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ख़ुर्शीद मलिक की कलम से....

पश्चिम बंगाल: क्या हुआ, क्यों और अब क्या?

           अब जबकि चुनाव ख़त्म हो चुका है और नतीजे सामने आ चुके हैं, तो कुछ बातें बिना किसी राजनीतिक या वैचारिक चश्मे के साफ़ कर देना चाहता हूँ।

तृणमूल कांग्रेस और लगभग तमाम मुसलमान यह मान रहे हैं कि बीजेपी की जीत और तृणमूल की हार में सिर्फ़ EVM मशीन और SIR का हाथ है, तो यह सोच पूरी तरह ग़लत है। ममता बनर्जी की इस करारी हार में ख़ुद ममता बनर्जी का भी बड़ा योगदान है। SIR का मामला तो 2026 में आया, लेकिन उससे पहले क्या था?

बीजेपी ने 2016 में केवल 10 प्रतिशत वोट हासिल करके तीन सीटें जीती थीं। 2021 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया और पार्टी को 77 सीटें मिलीं। 2016 और 2021 के बीच न तो SIR था और न ही सुप्रीम कोर्ट में कोई भाग-दौड़। फिर पाँच वर्षों में वोट प्रतिशत 10 से बढ़कर 38 कैसे हो गया? और अब 2026 में यह 38 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत तक पहुँच गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को 200 से ज़्यादा सीटें मिल गयीं।

क्या इस जीत में बीजेपी की मेहनत, ममता बनर्जी का अहंकार और विकास कार्यों की अनदेखी शामिल नहीं है? क्या जनता ममता बनर्जी से नाराज़ नहीं हो चुकी थी? क्या भ्रष्टाचार चरम पर नहीं था? क्या पार्टी के लोग मेहनत कम और मलाई ज़्यादा नहीं खा रहे थे? क्या बंगाल में कार्य संस्कृति दूसरी रियासतों के मुक़ाबले बहुत नीचे नहीं गिर चुकी थी? क्या सरकारी कर्मचारी ख़ुश थे? क्या अनुब्रत जैसे गुंडे पुलिस को फ़ोन पर माँ-बहन की गालियाँ देने के बावजूद पार्टी के हीरो नहीं बने रहे? और अनुब्रत के इस व्यवहार पर ममता का कोई कार्रवाई न करना पुलिस वालों में ग़ुस्सा और दुख पैदा करने के लिए काफ़ी नहीं था?

आर.जी. कर अस्पताल में डॉक्टर के साथ हुई वहशियाना बलात्कार और हत्या की घटना हुई। ममता बनर्जी का रवैया और पूरी सरकार का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तथा दबाव डालने वाला व्यवहार जनता के ग़ुस्से को और भड़काता गया, ख़ासकर युवाओं और महिलाओं में गहरी नाराज़गी पैदा हुई।

राज्य स्तर पर बड़ी इंडस्ट्रीज़ की लगभग पूरी ग़ैर-मौजूदगी, निवेश का ख़राब माहौल और औद्योगिक इकाइयों के बंगाल छोड़ने से लाखों नौजवान बेरोज़गार हुए, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान पहुँचा।

शिक्षा संस्थानों और शिक्षा व्यवस्था को ममता बनर्जी की सरकार ने किस हालत में पहुँचा दिया, यह सब जानते हैं। सिंडिकेट कल्चर से आम लोग परेशान हो चुके थे। राज्य में नौकरी के नाम पर सिर्फ़ वादे किये गये, कोई ठोस नीति नहीं अपनायी गयी। क्या शिक्षित नौजवान, जिनकी उम्र 40 पार कर चुकी है, अब भी स्कूलों और दूसरे विभागों में वैकेंसी का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं?

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क्या पिछले दस वर्षों में बंगाल से गुजरात, दिल्ली और हरियाणा जाने वाले मज़दूरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी नहीं हुई? क्या राज्य की सड़कों की हालत बेहतर हुई? ममता बनर्जी ने इन अहम मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया।

सिर्फ़ 1500 रुपये, अनाज, लैपटॉप, मोबाइल देना, मौलवियों और हिंदू पंडितों को वज़ीफ़ा देना, क्लबों और पूजा आयोजकों को ग्रांट देना या मंदिर बनवाना — इन सबसे लंबी अवधि का विकास नहीं होता। ममता के 1500 रुपये के जवाब में बीजेपी ने 3000 रुपये देने का वादा किया, तो ग़रीब वोटर ने ज़्यादा देने वाले का साथ दिया। उन्हें तो मुफ़्त पैसों से मतलब है।

