yousuf idris, यूसुफ़ इदरीश, yousuf idris story in hindi
मिस्र के ख्यात लेखक यूसुफ़ इदरीश लिखित कहानी। वादिदा वाशेफ़ द्वारा किये गये अंग्रेज़ी अनुवाद से हिंदी ​अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं श्रीविलास सिंह...

सबसे सस्ती रातें

            शाम की नमाज़ के थोड़ी देर पश्चात ही अब्दुल करीम के मुंह से निकलता गालियों का प्रवाह ताँतवी और उसके समस्त पूर्वजों को समेटता सारे गांव में फैल गया।

जल्दी-जल्दी चार प्रार्थनाएं करने के पश्चात अब्दुल करीम चुपके से मस्जिद से बाहर आ गया और तेज़ी से एक तंग गली में मुड़ गया। स्पष्ट रूप से नाराज़, वह अपनी पीठ के पीछे अपना एक हाथ दूसरे हाथ से कसकर पकड़े हुए था। वह आगे को झुका हुआ था, उसके कंधे गिरे हुए थे, मानो उस ऊनी शॉल के बोझ से दबे हों जो उसने ओढ़ रखी थी और जिसे उसने अपनी भेड़ों के ऊन से स्वयं अपने हाथों से बुना था। अब उसने अपना पीतल-सा पीला चेहरा ऊपर उठाया और हवा उसकी लंबी, नुकीली, झुकी हुई नाक, जिस पर बहुत-से गंदे काले धब्बे थे, से टकरायी। वह दांत पीसकर बड़बड़ाया और उसकी कसी हुई सूखी त्वचा सिकुड़ गयी, उसकी मूंछ की नोकें लगभग उसकी भौहों के किनारे तक आ गयीं जिन पर अभी भी वज़ू के पानी की बूंदें शेष थीं।

ज्यों-ज्यों वह लंबी संकरी गली में अपने बड़े और चपटे पैरों से, जिनके तलुवों में इतनी बड़ी बड़ी बिवाइयां थी कि कोई कील उनमें आसानी से खो जाती, आगे बढ़ता गया, उसकी खीझ त्यों-त्यों बढ़ती गयी।

गली युवा लड़कों, लड़कियों से भरी हुई थी, जो चारो ओर रोटी के चूरे की भांति बिखरे हुए थे, हर दिशा में टकराते और उसके रास्ते में आते हुए। उन्होंने उसका शॉल खींचा, उससे टकराये और वे जिस टिन के टुकड़े को ठोकर मार रहे थे, उससे उसका अंगूठा घायल हो गया। वह सिर्फ़ इतना कर सकता था कि उनको गालियां देता, उनके पिताओं और प्रपिताओं को ग़ुस्से में कोसता कि किस तरह के सड़े हुए बीजों से उन्होंने उन्हें जन्म दिया था, और उस मिडवाइफ़ को भी जो उन्हें इस दुनिया में ले आयी थी। उसने क्रोध से कांपते हुए गालियां दीं, क़समें खायीं, चिल्लाया और उस सड़ चुके शहर को कोसा, जहाँ ऐसे नालायक़ इतनी तेज़ी से ज़मीन से उग आते हैं, जितनी तेज़ी से किसी के सिर पर बाल भी नहीं उगते। लेकिन उसने अपने को इस विचार से सांत्वना दी कि भविष्य उनका हिसाब करेगा। उनमें से आधे का भुखमरी से मरना निश्चित था, जबकि बाक़ी को हैज़ा ले जाएगा।

उसने राहत की सांस ली, जब वह भीड़ भरी गली से बाहर आया और खुली चौकोर जगह, जो क़स्बे के बीचो-बीच स्थित तालाब को घेरे हुए थी, वहाँ पहुँचा। उसके सामने अंधेरा फैला था, जहाँ कम ऊंचे और एक दूसरे से सटे हुए भूरे रंग के घर थे, जिनके आगे गोबर का ढेर इस तरह पड़ा था मानो लंबे समय से ध्यान न दी गयी कब्रें हों। केवल कुछ दीपक रात्रि के वृत्त के आर-पार चमक रहे थे जो इस बात का संकेत थे कि जीवित प्राणी अपनी छतों के नीचे ठुंसे हुए हैं। उनकी मद्धिम रोशनियां, दूर से प्रेत-आत्माओं की अग्निमय आँखों-सी चमकती हुई, वहाँ तक आकर तालाब की कालिमा में डूब जा रही थीं।

