बोलती, ठहरती, दिखती, छुपती आवाज़
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

बोलती, ठहरती, दिखती, छुपती आवाज़

           ग़ौर से सुनिए। कोई आवाज़ दे रहा है। यह आवाज़ तो जानी-पहचानी-सी लग रही है। कब सुनी होगी! कहीं सुनी हुई-सी लग रही है। यह आवाज़ किसी अपने की लग रही है। यह आवाज़ दुआएं दे रही है। यह आवाज़ मन को मज़बूत कर रही है। यह आवाज़ तो हमारी आवाज़ में मिलकर इसे ताक़तवर बना रही है। यह आवाज़ किसकी है?

खनक जाते हैं जब साग़र तो पहरों कान बजते हैं
अरे तौबा, बड़ी तौबा-शिकन आवाज़ होती है

कितनी ही आवाज़ें आपके ज़ेह्न में अब तक मौजूद हैं। कोई चेहरा याद आते ही उसकी आवाज़ आपके कानों में गूंजने लगती है। या कोई आवाज़ सुनते ही किसी का चेहरा आंखों के सामने घूमने लगता है। वह आवाज़ आपके दिल को सुकून देती है। वह आवाज़ आपको ख़ुशियां देती है। उस आवाज़ के सुनने से ऐसा लगता है ख़ुशबुओं का एक झोंका आपके क़रीब मौजूद है। वह आवाज़ सुनते ही लगता है अंधेरे में कोई रोशनी हमारे क़रीब पहुंच रही है। बशीर बद्र कहते हैं-

ख़ुदा की उसके गले में अजीब क़ुदरत है
वो बोलता है तो इक रौशनी-सी होती है

वह आवाज़ जो हम तक पहुंच रही है, उसे हमने सुना है, मगर कुछ आवाज़ें ऐसी भी हैं जो हम तक कभी नहीं पहुंचतीं। उन आवाज़ों का असर हम महसूस करते हैं। वे आवाज़ें हमारे हक़ में दुआएं करती हैं। वे मन से बोलती हुई आवाज़ें हैं। मगर इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपनी आवाज़ दूसरों के कानों तक पहुंचाना नहीं चाहते। ख़ामोशियों को ओढ़े रहते हैं। मन ही मन में उमड़ते विचारों को बाहर नहीं आने देते। अपनी आवाज़ दबा देते हैं। आवाज़ को दबाना कभी ठीक नहीं होता। अहमद मुश्ताक़ ने कहा है:

मौत ख़ामोशी है चुप रहने से चुप लग जाएगी
ज़िन्दगी आवाज़ है, बातें करो, बातें करो

आवाज़ के बिना दुनिया वीरान है। आवाज़ सिर्फ़ संवाद का ज़रिया नहीं, भावनाओं को महसूस करने का भी माध्यम है। कई आवाज़ें अंधेरे में भी टहलती हुई दिखायी देती हैं। कई आवाज़ें उजाले में छिपती नज़र आती हैं। ये आवाज़ें शोर नहीं करतीं। ये आवाज़ें कोहराम भी नहीं मचातीं। ये आवाज़ें बेचैन करती हैं। ये आवाज़ें परेशान करती हैं। ये आवाज़ें दुनिया के अंधेरों से लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। मुक्तिबोध तभी तो कहते हैं:

ज़िंदगी के..कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार
आवाज़ पैरों की देती है सुनायी
बार-बार… बार-बार

हमारे आसपास से ऐसी कितनी ही आवाज़ें हर पल गुज़रती हैं। इन आवाज़ों के ज़रिये हम दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। इन आवाज़ों के ज़रिये दुनिया के कुछ लम्हों को अपने भीतर अंकित करने की कोशिश करते हैं। इन आवाज़ों के साथ हमारे सुख-दुःख जुड़ जाते हैं। इन आवाज़ों के साथ हमारे अच्छे दिनों की यादें जुड़ी रहती हैं। ये आवाज़ें हमें तालीम भी देती हैं। ये आवाज़ें हमें तरबियत भी देती हैं। ये आवाज़ें मुश्किल पलों में संभलना सिखाती है। ये आवाज़ें लड़खड़ाने पर ठहरना सिखाती हैं। ये आवाज़ें रास्ते पर चलने का हुनर भी देती हैं और हौसला भी। ये आवाज़ें मंज़िलों तक पहुंचने की प्रेरणा भी देती हैं। ये आवाज़ें मंजिल पर ठहरने का शऊर भी देती है।

हर आवाज़ में एक आवाज़ मिलाने की कोशिश कीजिए। हर आवाज़ को अपने भीतर जज़्ब करने की कोशिश कीजिए। जिनकी आवाज़ नहीं होती वे आवाज़ को पाने के लिए क्या कुछ नहीं करते! हमें आवाज़ दी गयी है तो इस आवाज़ को सलीक़ा सिखाएं। इस आवाज़ को दिलों तक पहुंचने का हुनर सिखाएं। इस आवाज़ को सदा सभी के साथ रहने की सीख दें। दुनिया में यह आवाज़ ही हर वक़्त मौजूद रहती है। यही किसी न किसी के होने का एहसास कराती है। जैसा कि मजाज़ ने कहां भी:

छुप गये वो साज़-ए-हस्ती छेड़कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है

दुनिया में आपकी आवाज़ ही शेष रहना है और कुछ नहीं। इसलिए अपनी आवाज़ को असरदार बनाएं। बेहतर बनाएं। विश्वसनीय बनाएं और लोगों के दिलों में क़ायम रहने वाली आवाज़ बनाएं।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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