
- October 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 2
#नयेसुर... इस अंक में नियमित ब्लॉग्स के अलावा जो भी सृजन है, सब बाक़ायदा विद्यार्थियों के द्वारा। इस अंक में चार पीढ़ियों के वो रचनाकार शामिल हैं, जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हैं। 10 सूत्रीय यह लेख एक ग्रामीण छात्रा की शैक्षणिक यात्रा का अनुभव है, जो एक बड़ी भारतीय आबादी के साथ हो रही असमानता के ज्वलंत प्रश्न उठाता है...
वक्तव्य कोमल कुशवाह की कलम से....
डिग्री मेरी, संघर्ष मेरा... सवाल पूरी व्यवस्था से
मैं विदिशा ज़िले की गुलाबगंज तहसील के संतापुर ग्राम की रहने वाली एक भारतीय नागरिक हूं।
मैं गाँव की रहने वाली हूँ। मेरा घर आर्थिक अभावों से घिरा हुआ है। मेरे परिवार के पास मुझे बड़े शहर में भेजकर पढ़ाने की आर्थिक क्षमता नहीं थी। मेरे पास न महँगी कोचिंग की सुविधा रही, न किसी प्रतिष्ठित पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने का अवसर और न ही वह शैक्षणिक वातावरण, जिसमें पढ़ाई के लिए आवश्यक सभी साधन सहज रूप से उपलब्ध होते हैं। मेरे पास जो कुछ था और है, वह पढ़ने का संकल्प, कुछ कर दिखाने की ज़िद और अपने जीवन को अपनी परिस्थितियों से बड़ा बनाने की इच्छा।
यह मेरा सौभाग्य कि 2015 में गुलाबगंज में महाविद्यालय खुला। मैंने पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया। परिस्थितियां आसान नहीं थीं, मैं पढ़ाई के साथ-साथ एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका का काम भी करती। इससे मुझे एक हज़ार रुपये प्रतिमाह की आय होती। यह मेरे लिए महत्वपूर्ण था। पर इस वजह से मैं कॉलेज नियमित नहीं जा पा रही थी। एक दिन मेरे हिंदी के प्रोफ़ेसर डॉ. संजीव कुमार जैन सर ने मेरे जैसी अन्य छात्राओं से पूछा कि तुम लोग नियमित क्यों नहीं आती हो..?
हममें से कोई भी उत्तर देने की स्थिति में नहीं था। पर मैंने साहस करके कहा कि हम स्कूल में टीचिंग करते हैं। तब हमारे सर ने पूछा कि कितना वेतन मिलता है और कितना समय देती हो। जब मैंने कहा कि छह घंटे प्रति दिन और सिर्फ़ एक हज़ार रुपये प्रतिमाह, तब इस बात पर सर बहुत गहरी सोच में चले गये और उन्होंने हमारे कॉलेज के प्राचार्य के समक्ष मुझसे कहा कि तुम यदि पढ़ना चाहती हो, तो स्कूल छोड़ दो और जो एक हज़ार रुपये मिलते हैं, वह मुझसे छात्रवृत्ति के रूप में ले लिया करो। जब तुम्हारी सरकारी नौकरी लग जाये तो मुझे वापस कर देना।
उन्होंने मुझ पर किसी एहसान का बोझ नहीं डाला। मुझे प्रेरित किया। कुछ दिनों बाद मैंने स्कूल छोड़ दिया। सर से भी कोई आर्थिक मदद नहीं ली। इस बात से सर बहुत ख़ुश हुए। उस दिन से मैंने पढ़ना आरंभ किया। कई बार साधनों की कमी ने मेरे सामने प्रश्न खड़े किये, लेकिन मैंने उन प्रश्नों को अपनी असफलता का कारण बनाने के बजाय अपनी मेहनत का आधार बनाया।
मुझे एक ऐसे प्रोफ़ेसर का मार्गदर्शन मिला, जिन्होंने मेरी आर्थिक स्थिति को मेरी बौद्धिक क्षमता का पैमाना नहीं माना। उन्होंने मुझे यह समझाया कि पढ़ाई केवल किताबों के पन्ने याद कर लेने का नाम नहीं है। पढ़ाई अपने भीतर प्रश्न करने की क्षमता विकसित करने और उन प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया है।
डॉ. संजीव सर के निर्देशन में मैंने अपनी अध्ययन-पद्धति विकसित की। मैंने समझना सीखा, अपने ज्ञान की कमियों को पहचानना सीखा और स्वयं पर विश्वास करना सीखा। परिणाम यह हुआ कि मैंने स्नातकोत्तर परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और बिना किसी कोचिंग के परीक्षा भी उत्तीर्ण की। और आज गेस्ट फ़ैकल्टी के रूप में एक कॉलेज में शिक्षण कर रही हूं।
