द टनल: असहज पाठकीय अनुभव देती कथा
मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....

द टनल: असहज पाठकीय अनुभव देती कथा

              एक मित्र के सुझाव से बीते दिनों अर्जेण्टीना के कथाकार और चित्रकार अर्नेस्तो सबातो का उपन्यास ‘द टनल’ पढ़ा।

‘द टनल’ की कथा के केंद्र में कन्फ़ेशन या हत्या की आत्म-स्वीकृति है। इसकी पांडुलिपि को देश के लगभग सभी प्रकाशकों ने एक ज़माने में लौटा दिया था और अंत में 1948 में एक मित्र के क़र्ज़ की मदद से यह सूर से छपी और हज़ारों की संख्या में इसकी प्रतियाँ बिक गयीं। इसी बीच, जब उपन्यास अल्बेयर कामू की नज़र में आया, तो उन्होंने भी इसकी भरपूर सराहना की और गालीमार से इसका फ़्रेंच अनुवाद करवाकर प्रकाशित करवाया। कामू के इस समर्थन ने पुस्तक को उच्च स्तरीय अस्तित्ववादी उपन्यासों के बराबर ला खड़ा किया।

मुश्किल से कुछ 120 पन्नों का यह उपन्यास एक व्यक्ति की आवाज़ में, स्वीकृति या कन्फ़ेशन के लहजे में लिखा गया है। भाषा और लहजा इस क़दर पुख़्ता है कि जैसे दरअसल मतिभ्रम से ग्रस्त एक लेखक का ख़ाका पढ़ा जा रहा है।

उपन्यास की शुरूआत में ख़ुआन पाब्लो कास्तेल, जो बुएनस आयरस का एक चित्रकार है, जेल की कोठरी में बैठकर क़ुबूल करता है कि उसने मारिया इरिबार्ने की हत्या की है। कथा में पीछे लौटते हुए वह बताता है एक चित्र प्रदर्शनी में उसका चित्र “मातेर्निदाद” लगा हुआ था, जिसके कोने की छोटी-सी खिड़की के सामने एक स्त्री देर तक खड़ी हुई, उसके चित्र को निहार रही थी। कास्तेल को लगता है कि उनके चित्र के किसी ब्योरे को पहली बार किसी ने इतनी संजीदगी से देखा है और वह उस स्त्री को ढूँढने लगता है। कुछ समय बाद वह उसे सड़क पर देखता है, उसका पीछा करता है और उससे अंततः संपर्क स्थापित करता है। शहर के अलग-अलग इलाक़ों में उनकी मुलाक़ातें शुरू होती हैं, कास्तेल को अंदाज़ा हो जाता है कि मारिया शादीशुदा है, और यह भी पता चलता है कि उसका पति अयेंदे अंधा है।

द टनल: असहज पाठकीय अनुभव देती कथा

इसके आगे कथा कास्तेल की ख़ब्त के बारे में है। वह मारिया के बारे में पैथोलॉजिकल हद तक जाकर सोचता है, उसके हर वाक्य, हर चुप्पी, हर क़दम का कुछ न कुछ मतलब निकालता है, उसे लगातार ख़त लिखता है और फ़ोन करता है। मारिया का एक रिश्तेदार या परिचित हंटर है, जिसके देहात वाले फ़ार्म में मारिया का आना-जाना है, कास्तेल का शक, उसकी जलन इसी के इर्द-गिर्द बढ़ती जाती है। वह मारिया से जवाब माँगता है, उन जवाबों को तौलता है, उनमें विरोधाभास ढूँढ़ता है। कास्तेल की यही सनक कथा की बनावट और विस्तार का आधार है।

साल 2026 की इस दुनिया में इस उपन्यास को पढ़ना असहज करने वाला पाठकीय अनुभव है। एक लेखक के तौर पर सबातो कथ्य, भाषा को इतना प्रभावोत्पादक रखते हैं कि यह किसी का बयान ही लगने लगता है। मानव मूल्यों, लैंगिक बराबरी के परिप्रेक्ष्य से इसमें कई असहज करने वाले तत्व हैं। मैंने एक आलेख में पढ़ा भी था कि अस्तित्ववादी लेखकों ने अपनी सनक को, अपने दमन या व्यभिचारी विषय-वस्तु को भी आदमी के अस्तित्ववादी पहलू से जोड़ रखा है, जहाँ वह कई बार, आज के लहजे में कहें तो, साहित्यिक प्रभाव पैदा करने की कोशिश में स्त्री-विरोधी शॉक वैल्यू पैदा करने जैसा टेक्स्ट लगने लगता है। लेकिन साहित्यिक पुस्तकों पर यह समाजशास्त्रीय आरोपण एक तरफ़, पुस्तकों के ग़ैर-मामूली, जोखिम भरे लेखन का माद्दा एक तरफ़।

उपन्यास सीधे-सीधे स्त्री-विरोधी नहीं है, क्योंकि इसमें लेखक कहीं अपनी आवाज़ में नहीं बोलता। मारिया के बारे में पाठक जो कुछ जानता है, कास्तेल के बयान से जानता है। अपने शक को वह तर्क बनाकर इस्तेमाल करता है। वह जो कहता है और उसके बताये दृश्यों में जो घटता है, इन दोनों के बीच का फ़ासला ही उपन्यास का असल काम है और उस ज़मीन पर ही पाठक की नज़र पड़ रही होती है। कास्तेल अपने बर्ताव को जितनी बारीकी से पाठक को समझाता है, उसकी सफ़ाई उतनी ही उसके ख़िलाफ़ गवाही बनती जाती है।

आधुनिक साहित्यिक आलोचना इसे उसी तरह स्वीकार करती है, जैसे नोट्स फ़्रॉम अंडरग्राउंड, लोलिता या कामू की द फ़ॉल को। इस तकनीक को Unreliable narrator कहा जाता है, जिसे वेन बूथ ने द रेटोरिक ऑफ़ फ़िक्शन (1961) में विस्तार से समझाया था। यहाँ कथा “मैं” की आवाज़ में कही गयी आत्मस्वीकृति है, अंदाज़ काफ़ी हद तक नाटकीय एकालाप का, जिसमें कथावाचक का लहजा पुख़्ता है, पर उसकी बातों पर यक़ीन करना मुश्किल होता जाता है। इसका असर नाटकीय विडंबना से पैदा होता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पाठक कास्तेल के बयान के पीछे वे बातें पढ़ने लगता है, जिन्हें कास्तेल या तो मानता नहीं, या देख ही नहीं पाता।

“टनल” को पढ़ते हुए, एक नैतिक ख़मियाज़े के बारे में बरबस सोचना आम पाठकीय अनुभव है और उस अनुभव के बावजूद उसे पढ़ना तथा स्वीकार करना एक पाठकीय ज़िम्मेदारी है।

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निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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