एडविना, नेहरू, edwina nehru affair, jawahar lal nehru, lady Mountbatten
आब-ओ-हवा के सिलसिले 'गूंज बाक़ी' के लिए एक और यादगार लेख। अक्टूबर 1991 धर्मयुग में प्रकाशित लाडलीमोहन निगम का यह लेख जवाहरलाल नेहरू और एडविना उर्फ़ लेडी माउंटबैटन के रिश्ते पर एक समझ बनाते हुए कुछ ऐसे तार भी छेड़ता है, जो अब भी विचारणीय हैं...
विवेक मेहता की प्रस्तुति....

एडविना-नेहरू पवित्र प्रेम की अनूठी मिसाल

              समाजवादी नेता लाडलीमोहन निगम राज्यसभा के सदस्य रहे। लोहियाजी के प्रिय रहे।लोहियाजी की जब मृत्यु हुई तब वे मंदसौर में थे। ख़बर सुनकर भौचक्के, परेशान थे और जैसे-तैसे दिल्ली पहुंचे। आजन्म कुंवारे रहे निगम जी के बारे में बहुत कम जानकारियां अब उपलब्ध हैं। उनकी एक पहचान बड़ौदा डायनामाइट कांड में जॉर्ज के सहयोगी की भी रही है।

संसद में लोहियाजी जवाहरलाल नेहरू के ख़र्चों को लेकर सवाल उठाते रहे। वहीं, समाजवादी नेता लाडलीमोहन निगम नेहरू-एडविना के रिश्तों का राजनीतिक लाभ न लेते हुए, गंदगी छोड़कर, खुले दिमाग़ से अपने विचार रखते रहे। इस संबंध में उनका लेख प्रस्तुत करते हुए विवेक मेहता यह भी याद कर रहे हैं कि उन्होंने लाडलीमोहन जी को दो-तीन बार नज़दीक से देखा। जीरन के घर की, एक बार की छवि जो आंखों में है- सफ़ेद झक कुर्ता-पायजामा, भरा-पूरा शरीर, चेहरे पर चमक और मुस्कान…

–धरोहर लेख–

लगता है 20वीं शताब्दी का उत्तरार्ध नर-नारी के सहज मैत्री संबंध के बारे में अभिशप्त रह गया। लोग चटखारे ले-ले कर इसका बखान करते हैं, ख़ासकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीति से जुड़े लोगो के बारे में तो यह और भी अतिरेकपूर्ण है। पहली बार ऐसी चर्चा एक ऐसी महिला की जीवनगाथा को लेकर शुरू हुई, जिसने अंग्रेज़ों के आख़िरी शासक और हिंदुस्तान की आज़ादी के बीच कारगर भूमिका निभायी थी। यह चर्चा शुरू हुई थी मिस्टर रिचर्ड हाग की किताब से, जो लेडी माउंटबेटन के जीवन के संबंध में थी। तभी मैंने एक लेख “नेहरू-एडविना-माउंटबेटन, ‘एक बेमिसाल त्रिकोण पर राजनीति, हृदय और सम्पुष्टि मर्यादा का” लिखा, जो धर्मयुग में छपा था। अब पुनः एक और किताब लेडी माउंटबेटन की जीवनकथा पर छपी है। लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार सुश्री जैनैट मोरगन हैं। शीर्षक है- “द लाइफ़ ऑफ़ माई ओन” (मेरी अपनी जीवनगाथा), जिसे हार्पर कॉलिन्स ने प्रकाशित किया है।

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यह किताब अभी भारत में नहीं आयी है, लेकिन इसके बारे में देश और विदेश के अख़बारों में जो कुछ छपा है और जो मेरी निगाह से गुज़रा है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि यह एक ऐसा आईना है, जो एडविना की ज़िदंगी को दर्शाता है, जिसमें उसका पूर्ण व्यक्तित्व आवरणरहित होता है, उसने अपनी भावनाओं, मनोदशा और संवेदनाओं को बेलौस अपने और नेहरू के बीच हुए पत्र-व्यवहार में रख दिया है। जिस ईमानदारी से उसने अपने विगत, वर्तमान और भविष्य को जीया है, वह अपने आप में एक अनूठी मिसाल है।

