ismat chughtai, इस्मत चुग़ताई
गूंज बाक़ी... इस्मत चुग़ताई (21.08.1915-24.10.1991) का एक नायाब इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने अपनी रचना प्रक्रिया पर बात की है, अपनी कहानियों पर चर्चा की है और साथ ही अपने समकालीन लेखकों/शायरों पर भी बेबाक कहा है। मंटो की वजह से लिखा एक ख़त पूरा पढ़ा है और हिंदी, अनुवाद, सिनेमा और सियासत जैसे पहलुओं पर खुलकर बातें की हैं... (भवेश दिलशाद की प्रस्तुति)

इस्मत चुग़ताई का 1972 का नायाब इंटरव्यू

            महफ़िल: आपको उर्दू कहानी की बनत के मामले में पहली कतार में गिना जाता है। सबसे पहले, अपनी शुरूआती उन रचनाओं पर मुख़्तसरन कहिए और फिर उन शुरूआती कहानियों में से कुछ एक पर, जिन्होंने आपको उर्दू अदब में इतना अहम मुक़ाम दिलाया।

            इस्मत: मैं इस तरह से चीज़ों को दर्जे देने में यक़ीन नहीं करती। ‘अहम मुक़ाम’ से आख़िर आपका क्या मतलब है? जब मैंने लिखना शुरू किया, तब चलन था—या तो रूमानी चीज़ें लिखी जातीं या प्रगतिशील लेखकों की तरह लिखा जाता। जब मैंने लिखना शुरू किया, तो क़ारीन यानी पाठक बहुत चौंक गये, क्योंकि मैंने बहुत बेबाकी से लिखा था। पहले-पहल तो लोगों को लगा कि ये रचनाएँ मेरे भाई अज़ीम बेग़ चुग़ताई की हैं, बस किसी दूसरे नाम से लिखी गयी हैं। वे भी हैरान रह गये और कहने लगे, “मेरे नाम और मेरी शैली में कौन लिख रहा है?” हम भाई-बहन थे, हमारी शैलियाँ मिलती-जुलती थीं।

मैं वह नहीं लिखती थी, जिसे आप ‘साहित्यिक’ लेखन कहें। मैं जिस तरह बोलती हूँ, उसी तरह लिखती थी और आज भी लिखती हूँ—बहुत आसान ज़ुबान में, साहित्यिक भाषा में नहीं। आप साहित्यिक भाषा और बोलचाल की भाषा का अंतर से तो वाकिफ़ हैं ही।

आप जानते हैं, मेरी उर्दू बहुत कमज़ोर थी, क्योंकि अलीगढ़ में जिन विषयों की मैंने पढ़ाई की, वे अंग्रेज़ी में थे—इतिहास, भूगोल, गणित, सब कुछ अंग्रेज़ी में। इसलिए उर्दू मेरी मातृभाषा नहीं थी और एक तरह से मुझे उसमें लिखना मुश्किल लगता था। मुझे हर समय अंग्रेज़ी में लिखना पड़ता था, इसलिए अपनी उर्दू पर ध्यान देने के लिए मेरे पास बहुत कम वक़्त था। तब उर्दू को अहमियत नहीं दी जाती थी। वह हमारी अपनी ज़ुबान थी, इसलिए हम ही उसे कोई तवज्जो नहीं देते थे।

मेरी उर्दू बहुत कमज़ोर थी, उसमें बहुत-सी ख़ामियाँ थीं, लेकिन मैंने फिर भी लिखना शुरू कर दिया। मुझ पर ध्यान मेरी भाषा की वजह से नहीं गया। ध्यान गया तो मेरे लिखने के ढंग की वजह से—बेबाकी की वजह से।

            महफ़िल: इस बेबाकी के बारे में बताइए।

ismat chughtai, इस्मत चुग़ताई

            इस्मत: यह मुझे अपने परिवार से मिली। हम सब बेबाक थे—मेरे वालिद, मेरे भाई और हम सभी। हम कभी अलग-अलग समूहों में नहीं बैठते थे कि औरतें एक जगह बैठें और मर्द दूसरी जगह। मेरे अब्बा काफ़ी प्रगतिशील और बहुत लिबरल विचारों वाले थे। वे तालीम में यक़ीन करते थे और उन्होंने मुझे भी मेरे भाइयों के बराबर मौक़े दिये। घुड़सवारी और बाक़ी सब चीज़ों में भी।