अब्दुल करीम ने उस निराशा की ओर नज़र डाली जो उसके सामने पसरी हुई थी। दलदल से आती दुर्गंध उसके नथुनों में घुस रही थी। उसने उसे इतना परेशान किया कि उसे साँस लेना कठिन हो गया। क़स्बे के लोग अपने बंद दरवाज़ों के पीछे कबके खर्राटे ले रहे होंगे, इस विचार ने उसे और परेशान कर दिया। लेकिन अब उसका ग़ुस्सा तांतवी, चौकीदार, की ओर मुड़ गया जिसने उसे सूर्यास्त की बेला में एक गिलास चाय दी थी और अपने सूखे गले और चाय के स्वाद के लिए उसकी इच्छा ने उसके सम्मान की क़ीमत पर उसे स्वीकार करने को मजबूर कर दिया था।

चौराहे पर बहुत शांति थी। क़ब्रिस्तान की भांति शांति; कुछ भी गतिशील नहीं था। अब्दुल करीम चलता रहा फिर आधे रास्ते में ही रुक गया। बिना कारण के नहीं। यदि वह अपने पैरों का अनुसरण करता रहता, जहाँ वे उसे ले जा रहे थे तो कुछ ही क़दमों में वह अपने घर होता, और अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर के अपने तख़्त पर गिरकर सोने जाने के अतिरिक्त करने को उसके पास कुछ नहीं होता। पर उसकी आँखों में उस वक्त नींद का एक क़तरा भी न था। वह पम्प से निकले जल से भी अधिक स्पष्ट, शहद से भी हल्का महसूस कर रहा था और वह अगले रमादान के चाँद के उगने तक जागता रह सकता था। सब कुछ मात्र इसलिए कि वह एक गिलास काली चाय और तांतवी की दुष्ट मुस्कराहट से स्वयं को नहीं रोक पा रहा था।

और अब उसे सोने की कोई इच्छा नहीं महसूस हो रही थी जबकि रात्रि को अपने शैतान बच्चों के लिए छोड़कर क़स्बे के लोग अपनी झोपड़ियों में सिकुड़े खर्राटे ले रहे होंगे। उसे अपने साथ क्या करना चाहिए। खड़ा रहे। लेकिन कहाँ? क्या करते हुए? क्या उसे आँख-मिचौनी खेलते बच्चों में सम्मिलित हो जाना चाहिए? अथवा यहीं रुकना चाहिए ताकि नन्ही बच्चियां उसके चारों ओर जमा हो जाएं और खी-खी करें। अपनी जेब पूरी तरह कट जाने के बाद वह कहाँ जा सकता था। उसके पास एक खोटा सिक्का भी नहीं था जो उसे, उदाहरण के लिए, अबू अल असद के अड्डे तक ले जाता। जहाँ वह कॉफ़ी मंगाता, हुक्का पीता और आराम से देर तक रुक सकता अथवा बैठकर वकीलों के क्लर्कों को ताश खेलते हुए देखता और रेडियो पर बजती वे तमाम चीज़ें सुनता, जो उसकी समझ में नहीं आती थीं। वह अबू ख़लील की पसलियों में टहोका लगाते हुए दिल खोलकर हँस सकता था और फिर वहाँ जा सकता था जहाँ बाज़ार प्रमुख अम्मार पशु व्यापारियों के साथ बैठता था और बाज़ार में मंदी के संबंध में उनकी बातचीत में शामिल हो सकता था। लेकिन उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। अल्लाह तांतवी का घर बर्बाद कर दें।

