़ोकस रखते हैं यानी जिनका कोई मतलब ही नहीं:
सारी बस्ती ने दिये सुल्तान को रेशम के थान
और बस्ती का जुलाहा बुनके खद्दर ले गया
हमें बुलंदियों के ख़्वाब देने वालों ने
हमारे सामने पानी की सीढ़ियां रख दीं
मख़ौल आपका माली उड़ाएँगे साहब
कि आप तितलियों को व्याकरण सिखाते हैं
एक चट्टान ने पत्थर को समझकर बालक
अपनी छाती से कई बार लगाया होगा
इस शेर पर कुछ कहे बिन रहा कैसे जाये! विवेक जी ने पत्थर और चट्टान में जो अंतर दिखाने की कोशिश की है वह बिल्कुल हास्यास्पद है। विवेक जी शायद कहना चाह रहे हैं की चट्टान पत्थर का बड़ा टुकड़ा है और पत्थर चट्टान का छोटा टुकड़ा है। गिनती कीजिए इन शेरों पर आपके ज़ेह्न में कितनी बार आया, “अपना कहा ये आप समझें या ख़ुदा समझे”..!
सहन में रखते हो लपटों की खोलकर गठरी
फिर उसके बाद हवाओं को घर बुलाते हो
विवेक जी ने यहाँ कितनी मेहनत की है। पहले तो बड़ी मुश्किल से लपट की गठरी बाँधी, फिर सहन में गये, फिर उसे खोला, फिर यह बात उनके मन में आयी कि लपट की गठरी विशेष रूप से सहन के लिए हानिकारक होती है, तब शेर ज़ेह्न में आया होगा। इसे ही कहते हैं verbal diarrhoea। अब यह शेर देखिए, सच कहूँ तो इसे भी शेर कहना शेरों को गाली देने से कम नहीं:
ढाबे से वह लौट आया कुछ खाये बिना
उसकी जेब में पैसे भी इतने कम थे
एक बच्चे ने पूछा वह ढाबे से कुछ खाये बग़ैर क्यों लौटा? दूसरे ने कहा क्योंकि उसके पास पैसे कम थे। ज्ञानप्रकाश विवेक के बहुत बड़े पैरोकारों में एक हैं हरेराम समीप जी। उन्हीं से क्यों न पूछा जाये कि इसमें शेर है कि चूहा है? ऐसे शेर पढ़ने के बाद धूमिल के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘पूँछ उठाया तो मादा निकला’… कभी-कभी ऐसा लगता है विवेक जी हर तरह के विसर्जन काग़ज़ पर ही करते हैं।
वहाँ पे धूप ने अपना बनाया है मंदिर
वहाँ गया तो मैं जूते उतार जाऊंगा
समीप जी ही विवेक जी से पूछकर बताएं कि यहाँ धूप कौन सा बहुत बड़ा प्रतीक है। मुझे लगता है मंदिर हो, मस्जिद हो, गुरुद्वारा हो, जूते उतारकर ही जाना चाहिए। ये क्या कि धूप बनाएगी तो उस मंदिर में जूते उतारकर जाएंगे, छांव बनाएगी तो आप जूते पहने ही घुस जाएंगे? समीप जी इनको ‘ग़ज़ल का भगवान’ मानते हैं, वही पूछें। अच्छा, वाक्य में रह-रहकर ऐसा भी लग रहा है धूप ने अपना ही मंदिर बनाया है! ‘वहां’ के बाद ‘पे’, यह फ़ोन-पे या गूगल-पे जैसा कोई ऐप तो नहीं!
जो ‘बड़े’ बना दिये गये हैं, उन्हें समझने-समझाने में बहुत-सी बातें करना पड़ती ही हैं। न जाने कितने शेर रह गये हैं, विवेक जी की ग़ज़लों में दोषों की बात एक लेख में हो भी कैसे सकती है.. बहरहाल इन तमाम कमियों और अनगिनत बेतरतीब और बचकाने प्रयोगों के बावजूद हिन्दी ग़ज़ल ने विवेक जी को सर पर क्यों चढ़ा रखा है? आपको किसी ज्ञानी से पता चलें तो मुझे भी कुछ ज्ञान दें। ज्ञान प्रकाश विवेक और इनके जैसे अनेक शायर जो आत्ममुग्धता की बीमारी से पीड़ित हैं, हिन्दी ग़ज़ल में ज़्यादा शोर करते दिखायी देते हैं। कुछ लोग तो इन्हें संगे-मील माने बैठे हैं! उनकी भी सेहत चिंता का विषय है। कुल मिलाकर आप और हम कह सकते हैं, कुछ नये बच्चे भले ही अच्छा लिख रहे हों, मगर इतनी कमज़ोर बुनियाद की वजह से हिंदी ग़ज़ल की अट्टालिका कभी भी भरभराकर गिर सकती है।

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
