
- May 15, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
'लड़ते हुए लोग' श्रमिक संघर्ष की कहानियाँ।
संघर्षरत औद्योगिक श्रमिकों पर केंद्रित कहानी-संग्रह ‘लड़ते हुए लोग’ की कहानियों से गुज़रना पाठकों को एक नये अनुभव संसार से परिचित कराना है। इनके माध्यम से विभिन्न उद्योगों में लगे मज़दूरों की जीवन-स्थितियों, उनके न्यायोचित संघर्ष, मालिकों की मनमानी, हड़तालों, तालाबंदी तथा छँटनी के कारण बर्बाद होते उनके परिवारों के चित्र सामने आते हैं।
यह कहना ग़लत नहीं होगा कि औद्योगिक मज़दूरों के जीवन पर लिखा तो गया है, लेकिन यह साहित्य अपेक्षाकृत कम मिलता है। वर्तमान में वैश्विक संरचना के बीच अपने देश की बात करें तो किसान और मज़दूर सबसे निचले पायदान पर दिखते हैं। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से सरकारी प्रतिष्ठान और संसाधन निजी देशी और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज चरम पर है। अब तो शासन-व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल-पहाड़ों का भी सौदा करना चाहती है जो वहाँ के लोगों, आदिवासियों के जीवन-मरण का प्रश्न बन रहा है। आज पूँजीवाद अपने चरम में दिखायी देता है। इसका प्रारंभिक प्रगतिशील रूप-रंग बदल चुका है। एकाधिकारवादी पूँजीवाद का तानाशाही रूप धारण करना अनिवार्य है। शोषित-पीड़ित जनता की एकता और संगठन को नष्ट करने के लिए सत्ता वर्ग हर प्रकार की विभाजनकारी नीतियों का सहारा लेता है। धार्मिक कट्टरवाद, जातिगत भेदभाव या सांप्रदायिक विद्वेष जनता की एकता और प्रतिरोध को नष्ट करने के लिए हैं। हिंसा और दमन शासन-व्यवस्था के प्रमुख हथियार हैं।
अभी पिछले दिनों मार्च के महीने में देश की एक प्रमुख तेल कंपनी की पानीपत रिफ़ाइनरी में हड़ताल हुई। इससे पहले फरवरी में बिहार की बरौनी रिफ़ाइनरी में भी असंतोष फैल रहा था। इसकी चिंगारी अन्य राज्यों के उद्योगों में भी फैली और लंबे समय से दबा हुआ असंतोष जगह-जगह भड़क उठा। उत्तरप्रदेश के नोएडा, ग्रेटर नोएडा, हरियाणा के मानेसर, गुरुग्रंथ, फ़रीदाबाद, राजस्थान के भिवाड़ी, नीमराना, उत्तराखंड के पंतनगर और गुजरात के सूरत… सभी जगह न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग थी।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार अधिकतर उद्योगों में एक तिहाई से भी कम श्रमिक नियमित वेतन पर हैं। बाक़ी स्वरोज़गार या ठेके पर रखे जाते हैं। इनके काम के घंटों की न कोई सीमा होती है और न वेतन निर्धारण। सब ठेकेदार की कृपा पर। नियमित वेतन वालों में भी सबके पास लिखित नियुक्ति पत्र नहीं होते। ठेके के मज़दूरों में बड़ी संख्या प्रवासी मज़दूरों की होती है। दुर्घटनाओं में मरने वाले इन प्रवासी श्रमिकों का न पता-ठिकाना और न इनके परिवारों को मुआवज़ा मिलने की स्थिति। वेतन के अलावा जब श्रमिक कार्य स्थल पर साफ़ पीने के पानी की और शौचालय की भी मांग करें तो स्थिति की गंभीरता दिखती है। आज से बीस-पच्चीस साल पहले भी नोएडा की एक गारमेंट फ़ैक्ट्री की महिला कर्मचारियों ने यही शिकायत की थी कि काम के लंबे घंटे होते हैं और उनके लिए शौचालय तक नहीं है।
