
- October 15, 2026
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नियमित ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
अलारिज, स्पेन का एक चमत्कारी नगर
सच कहूँ तो मुझे मालूम ही नहीं था कि स्पेन के दक्षिण छोर पर एक ऐसा नगर है, जहाँ महात्मा गांधी और टैगोर को अब भी प्रतिवर्ष याद किया जाता है; प्रत्येक वर्ष एक भारतीय को बुलाकर सम्मानपूर्वक सुना जाता है। जब योलाण्डा ने मुझे अकोरुना, जो गैलिसियन भाषी क्षेत्र में है, आमंत्रित किया तो मुझे बताया कि मैं दो दिन के लिए अलारिज में आमंत्रित हूँ। यह मेरे लिए सुखद संयोग ही था।
मुझे यूरोप की रेलगाड़ियाँ आकर्षित करती हैं। मैं पहले रोम, नॉर्वे आदि में रेल यात्रा कर चुकी हूँ, इसलिए परेशान नहीं थी। इस रेल में तीर्थयात्री भी दिखायी दे रहे थे, जो सैंटियागो से लौट रहे थे। सैंटियागो न केवल स्पेन, बल्कि पूरे यूरोप का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है, जहाँ पूरे यूरोप से तीर्थयात्री आते हैं। दो घंटे में मैं अलारिज पहुँच गयी थी। योलाण्डा ने मुझे कहा था कि एक कॉफ़ी का ऑर्डर देकर वाई-फ़ाई का पासवर्ड माँग लेना, जिससे लुइस को अपने आने की सूचना दे सकूँ।
लुइस आयोजक थे, लेकिन वे अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं जानते थे। थोड़ी देर में लुइस हाज़िर हुए—हँसमुख और बच्चों-सी चपलता वाले; उन्होंने मेरा बैग उठाया और चलने का इशारा किया। नगर के भीतर गाड़ी ले जाना संभव नहीं था, पूरा नगर पतली-पतली गलियों से घिरा था, जो छोटे-छोटे चौकों से जुड़ी थीं। चौक पर पहुँचते ही पत्थर का एक ख़ूबसूरत नल दिखायी दिया, जिसके आसपास प्याऊ जैसी बनावट थी। लुइस ने बोर्ड की ओर इशारा किया; नगर के बीचो-बीच गरम पानी की नहरें निकलती हैं, थोड़ी दूर पर एक बाथ, आज की भाषा में कहा जाये तो स्पा बना है।
इतिहास से अपने कमरे तक
अलारिज शहर अरनोइया (Arnoia) नदी के किनारे बसा है; यह रोमन काल से भी प्राचीन नगर है, जिस पर राज प्रभुत्व रहा था। राज परिवार के लोगों का निवास स्थान होने के कारण इसे एक क़िले की तरह सुरक्षित किया गया था। इसलिए जब रोमन साम्राज्य का विकास हो रहा था, तो यह गुप्त प्रान्त भी उनकी चपेट में आया। रोमन सेना पुर्तगाल की ओर बढ़ी तो रास्ते भर अपनी छाप छोड़ती गयी।
नदी का प्रयोग सेना के यातायात के लिए उपयुक्त था। रोमन सेना ने जगह-जगह अपने घोड़ों के लिए अस्तबल और विश्राम गृह बनाये। गरम स्रोत सैनिकों के आरामगाह बन गये। आज उन अस्तबलों में चमड़े के कारख़ाने खुल गये हैं, लेकिन अस्तबल के चिह्नों को जैसा का तैसा रखा गया है। गरम स्रोतों को इंजीनियरिंग के द्वारा नलों से जोड़ा गया। यही नहीं, नदी के किनारे जो पुल हैं, उन पर बने अर्धचंद्राकार द्वार आज भी चकित करते हैं।
चौक पार करते हुए हम एक छोटे-से घर में जा पहुँचे, जो एक होटल था, जिसमें मेरे लिए कोने का एक बेहद छोटा कमरा बुक किया गया था। कमरे में बस एक बेड और एक मेज़ थी, और खिड़की गली में खुलती थी। बाथरूम साफ़-सुथरा था। मेरा सामान होटल में रखकर लुइस मुझे खाना खिलाने ले आये, और जब उन्होंने मेरी खाने की आदतों के बारे में पूछा, तो मैंने कहा कि जो चीज़ यहाँ सबसे ज़्यादा पसंद की जाती हो, वही खाना है। वे एक होटल में गये, जहाँ हमने लोफ़ ब्रेड के साथ सब्ज़ी खायी। सब्ज़ी में ख़ूब सारे आलू पड़े थे; निसंदेह मसाला अलग रहा होगा, लेकिन शोरबा था।
एक व्यक्ति जो संस्था था