सियासी फ़ैसले भी ग़लत

ममता बनर्जी ने कांग्रेस को कमज़ोर किया, उसे लगातार चोट पहुँचाती रहीं। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस तो कमज़ोर हुई ही, बीजेपी यहाँ मज़बूत हो गयी। कभी गोवा में चुनाव लड़ने चली गयीं, कभी असम और नॉर्थ ईस्ट में। वह किसे कमज़ोर कर रही थीं और क्यों लड़ रही थीं? इन सब कोशिशों से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ, उल्टा बीजेपी को फ़ायदा हुआ और कांग्रेस को नुक़सान।

नाचने-गाने वालों को टिकट देकर जिता तो दिया, मगर वे अपने क्षेत्रों में जाते ही नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि लोग धीरे-धीरे उनसे नाराज़ होते गये। क्या शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद और यूसुफ़ पठान जैसे लोगों को टिकट देकर जिताना सही फैसला था? क्या बंगाल में उनके अलावा कोई और नहीं मिल सकता था?

INDIA गठबंधन की बात करें तो ममता बनर्जी ने उसे कमज़ोर करने के लिए न जाने कितनी राजनीतिक चालें चलीं। उसे लगभग निष्क्रिय बना दिया। अगर ममता इस गठबंधन को मज़बूत करतीं तो शायद बीजेपी लोकसभा में 240 सीटें भी न जीत पाती।

ख़ैर, चुनाव से पहले मैंने ये बातें नहीं कहीं, क्योंकि मेरा मानना था कि ममता बनर्जी जैसी भी हैं, अल्पसंख्यकों के लिए बीजेपी से कई गुना बेहतर हैं।

अब क्या होगा?

अब अहम सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी या उनकी पार्टी 2031 का चुनाव जीत पाएगी? राजनीति में भरोसे के साथ कुछ कहना मुश्किल है, लेकिन मुझे लगता है कि वापसी बहुत कठिन है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पार्टी में टूट-फूट शुरू हो चुकी है।

मेरे घर के पास एक क्लब है, उसका सचिव इस चुनाव में तृणमूल पार्टी का एजेंट था। मैं वोट देने गया तो उससे बात भी हुई। दो दिन से देख रहा हूँ कि वह मोटरसाइकिल पर क्लब के सामने से गुजरते हुए “जय श्रीराम” का नारा लगा रहा है। यही हालात दूसरी जगहों पर भी होंगे। कुछ दिन गुज़रने दीजिए, और ख़बरें सामने आएँगी।

पुलिस और प्रशासन अब बीजेपी के हाथ में होगा। सबसे अहम बात यह कि पार्टी फ़ंड में आने वाले सैकड़ों करोड़ रुपये भी बंद हो गये हैं। और अब यही पैसा बीजेपी के फ़ंड में जाएगा, जिससे पार्टी और मज़बूत होगी।

क्या करना मुनासिब है?

ममता बनर्जी को सबसे पहले पार्टी को टूटने से बचाना होगा। चापलूस लोगों को किनारे करना होगा। युवाओं को अहम ज़िम्मेदारियाँ देनी होंगी। शिक्षित लोगों को पार्टी में शामिल करना होगा। अगर मुसलमानों या कमज़ोर तबक़ों पर कहीं अत्याचार हो तो तुरंत मदद के लिए पहुँचना होगा और पार्टी को भी स्पष्ट निर्देश देने होंगे।

विपक्ष में रहकर ममता ज़्यादा ख़तरनाक और प्रभावी साबित हो सकती हैं। INDIA गठबंधन को मज़बूत करें और 2029 में बीजेपी को केंद्र से हटाने के लिए पूरी ताक़त लगाएँ। अगर 2029 में वह इसमें सफल हो गयीं तो 2031 में बंगाल में वापसी का रास्ता आसान हो सकता है। अपनी ज़िद और अहंकार को पूरी तरह छोड़ दें।

यह सब कुछ अंदरूनी सुधारों के बिना संभव नहीं है। बंगाल की जनता अब सिर्फ़ वादों और छोटी योजनाओं से नहीं, बल्कि वास्तविक विकास, रोज़गार और बेहतर शासन से प्रभावित होगी।

(चित्र परिचय: कार्टून सतीश आचार्य के सोशल मीडिया से साभार)

ख़ुर्शीद मलिक, khursheed malik

ख़ुर्शीद मलिक

वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार। दूरदर्शन और जनसंपर्क विभाग के डायरेक्टर(रिटायर्ड) रह चुके हैं। इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो, प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ कम्युनिकेशन जैसी संस्थाओं की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके साथ कार्य अनुभव रहा है।

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