वैसे नेहरू और एडविना एक-दूसरे को आज़ादी से पहले भी जानते थे, लेकिन दोनों के बीच एक अंतरंग समझ 1948 में उपजी और इस समझ को जिस ईमानदारी के साथ एडविना ने व्यक्त किया है, उसका उदाहरण दिया जा सकता है। नेहरू और एडविना के रिश्ते न आध्यात्मिक थे, न शारीरिक। मुझे लगता है कि यह सब गौण था उनके लिए, उन्होंने भावनात्मक स्तर पर अपने रिश्तों को पूर्ण शिद्दत के साथ जीया। समय की मसरूफ़ियत दोनों को बहुत कम क्षण उपलब्ध कराती थी मिलने के लिए, लेकिन जो क्षण मिलते थे, उन्हें वे भरपूर जीते थे और आगे वैसे ही क्षण जीने की आकांक्षा लिये, वे दोनों क़रीब-क़रीब रोज़ ही पत्र-व्यवहार के माध्यम से अपने अंदर जो घट रहा था, उसे व्यक्त करते रहते थे। यह किताब एडविना और नेहरू के इकलौते अनुराग का जीवंत शब्दकोश है।

एडविना और नेहरू ने अपने रिश्ते को संवेदनशील, भावपूर्ण मनोवेग व पूरे जोश के साथ जीने की कोशिश की थी। 1948 से 1951 तक वे रोज़ रात सोने के पहले एक पत्र ज़रूर लिखते थे। उसके बाद 1954 तक हर हफ़्ते पत्र लिखने का यह सिलसिला जारी रहा, फिर पाक्षिक होने लगा। इस रिश्ते की शिद्दत को एडविना ने अपनी मृत्यु के अंतिम समय तक, जो कि 20 फरवरी, 1960 को हुई, जीया। अपने पूर्णतया व्यक्तिगत पत्र, उन्होंने सिलसिलेवार अपने पास सुरक्षित रखे थे। एक-एक क्षण जीने की ललक इन दोनों के मध्य सदा रहती थी, एडविना तो कुछ समय तक अपनी घड़ी का समय भारत के समय के अनुसार रखती रही। इन दोनों ने कभी अपने मिलने के और साथ रहने के अवसर को खोने नहीं दिया। 1950 से 1954 के बीच में नेहरू आठ बार लंदन गये और हर बार वे कोशिश करते थे कि एक सप्ताहांत, एकांत में साथ रह सकें और वे समय निकालते भी थे, उन्होंने रिश्तों को नये आयाम दिये।

46 वर्ष की थी एडविना जब नेहरू से मिली। गो कि नेहरू के जीवन में असंख्य औरतें आयीं और हरेक के साथ उन्होंने अपने तरीक़े से, अपने एकांकी जीवन को भरने की कोशिश की, लेकिन एडविना के पदार्पण के साथ ही जैसे उनका सपाट विधुर जीवन एक नयी कली के रूप में विकसित होते-होते, पूर्ण पुष्प बना। और उसकी सुगंध दोनों के ही अंतरंग को जोड़ती, सराबोर करती रही। समय और कर्तव्यों की मजबूरियां भी उन लोगों के बीच आड़े नहीं आयीं- इसका यह अर्थ नहीं कि वे कर्तव्यविमुख हुए। उनके काम में कहीं लेशमात्र भी कमी नहीं खटकी थी। शायद इसका कारण यह रहा हो कि उन्होंने अपने जीवन के अंदर की कमियों को, अपने परस्पर रिश्तों में खोजकर अपने को पूर्ण बना लिया था।