न ही वह शेख अब्दुल मज़ीद के पास जा सकता था वहाँ निश्चय ही वह कॉफ़ी उबालता हुआ अंगीठी के पास पालथी मारे बैठा होगा। अल शीहे भी वहीं उसके पास बैठा होगा, उन रातों के बारे में बताता हुआ जिनके कारण उसके बाल भूरे हो गये, और बीते हुए उन दिनों के बारे में जब वह सीधे, सरल और दयालु लोगों के साथ ख़ुशी से जी रहा था और किस प्रकार उसे आज की दुष्ट पीढ़ी द्वारा झूठ बोलने, चोरी करने और दूसरों की फसलें बर्बाद कर देने का अफ़सोस था।

नहीं, वह वहाँ भी नहीं जा सकता था क्योंकि परसों ही उसने उस आदमी को रहट के गड्ढे में धकेलकर हँसी का पात्र बना दिया था। और उनके बीच रहट की मरम्मत के ख़र्चे को लेकर कहा-सुनी हो गयी थी। तबसे उनके बीच बोलचाल नहीं है।

काश ! वह बस अपनी छल्ले जड़ी छड़ी लेकर समा’न के पास जा पाता और उसके साथ पड़ोस के अल बलब्सा के फ़ार्म पर चला जाता। वहाँ बहुत मज़ा था। विवाह की दावतें, नाचने वाली औरतें, मौजें और आनंद, और क्या चाहिए। लेकिन उस सबके लिए पैसा कहाँ था? हो सकता है समा’न अपनी पत्नी से सुलह करने के लिए अपने चाचा के घर गया हो, जहाँ वह आजकल रह रही है। रास्ता ख़राब है और चारों ओर घना अंधेरा है। या अल्लाह, पूरे क़स्बे में एक उसी को नींद की कमी का सताया हुआ मूर्ख क्यों होना चाहिए था? और तांतवी। वह नहीं परेशान है। वह संभवतः किसी कोने में शांति से पड़ा खर्राटे ले रहा होगा। हे परवरदिगार, वह खर्राटे लेता हुआ नर्क में चला जाये।

मान लो कि अब उसे एक सद्गृहस्थ की भांति सीधे घर जाना है। वह अपनी पत्नी को टहोका लगाकर जगाएगा और उसे लैम्प जलाने को, चूल्हा जलाने को, रोटियां गर्म करने को मजबूर करेगा। हो सकता है, सौभाग्य से, वहाँ मांस का एक टुकड़ा, जो उसकी सास ने सुबह भेजा था, भी बचा हो। फिर वह उसके लिए हींग का बढ़िया पेय बनाएगी और उसके पश्चात, किसी सुल्तान की भांति प्रसन्न होकर वह बेंत की पुरानी हो चुकी टोकरियों के हत्थों की मरम्मत करेगा।

हाँ, क्या होगा यदि वह बिलकुल ऐसा ही करे? क्या स्टेशन को पंख उग आएंगे और वह उड़ जाएगा अथवा खलिहान में स्वर्ग उतर पड़ेगा? वह जानता था कि ऐसी कोई चीज़ नहीं होगी। वह अपनी पत्नी को भी जानता था। वह अपने चारों ओर पिल्लों के समूह की तरह पसरे छः बच्चों के साथ आटे की किसी बोरी की भांति पड़ी होगी। कोई भी उसे नहीं जगा पाएगा। मुर्दों को जगाने हेतु अपना बिगुल बजाते फ़रिश्ते इस्राफ़ील भी नहीं। और यदि किसी चमत्कारवश वह जाग भी जाये, तब फिर क्या? वह खुद से मज़ाक़ नहीं कर रहा। पेट्रोल लैम्प बस आधा भरा होगा और उस औरत को कल इसकी ज़रूरत होगी, जब वह सारी रात रोटियां सेकेगी। वह भी तब, यदि वे सभी कल तक जीवित रहेंगे। बच्चों ने सूर्यास्त को ही, भूख लग जाने के कारण, रोटी के आख़िरी टुकड़े के साथ आख़िरी मिर्च तक ठूंस ली होगी। और निश्चय ही मिर्च और रोटी के पश्चात मांस का नंबर आया होगा। जहाँ तक हींग और शक्कर की बात है, उसे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। वे चीज़ें उसके घर में हैं ही नहीं। और फिर कभी दोबारा वैसी चाय का गिलास नहीं मिलने वाला है जैसा उसने तांतवी के यहाँ ख़ाली किया था। अल्लाह करे तुम्हारी आत्मा नर्क में जाये, तांतवी, ज़ुबैदा के बेटे।