आप व्यवस्था हैं या समाज तो सुनिए…
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो उपलब्धियों पर प्रसन्नता होती है। लेकिन इस प्रसन्नता के साथ मेरे भीतर कुछ असहज प्रश्न भी जन्म लेते हैं। ये प्रश्न मेरी व्यक्तिगत सफलता से बड़े हैं। ये प्रश्न उस शिक्षा-व्यवस्था से जुड़े हैं, जो सबको समान अवसर देने का दावा करती है। उस लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े हैं, जो प्रत्येक नागरिक की गरिमा और समानता को अपना आदर्श बताती है।
यदि एक ग़रीब ग्रामीण छात्रा बिना कोचिंग, बिना समुचित पुस्तकालय और सीमित शैक्षणिक संसाधनों के विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकती है, तो क्या यह केवल उसकी प्रतिभा का प्रमाण है? या उस व्यवस्था के सामने खड़ा एक प्रश्न भी है? जो उसे ये सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करा सकी?
मेरे लिए यह प्रश्न अब सबसे महत्त्वपूर्ण है।
1 शिक्षा का अधिकार और शिक्षा प्राप्त करने की वास्तविकता
हमारे देश में शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना जाता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना की जाती है। योजनाएँ बनायी जाती हैं। छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैं। भाषणों में शिक्षा को ग़रीबी से मुक्ति का रास्ता बताया जाता है। लोकतांत्रिक सरकारें बार-बार विश्वास दिलाती हैं कि प्रत्येक बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

मैं इन प्रयासों के महत्त्व को नकारना नहीं चाहती। शिक्षा के विस्तार के लिए सरकारी संस्थाओं, शिक्षकों और सामाजिक योजनाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। लेकिन मैं यह भी पूछना चाहती हूँ कि क्या किसी संस्था का अस्तित्व मात्र इस बात का प्रमाण है कि वहाँ शिक्षा के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ मौजूद हैं?
- मेरे ग्रामीण महाविद्यालय में नियमित और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन के लिए आवश्यक पुस्तकालय-सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं।
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अध्ययन-संसाधनों की भी कमी थी।
- कालेज में पीजी नहीं है, पीजी के लिए मुझे बासौदा में प्रवेश लेना पड़ा।
सर ने मुझे किताबें लाकर दीं, नेट जेआरएफ़ का मतलब समझाया। रोज़ बासौदा जाना संभव नहीं था, तब सर गुलाबगंज कॉलेज में ही पीजी का कोर्स पढ़ाते रहे, नेट जेआरएफ़ की तैयारी करवाते रहे।
ऐसी स्थिति में महाविद्यालय में प्रवेश तो ठीक, लेकिन उन अवसरों तक पहुँच आसान नहीं थी, जो किसी बड़े शहर के विद्यार्थी को अपेक्षाकृत सहज रूप से उपलब्ध हो सकते हैं।
यहाँ मुझे शिक्षा के अधिकार और शिक्षा की वास्तविक उपलब्धता के बीच का अंतर दिखता है।
किसी छात्रा का महाविद्यालय में नामांकन हो जाना और उसका गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर पाना दो अलग-अलग बातें हैं। पहली बात का प्रमाण सरकारी आँकड़ों में मिल सकता है, लेकिन दूसरी बात को समझने के लिए यह देखना पड़ता है कि…
उसके पास पुस्तकें हैं या नहीं
शिक्षक का मार्गदर्शन है या नहीं
अध्ययन का वातावरण है या नहीं
और उसकी आर्थिक परिस्थितियाँ उसे पढ़ने का समय देती हैं या नहीं!
