vikas ki trasdi par famous shayari blog by ashish dashottar
नियमित ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....

आसमान की ख़्वाहिश और ज़मीन को भूलना

         आसमान छूने की ख़्वाहिश एक बच्चे की उस ख़्वाहिश की तरह नहीं है, जो चांद को पाना चाहता है। ऊंचाइयों पर जाने की होड़ उस होड़ की तरह नहीं है, जो कक्षा में अव्वल आने की होती है। बुलंदी पर पहुंचने की हसरत उस हसरत की तरह नहीं है, जो किसी अपने के प्यार को पाने की होती है। ऊंचाइयां इंसान को हमेशा से लुभाती हैं। आसमान छूने की ख़्वाहिश में कई लोग अपनी ज़मीन भूल जाते हैं। ज़मीन की बेहतरी को नज़रअंदाज़ कर आसमान की ऊंचाई को छूना किसी भुलावे से कम नहीं। आसमान छूती इमारतें ऐसी ही ख़्वाहिशों की तरह हैं, जो बहुत ऊंचाई पर जाने का संकेत तो करती हैं लेकिन अपनी ज़मीन से जुदा कर देती है। ऐसी ऊंची इमारतें ज़मीन से जुड़े इंसान के लिए किसी तानाशाह से कम नहीं होती। ये इंसान पर कई तरह के सितम करती हैं। महेश अग्रवाल इसी स्याह दृश्य को ऐसे बयां करते हैं:

सबके हिस्से धूप सुनहरी, वक़्त किसी का स्याह न हो

मेरे सपनों की दुनिया में कोई तानाशाह न हो

अपनी ज़मीन की ताज़गी, उसकी ख़ूबसूरती और उसकी समृद्धि हमें समृद्ध करती है। पता नहीं, इंसान बहुत ऊंचाई पर जाने के ख़्वाब क्यों पालता है! ऊंची-ऊंची इमारतें उसके इस ख़्वाब का प्रमाण हैं। दुनिया में जब-जब भी ऊंची इमारतें आसमान की तरफ़ पहुंचीं, फ़ुटपाथ पर रहने वाले इंसान से उसका सूरज भी छिन गया। उसके हिस्से की धूप भी ऊंची इमारत ने अपने क़ब्ज़े में कर ली। उसकी तरफ़ आने वाली ख़ुशनुमा हवा भी रुक गयी। तभी तो शायर को कहना पड़ता है:

कितने ख़ुदग़र्ज़ हैं ये ऊंचे मकानों के मकीं

अहले फ़ुटपाथ का सूरज भी छिपा लेते हैं

आसमान पर पहुंचने की हसरत, कई लोगों के सपनों को ध्वस्त करती है। गगनचुंबी इमारतें इंसान की खोखली इच्छाओं को ही व्यक्त नहीं करतीं, उसकी ज़मीन से दूरी को भी व्यक्त करती हैं। उसके फैलते दायरे को भी व्यक्त करती है। उसने अपनी संख्या में जो वृद्धि की है, उसकी तरफ़ भी इशारा करती है। ये इमारतें यह भी कहती हैं कि ज़मीन जब इंसान को कम पड़ने लग जाये, तो वह आसमान की तरफ़ जाने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। ये हसरतें ही ज़मीन पर रहने वाले इंसान के सपने छीन लेती हैं। उसे अपने आप को कमतर मानने पर विवश करती हैं। उसके भीतर मौजूद ऊंच-नीच की रेखा को और गहरा करती हैं। शायर जावेद अख़्तर कहते भी हैं:

ऊँची इमारतों से मकाँ मेरा घिर गया

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये

ये कुछ लोग ही बहुत सारे लोगों को हीनता बोध करवाते हैं। ये कुछ लोग ही अपनी उम्मीदों के पहाड़ खड़े करते हैं और समाज के सामने एक खाई का निर्माण करते हैं।‌ प्रगति करना अच्छी बात है। विकास भी बेहतर है, परंतु ख़्वाहिशों के महल खड़े करना ठीक नहीं। ज़मीन पर चलने वाले लोग आसमान की तरफ़ देखकर चलने लगें तो ठोकर लगना तय है। उड़ने की चाह में ज़मीन से पांव हटा लिये तो गिरना तय है।‌

बहुत इच्छाओं के परों से उड़ने वाला परिंदा बहुत जल्द ज़मीन पर आ जाता है।‌ बहुत ऊंचा होना सबकी नज़र में भी आता है। ऊंचाई दिखती ही नहीं बहुत कुछ सिखाती भी है। यह सलाह मुनव्वर राना भी देते हैं:

बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है

बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है

ज़मीन, हमें खड़े रहने का सलीका सिखाती है और ऊंचाइयां इसी ज़मीन से दूर करती हैं। बहुत ऊंची उड़ानें इंसान को मग़रूर बनाती हैं। बेहतरी इसी में है कि गगनचुंबी इमारतों की तरह ज़िन्दगी को ऊंचा उठाने के बजाय अपने किरदार को ऊंचा उठाया जाये। अपनी शख्सियत को ऊंचा उठाया जाये। अपने इल्म को, अपनी मिलनसारिता और अपनी संवेदनाओं को ऊंचा उठाया जाये। इन सभी की इमारतें अगर ऊंची उठ गयीं तो ये आपको और अधिक बेहतर करेंगी। ऐसी ऊंचाई पर पहुंचकर फ़ख़्र भी होगा और संतोष भी हासिल होगा।

आशीष दशोत्तर

आशीष दशोत्तर

ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।

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