raag mala. ग्वालियर, मोती महल, राग माला, gwalior, moti mahal
नियमित ब्लॉग ब्रजेन्द्र शरण श्रीवास्तव की कलम से....

संगीत का चित्रकला में रूपांतरण-1

            संगीत का चित्रकला में रूपांतरण: कैसे और कितना सम्भव? बैजू बावरा फ़िल्म में एक दृश्य है: भोर का समय है, तानसेन गायन का अभ्यास कर रहे हैं, गाते समय वह जब राग दरबारी के सप्तक के जो भी स्वर उच्चारित करते हैं (इसमें मूल स्वर उस्ताद अमीर ख़ां साहब का है) तो ठीक वही स्वर दीवारों पर अंकित रागमाला के चित्रों से भी मुखरित होने लगते हैं। इसमें ध्वनि का चित्र से संवाद और फिर चित्र से ध्वनि के मुखर होने का जो आदान-प्रदान दर्शाया गया है, यह इंटरफ़ेस दर्शक के मन को रागरंजित करते हुए संगीत के अद्भुत लोक में ले जाता है। यूट्यूब पर यह वीडियो उपलब्ध है।

1- रागमाला चित्रांकन और इसकी सीमाएं

संगीत और चित्रकला का साझा ज़िक्र होने पर अक्सर रागमाला याद आ जाती है। रागमाला- जिसमें राग के अव्यक्त मूल स्वभाव को व्यक्त करने वाले देवी-देवता और दृश्य को चित्रित किया जाता था। रागमाला लगभग 16वीं सदी में प्रचलित रही, इसकी पहाड़ी-कांगड़ा शैली और राजस्थानी-कोटा-बूँदी आदि शैलियाँ आज भी बहुत चित्ताकर्षक लगती हैं।

यद्यपि अन्य तरह से और आठ प्रहर अनुसार विभाजन भी हैं, फिर भी रागमाला के चित्रण में उदाहरण के लिए, मुख्यतः छह ऋतुओं और दिन का विभाजन कुछ इस तरह है:

1- वसंत ऋतु: राग हिंडोल- समय उषाकाल
2- ग्रीष्म ऋतु: राग दीपक- समय संध्याकाल
3- वर्षा ऋतु: राग मेघ- समय मध्याह्न काल
4- शरद ऋतु: राग मालकौंस- समय मध्यरात्रि
5- हेमंत ऋतु: राग श्री- समय गोधूलि
6- शिशिर ऋतु: राग भैरव– समय प्रातः काल

रागमाला के चित्र, रागों के शृंगार, शान्त आदि भाव के अनुसार हैं। ग्वालियर के मोती महल में भी रागमाला चित्रित कक्ष हैं, जो अब उपेक्षित हैं।

रागमाला चित्रण का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि उस समय रागों की स्वरावली को विशेष रूप से लिखने की पद्धति, नोटेशन विधि की कल्पना नहीं थी- जैसी कि वर्तमान समय में भातखण्डे जी ने संगीत में प्रचलित की है, जिससे प्रत्येक राग-रागिनी के स्वरों का संरक्षण और मानकीकरण दोनों ही हो गये। इसलिए उस समय राग के ऋतु और समय के विवरण दर्शाने वाले चित्र लिखे और बनाये जाने का चलन हुआ। रागमाला का मुख्य उद्देश्य यह था कि संगीतकार राग-चित्र से राग का मूल स्वभाव ग्रहण कर इसे प्रेषित करे और रसिक को राग का भाव बोधग्रहण करने में सुभीता हो। जैसे वर्षा राग मेघ-मल्हार में वर्षा, बादल, बिजली का चित्रण, वसंत के राग में संयोग शृंगार, वर्षा के राग में विरह शृंगार चित्रण। इसी तरह समय संकेत के लिए रात का समय हो तो चंद्रमा का चित्रण इत्यादि।

रागमाला में इस प्रकार, कानों से सुनी जाने वाली संगीत की श्रव्य कला का रूपांतरण, नेत्रों से देखी जाने वाली चित्रकला में दर्शाया जाता था। परंतु ऐसे चित्रण की कुछ समस्याएं हैं और सीमाएं भी। रागमाला में सभी रागों को ऋतु या प्रहर के अनुसार निबद्ध नहीं किया गया है। ऐसा किया भी नहीं जा सकता, वैसे भी ऋतु अनुसार रागों के विभाजन पर मतभेद भी है। इसके अलावा ऋतु विभाजन के स्थान पर रागों के दिन के चार प्रहर और रात के चार प्रहर के अनुसार विभाजन पर भी अधिक ज़ोर है, जो व्यावहारिक भी है।