शिक्षा में समानता का अर्थ केवल यह नहीं कि सभी विद्यार्थियों के लिए महाविद्यालय के दरवाजे खुले हों। इसका अर्थ यह भी है कि उन दरवाज़ों के भीतर प्रवेश करने के बाद उनकी सीखने की संभावनाएँ आर्थिक स्थिति के कारण सीमित न हो जाएँ।
2. लोकतंत्र के वादे और अवसरों की असमानता
मैं लोकतंत्र को केवल चुनाव, सरकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित करके नहीं देखती। मेरे लिए लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि किसी व्यक्ति का भविष्य केवल उसके जन्मस्थान, परिवार की आय और सामाजिक परिस्थितियों से निर्धारित न हो।
यदि एक विद्यार्थी महँगी कोचिंग ले सकता है, बड़े पुस्तकालय में पढ़ सकता है, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों का नियमित उपयोग कर सकता है तथा विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है, तो उसके पास भविष्य के अनेक रास्ते होते हैं।
इसके विपरीत, मेरे जैसी ग्रामीण छात्रा को कई बार उन्हीं संसाधनों की अनुपस्थिति में अपनी अध्ययन-पद्धति के लिए ही जूझना होता है…
मुझे समझना पड़ता है कि कौन-सी पुस्तक उपयोगी होगी!
किस विषय को किस क्रम में पढ़ना चाहिए!
अपनी ग़लतियों को कैसे पहचानना चाहिए!
और परीक्षा की माँग के अनुसार उत्तर देने की क्षमता कैसे विकसित करनी चाहिए!
हम दोनों की परीक्षा एक ही हो सकती है, प्रश्नपत्र एक ही हो सकता है और मूल्यांकन के नियम भी एक ही हो सकते हैं। लेकिन उस परीक्षा तक पहुँचने की हमारी यात्राएँ समान नहीं होतीं।
यहीं मेरे मन में एक नैतिक प्रश्न उठता है- क्या सबके लिए एक जैसी परीक्षा आयोजित कर देना ही समान अवसर सुनिश्चित कर देता है?
औपचारिक समानता कहती है कि सभी अभ्यर्थियों के लिए नियम समान होने चाहिए। लेकिन वास्तविक समानता यह भी पूछती है कि क्या सभी अभ्यर्थियों को अपनी योग्यता विकसित करने के लिए आवश्यक अवसर मिले हैं?
मैं यह नहीं कहती कि ग्रामीण विद्यार्थियों को कम योग्यता वाला मानकर उनके लिए अपेक्षाएँ घटा दी जाएँ। मैं तो इसके विपरीत चाहती हूँ कि उनकी प्रतिभा को विकसित करने के लिए आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करवायी जाएँ, ताकि वे अपनी योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
3. मेरी सफलताः क्या व्यवस्था की विफलता का संकेत?
जब मैंने विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया, तो लोगों ने मेरी मेहनत की प्रशंसा की। जब मैंने नेट परीक्षा उत्तीर्ण की, तो मुझे लगा कि मेरी साधना सफल हुई। ये उपलब्धियाँ मेरे लिए आत्मविश्वास का स्रोत हैं। लेकिन मैं अपनी सफलता को केवल प्रेरक कहानी बनाकर समाप्त नहीं करना चाहती।
अक्सर ऐसी कहानियों में कहा जाता है यदि व्यक्ति के भीतर दृढ़ संकल्प हो, तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती। यह बात प्रेरणा देती है, लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। यदि हर उस विद्यार्थी से यह अपेक्षा की जाये कि वह संसाधनों के अभाव को अपनी इच्छाशक्ति से पराजित कर दे, तो क्या हम संस्थाओं की ज़िम्मेदारी को कम नहीं कर रहे हैं?