सन 1949 में नेहरू ने एडविना को कोणार्क के सूर्य मंदिर की शृंगारात्मक मूर्तियों का एक अलबम भेंट किया था। नेहरू ने उनको लिखा- “जब पहली बार मैंने इनको देखा तब कुछ समय के लिए जैसे मेरी सांस तक रुक गयी थी। मैं ख़ुद समझ नहीं पाया, लेकिन गहराई से देखने के बाद, मुझे ऐसा लगा कि इनके अंदर बहुत कुछ पूर्ण है, जो छिपा हुआ और संरक्षित है। स्वयं ही प्रश्न उपजा कि इनका गहन मतलब क्या है? मैं उस वक़्त के समाज में स्वयं को ले गया और सोचने लगा कि क्या उस ज़माने का समाज इतना समुन्नत था कि ऐसी शृंगारिक चीज़ों को भी, मंदिर की पवित्र दीवारों पर उकेर सकता था। अगर उनके दिमाग़ में कोई अश्लीलता, अपवित्रता या वेगपूर्ण काम-वासना होती तो निःसंदेह वे इसे मंदिर में नहीं उकेरते। आज मुझे लगता है कि वह समाज कितना उन्नत था- वह अनासक्त, निष्कपट या विरक्त-मन रहा होगा जिसने ज़िंदगी की असली हक़ीक़त को, बिना किसी शर्म अहसास किये, कुछ भी छिपाये उकेरा था। शायद समाज उन वर्जनाओं से घिरा नहीं था, उन्मुक्त समाज था जिसके जिसमें ज़रा भी अश्लीलता नहीं थी। पुराने भारतीय इतिहासकारों, साहित्यकारों ने जिस विस्मयजनक तरीक़े से ‘काम’ पर लिखा, वह अपने आपमें ईमानदारी, अनासक्ति और निश्छल मन का एक सबूत है और इसमें कहीं नहीं लगता कि इन मूर्तियों से कामवासना प्रभावित करने को कोई अभिलाषा हो।”

एडविना ने जवाब दिया- “मैं समझती हूं कि सूर्य मंदिर की मूर्तिकला में कोई गुप्त-प्रेम, व्यभिचार या षड्यंत्र नहीं है। मैं ऐसी किसी चीज़ से चिंतित और आघातित महसूस नहीं करती जो क़ुदरती है, स्पष्ट है और हक़ीक़ी है। इनमें कोई अश्लीलता और छद्म तथा उबाऊपन अथवा जुगुप्सा का भाव नहीं है और न ही अरुचि का भाव उत्पन्न होता है। असल में मेरे दिमाग़ में इनको देखकर प्राथमिक रूप में एक विस्मयकारी और अलौकिकता का भाव पैदा होता है।”

एडविना ने भारत व नेहरू में अपनी पहचान खोज ली थी। उनके लिए नेहरू-भारत, भारत-नेहरू का पारस्परिक रिश्ता एक अजीब तरीक़े से घुल-मिल गया, गुंध गया था। उन्होंने अपना सब कुछ भारत के लिये दिया, नेहरू के ज़रिये, क्योंकि उन्हें वे भारत का प्रतीक मानती थी। नेहरू ने सदा उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया। जब दोनों साथ होते तो एडविना अपने अंदर एक गति और वेग का अनुभव करती, अपनी सारी थकान, बीमारी, विगत, वर्तमान तथा भविष्य को भूल जाती थी। साफ़गोई व अनौपचारिक बातचीत के लिए दोनों का मन सदा लालायित रहता था। उनमें कहीं कोई लगाव, दुराव-छिपाव नहीं था।