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दूसरी ओर, दक्षिण भारत की कर्नाटक पद्धति के संगीत में तो ऐसा कोई भी विभाजन मान्य ही नहीं है।

मुझे ऐसा लगता है जिन राग-रागिनियों की स्पष्ट रूप से ऋतु की पहचान स्थापित है, उसे तो रागमाला चित्रकार ने ऋतु या समय अनुसार बना दिया है पर अन्य रागों का चित्रण कम ही देखा गया है। इसी प्रकार दो रागों के मेल से बने राग का चित्रण भी कठिन ही है। राग पर संगीतकार के प्रयोग भी ऐसी चित्रशैली में दर्शाना असंभव है। पर इतना तो है कि चित्र संगीत की यह शैली आज भी मन को सम्मोहित करती है और मन को दृश्य लोक से उठा कर ध्वनि लोक में उतार देती है। इसलिए इस पर और प्रयोग करते हुए इसका विस्तार करने की आवश्यकता है, इससे इस लोक कला को नवजीवन भी मिलेगा और भारतीय ज्ञान परम्परा भी आगे बढ़ेगी। ऐसे चित्रण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता AI का भी सावधानी से प्रयोग परीक्षण संभव हो सकता है।

2- दृश्य या चित्र का संगीत में रूपांतरण

चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, आज जब हम बेहतर साधन सम्पन्न हैं तब राग-रागिनियों का गायन और वादन इन दोनों का चित्रकला में बेहतर और व्यापक रूपांतरण- प्रयोग बतौर ही सही– क्यों नहीं किया जा रहा है? एक प्रश्न और भी है- संगीत में ध्वनि और शब्द, दोनों अंततः ध्वनि हैं, जो कान की विषय-वस्तु हैं जबकि चित्र नेत्र की विषय-वस्तु है। क्या दृश्य चित्र का रूपांतरण संगीत में नहीं हो सकता? क्या यह संवाद दोनों तरफ़ का नहीं हो सकता?

जैसे कानों से सुनी जाने वाली श्रव्य कला का रूपांतरण नेत्रों से देखी जाने वाली चित्र कला में दर्शाया जाता था, इसे और व्यापक एवं प्रभावशाली बनाने के अलावा क्या नेत्रों से देखी जाने वाली दृश्यकला का बदलाव कानों से सुने जाने वाले संगीत में या ध्वनि संकेत में बदला जा सकता है? बादल के टुकड़े को आसमान में बच्चे की तरह खेलते हुए देखने का मनोभाव बच्चे के मधुर स्वर में झंकृत किया जा सकता है?

दृश्य के साथ जुड़ी ध्वनि का अनुकूलन तो संगीत में होता रहा है। उदाहरण के लिए संगीत के सात स्वर, मतंग ऋषि ने प्रकृति की विभिन्न ध्वनियों से ही तो लिये हैं; मान्यता है कि उन्होंने स्वरावली का पंचम स्वर कोयल से लिया है– इसलिए अक्सर वर्षा गीत में कहा जाता है कि पंचम सुर में कोयल बोले।

3- दृश्य चित्र का काव्य में रूपांतरण

वैसे प्रकृति स्वयं चित्रकार है और चित्र दोनों ही है। इसके विविध रूप ही साहित्य में आलंबन उद्दीपन का कार्य करते हैं। प्रकृति का चित्रण लेखन में तरलता और भावुकता और सम्मोहन-सा पैदा कर देता है। प्रकृति में विस्तारित मौन संगीत अधिकतर काव्य रूप धारण कर लेता है। तारों जड़े आकाश की झिलमिल रमणीयता, नीलाकाश की अनन्त विशालता, झरनों से कोलाहल के बीच झरती संगीतात्मकता और वनप्रान्तर के बीच धूप-छाँव की तरह स्तब्धता.. यह सब दृश्य नेत्र की रूप तन्मात्रा के माध्यम से मन में उतरकर काव्य के शब्द में कब बदल जाते हैं, इसका ठीक पता तो कवि को भी नहीं रहता है। प्रसाद ने कामायनी में प्रकृति के दृश्यों में जो रमणीयता की अनुभूति की, उसे संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा है:

‘हे अनन्त रमणीय! कौन तुम?
यह मैं कैसे कह सकता?
कैसे हो क्या हो, इसका तो
भार विचार भी न सह सकता’

वस्तुतः हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता रहता है, जब हम अपने वातावरण से मिली प्रेरणा को शब्दों में, गीतों में बदल देते हैं। बस इस घटना के घटित होने को अलग से रिकॉर्ड में नहीं रखते हैं। जब किसी झरने की ध्वनि सहसा हमें असीम आनन्द के ध्वन्यालोक में ले जाती है, तो मन सहसा कुछ गुनगुनाने लगता है या सुंदर दृश्य देखकर कोई कविता याद आ जाती है।

4- अंतरविषयक समागम की आवश्यकता

आज कल अन्तर विषयक अध्ययन (interdisciplinary study) की चर्चा बहुत है; राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP2020) में इसे महत्वपूर्ण स्थान भी दिया गया है। इसलिए ऐसे कुछ असंगत से दिखने वाले सह-सम्बन्धों पर अब चर्चा होने लगी है। मैंने स्वयं ज्योतिर्विज्ञान और संगीत के बीच अन्तःसंबंधों पर एक लंबा अध्याय ही अपनी पुस्तक में लिख दिया है; तानसेन समारोह की स्मारिका में भी इस पर मेरे आलेख प्रकाशित हुए हैं।

यहाँ इस विषय को बेहतर समझने के लिए थोड़ी सी चर्चा तन्मात्रा पर आवश्यक लगती है। हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियों में से प्रत्येक की एक तन्मात्रा या (sensory power) होती है। कान की शब्द, त्वचा की स्पर्श, नेत्र की रूप, जीभ की रस, और नासिक की गंध तन्मात्रा है। इन तन्मात्राओं के ज़रिये ही बाहरी संसार भीतर हमारे मन में उतरता रहता है।

5- ध्वनि के चित्र रूप में अंकन की सीमाएं

प्रकृति की विभिन्न ध्वनियों के चित्रांकन से अलग, राग के चित्रांकन में समस्या यह है कि चित्रकार जब कान की शब्द नाम तन्मात्रा के माध्यम से मन में उतरने वाले संगीत के शब्द या ध्वनि को, नेत्र की तन्मात्रा वाले और आँखों से देखे जाने वाले रूप और आकार में तब्दील करता है, तो इसकी सीमाएं सामने आ जाती हैं क्योंकि राग नियम से बद्ध क़िस्म की आवाज़ होती है जबकि प्रकृति की ध्वनियाँ ऐसे बन्धन से मुक्त होती हैं। इसके अलावा वादन या गायन में जो कलाकारी होती है, मध्य, द्रुत, लय, मींड़ इत्यादि के माध्यम से, वह तो चित्र में दर्शायी ही नहीं जा सकती या दर्शायी जाये तो दर्शक ग्रहण ही नहीं कर सकता।

हमने जिस विषय को यहां चर्चार्थ रखा, ‘संगीत का चित्रकला में रूपांतरण: कैसे और कितना सम्भव?’ अभी उसमें बात की कुछ और गुंजाइशें हैं जैसे किस प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं या हों और कला के विद्वानों के इस बारे में क्या मत हैं… इस चर्चा को हम दूसरे भाग में जारी रखेंगे।

(चित्र परिचय: ग्वालियर के मोती महल में राग-माला के कुछ चित्र)

ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव, brijendra shrivastav

ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव

साहित्य, संस्कृति व कला, विज्ञान, धर्म, अध्यात्म व दर्शन, ज्योतिष और वास्तु, वैदिक विद्या एवं ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों पर 50 से अधिक वर्षों से निरंतर लेखन। आपके लिखे दो कथक नृत्य-नाटक दिल्ली कथक केन्द्र के कलागुरुओं के निर्देशन में मंचित। ज्योतिर्विज्ञान में नये विचार शिक्षा मंत्रालय से डिजिटलीकृत। संपर्क: shrivastava.brijendra@gmail.com

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