लुइस विन्सेन्ट के नाम पर एक संस्था चलाते हैं, जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। Vicente Martínez Risco Agüero (01.10.1884-30.04.1963) ओरेन्स नगर की एक महान बौद्धिक हस्ती थे। उन्होंने Xeración Nós नामक साहित्यिक संस्था की स्थापना की। गैलिसियन भाषा के साथ-साथ उन्हें स्पेनिश उपन्यास और आलोचना कला का पिता भी माना जाता है। उन्होंने गैलिसियन भाषा के उद्धार के लिए बहुत परिश्रम किया।
मुझे बताया गया कि विन्सेन्ट भारतीय संस्कृति से प्रभावित थे और भारत आना भी चाहते थे, लेकिन वह वक़्त अलग था। वे पहले रवींद्रनाथ टैगोर के प्रशंसक थे, लेकिन यूरोप के ही किसी प्रांत में जब उनसे मिले, तो उन्हें लगा कि रवींद्रनाथ का समाजवाद पुस्तकीय है, जबकि गांधी का समाजवाद व्यावहारिक है; वे तभी से गांधी के अनुयायी बन गये, हालाँकि उन्हें गांधी जी से मिलने का मौक़ा कभी नहीं मिला। आज भी उनके नाम पर चलने वाली संस्था, विन्सेन्ट के भारत प्रेम के प्रतीक के रूप में, भारतीय कलाकारों या साहित्यकारों को साल में एक-दो बार ज़रूर आमंत्रित करती है।
नगर भ्रमण और कई आश्चर्य
मेरी बीस से अधिक कविताओं का योलाण्डा ने गैलिसियन भाषा में अनुवाद कर लिया था; यहाँ भी कम से कम एक घंटे का पाठ होना था। शाम को लुइस अपनी पत्नी अना के साथ हाज़िर हुए। अना काफ़ी व्यावहारिक लगीं; हालाँकि वे अंग्रेज़ी का एक शब्द भी नहीं जानती थीं, लेकिन हाथों और आँखों से बात समझाने का प्रयास कर रही थीं।

सबसे पहले, लुइस मुझे नदी के किनारे रोमनकालीन एक अस्तबल में ले गये, जहाँ घोड़े रखे जाते थे; आज वह चमड़े का व्यापारिक केंद्र है। नदी बेहद ख़ूबसूरत थी, और उस पर बने अर्धचंद्राकार पुल तो बहुत ही सुंदर थे, जिनकी परछाईं जल पर इस तरह पड़ रही थी कि वे पूर्ण चंद्र की तरह लग रहे थे। हम नदी के किनारे बढ़ते चले गये; लुइस दंपत्ति का भाषा न जानना मुझे आश्वस्त कर रहा था। इस तरह का नज़ारा मैंने सिर्फ़ चित्रों में देखा था, आज सम्मुख देखकर विभोर थी।
फिर हम घूमकर नगर में आ गये। रास्ते में हम एक बेकरी पर रुके, जहाँ मेरे चित्र वाला पोस्टर लगा हुआ था। मुझे बहुत अच्छा लगा। इसी बेकरी से कविता पाठ के स्थान पर भोजन हुआ। हम लोगों ने आइसक्रीम खायी, फिर चल दिये। रास्ते में बेंच पर मैंने बहुत-से वृद्धों को गुमसुम बैठे देखा; वे साथ थे, फिर भी चुप थे। उम्र का सन्नाटा उनकी आँखों में उतर आया था। मैंने अकोरुना में अनेक वृद्धों को पार्कों या चौराहों पर बैठे देखा था। फिर मुझे लगा, कम से कम वे पार्क तक तो जा सकते हैं; हमारे देश में तो बूढ़ों को घर से बाहर नहीं निकलने देते, उन्हें समाज के सामने नहीं लाते।
अब हम एक ऐसी जगह पहुंचे जो कभी अस्तबल हुआ करती थी, लेकिन उसी पर रेस्टोरेंट बना दिया गया। घोड़ों के चारों ओर की मांद, घानी आदि को जस का तस रखा गया था। अस्तबल की किसी भी निशानी को मिटाए बिना उसे बड़ी सुंदरता से रेस्टोरेंट का रूप दे दिया गया था। मुझे अपने देश की सिर्फ़ एक बात बुरी लगती है कि यहां आधुनिकता प्राचीन निशानों को मिटा कर आती है, जबकि यूरोपीय देश अपनी स्मृतियों को मिटाते नहीं, बल्कि उन्हें भीतर से नया रूप देकर भी पुरातन कला को जीवित रखने की कोशिश करते हैं।
अना की आयु मेरे समान ही होगी, लेकिन वे बेहद उत्साहित महिला हैं, लुइस दिल से सोचने वाले और वे बहुत व्यावहारिक पुरुष हैं। ऐसे छोटे शहरों के वासी एक-दूसरे को नाम से जानते हैं। उनका क़रीब सारा परिवार आसपास ही रहता था। अना मुझे अधिक से अधिक स्थान दिखलाना चाहती थीं। रास्ते में अना ने मुझे एक विशालकाय ननरी दिखायी, बड़ी अजीब-सी इमारत, जिसमें एक भी खिड़की नहीं दिख रही थी। ऐसा लगा कि कोई अंधा कुआं ज़मीन से ऊपर खड़ा हो, जो किसी जेल से कम नहीं थी।
