rajendra rajan book, kavita ki kitab, yah kaun si jagah hai
पुस्तक चर्चा विवेक मेहता की कलम से....

वर्तमान की परख करती कविताएं

            राजेंद्र राजन की छुटपुट कविताएं यदा-कदा पढ़ने में आती रहती थीं। बिना किसी आक्रोश, आवेश के वर्तमान समय की विसंगतियों, ढोंग, दोगलेपन को उजागर करती हुई ये कविताएं धूमिल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल की परंपरा की याद दिलाती हैं। ये कविताएं कोई बिम्ब नहीं रचतीं, शब्दों से चमत्कार नहीं गढ़तीं। ये कविताएं सीधी, सरल भाषा के कारण दिल-दिमाग़ को छू जाती हैं। इस कारण उनकी कविताएं ध्यान खींचती रहती थीं।

1960 में जन्मे राजेंद्र राजन, पहले पूर्णकालीन कार्यकर्ता रहे। बाद में विचारक किशन पटनायक की ‘सामयिक वार्ता’ से जुड़े रहे। 2003 में जनसत्ता के संपादकीय पृष्ठ का संपादन करते हुए 2018 में वरिष्ठ संपादक के पद से सेवानिवृत हुए। लगभग 15 वर्ष उन्होंने जनसत्ता में गुज़ारे। हाल ही उनका दूसरा कविता संकलन ‘यह कौन सी जगह है’ प्रकाशित हुआ। उनका पहला संकलन ‘बामियान में बुद्ध’ भी चर्चित रहा। किसान आंदोलन पर केंद्रित कविता संकलन ‘सड़क पर मोर्चा’ के संपादन से भी वे जुड़े रहे।

उनकी इस पृष्ठभूमि से उनकी कविताओं के विषय, विवशता, विभिषिकाओं का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

‘यह कौन सी जगह है’ कविता संकलन 168 पेज का है, जिसमें उनकी लगभग 68 कविताएं संकलित हैं। इनमें ‘फन्ने खां’ सीरीज़ की आठ कविताएं भी हैं। इस संकलन की अधिकतर कविताएं सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों का मुखौटा उतारती-सी लगती हैं।

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कविताओं की भाषा सरल, सहज और अंदर तक उतरने वाली हैं। उदाहरण देखें:

“बहुत खटखटाने पर भी / नहीं खुला इनके लिए / इतिहास का दरवाज़ा / निराश होकर / अब ये चोरों की तरह / जुड़ गये हैं इतिहास में सेंध लगाने…”

या फिर ये पंक्तियां देखिए:

“भेड़ियो की शिकायत पर / मेमनों के ख़िलाफ़ / दर्ज कर ली गयी है एफ़आईआर / …जांच रिपोर्ट बताती है / मेमने के शरीर पर / दांत और नाख़ून के गहरे निशान हैं / मगर रिपोर्ट अंत में कहती है/ भेड़िए ने जो कुछ किया / आत्मरक्षा के लिए किया/…”

कुछ कविताएं बहुत अच्छी हैं। कुछ में विषय का दोहराव है। बात वही है शब्द और प्रतीक बदल गये। ‘यह कौन सी जगह है’- संकलन के शीर्षक की अंतिम कविता ‘चलो यहां से’ है, पर यह कवि की हार मान लेने वाली मनोस्थिति को बयां नहीं करती।

वर्तमान कठिन समय में जब ज़्यादातर लेखक, कवि कछुए की तरह खोल में घुसकर या फिर बहरूपिये की तरह लिबास बदलकर जी रहे हैं; कुछ ही लोग हैं जो सबको ज़िंदा दिखाने के प्रयास में लगे हुए हैं। यह कवि भी कहता है:

“जब मुझे तनकर खड़ा होना चाहिए / मैं अपने घुटनों के बल झुक जाता हूं / जब बग़ावत का झंडा उठा लेना चाहिए / मैं आततायियों के गुण गाता हूं / मेरे सकारात्मक होने में/ कोई कसर रह गयी हो तो बताइए।”

सेतु प्रकाशन नोएडा से प्रकाशित 249 रुपए के इस संकलन का स्वागत किया जाना चाहिए।

विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की' चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

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