cartoon, doctor, strike, डॉक्टर. हड़ताल
हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....

डॉक्टर हड़ताल पर हैं!

             आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाक़ायदा दर्ज किये जाने लायक़ है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाक़ायदा हड़ताल पर हैं।

अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमाचौकड़ी न ही मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नज़रबंदी बना दिया है। फ़रमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञापन दे आओ।

वरना हमारे यहाँ हड़ताल भी बड़ी मानवीय हुआ करती है। डॉक्टर दुकान बंद रखते हैं, पर पीछे के दरवाज़े से “इमरजेंसी” नामक सनातन सुरंग खुली रहती है। यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसे डॉक्टर और मरीज़ दोनों बराबर श्रद्धा से चलाते हैं। फ़ॉलो-अप वाले मरीज़ आ जाते हैं— “डॉक्टर साहब, बस दो मिनट।” फिर किसी का दबाव, किसी की सिफ़ारिश, किसी की धमकी— “या तो हमारे आदमी को देख लो, नहीं तो हम तुम्हें देख लेंगे।” ऊपर से डॉक्टर अपने को दिहाड़ी मज़दूर की तरह समझता है; एक दिन प्रैक्टिस ठप हुई नहीं कि डॉक्टर भूखा मर जाएगा।

कुछ डॉक्टर ऐसे भी होते हैं, जो हर आपदा में अवसर का रामबाण ढूँढ़ लेते हैं और हड़ताल को पारिवारिक पर्यटन में बदल देते हैं। पर सब निकल पड़ें तो समाज यही कहेगा— “वाह रे धरती के भगवान! इधर जनता कराह रही है, उधर ये पिकनिक मना रहे हैं।” इसलिए यूनियन ने इस बार मौज की सारी संभावनाओं पर ताला ठोक दिया। न सड़क पर नारे, न रैली, न भाषण, न पुलिस के डंडों का लोकतांत्रिक प्रसाद।

सुबह-सुबह पहली बार पता चला कि अख़बार में सचमुच सोलह पन्ने होते हैं और उन्हें पूरा पढ़ने में दो घंटे लग सकते हैं। इस खोज के बीच मैं श्रीमती जी से दो बार चाय बनवा चुका था। तीसरी बार इच्छा प्रकट की तो श्रीमती जी ने चाय की जगह मुंह बना लिया।

उधर फ़ोन पर मरीज़ों से क्षमा याचना का सिलसिला चल रहा था। कुछ तो सीधे रिश्तेदार निकले— “गर्ग साहब, सारे अस्पताल बंद पड़े हैं, आपसे ही उम्मीद थी। आप तो अपने आदमी हैं।” दुख की विडंबना देखिए, जब सब दरवाज़े बंद हों तभी आदमी को ‘अपने’ याद आते हैं, और एक हम हैं कि अपने होकर भी अपनों के काम नहीं आ पा रहे।

दोपहर तक घर का वातावरण ऐसा हो गया मानो किसी चिड़ियाघर से एक दुर्लभ जीव अस्थायी रूप से बैठक में छोड़ दिया गया हो। बच्चे बार-बार कमरे में आकर मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे पूछ रहे हों— “यह दिन में दिखायी देने वाला प्राणी कौन है?” अब तक मैं उनके लिए निशाचर वर्ग का सदस्य था। जिस कुर्सी पर मैं विराजमान था, उस पर उनके स्वाभाविक अधिकार थे। डेस्कटॉप पर मेरा यह अतिरिक्त और अनधिकृत कब्ज़ा उन्हें वैसा ही लग रहा था, जैसे सरकार अचानक पार्क पर बहुमंज़िला योजना घोषित कर दे।

cartoon, doctor, strike, डॉक्टर. हड़ताल

मैं कंप्यूटर पर डाटा खंगाल रहा था, पर बच्चों की दृष्टि में मैं शायद उनका डाटा भी चबा जाने वाला था। थोड़ी देर न्यूज़ चैनल देखने की भूल की तो श्रीमती जी ने रिमोट पर ऐसा अधिकार जताया, जैसे वह वैवाहिक संविधान की धारा 370 हो। उनके सास-बहू सीरियल का समय हो चुका था। मैंने सोचा, महाभारत देखने की वस्तु है, घर में शुरू करने की नहीं।

थोड़ा बिस्तर पर पसरा ही था कि कामवाली बाई आ गयी। उसने मुझे हिकारत से, और मैडम को संदेह से देखा— “साहब को क्या हुआ? बुख़ार है क्या? आज अस्पताल नहीं गये?” मैडम ने बताया— “आज हड़ताल है।” बाई बोली— “अच्छा, तो उनसे कहो बाहर जाएँ, बिस्तर हटाने हैं, चादर बदलनी है।” उस क्षण मुझे पहली बार समझ आया कि घर में निष्क्रिय पुरुष का सामाजिक दर्जा फ़ालतू फ़र्नीचर से बस आधा इंच ऊपर होता है।

मैंने सोचा, चलो किचन में हाथ बँटा दूँ। चार बर्तन निकालने गया, दस गिरा दिये, एक कप तोड़ दिया। श्रीमती जी ने तुरंत श्रमदान बंद करवा दिया— “तुमसे नहीं होगा। जाओ, बाज़ार से सब्ज़ी ले आओ, बैंक लॉकर से गहने ले आओ, लोन ऑफ़िस जाकर फ़ाइल भी देख आओ।” मैंने विवशता रखी— “बाहर गया तो कोई मरीज़ पकड़ लेगा। अख़बार वालों ने देख लिया तो कल छपेगा— ‘डॉक्टरों की हड़ताल विफल, डॉ. गर्ग इलाज करते पकड़े गये।’ ऊपर से यूनियन अलग पेनल्टी ठोक देगी।”

अब मैं बालकनी में शरण लिये बैठा हूँ। खिड़कियाँ बंद हैं, ताकि पड़ोसी न देख लें। घर अस्पताल के ऊपर है, बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। कोई रिश्तेदार भी आ गया तो फ़ुटेज कल प्रमाण बन जाएगी कि हड़ताल की आड़ में चिकित्सा जारी थी। उधर श्रीमती जी का अंतिम ताना गूंज रहा है— “एक तो प्रैक्टिस का नुक़सान, ऊपर से आप घर बैठकर छाती पर मूँग दल रहे हो। रहने दो, एक तुम ही हो, जो नियमों से चलते हो।”

अब आप ही बताइए, इससे अधिक मनहूस दिन किसी डॉक्टर के हिस्से में और क्या आएगा?

डॉ. मुकेश असीमित, dr mukesh aseemit

डॉ. मुकेश असीमित

हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!