कहा जाता है कि जो पुरुष अपनी पत्नी से नाराज़ होते या उन्हें पसंद नहीं करते, वे पत्नी को यहां छोड़कर चले जाते। ननरी के भीतर क्या होता, कोई नहीं जानता था, क्योंकि एक बार भीतर जाने के बाद कोई उन्हें देख नहीं सकता था। अना ने एक खिड़की दिखायी, जो रोशनदान के आकार की थी। उसका पल्ला कुछ इस तरह था कि भीतर स्थित व्यक्ति की शक्ल दिखायी नहीं देती थी। यदि घर का कोई जन उपहार लेकर आये तो उसे उस खिड़की से सामान देना होता था, जो घूमती थी, जिससे भीतर बैठे जन की परछाईं भी न दिखे। औरत को सज़ा देने के अनेक तरीक़े रहे हैं, यह तरीक़ा भी कम वीभत्स नहीं रहा होगा। न जाने कितनी आत्माओं का रुदन होगा भीतर।
भाषा की समस्या थी, इसलिए मैं इतिहास पूछ नहीं सकती थी; सोचा कि कहीं तो जानकारी मिलेगी इसके बारे में, लेकिन बहुत खोजने पर भी नहीं मिली। ननरी किस तरह का जेलख़ाना थी, इस पर रिसर्च होनी चाहिए, लेकिन धर्म के छत्ते पर कौन हाथ डाले।
यह भी दिखा कि अलारिज में बैलों का महत्व रहा है, यहां बुल फ़ाइट प्रचलित रही है, यह स्पेन का प्रमुख खेल रहा है। अलारिज में भी बुल फ़ाइटिंग होती है और गलियों में जगह-जगह बुल के स्कल्पचर बनाये गये हैं। महान कलाकार Arturo Di Modica द्वारा रचित बैलों के शिल्प बेहद दर्शनीय हैं। इसलिए हम जगह-जगह बैलों की आकृतियां देख सकते हैं।
किताबें, कविता और बातें
पतली-पतली गलियों से निकलकर जब हम विन्सेन्ट मारतिनेज रिस्को (Vicente Martínez Risco) के भवन पहुंचे, मैंने अपना मन विन्सेन्ट के पुस्तकालय आदि को देखने में लगाया। उनके पुस्तकालय और आदमक़द मूर्तियों से स्पष्ट ही उनकी साहित्यिक समृद्धता की जानकारी मिल रही थी। क्या हम मेधावी विन्सेन्ट के बारे में कुछ जानते थे? मैं अपनी अज्ञानता को स्वीकार करूंगी कि मैं नहीं जानती थी, लेकिन पता चला कि कोलकाता से उनका संबंध था।
विन्सेन्ट ने गैलेसियन भाषा के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान तो दिया ही, साथ ही गैलेसियन भाषियों को वैश्विक साहित्य से परिचित करवाया। कुछ देर बाद लोग आने शुरू हो गये थे। तीन लोग मेरी कविता का अनुवाद पढ़ने वाले थे। वे तीनों मुझसे बात करने लगे। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि वे कविता को समझना चाह रहे थे, ताकि सही तरीक़े से पाठ कर सकें। मैं लुइस के बारे में सोच ही रही थी कि वे और अना आते दिखायी दिये। लुइस किसी बच्चे की तरह चपल थे।
भवन के कमरे छोटे-छोटे थे, उन्हीं में से एक अपेक्षाकृत बड़े कमरे में पाठ आरंभ हो गया। गैलेसियन भाषा में अनुवाद के कारण लोग कविता समझ भी पा रहे थे।
काव्य पाठ अच्छी तरह चला, लुइस दर्द भूलकर फ़िल्म बनाते रहे। कमरा तंग था, लेकिन लोगों में उत्साह था।
मुझसे कुछ सवाल भी पूछे गये। एक सवाल ने मुझे चक्कर में डाल दिया। मेरे अनुवाद पाठ करने वाले ने पूछा कि आपकी कविताओं में खिड़की और दरवाज़े के प्रतीक बहुतायत से आये हैं, क्या कारण है? दरअसल जिन कविताओं का गैलेसियन में अनुवाद हुआ था, वे मेरे शुरूआती दौर की कविताएं थीं। निसंदेह उस वक़्त मैं सामाजिक बंधनों से जूझकर अपने लिए राह बनाने की कोशिश कर रही थी, ऐसे में खिड़की, दरवाज़ा, आंगन—ये सारे स्वतंत्रता के प्रतीक रहे होंगे।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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