यदि कोई उस समय फ़ारिग होने चौराहे पर निकल आता और बीच में बिजूके की तरह खड़े अब्दुल करीम को देखता तो यही सोचता कि उसे किसी बला ने छू लिया है या वह शैतान के वश में है। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। वह केवल एक ऐसा व्यक्ति था, जिसकी निराशा उसकी सहनशक्ति से अधिक हो गयी थी। एक साधारण आदमी, रात की बातों से अपरिचित, जिसके सिर में चाय हाहाकार मचाये हुए थी, जिसकी जेब जाड़े की एक ठंडी रात में कट गयी थी और उसके तमाम साथी बहुत पहले ही गहरी नींद में डूब चुके थे। उसके करने के लिए वहाँ क्या था?

अपना मन बनाने के पूर्व वह वहाँ देर तक खड़ा सोचता रहा। कोई विकल्प न पाकर वह चौराहे के दूसरी ओर निकल गया। वह केवल वही कर सकता था, जो वह हमेशा जाड़े की तमाम ठंडी रातों में किया करता था।

अंत में वह घर आ गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और सावधानी से अंधेरे में अपने बच्चों को बचाता हुआ मिट्टी के चूल्हे तक गया। भीतर ही भीतर उसने अपने उस भाग्य को कोसा जिसने उसके पास छः ऐसे भूखे पेट भेज दिये थे, जो ईंट भी हज़म कर जाएं।

पुरानी आदत के कारण वह जाड़े की ठंडी रातों में अंधेरे में अपना रास्ता जानता था। और जब उसने अपनी स्त्री को पाया तो उसे टहोका नहीं दिया। उसने उसका हाथ लिया और एक-एक कर उसकी उंगलियों के पोर फोड़ने लगा और उसके पैर रगड़ने लगा, जिनमें टनों मैल की पपड़ी जमी थी। उसने उसे ज़ोर से झंझोड़ा जिससे उस सोये हुए ढेर में एक कंपन-सा हुआ। तांतवी को दी गयी उसकी अंतिम बद्दुआ के साथ औरत में हरकत हुई। उसने उसांस ली और निर्लिप्त भाव से जम्हाई लेते हुए पूछा कि उस आदमी ने आधी रात को बद्दुआ देने लायक़ क्या काम कर दिया। अब्दुल करीम जिसने भी उसे ऐसा करने को प्रेरित किया था, उसे बद्दुआ देता हुआ बड़बड़ाया और जो कुछ किया जाना था, उसकी तैयारी में अपने कपड़ों से उलझ गया।

yousuf idris, यूसुफ़ इदरीश, yousuf idris story in hindi

महीनों बाद औरतें एक बार फिर उसके पास पुत्र जन्म की सूचना देने आयीं। उसका सातवां। उसने उसके देर से आगमन हेतु स्वयं को सांत्वना दी। दुनिया की सारी ईंटें इसको भी नहीं भर पाएंगी।

और महीनों और वर्षों बाद, अब्दुल करीम अभी भी गलियों में भरे हुए, चारों दिशाओं से टपकते, और आते-जाते, उसके रास्ते में मिलते बिगड़ैल बच्चों से टकराता था। और हर रात अपना हाथ अपनी पीठ पर बांधे, अपनी लंबी नुकीली नाक पर हवा के टकराने के साथ ही अब भी आश्चर्य करता था कि स्वर्ग अथवा धरती पर वह कौन-सा गह्वर था, जो उन्हें निरंतर यहाँ फेंकता रहता था।

श्रीविलास सिंह

श्रीविलास सिंह

अनेक वर्षों से लेखन। दो कविता संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कविताओं के, एक कहानी संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कहानियों के, कविताएँ, कहानियाँ और देशी विदेशी साहित्य के अनुवाद और लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित, साहित्य और संस्कृति की पत्रिका “परिंदे” का अवैतनिक संपादन।

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