मुझे ऐसा लगता है दोनों ने अपने जीवन की लक्ष्मण-रेखाओं को लांघकर, बंधनमुक्त हो कर, अपने अंतर्मन को एक-दूसरे के समक्ष उंड़ेल दिया था। उनके अंदर एक अजीब क़िस्म की संवेदना का स्रोत कलकल करता था और एक उज्ज्वल पारदर्शी प्यार की सूक्ष्म अनुभूति का अहसास जीवन को सुगंधित करता रहता था। वह सुगंध बड़ी मनोहारी और जीवनदायिनी थी। दोनों एक-दूसरे को अपने प्रथम नाम से बुलाते थे।

एडविना को कभी अपना अंतर्मन अपने पति से व्यक्त करने में संकोच नहीं होता था और पति का हृदय भी तो कितना विशाल! सन् 1952 में अपनी बीमारी के समय उन्होंने अपने पति को लिखा, “मैंने अपने जवाहर के जो पत्र हैं, सब रखे हैं। मैं चाहूंगी कि जीवनपर्यंत तुम इन्हें अपने पास रखना।” एडविना अपने पति लॉर्ड माउंटबैटन को प्यार से ‘डिकी’ कहती थीं। उन्होंने आगे लिखा- “तुमको पता चलेगा कि मेरे और जवाहर के कैसे रिश्ते हैं, इनमें कुछ में पूर्ण सच्चाई, कुछ में इतिहास और कुछ में बिल्कुल व्यक्तिगत और कुछ ऐसे पत्र हैं, जो प्रेमपत्र कहे जा सकते हैं। यह मैं इसलिए लिख रही हूं कि सिर्फ़ तुम हो जो इस अजीब और अज़ीम रिश्ते को समझ सकते हो। इसमें बहुत कुछ आध्यात्मिक भी लगता है। जवाहर का मेरे जीवन में बड़ा स्थान है। मुझे लगता है कि मानवीय स्तर पर मैंने उसको और उसने मुझको पूर्णतः समझा है। हम लोगों की मुलाक़ात बहुत कम और विरले होती है।”

लॉर्ड माउंटबैटन ने अपने जवाब में लिखा- “मैं सदा तुम्हारे और जवाहर के रिश्तों को समझता और जानता रहा हूं। इससे मेरे मन में जवाहर के लिए अनुराग व प्रीति रही है। तुम लोगों के रिश्तों के लिए मेरे मन में सदा ही प्रशंसा का भाव रहा है और मैं अपने को इस मामले में भाग्यशाली समझता हूं कि जहां मेरे अंदर और कमियां हो सकती हैं, वहीं इन रिश्तों ने कभी भी मेरे मन में ईर्ष्या नहीं पैदा की।”

हिन्दुस्तान से जाने के बाद एडविना को भारत, जिसको सदा ही उन्होंने अपना घर समझा, की याद सदैव सताती थी। एक अजीब गृहासक्ति का अहसास था। एक ही मिसाल काफ़ी है कि सप्ताहांत वे हमेशा जब अपने कार्यालय में जातीं तो इस उम्मीद से जातीं कि भारत से उनका कोई व्यक्तिगत पत्र कृष्ण मेनन, जो उस समय लंदन में भारतीय उच्चायुक्त थे, के पास आया हो। नेहरू अपने पत्र सदा ‘राजनीतिक थैले’ के ज़रिये ही एडविना को भेजते थे। जब कोई पत्र मिलता तब वे अपने को हल्का महसूस करती थीं और लंबे अंतराल तक पत्र नहीं मिलता, तब फोन करतीं। उस जमाने में सीधी संचार-सेवा नहीं थी। इसलिए वहां से ऑपरेटर के माध्यम से पूना, मुंबई और अन्यत्र होकर दिल्ली टेलिफ़ोन मिलता था और वह भी साफ़ आवाज़ में नहीं। एडविना की बात ऑपरेटर सुनकर, दूसरे ऑपरेटर को बताता था और फिर वह बात नेहरू के पास पहुंचती थी।

