
- October 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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व्यंग्य ललन चतुर्वेदी की कलम से....
झूठ का दुःख
मैं अपने अध्ययन-कक्ष में शब्दों की साधना में संलग्न होने को प्रस्तुत हुआ ही था कि अचानक उसकी दस्तक हुई। मैं उसके असमय आगमन से चौंक उठा। ऐसा नहीं कि वह पहले कभी नहीं आया हो। वह अनुभूति के स्तर पर उपस्थित होता और मैं उसकी उपेक्षा करते हुए टाल देता। इस बार जब वह सदेह उपस्थित हुआ तो मैं उसे पहचान नहीं पाया।
मैंने उससे परिचय देने के लिए कहा। साथ ही अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा- “यह मेरी पावन साधना-स्थली है। इस तरह असमय तुम्हें अनधिकृत रूप से यहाँ प्रवेश नहीं करना चाहिए था।”
उसे हँसी आ गयी- “अच्छा तो, आप मुझे पहचान नहीं पा रहे हैं। इसमें आपका कोई दोष नहीं है। जब मतलब निकल जाता है, तो लोग पहचानते नहीं हैं। यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं है।”
मैंने कहा- “साफ़-साफ बतलाओ, आख़िर तुम कौन हो?”
“बतलाता हूँ सुकवि! कवि को अधीर नहीं होना चाहिए। अच्छा किया कि आजकल गद्य लिख रहे हो। वास्तव में ज़िन्दगी भी गद्य हो गयी है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि अब भी लोग गुलाब के गीत क्यों मांग रहे हैं?
मैं अधिक समय नहीं लेते हुए बतलाना चाहता हूँ कि मुझे कहीं दूर देश या किसी व्यक्ति के पास जाने के लिए पासपोर्ट, वीज़ा या अनुमति की ज़रूरत नहीं होती। लोग मुझे स्वतः सादर बुलाते हैं और मैं भी गाढ़े वक़्त में उनकी इज़्ज़त बचाता हूँ। जब सच से काम नहीं चलता मैं ही उनकी समस्या का त्वरित समाधान करता हूँ। बाद में काम निकल जाने पर लोग जल्दबाज़ी में बिना धन्यवाद दिये विदा कर देते हैं, मैं कुलीन महानुभावों के जीवन में अवैध प्रेयसी की तरह रहते-रहते तंग आ गया हूँ।”

“इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? तुम गले पड़कर रो रहे हो और अपना नाम तक नहीं बतला रहे हो। मेरे बहुमूल्य समय को नष्ट कर रहे हो। जानते हो, लेखक और सम्पादक के पास समय की कितनी किल्लत होती है?”
“श्रीमान! मुझसे बेहतर कौन है, जो आपकी पीड़ा को समझ सकता है? असल में मेरा और आपका अर्थात् दोनों का दुःख साझा है। हम दोनों आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझ रहे हैं। हमारा यह दुःख युग-युग का दुःख है। लेकिन मुझे लगता है कि इस दुःख को दूर करने का सही समय अब आ गया है। अब इतनी बात हो गयी तो अपना परिचय दे ही दूं। मैंने इतना समय इसलिए लिया कि कहीं आप मेरा नाम सुनकर तुरंत भगा न दें। मैं झूठ हूँ और मुझे अपने नाम पर गर्व है।”
सच का सामना करते हुए आदमी डरता है। आज झूठ का सामना करते हुए मुझे एक साथ भय और ग़ुस्सा दोनों हो रहा था। मैंने उससे कहा- “यह तुम्हारे लिए उचित जगह नहीं है। मैं यहाँ तुम्हें एक पल नहीं टिकने दूँगा।” वह ठठाकर हँस पड़ा- “सुकवि! मैं सृष्टि के आदिकाल से हूँ और जब तक यह संसार रहेगा, तब तक मैं अपने विभिन्न रूपों में विभिन्न जगहों पर विराजमान रहूंगा। मेरे लिए इस दुनिया में सत्य से कहीं अधिक स्पेस है। मुझे गर्व है कि ईश्वर के बाद मेरी ही जगह है। अन्य मानवीय मूल्य निचले पायदान पर हैं। शायद आपको ज्ञात हो मेरे लिए एक जगह स्वर्ण निर्धारित की गयी थी। जैसे ही मुझे जगह मिली मैं उछलकर राजमुकुट में आसीन हो गया (परीक्षित की कथा याद करें)।”
मेरा दिमाग़ चकरा गया। मुझे भय होने लगा कि कोई मुझे झूठ के साथ देख ले तो मेरी छवि धूमिल हो जाएगी। मैंने उससे निवेदन किया- “अरे भाई, तुम झूठ हो और झूठ ही बने रहोगे। इसमें क्या परेशानी है?”
“यही तो परेशानी है कि मुझे कोई इस नाम से जानता ही नहीं। मुझे लोग सच कहते हैं। सुसंस्कृत लोग सत्य कहते हैं। अब आप ही बतलाइए- कोई पुरुष को स्त्री या स्त्री को पुरुष कहे तो यह कितना दुखद और अपमानजनक है! पुरुष की सार्थकता पुरुष होने में, उसी तरह स्त्री की स्त्री होने में है। मैं तो यही चाहता हूँ कि मुझे झूठ ही कहा जाये। मुझे सच कहलवाने का कोई शौक़ नहीं है। मैं दूसरे का कपड़ा पहनकर रईस नहीं कहलाना चाहता। आजकल मैं बहुत दुखी रहता हूँ कि हर जगह मुझे सच की तरह परोसा जाता है। मेरी इतनी सी पीड़ा है, इसको आप वाणी देकर मेरी परेशानी दूर करने का अनुग्रह करें।”
मैं धर्मसंकट में पड़ा सोच रहा था कैसे इसकी सहायता करूँ? इस काम का जोखम मैं समझ रहा था। मैंने अपना पल्ला छुड़ाते हुए कहा– “देखो भाई, हम पढ़ने-लिखने वाले लोग इस कठिन काम में सहायक नहीं हो सकते और तकनीक में भी दक्ष नहीं है। इतनी सलाह दे सकता हूँ सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर अपना अकाउंट बनवा लो और रोज़ अपनी तस्वीर के साथ पोस्ट डालते रहो। धीरे-धीरे तुम्हारे फ़ैन-फ़ॉलोअर तुम्हारा काम आसान कर देंगे।”
जाते-जाते उसने मर्माहत करने वाली टिप्पणी कर दी- “बुरा मत मानिएगा। आप लोग भी मेरा कम मिसयूज़ नहीं करते हैं लेकिन एक छोटी सी सहायता नहीं कर सकते। यही न कि झूठ को झूठ ही तो लिखना था। इतना करने के पहले ही न जाने किन कारणों से आपकी कलम कांपने लगी।”
यह कहकर वह मेरे कमरे से निकल गया लेकिन मुझे लग रहा है कि वह अब भी मेरे सामने प्रश्न-चिह्न की तरह खड़ा है। मैं अपनी दाढ़ी सहला रहा हूँ। कोई तिनका तो नहीं!

ललन चतुर्वेदी
लेखक और कवि। दो व्यंग्य संकलन और तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। संपर्क: 9431582801
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