- मेरी मेहनत ने मुझे आगे बढ़ने में सहायता की, लेकिन मेरी मेहनत किसी पुस्तकालय का विकल्प नहीं हो सकती।
- मेरे संकल्प ने मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया, लेकिन संकल्प से महाविद्यालय में अनुपलब्ध पुस्तकों की व्यवस्था अपने आप नहीं हो जाती।
- एक प्रोफेसर का सही निर्देशन मेरे लिए निर्णायक सिद्ध हुआ, लेकिन प्रत्येक विद्यार्थी को ऐसा मार्गदर्शन मिलना भी तो शिक्षा-व्यवस्था की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।
यदि मैं सफल हुई हूँ, तो इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी। इसका अर्थ यह है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेरी मेहनत, मेरे शिक्षक के मार्गदर्शन और मेरी अध्ययन-पद्धति ने मुझे आगे बढ़ने में सहायता की।
मैं चाहती हूँ कि मेरी कहानी को इस रूप में समझा जाये कि प्रतिभा अभावों में भी विकसित हो सकती है, लेकिन प्रतिभा को अभावों के सहारे विकसित होने के लिए विवश करना किसी व्यवस्था की उपलब्धि नहीं माना जा सकता।
मेरी सफलता के बहाने उस स्थिति पर विचार होना चाहिए, जिसमें मुझे अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए उन सुविधाओं के बिना संघर्ष करना पड़ा, जिन्हें शिक्षा की सामान्य आवश्यकताओं में शामिल होना चाहिए।
4. शिक्षा का बाज़ारीकरण और योग्यता की नयी परिभाषा
आज शिक्षा के क्षेत्र में प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्त्व लगातार दिखायी देता है। NET जैसी परीक्षाएँ उच्च शिक्षा और शैक्षणिक अवसरों से जुड़ी हैं। अनेक विद्यार्थी अपने भविष्य की संभावनाओं को इन परीक्षाओं से जोड़कर देखते हैं।
इस वातावरण में कोचिंग संस्थानों, निजी अध्ययन केंद्रों, महँगी पुस्तकों और डिजिटल पाठ्यक्रमों का एक बड़ा संसार विकसित हुआ है। इन साधनों से विद्यार्थियों को उपयोगी सहायता मिल सकती है। मैं इनके महत्त्व को अस्वीकार नहीं करती। मेरा प्रश्न यह है कि…
- जब शिक्षा के महत्त्वपूर्ण अवसरों तक पहुँचने के लिए निजी संसाधनों की भूमिका बढ़ती है, तब आर्थिक रूप से कमज़ोर विद्यार्थी की स्थिति क्या होती है?
- क्या शिक्षा धीरे-धीरे ऐसी प्रतिस्पर्धा बन रही है, जिसमें योग्यता के साथ-साथ संसाधनों की उपलब्धता भी परिणामों को प्रभावित करती है?
- एक ग़रीब विद्यार्थी को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ना होता। उसे कई बार यह भी सोचना पड़ता है पुस्तक कहाँ से प्राप्त होगी, परीक्षा की तैयारी के लिए समय कैसे निकलेगा और यदि दूसरे शहर जाना पड़े तो ख़र्च कहाँ से आएगा।
मेरे अनुभव ने मुझे सिखाया है कि योग्यता को केवल प्राप्त अंकों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को समझकर भी देखना चाहिए जिनमें वह योग्यता विकसित हुई है। इसका अर्थ यह नहीं कि परीक्षा के मूल्यांकन में पक्षपात होना चाहिए। इसका अर्थ है कि शिक्षा-व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें किसी विद्यार्थी को केवल इसलिए पीछे न रहना पड़े कि उसके पास सीखने के आवश्यक साधन नहीं हैं।
यदि शिक्षा नागरिक अधिकार है, सामाजिक गतिशीलता का माध्यम है, तो उसकी संरचना ऐसी होनी चाहिए कि आर्थिक अभाव, शिक्षा के अवसरों को ख़रीदने की क्षमता का अभाव बनकर न रह जाये।
5. शिक्षक की भूमिका: पाठ से आगे की ज़िम्मेदारी
मेरे जीवन में एक प्रोफ़ेसर का मार्गदर्शन बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। उन्होंने मुझे केवल विषय की जानकारी नहीं दी, बल्कि सीखने की दिशा भी दिखायी। उन्होंने मेरी परिस्थितियों को समझा, मेरी क्षमता पर विश्वास किया और मुझे अपने अध्ययन की ज़िम्मेदारी स्वयं लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मुझे सहायता की यह समझने में, कि कठिन पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे हिस्सों में कैसे बाँटा जा सकता है, विषयों को आपस में कैसे जोड़ा जा सकता है और अपनी ग़लतियों को सुधारने की प्रक्रिया को पढ़ाई का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है। इस अनुभव से मुझे शिक्षक की भूमिका का एक व्यापक अर्थ समझ में आया।
शिक्षक केवल निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह विद्यार्थी की संभावनाओं को पहचानने वाला, उसके भीतर प्रश्न करने की क्षमता विकसित करने वाला और उसे आत्मनिर्भर बनाने वाला मार्गदर्शक भी है। लेकिन यहाँ भी एक प्रश्न है…
- क्या किसी ग्रामीण महाविद्यालय के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए किसी एक संवेदनशील शिक्षक पर निर्भर रहना चाहिए?