‘लड़ते हुए लोग’ संकलन की कहानियाँ श्रमिकों के जीवन, जुझारूपन और साथ ही ट्रेड यूनियनों के अंतर्विरोधों के साथ बहुआयामी चित्र प्रस्तुत करती हैं। प्रबंध तंत्र की कार्यशैली और श्रमिकों के प्रति संवेदनहीनता भी इन कहानियों के विषय बने हैं और इसी क्रम में अरविंद कुमार सिंह की ‘फ़ेयरवेल’ और जयनंदन की ‘कारपोरेटी बिसात’ कहानियाँ हैं। ‘कारपोरेटी बिसात’ में बड़े प्रतिष्ठान के मालिक द्वारा एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारी सकल सिंधु को पड़ोसी राज्य से वहाँ लाया जाता है ताकि लाॅ एंड आर्डर के नाम पर एक-एक करके प्रबंध तंत्र अपने सरदर्द ट्रेड यूनियन नेताओं को ठिकाने लगा सके। मैनेजमेंट अपनी एक महिला अधिकारी की भी अपने गुंडों द्वारा अपहरण कर, हत्या करा देता है क्योंकि उसने उस पुलिस अधिकारी के पास जाने से मना कर दिया था, जिसके द्वारा वह एक प्रभावशाली नेता की भी हत्या कराना चाहते थे।
‘फ़ेयरवेल’ कहानी में बावजूद अच्छे मुनाफ़े के कंपनी लगातार कर्मचारियों की छँटनी कर रही है और ज़बरदस्ती त्यागपत्र लिखवा रही है ताकि वह किसी प्रकार की देनदारी से बच सके। कर्मचारी विवश हैं और जब वे कंपनी से वी.आर.एस. की मांग करते हैं तो उन्हें गुंडों से पिटवाकर जबरन त्यागपत्र पर दस्तख़त कराये जाते हैं। इस लंबी कहानी में ट्रेड यूनियनों के बीच प्रतिस्पर्धा, नेताओं का दोग़लापन और नेतागिरी चमकाने के हथकंडों के साथ सरकारी श्रम विभाग, श्रमायुक्त, कोर्ट और वकीलों के चक्रव्यूह में फँसे कर्मचारियों का विस्तार से वर्णन है, जो वास्तविकता उजागर करता है। पीड़ित इस भँवर में फँसकर रह जाते हैं लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिलता। निरंतर छँटनी और तालाबंदी से उद्योगों के श्रमिकों तथा कर्माचारियों का जीवन नष्ट हो जाता है तथा परिवार बिखर जाते हैं। राजा सिंह की कहानी ‘कामरेड का मकान’ हड़ताल और तालाबंदी के बाद एक हँसते-खेलते परिवार के बिखरकर समाप्त हो जाने की करुण गाथा है।

‘प्रहरी’ की तीन कहानियाँ ‘हड़ताल’, ‘फैलाव ‘और विजय हमारी’ हैं। ये कोयला खदान मज़दूरों के जीवन पर हैं और एक लंबी कहानी के रूप में पढ़ी जा सकती हैं। मज़दूर जब कोई मांग उठाते हैं तो मालिक एक हथियार के रूप में तालाबंदी कर देते हैं। खदान में नीचे कुओं में उतरने पर उन्हें सुरक्षा साधन मुहैया नहीं कराये जाते। काम के दौरान ज़ख्मी होने के बावजूद कंपनी का डाक्टर उन्हें फ़िटनेस सर्टिफिकेट थमाता है। पैर से ज़ख्मी वेंकटय्या जब डॉक्टर से इसका विरोध करता है, तो पुलिस आती है और वह जेल में डाल दिया जाता है। विरोध में सभी मज़दूर हड़ताल पर चले जाते हैं। यहाँ अलग-अलग यूनियनों की परस्पर खींचतान और कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं के प्रबंध तंत्र से मिले होने के प्रकरण भी सामने आते हैं। एक ओर श्रमिक परिवारों की भुखमरी है तो दूसरी ओर उनका जुझारूपन है। अंत में वेंकटय्या जेल से बाहर आता है और प्रबंध तंत्र समझौता करने को मजबूर होता है।