एडविना पत्रों में अपने को ज्यादा सही तरीक़े से व्यक्त कर पाती थीं, लेकिन एक डर था कि पत्र किसी और के हाथ न लग जाये, इसलिए लिफ़ाफ़े के ऊपर ये दोनों कुछ चिन्ह बना दिया करते थे। पत्र मिलने के बाद दोनों ही ख़तों पर क्रमवार नंबर भी डाल देते थे। शायद इसलिए कि कहीं कोई पत्र खो न जाये और दूसरी बात, इस बात से आश्वस्त हो जायें कि पत्र लगातार मिल रहे हैं। उस ज़माने में राजनीतिज्ञों के दिमाग़ में कम्युनिस्टों का एक अजीब भूत चढ़ा था और इन दोनों को डर था कि उनके आशुलिपिक के माध्यम से कम्युनिस्टों के हाथ उन पत्र की प्रति न लग जाये, इसलिए वे बहुत सचेत रहते थे। एडविना तो स्वयं टाइप कर लेती थीं, लेकिन नेहरू पहले एडविना को स्वयं पत्र लिखते परंतु कभी-कभी कुछ अंश टाइप भी करवा लिया करते थे। लिखने में भी वे बड़ी सतर्कता और संयम बरतते थे।

एडविना के न रहने के बाद नेहरू ने अपने कमरे से एडविना और माउंटबैटन की हर चीज़ हटा ली थी। जगह खाली हो गयी, लेकिन उनकी याद की गंध हमेशा उस कमरे में नेहरू महसूस करते थे और उन यादों को हमेशा अपने साथ लिपटे हुए पाते थे। नेहरू ने एक पत्र एडविना को, उनकी भारत से रवानगी के सात दिन पहले लिखा था- “मैं अपने स्वप्नलोक में विचर रहा हूं जो कि एक प्रधानमंत्री के लिए शोभायमान नहीं है, लेकिन मेरी बदक़िस्मती है कि तुम लोगों की यादों के साथ जुड़े स्वप्नलोक के बावजूद घटनावश मैं प्रधानमंत्री हूं।” अपने भावनापूर्ण पत्र में उन्होंने लिखा कि- “कल्पना कर रहा हूं कि विदाई के समय तुम हज़ारों आदमियों से मिल रही होगी और मैं दूर खड़ा निहार रहा हूंगा। तुम मेरे जीवन में वह सब कुछ ले कर आयीं, जिसकी मुझे चाह है।” ऐसे ही भाव एडविना ने नेहरू से व्यक्त किये थे। वे दोनों एक संतुलित प्यार की अनुभूति का अहसास लिये, सदा जीते रहे, यह जानते हुए भी कि वे परिस्थितियों को नहीं बदल सकते। इसके बावजूद दोनों का जीवन और ज्यादा शक्तिशाली और अर्थपूर्ण बन गया।

जबसे यह किताब आयी है, बहुत से राजनीतिक, इतिहासकार, मनोविश्लेषक तथा राजपुरुषों ने इन दोनों के रिश्तों के नाना अर्थ लगाये हैं और इनके रिश्तों के बारे में विस्तार से कहा है। कुछ ने तो गांधीजी और मीराबेन के रिश्तों की भी तुलना करने की ज़हमत की है। मुझे लगा कि जिस तरीक़े से लोगों ने मीराबेन और गांधीजी के रिश्तों को न्यायपूर्ण तरीक़े से नहीं देखा, कमोबेश नेहरू के इस रिश्ते को भी उन लोगों ने रंगीन चश्मे से देखने की कोशिश की। लेकिन इस किताब से मुझे लगता है कि हर वो शक-ओ-शुब्हे के पर्दे लोगों की निगाहों से उतर जाएंगे जो अब तक दोनों की ज़िंदगी को परिभाषित करते रहे हैं। एक प्लूटोनिक प्यार का रिश्ता दोनों के अंदर था- यहां तक कि इस प्यार भाषा पर नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम, नयी दिल्ली के एक प्रोफ़ेसर निदेशक भी इस रिश्ते को सही तरीके से परिभाषित नहीं कर पाये।

