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#नयेसुर... इस अंक में नियमित ब्लॉग्स के अलावा जो भी सृजन है, सब बाक़ायदा विद्यार्थियों के द्वारा। इस अंक में चार पीढ़ियों के वो रचनाकार शामिल हैं, जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हैं। पिछले कुछ दिनों में, अख़बार से लेकर सोशल मीडिया पर लिखे नेहा के शब्द हिंदी और आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए (जनहित के लिहाज़ से), भवेश दिलशाद की प्रस्तुति...

और बड़ी लड़ाई बाक़ी है अभी: नेहा बोरा

            नेहा (बोरा) के बायो से पता चलता है वह पीएचडी की छात्रा हैं और ‘आइसा’ छात्र संगठन की राष्ट्रीय नेता। मौजूदा समय में न सिर्फ़ एक छात्र नेता बल्कि वह एक युवा आइकॉन की तरह सामने आयी हैं और 2026 में देश की बड़ी उपलब्धियों में से एक की तरह उभरी हैं। सोशल मीडिया पर लगातार छात्रों/युवाओं से जुड़े मुद्दे उठाती हैं। दिल्ली समेत अनेक राज्यों के छात्रों की समस्याओं पर सवाल पूछती हैं, जवाब मांगती हैं। छात्रों को लामबंद करती हैं। आंदोलनों की अगुवाई करती हैं और हिरासत से भी कतराती नहीं हैं।

नेहा की आवाज़ में देश के युवाओं की आवाज़ सुनायी देने लगी है। युवा ही नहीं, बल्कि विपक्ष के बड़े नेता भी उनकी आवाज़ को अहमियत दे रहे हैं। क्या नेहा आने वाले कल की सियासत का भविष्य हो सकती हैं? क्या नेहा किसी पार्टी के साथ गठबंधन कर अगले किसी चुनाव में दिख सकती हैं? ऐसे सवालों के जवाब अभी भविष्य की कोख में ही हैं, फ़िलहाल एक सशक्त आंदोलनकारी होना ही उनकी पहचान है। नेहा के लिए मेरा एक सवाल, कुछ बातें और कुछ मशवरे:

क्या है तजवीज़ कहो ख़्वाब दिखाने के बाद?
हो गया शोर.. तो अब शोर मचाने के बाद?

शोर बाहर जो थमे देखना भीतर न उठे
ख़ाक रह जाये न बस ख़ाक उड़ाने के बाद

अभी अहसास जगाने हैं तुम्हें पत्थर में
उसके चेहरे पे चढ़ा चेहरा हटाने के बाद

आओ कुछ काम करें इश्क़ के हम शे’र कहें
क़हक़हा एक सियासत पे लगाने के बाद

आसमां देख रहा हूं मैं हवा का रुख़ भी
एक पिंजरे से परिंदे को उड़ाने के बाद

मजमा दिलशाद घड़ी भर का है फिर हम ही हम
शाइरी चाहिए सब सुनने-सुनाने के बाद

नेहा से सवाल-जवाब, बातचीत वग़ैरह चलती रहेगी। अभी यहां उनके लिखे शब्दों की आंच महसूस करना ज़्यादा प्रासंगिक है…

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25 जुलाई, इंडियन एक्सप्रेस के लेख (मूलत: अंग्रेज़ी में) के अंश…

3 मई को आयोजित NEET-UG की परीक्षा 12 मई को रद्द कर दी गयी, क्योंकि प्रश्नपत्र लीक होने की बात को और कितना नकारा जाता। छात्रों के लिए इस परीक्षा के मायने थे वर्षों की तैयारी, परिवार की बचत, उधार ली गयी रक़म और ज़िंदगी जैसे स्थगित कर देना। कुछ युवाओं ने मौत को गले लगाया और कुछ परिवार बिखर गये। फिर भी, सरकार ने न तो खेद व्यक्त करना ठीक समझा और न ही अपनी जवाबदेही स्वीकार करना। बजाय इसके, सवाल उठाने वालों को परेशान करने, डराने और बदनाम करने का रवैया दिखाया… जवाबदेही से मुकरने के कारण ही शिक्षा मंत्री प्रधान के इस्तीफ़े की हमारी माँग उठी थी।