            महफ़िल: तो यह बेबाकी आपकी ज़ात में थी और आपके लेखन में भी आ गयी। नतीजतन आपने बहुत जल्दी अपना नाम बना लिया।

            इस्मत: बहुत ख़राब नाम! मेरी पहली रचना पत्रिका ‘साक़ी’ के लिए एक नाटक थी। मैंने उसे स्कूल के लिए लिखा था। मैं स्कूल के लिए छोटी-मोटी चीज़ें और सांस्कृतिक समारोहों के लिए छोटे नाटक लिखा करती थी। यह नाटक 1938 में प्रकाशित हुआ। फिर मैंने अपनी कहानी गेंदा लिखी, उसके बाद दो-तीन और कहानियाँ। इनके बाद लिहाफ़ लिखी।

आपको पता है, जब मैंने पहली बार लिहाफ़ लिखी, तब इस विषय—यानी समलैंगिक संबंधों—पर खुलकर बात नहीं होती थी। हम लड़कियाँ आपस में इस बारे में बात करती थीं और हमें पता था ऐसा कुछ होता है, लेकिन हमें पूरी सच्चाई मालूम नहीं थी। मैंने इस विषय पर कोई किताब या साहित्य भी नहीं पढ़ा था। इसलिए जब मैंने यह कहानी लिखी, तो अपनी भाभी को दिखायी, जो मेरी ही उम्र की थीं। उन्होंने कुछ पात्रों को पहचान लिया और कहा, “यह फ़लाँ है और वह फ़लाँ।” उन्होंने यह नहीं कहा कि कहानी गंदी है या ऐसा कुछ और।

इसके बाद मैंने अपनी चौदह साल की भतीजी को कहानी पढ़ने के लिए दी। उसे मेरी कहानियाँ पढ़ने का बहुत शौक़ था, लेकिन इसे पढ़ने के बाद उसने कहा, “यह क्या है? आपने जो लिखा है, मैं उसे समझ नहीं पा रही हूँ।” मैंने उससे कहा कि मैं उसे समझा नहीं सकती; बड़ी होने पर वह ख़ुद समझ जाएगी।

जब मैंने इस विषय पर लिखा, तो मैंने—क्या बेवकूफ़ी थी मेरी!—यह सोचा कि ऐसा केवल औरतें ही करती हैं। मुझे लगता था मर्द तो हमेशा वेश्याओं के पास जाते हैं, लेकिन लड़कियाँ वेश्याओं के पास नहीं जा सकतीं, इसलिए वे ऐसा करती हैं। सचमुच, उस वक़्त मैं बहुत नासमझ थी। मुझे इसके बारे में कुछ पता नहीं था, क्योंकि इस पर कभी कोई चर्चा ही नहीं करता था। लोग सेक्स पर चर्चा तो कर सकते थे, लेकिन उसके इस पहलू—जिसे वे विकृति मानते थे—पर नहीं।

इसलिए जैसे ही मैंने यह कहानी लिखी, ऐसा लगा मानो परमाणु बम फट गया हो! लोग मुझे गालियाँ देने लगे और बुरे-बुरे नामों से पुकारने लगे। किसी को मेरा पता मालूम नहीं था, इसलिए लोग केवल मेरे संपादकों के ज़रिये मुझे पत्र लिख सकते थे।

            महफ़िल: कौन-सी पत्रिका में?