- क्या संस्थागत व्यवस्थाएँ ऐसी नहीं होनी चाहिए कि प्रत्येक विद्यार्थी को नियमित शैक्षणिक परामर्श, पुस्तकालय, अध्ययन-सामग्री और प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शन की सुविधा मिल सके?
मेरे प्रोफ़ेसर का योगदान मेरे लिए अमूल्य है। मैं यह भी चाहती हूँ कि उनका योगदान एक अपवाद बनकर न रह जाये। अच्छे शिक्षक की भूमिका को संस्थागत सहयोग मिलना चाहिए, ताकि उसका लाभ अधिक से अधिक विद्यार्थियों तक पहुँच सके।
एक शिक्षक की वास्तविक सफलता केवल इस बात में नहीं है कि उसके मार्गदर्शन से एक छात्रा विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करे। उसकी सफलता इस बात में भी है कि वह छात्रा आगे चलकर स्वतंत्र रूप से सोचने, अपने ज्ञान का विस्तार करने और दूसरों के लिए अवसरों का निर्माण करने में सक्षम बने।
6. क्या शिक्षा हमें प्रश्न करना सिखाती है?
मैंने पढ़ाई के दौरान सीखा कि किसी भी विषय को समझने के लिए केवल उसकी परिभाषा जानना पर्याप्त नहीं है। उसके कारणों, परिणामों और अंतर्निहित मान्यताओं को भी समझना आवश्यक है।
यदि मैं इतिहास पढ़ती हूँ, तो केवल घटनाओं का क्रम याद नहीं करती, मैं यह जानना चाहती हूँ कि वे घटनाएँ क्यों हुईं और उनका प्रभाव किन लोगों पर पड़ा।
यदि मैं राजनीति और लोकतंत्र का अध्ययन करती हूँ, तो केवल संवैधानिक प्रावधानों को याद नहीं करती, मैं यह भी पूछती हूँ कि उन प्रावधानों के आदर्शों और सामाजिक जीवन की वास्तविकताओं के बीच क्या संबंध है।
इसी दृष्टि से मैं अपनी शिक्षा-व्यवस्था को देखती हूँ। जब कोई सरकार शिक्षा को लेकर समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, डिजिटल शिक्षा जैसे बड़े दावे करती है, तो मैं उन्हीं सब स्थितियों को लेकर प्रश्न पूछना चाहती हूं, जिनकी चर्चा मैंने की है। ये प्रश्न किसी एक सरकार, किसी एक दल या किसी एक नीति के विरुद्ध आरोप नहीं बल्कि ये उन नीतियों और उनके क्रियान्वयन को समझने के प्रश्न हैं, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूछे जाने चाहिए। मुझे लगता है मुझसे पहले भी, शायद दशकों से ऐसे प्रश्न करने वाले और भी रहे होंगे।

सरकारों की घोषणाएँ, योजनाओं के उद्देश्य और वास्तविक परिणाम तीन अलग-अलग स्तर हैं। किसी योजना का उद्देश्य अच्छा हो सकता है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में कमियाँ रह सकती हैं। किसी नीति से कुछ विद्यार्थियों को लाभ मिल सकता है, जबकि कुछ समूहों तक उसका लाभ पर्याप्त रूप से न पहुँचे।
इसलिए शिक्षा के मूल्यांकन में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कितनी योजनाएँ घोषित की गयीं। देखना होगा कि उन योजनाओं ने विद्यार्थियों की वास्तविक सीखने की परिस्थितियों में कितना परिवर्तन किया।
लोकतंत्र में आलोचना विरोध का पर्याय नहीं है। आलोचना वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से सार्वजनिक नीतियों को उनके घोषित उद्देश्यों और वास्तविक परिणामों की कसौटी पर परखा जाता है।
यदि शिक्षा हमें प्रश्न करना नहीं सिखाती, तो हम डिग्रियाँ प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक नागरिक के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा पाएँगे।
7. ग्रामीण छात्रा होना कमज़ोरी नहीं, मेरे अनुभव का आधार
मेरे ग्रामीण परिवेश ने मुझे कुछ ऐसी वास्तविकताओं से परिचित कराया है, जिन्हें समझने के लिए केवल पाठ्यपुस्तक पर्याप्त नहीं है।