यह जगज़ाहिर है कि सत्ता-हस्तांतरण में एक अहम भूमिका एडविना ने निभायी और कुछ हद तक उसको प्रभावित भी किया। लेकिन उन्होंने लगन से शरणार्थी समस्या व अन्य समस्याओं से अपने को जोड़ा। उसमें कोई बेईमानी नज़र नहीं आती। एडविना ने तो यहाँ तक लिखा है कि- “हिंदू-मुस्लिम-सिख समस्या के लिए बहुत हद तक इनके अंदर खेली और चलायी गयी राजनीति ज़िम्मेदार है, जो कि योजनाबद्ध षड्यंत्रों के तरीक़े से चलायी गयी। इसमें पूर्व सत्ता से जुड़े लोग और इन तीनों फ़िरक़ों के नेताओं का स्वार्थ भी उत्तरदायी है, ये सारी समस्या नक़ली और षड्यंत्रकारी होने के साथ-साथ सत्ता-स्वार्थ से लबरेज़ है।”

मुझे लगता है कि जो बात अंग्रेज़ों के लिए सच थी, वह मौजूदा सत्तासीनों के लिए भी सही है जो कि ग़ुलामी की लीक पर आज भी चल रहे हैं। राजनीति को धर्म की बैसाखी से खड़ा किया जाना प्रजातंत्र के लिए बहुत घातक है। ग़लतियां सब तरफ़ से हुई हैं। पहले की गयी उन ग़लतियों से नसीहत लेकर, भविष्य के लिए कुछ सोचा जा सकता है और इस बात की सावधानी बरती जा सकती है कि वे ग़लत योजनाएं और स्वार्थ अब भविष्य में कभी न पनपें, अगर इनसे नहीं लड़ा जाता, नहीं बदला जाता, तो आज की पीढ़ी की तरह आने वाली पीढ़ी भी इन्हीं स्वार्थों से अभिशप्त रहेगी।

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मैं जान-बूझकर उन राजनीतिज्ञों, राजनयिकों, इतिहासकारों और साहित्यकारों का नाम नहीं ले रहा हूं जिन्होंने नेहरू और एडविना के रिश्तों को चटपटा बनाकर दुनिया के सामने परोसने की कोशिश की व कर रहे हैं। नेहरू ने बहुत-सी विदुषी और बौद्धिक, सामाजिक व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर महिलाओं के साथ एक गहन रिश्ता जीया है और उन्हें इस्तेमाल भी किया। लेकिन भाग्यशाली भी रहे कि किसी भी महिला ने, जिनमें से आज चंद ही जीवित हैं, कभी कोई शिकायत नहीं की। एडविना के नेहरू के जीवन में पदार्पण के बाद नेहरू की सारी वे कमियाँ ख़त्म हो गयीं। उन सारे आवेगों, मनोवेगों की तीव्रता पर लगाम लगी, जो नारियों के साथ महसूस करते थे और एक ऐसा सुंदर, ख़ुशनुमा, सुगंधमय जीवन बन गया, जिसमें न काम रहा, न कामना- बचा सिर्फ़ पारदर्शी प्यार!

जाने से पहले एडविना ने नेहरू को अठारहवीं शताब्दी का सोने का एक फ़्रांसीसी डिब्बा दिया, जिस पर मीनाकारी का काम था। यह उसे सबसे ज़्यादा प्रिय था। साथ में पन्ने की एक अंगूठी दी और चलते-चलते संत क्रिस्टोफ़र का पवित्र तमग़ा दिया। नेहरू अचंभित! उन्होंने पूछा, “इसका क्या करूं? क्या गले में पहन लूं?” एडविना ने कहा, “यह मत भूलना कि यह तमग़ा मेरी मां ने मेरे पिता को दिया था, और पिता ने मुझे। मैं यह सिर्फ़ तुम्हें दे रही हूं, यह मुझे बहुत प्रिय है।”