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यह मुद्दा NEET से आगे भी गया। छात्र UPTET, कांस्टेबल भर्ती परीक्षाओं और दूसरी परीक्षाओं से जुड़ी कहानियाँ लेकर आये। ये पर्चा लीक होने, परीक्षाएँ रद्द होने, रिज़ल्ट में देरी और भर्ती प्रक्रियाओं के ठप पड़ जाने की कहानियाँ थीं। इस आंदोलन ने उस पीढ़ी की आवाज़ उठायी, जिसे कहा जाता है लगातार पढ़ते रहो, इंतज़ार करते रहो, और संस्थागत विफलता को नहीं हर बार ख़ुद को दोषी ठहराओ। हमने इस पर ज़ोर दिया कि चाहे प्रश्नपत्र का लीक होना हो, “युक्तिसंगत बनाने” के नाम पर किसी सरकारी स्कूल को बंद करना या उसका किसी स्कूल में विलय करना हो, फ़ीस की वजह से किसी छात्र का कॉलेज छोड़ने के लिए मजबूर होना हो या फिर किसी ख़ाली पद का कभी न भरा जाना हो… सबके पीछे सियासत ही है।

प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं एक गहरे संकट का हिस्सा थीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 ने यह किया कि NTA के माध्यम से केंद्रीकृत परीक्षा तंत्र को और मज़बूत किया है, शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूँजी के लिए रास्ते और खोले हैं तथा शिक्षा तक पहुँच की ज़िम्मेदारी राज्य के बजाय परिवारों पर डाल दी है। बढ़ती फ़ीस, सेल्फ़-फ़ाइनेंसिंग पाठ्यक्रम और स्वायत्तता ने एक ऐसी भाषा गढ़ी कि जनता के अधिकार को एक उत्पाद में बदल दिया। यह सभी का सिरदर्द है, ख़ास तौर से हाशिये के समुदायों के लिए।

हमारे साथ जुड़ने वाले बहुत-से लोग ऐसे थे, जिन्हें पहले किसी विरोध-प्रदर्शन का अनुभव न था। हमारी 23 दिनों की भूख हड़ताल के दौरान हमसे कई माता-पिता मिलने आये, तो उस राजनीति का चुनाव करने के लिए शर्मिंदा थे, जिनके कारण उनके बच्चों का आने वाला कल ख़तरे में पड़ गया… वे समझ गये कि ख़ुद को राजनीतिक मानें या न मानें, राजनीति के असर से बचा नहीं जा सकता। उनके आँसुओं ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।

20 जुलाई को ‘संसद चलो मार्च’ के लिए लाखों छात्रों का जुटान हुआ। उन्हें लाठियों, आँसू गैस, पानी की बौछारों और पैलेट गन का सामना करना पड़ा। बच्चों तक को मारा गया, धकियाया गया। तस्वीरों से दिखा कि महिलाओं के ख़िलाफ़ लाठियों का इस्तेमाल जान-बूझकर अपमानजनक ढंग से किया गया। बेशक, हिंसा डराने-धमकाने का ही केवल एक तरीक़ा थी…

सरकार को शायद लगा था डर उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर देगा। लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा। हर बैरिकैड ने एकजुटता को और मज़बूती दी। लोग जाने कितना पैदल चले, अपने घरों के दरवाज़े खोल दिये, आने-जाने के लिए गाड़ियों का इंतज़ाम किया, भोजन-पानी भेजा, घायलों की देखभाल की और मार-पीट सहकर भी लौट आये। इस आपसी देखभाल ने हमारी भूख हड़ताल को टिकाये रखा। छात्रों ने सड़कों पर दृढ़ता, आशा और हास्य का माहौल बनाये रखा और विरोध-प्रदर्शन की भाषा को बदल दिया। प्रधान का इस्तीफ़ा इसी साहस की विजयश्री है।

इस सरकार ने चाहे वह विपक्ष हो, एक्टिविस्ट हों, कैंपस हों या समुदाय विशेष, सबके ख़िलाफ़ डर को एक हथियार बनाया है। गिरफ़्तारियों, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), निगरानी, बदनाम करने के अभियानों और बल प्रयोग जैसे डर वो हथियार रहे हैं। छात्रों ने उस डर का सामना आँखों में आँखें डालकर किया…

एक मंत्री को हटाने भर से वह व्यवस्था और नीतियां ख़त्म नहीं होंगी… यह इस्तीफ़ा मंज़िल नहीं है, बल्कि सबूत है कि संगठित, एकजुट छात्र जीत सकते हैं और अब उन्हें इससे कहीं बड़ी लड़ाई लड़ना है।
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(प्रदर्शनरत छात्रों पर स्याही फेंकने की घटना के बाद) 11 अगस्त को पोस्ट —