मैं जानती हूँ आर्थिक अभाव में पढ़ाई करना केवल कम सुविधाओं के बीच बैठकर पुस्तक पढ़ना नहीं है। इसका अर्थ कई बार अपने समय, ऊर्जा और इच्छाओं के बीच कठिन चुनाव करना भी होता है। परिवार की आर्थिक परिस्थितियाँ, घरेलू ज़िम्मेदारियाँ, यात्रा की कठिनाइयाँ और अध्ययन-सामग्री की अनुपलब्धता पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है।
मैं यह भी जानती हूँ कि गाँव की प्रत्येक छात्रा की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं। कुछ परिवार शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, कुछ के सामने आर्थिक विवशताएँ अधिक होती हैं और कुछ छात्राओं को सामाजिक अपेक्षाओं के कारण अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए मैं अपने अनुभव को सभी ग्रामीण छात्राओं की कहानी नहीं कह सकती। लेकिन मेरा अनुभव उन प्रश्नों की ओर अवश्य संकेत करता है, जिन्हें शिक्षा-व्यवस्था को गंभीरता से समझना चाहिए…
- मेरे लिए गाँव में रहना ही पिछड़ेपन का प्रमाण नहीं है।
- मेरे पास सीमित संसाधन थे, लेकिन सीमित संसाधन का अर्थ सीमित बौद्धिक क्षमता नहीं है।
- मेरी आर्थिक स्थिति मेरे ज्ञान की सीमा निर्धारित नहीं करती।
- मेरे महाविद्यालय में पुस्तकालय-सुविधाओं का अभाव मेरी जिज्ञासा समाप्त नहीं करता।
मैं चाहती हूँ मेरी पहचान केवल एक ग़रीब छात्रा के रूप में न हो। मैं चाहती हूँ मेरी पहचान एक ऐसी विद्यार्थी के रूप में हो, जिसने अध्ययन किया, अपनी कमियों को पहचाना, मार्गदर्शन प्राप्त किया, अपनी पद्धति विकसित की और अपनी योग्यता सिद्ध की।
और फिर मैं यह भी चाहती हूँ कि मेरे बाद आने वाली छात्राओं को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए अनावश्यक कठिनाइयों से न गुज़रना पड़े।
मेरी सफलता किसी दूसरी छात्रा को प्रेरित करती है, तो यह अच्छी बात है। लेकिन यदि मेरी कहानी के आधार पर संस्थाएँ अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाएँ और कहें कि कठिन परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त की जा सकती है, तो यह मेरी कहानी का अर्थ कमज़ोर कर देना होगा।
8. मैं शिक्षा-व्यवस्था से क्या चाहती हूँ?
मैं कोई विशेष सुविधा नहीं माँगती। मैं ऐसी व्यवस्था चाहती हूँ, जिसमें विद्यार्थियों को अपनी योग्यता विकसित करने के लिए आवश्यक आधारभूत अवसर मिलें, जैसे…
- मैं चाहती हूँ ग्रामीण महाविद्यालयों में पुस्तकालय केवल एक औपचारिक कक्ष न हो, बल्कि नियमित रूप से उपयोग किए जाने वाले अध्ययन-केंद्र बनें। वहाँ पाठ्यक्रम की पुस्तकें, संदर्भ-ग्रंथ, प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री और उपयोगी डिजिटल संसाधन उपलब्ध हों।
- मैं चाहती हूँ आर्थिक रूप से कमज़ोर विद्यार्थियों को केवल प्रवेश दिलाने तक सहायता सीमित न रहे। उन्हें अध्ययन-सामग्री, छात्रवृत्ति, डिजिटल पहुँच और आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन भी मिले।
- मैं चाहती हूँ महाविद्यालयों में ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम चलें, जिनमें विद्यार्थियों को अध्ययन की योजना से लेकर उसे उपलब्धि बनाने के तमाम उपकरण सिखाये जाएं।
- मैं ऐसी व्यवस्था चाहती हूँ, जिसमें शिक्षक की प्रतिबद्धता को संस्थागत सहयोग मिले, विद्यार्थियों की जिज्ञासा को प्रोत्साहन मिले और आर्थिक अभाव किसी की शैक्षणिक संभावनाओं को सीमित करने वाला निर्णायक कारक न बने।
- यह माँग किसी विशेष छात्रा की निजी सुविधा की माँग नहीं है। यह सार्वजनिक शिक्षा के मूलभूत उद्देश्य की माँग है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल नामांकन, परीक्षा-परिणाम या योजनाओं की संख्या से न किया जाये। यह भी देखा जाये कि विद्यार्थियों ने वास्तव में क्या सीखा, उनकी समझ में कितना विकास हुआ और वे आगे की शिक्षा तथा रोज़गार के अवसरों के लिए कितने तैयार हुए।