गोविंद उपाध्याय की कहानी ‘अभी तो’वर्तमान के ही श्रमिकों के प्रति सरकारी रवैये को उजागर करती है। इब्राहीम शरीफ़ की कहानी ‘ज़मीन का टुकड़ा’ उन श्रमिक परिवारों की कहानी है, जो गाँव से आते हैं और परिवार में जो थोड़ी-बहुत खेती है, उसके बूते परिवार चलाना मुश्किल है। आज गाँव में किसान भी बेबस है। छोटा किसान शहर में मज़दूरी कर रहा है और अपनी ज़मीन से भी वंचित हो रहा है। सीमा आज़ाद की कहानी ‘सरोगेट कंट्री’ भी फ़ैक्ट्री में अपने मुनाफ़े को बढ़ाने और कारोबार को स्थानांतरित कर कर्माचारियों को बेरोज़गार करने की कहानी है, जिसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है। ऐसी ही तालाबंदी के शिकार सुभाष की पत्नी को घर चलाना और बच्चे को स्कूल भेजना भी मुश्किल हो गया है। तब वह ‘सरोगेट मदर’ बनने को तैयार होती है। उसे लगता है कि एवज़ में मिले दो लाख रुपयों से सुभाष कोई धंधा शुरू कर सकेगा। समय पूरा होने पर उसे ठगी का एहसास होता है। जब अस्पताल के बिल के पैसे उसको मिलने वाली रकम से काट लिये जाते हैं और उसको सरोगेट मदर बनाने वाले विदेशी दंपति देश छोड़कर जा चुके होते हैं।
संग्रह में स्वयं मज़दूर आन्दोलनों में रहे कथाकार इसरायल की कहानी ‘घेराव’ और सुप्रसिद्ध कथाकार कामतानाथ की कहानी ‘काम का पहिया’ भी हैं। कंपनी के बंद होने की ख़बर से पूरे श्रमिक वर्ग में बेचैनी है और परिवारों में दहशत का माहौल है। यूनियन के आह्वान पर मैनेजर का घेराव किया गया है। मज़दूरों का सोच है कि इस तरह दबाव से वह न तो छँटनी होने देंगे और न कारख़ाना बंद होगा। कहानी घेराव के माहौल में ही ख़त्म होती है, जहाँ फ़ैक्ट्री के गेट पर मज़दूरों के बीवी-बच्चे भी शामिल होने लगते हैं।
कामतानाथ की कहानी ‘काम का पहिया’ में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर की पृष्ठभूमि है। एक समय वहाँ अनेक बड़ी कपड़ा मिलें थीं और शक्तिशाली प्रभावी ट्रेड यूनियनें थीं। यहाँ के श्रमिक नेता मज़दूर आन्दोलनों के आधार स्तंभ हुआ करते थे। इस कहानी के केंद्र में पूर्ण समर्पित और जुझारू ट्रेड यूनियन नेता गुरु रामप्रसाद हैं। यूनियन की हड़तालें और आन्दोलन इनके बूते ही सफल होते हैं। गुरु रामप्रसाद ने कभी अपना वेतन भी पार्टी से नहीं लिया। वे अकेले हैं और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन से अपना खाना-पीना और ख़र्च चलाते हैं। यह भी सच है कि वे स्वयं बहुत साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से हैं और बावजूद अपना जीवन संगठन को समर्पित कर देने के वो संगठन और पार्टी की उपेक्षा का शिकार होते हैं। उन्हें कभी ऊँचा पद और सम्मान नहीं मिलता। वर्गीय चेतना के साथ वर्गभेद भी हमारे समाज का सच है। गुरु रामप्रसाद जो अपनी उपेक्षा के कारण नाराज़ थे और अलग-थलग थे, अपने को रोक नहीं पाते और उस समय जब हड़ताल चरम पर है तो ढुलमुल हो रहे मज़दूरों के बीच जाकर आन्दोलन को सफल बनाते हैं।
श्रमिकों के जीवन और संघर्षों को समझने और उस संवेदना से पाठकों को जोड़ने का काम यह संकलन बख़ूबी करता है। आज लगातार अमीर और ग़रीब के बीच की खाई चौड़ी हो रही है। आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग केवल अपनी सुख-सुविधाओं तक सीमित है। जिनके हाथों में पूँजी और सत्ता है, वे ज़मीन से लेकर आसमान तक, सभी संसाधनों पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। ऐसे में, सबसे उपेक्षित लेकिन विकसित समाज के निर्माण में चूने-पत्थर की तरह लगे औद्योगिक श्रमिकों के जीवन और संघर्षों को स्वर देने वाली इन कहानियों की प्रस्तुति सराहनीय है और इसके संपादक बधाई के पात्र हैं।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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