इसी स्याही से हम क्रांति लिखेंगे…

झारखंड के छात्र एक बेहतर कल लिखने के लिए अब भी एकजुट होकर संघर्ष कर रहे हैं। जिन लोगों ने कभी छात्रों के मुद्दों और उनके जीवन को समझने की कोशिश तक नहीं की, वे भला स्याही की ताक़त को क्या समझेंगे?
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(दिल्ली पुलिस द्वारा प्रतिबंधात्मक घोषणाओं पर) 2 अक्टूबर को पोस्ट —

महत्वपूर्ण सूचना
‘हम, भारत के लोग’ अपने संवैधानिक अधिकारों का आह्वान करते हैं और उन्हें पुनः दृढ़तापूर्वक स्थापित करते हैं:

  1. अनुच्छेद 19(1)(a), जो हमें बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है और सार्वजनिक रूप से आलोचना करने का अधिकार प्रदान करता है।
  2. अनुच्छेद 19(1)(b), जो हमें शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार मुहैया करवाता है।
  3. अनुच्छेद 21, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है और राज्य द्वारा मनमाने ढंग से हिरासत में लिये जाने के विरुद्ध संरक्षण देता है।

अब दिल्ली पुलिस को देश के क़ानून का पालन करने के लिए बाध्य किया जाना है, न कि सत्तारूढ़ शासन के आदेशों का, अब उसे निम्नलिखित बातें सुनिश्चित करनी होंगी:

लाठीचार्ज नहीं होगा।
आँसू गैस के गोले नहीं छोड़े जाएँगे।
पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं होगा।
कोई भी पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट के तैनात नहीं होगा।
वॉटर कैनन का इस्तेमाल नहीं होगा।
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9 अक्टूबर को पोस्ट —

मेरी पीढ़ी के नाम,

हर पीढ़ी के जीवन में वह क्षण आता है, जब उसे सहूलियत और अंतरात्मा की आवाज़ में से किसी एक को चुनना होता है। हमारे लिए वह क्षण एक बार फिर आया है।

जुलाई में हम सड़कों पर उतरे और एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा। हम यह पहले भी कर चुके हैं।

1942 में, अंग्रेज़ों ने सुबह होने से पहले ही नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था। उन्हें लगा था नेताओं को गिरफ़्तार कर लेने से आंदोलन ख़त्म हो जाता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। युवाओं ने उस आंदोलन की कमान थामी और अंग्रेज़ी राज का अंत कर दिया।

आज मोदी-शाह भी उसी रणनीति पर हैं: रास्ते बंद करो, आंदोलन को ग़ैर-क़ानूनी बताओ और लोगों के बोलने से पहले ही उन्हें हिरासत में ले लो।

इसलिए हमा भी वही जवाब देंगे, जो 1942 के युवाओं ने दिया था। अगर कल हममें से किसी एक को रोक दिया गया, तो उसके अगल-बगल खड़ा साथी आंदोलन को आगे बढ़ाएगा। अगर उसे रोक दिया गया, तो अगला साथी यही बागडोर संभालेगा। यह आंदोलन हममें से हर एक का है।

सालों बाद, कोई हमसे पूछेगा कि 10 अक्टूबर को हमने क्या किया था, जब ट्रेनें रोक दी गयी थीं, रास्ते बंद कर दिये गये थे और एक पूरे देश से ख़ामोश रहने को कहा गया था!

आइए, हमारे पास ऐसा जवाब हो, जिस पर हम फ़ख़्र महसूस करें।

कल मिलते हैं। जंतर-मंतर 2.0 का संघर्ष जारी है।
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12 अक्टूबर को पोस्ट —

देखिए, देश क्या हो चुका है!

हर शाम हिरासत में लिये गये सभी लोगों की रिहाई सुनिश्चित करवाने वाले तमाम युवा वकीलों को दिल से सलाम!

यह लड़ाई अब भी जारी है, क्योंकि हम इसे अकेले नहीं लड़ रहे हैं। ग़ैर-क़ानूनी दमन के बावजूद सच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार, पुलिस को क़ानून के दायरे में रखने के लिए संघर्ष करने वाले वकील, पूरी ताक़त से लड़ रहे लाखो-लाख वो युवा जो पहली बार विरोध-प्रदर्शन में शामिल हैं, और लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए सचमुच अपना ख़ून बहाने वाले लोग—इन सबकी बदौलत यह संघर्ष जारी है।

2 comments on “और बड़ी लड़ाई बाक़ी है अभी: नेहा बोरा”

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