9. मेरी सफलता का वास्तविक अर्थ
आज मैं अपनी उपलब्धियों को देखती हूँ, तब मुझे लगता है विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करना और नेट परीक्षा उत्तीर्ण करना मेरी यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं, लेकिन मेरी शिक्षा का उद्देश्य इन उपलब्धियों तक सीमित नहीं है।
शिक्षा ने मुझे अपनी परिस्थितियों को समझने की दृष्टि दी है। उसने मुझे यह सिखाया है कि किसी समस्या को देखकर केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं है। उसके कारणों को समझना और उसके समाधान के लिए तर्कपूर्ण सुझाव देना भी आवश्यक है।
मेरे भीतर अब यह इच्छा है कि मैं अपनी उपलब्धियों को केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन न बनाऊँ। मैं चाहती हूँ मेरे अनुभव से दूसरी छात्राओं को यह विश्वास मिले कि आर्थिक अभाव उनकी बौद्धिक क्षमता का अंतिम निर्णय नहीं है। लेकिन मैं उन्हें केवल संघर्ष करने की सलाह नहीं देना चाहती। यह भी चाहती हूँ कि समाज और संस्थाएँ उनके संघर्ष को कम करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ।
मैं नहीं चाहती किसी ग़रीब छात्रा को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए बार-बार यह प्रमाण देना पड़े कि वह सुविधाओं के बिना सफल हो सकती है। मैं चाहती हूँ उसे सुविधाएँ इसलिए मिलें, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना उसके विकास का आवश्यक आधार और अधिकार है।
मेरी सफलता का अर्थ तभी व्यापक होगा, जब वह उन परिस्थितियों में परिवर्तन की माँग भी करे, जिनमें दूसरी छात्राएँ पढ़ रही हैं।
यदि मैं अपनी उपलब्धियों के बाद यह मान लूँ कि केवल व्यक्तिगत मेहनत ही सब कुछ है, तो मैं उस शिक्षक के योगदान को भी सीमित कर दूँगी, जिसने मुझे सही दिशा दी। मैं उन संस्थागत सुविधाओं के महत्त्व को भी अनदेखा कर दूँगी, जो किसी विद्यार्थी के विकास में निर्णायक हो सकती हैं।
10. मेरे प्रश्नों का स्पष्ट उद्देश्य
- मैं सरकारों से प्रश्न करती हूँ, क्योंकि लोकतंत्र में सार्वजनिक नीतियाँ जनता के जीवन को प्रभावित करती हैं।
- मैं महाविद्यालयों से प्रश्न करती हूँ, क्योंकि शिक्षा-संस्थाओं की ज़िम्मेदारी केवल विद्यार्थियों को प्रवेश देना नहीं, बल्कि उन्हें सीखने के अवसर उपलब्ध कराना भी है।
- मैं समाज से प्रश्न करती हूँ, क्योंकि प्रतिभा को पहचानना और उसे विकसित होने का अवसर देना केवल परिवार या शिक्षक की ज़िम्मेदारी नहीं है।
मेरे प्रश्नों का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना भर नहीं। मेरा उद्देश्य उस अंतर को समझना है, जो शिक्षा के आदर्शों और विद्यार्थियों के वास्तविक अनुभवों के बीच दिखायी देता है।
मैं चाहती हूँ शिक्षा ऐसी हो, जिसमें ग़रीब विद्यार्थी को अपनी ग़रीबी के बावजूद नहीं, बल्कि अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिले। ऐसी हो, जिसमें शिक्षक का मार्गदर्शन किसी एक विद्यार्थी का सौभाग्य न रह जाये बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी के विकास का हिस्सा बने।
(चित्र परिचय: एनडीटीवी ने एक साल पहले मध्य प्रदेश के कॉलेजों पर ग्राउंड रिपोर्ट जारी की थी, दोनों चित्र उसी रिपोर्ट से साभार।)

कोमल कुशवाह
फ़िलहाल 'महिला उपन्यासकारों की आत्मकथा का तुलनात्मक अध्ययन (मन्नू भंडारी,प्रभा खेतान और मैत्रेयी पुष्पा के विशेष संदर्भ में)' विषय पर बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल से शोधरत हैं। शेष परिचय यह लेख ही है।
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