पाठक ख़ुद इसका फ़ैसला करें कि किस धरातल पर दोनों ने अपने रिश्तों को जीया होगा! नेहरू ने बदले में उन्हें भारत का एक प्राचीन सिक्का भेंट किया, जिसे उसने अपने कंगन में लटका लिया और जीवन भर लटकाये रखा। उन्होंने एक दशहरी आम की पेटी का बक्सा और अपना जीवन-चरित्र भी भेंट किया। वायसराय भवन से और भी चीज़ें आयीं जिनमें एक बहुत सुंदर फ़्रेम में मढ़ा हुआ अद्भुत चित्र लुई और एडविना का था। वह भी माउंटबेटन की नेहरू को भेंट थी। इस सुंदर चित्र को नेहरू सदा अपने अध्ययन-कक्ष में रखते थे।

मैं एक घटना का ज़िक्र करने से अपने को नहीं रोक पा रहा हूं जो भारत के प्रति एडविना के अनूठे प्रेम का सबूत है। क्या मृत्यु को भी अपने सपने और जीवन के साथ कोई ऐसा जोड़ सकता है? इस मामले में मुझे एडविना विरली लगती हैं। ज़रा कल्पना कीजिए, जब 20 फरवरी, 1960 को, नॉर्थ बोर्नियो में सोते हुए वे अपना शरीर छोड़ रही थीं, तब उनके सिरहाने सारे वे पत्र रखे थे, जिन्हें वे अपने जीवन की अमूल्य निधि समझती थीं और जिनको वे रात को पढ़ती थीं। उनका शरीर हवाई जहाज़ से घर ब्रॉडलैंड लाया गया। फिर उसे रोमसे अबे में रखा गया। कैंटबरी के महाधर्माचारी ने अंतिम यात्रा का सारा कार्य निभाया। फिर एक ताज्जुब की बात हुई। उनके ताबूत को ‘त्रिशूल’ नामक समुद्री जहाज़ पर लादा गया, जो नेहरू ने उनकी अंतिम यात्रा के लिए भेजा था। उस ताबूत पर गेंदे की पुष्पमाला (रीथ) रखी थी, जो नेहरू ने भेजी थी और फिर जहाज़ ताबूत को लेकर विशाल समुद्र की अतल गहराइयों की ओर चल पड़ा। एक तरीक़े से भारतीय पद्धति से जिसको जलसमाधि कहते हैं, एडविना का अंतिम संस्कार किया गया।

एक अजीब एहसास मेरे मन में इस घटना से उपजा कि जिस तरह समुद्र की कोई परिधि नहीं है, इसी तरह प्यार के सागर की भी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य जब तक मन की अतल गहराइयों के सागर में नहीं उतरता, इसका अहसास कैसे महसूस कर सकता है! यह एडविना का भारतप्रेम ही था शायद कि उसने अपनी अंतिम इच्छा यह प्रदर्शित की कि उसके ताबूत को दफ़नाया न जाये, बल्कि समुद्र की अतल गहराइयों में उतार दिया जाये। जल प्रतीक है निर्मलता का, पवित्रता और शुद्धता का। दुनिया की नदियां समुद्र में ही समा जाती हैं, गंगा का भी मिलन सागर में होता है। नेहरू को गंगा बहुत प्रिय थी। उनकी जीवनदायिनी थी गंगा! एडविना ने शायद इस कल्पना को जीया होगा कि जब नेहरू की अंतिम यात्रा होगी तब उनका अस्थिविसर्जन गंगा में होगा और उनके अवशेष गंगा से होकर समुद्र में आ कर मिलेंगे और तब उसकी अतल गहराइयों में उन दोनों रूहों का मिलन होगा!

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