            इस्मत: अदब-ए-लतीफ़ और साक़ी में। लिहाफ़ सबसे पहले अदब-ए-लतीफ़ में प्रकाशित हुई थी। लोगों ने कहा यह बहुत, बहुत फ़ह्श कहानी है और मैं ख़ुद बहुत गंदी औरत हूँ, जो एक बहुत गंदे परिवार से आती है। उन्होंने मेरे बारे में तरह-तरह की बुरी बातें कहीं।

फिर मेरी शादी हो गयी। जब शुरू में मुझे इस तरह के ख़त मिलते थे, तो संपादक उन्हें मेरे पास नहीं भेजते थे। वे ख़त खोलकर पढ़ लेते और यह सोचकर कि मैं एक लड़की हूँ, उनमें लिखी अश्लील गालियों वाले ख़त नष्ट कर देते थे। लेकिन मेरी शादी हो जाने के बाद उन्होंने कहा कि अब मैं एक ज़िम्मेदार व्यक्ति हूँ, इसलिए वे सारे ख़त मुझे भेजने लगे।

लिहाफ़ के 1942 में प्रकाशित होने के लगभग दो महीने बाद ही मेरी शादी हो गयी थी। इसके बाद मुझे ख़तों के बड़े-बड़े बंडल मिलने लगे—इतनी गंदी बातें लिखी होती थीं उनमें! बहुत डर गयी थी मैं। फिर मैंने उस तरह कभी नहीं लिखा; वह ग़लती दोबारा नहीं दोहरायी। अगर आप मेरा लेखन देखें, तो पाएँगे कि उसके बाद बेबाक और खुले शब्दों का इस्तेमाल करने में बहुत सतर्क हो गयी मैं। जब भी कोई लिहाफ़ शब्द का ज़िक्र करता है, मैं घबरा जाती हूँ।

            महफ़िल: लेकिन उर्दू अफ़सानों के लेखन में यह कहानी निश्चित रूप से एक बड़ा बदलाव थी!

            इस्मत: बाद में कुछ लोग मेरी तरफ़दारी में भी आये। उन्होंने कहा कहानी ठीक है। लेकिन मैंने कहा भी कि मुझे अफ़सोस है।

            महफ़िल: आपकी तरफ़ कौन-कौन थे?

            इस्मत: सबसे पहले मजनूं गोरखपुरी ने इस पर एक लेख लिखा। मैंने वह लेख अब तक नहीं पढ़ा। फिर कृष्ण चंदर और उसके बाद, ज़ाहिर है, मंटो।

            महफ़िल: मंटो, ज़ाहिर है। इसके बाद आप दूसरे विषयों की ओर बढ़ीं। आपने और क्या लिखा? जंग के दौरान क्या?

            इस्मत: जंग के दौरान मैंने अपना नॉवेल टेढ़ी लकीर लिखा। वह एक बड़ा, मोटा उपन्यास था। उन दिनों मैं बीमार थी और अपनी बेटी को जन्म देने वाली थी। लेकिन मैं लगातार वही लिखती रहती थी।

            महफ़िल: कल मैंने उर्दू के एक दूसरे लेखक से बात की। उन्होंने कहा वे अपने काम से काम रखते हुए लिख रहे थे और फिर अचानक उन्हें पता चला कि उन्हें ‘तरक़्क़ीपसंद’ कहा जा रहा है और वे तहरीक का हिस्सा बन चुके हैं। वे औपचारिक रूप से कभी उसमें शामिल नहीं हुए थे, फिर भी… आपके साथ क्या हुआ?

            इस्मत: 1936 में जब मैं बी.ए. कर रही थी, तब मैंने लखनऊ में अंजुमन तरक़्क़ीपसंद तहरीक यानी प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक में हिस्सा लिया था, जिसमें प्रेमचंद भी शामिल हुए थे। उस समय मुझे बहुत कुछ समझ में नहीं आया था, लेकिन मैंने ‘अंगारे’ पढ़ी थी। फिर, ज़ाहिर है, रशीद जहाँ थीं। उन्होंने तो मुझे बिगाड़ ही दिया था। मेरा परिवार यही कहा करता था। उन्होंने मुझे इसलिए बिगाड़ा, क्योंकि वे बहुत बेबाक थीं और हर तरह की बातें खुलेआम, ऊँची आवाज़ में कहती थीं। मैं बस उनकी नक़ल करना चाहती थी।

उनका मुझ पर बहुत असर पड़ा—उनके लिबरल और आज़ाद ख़यालों का। वे कहती थीं आप जो भी महसूस करें, उसके लिए आपको शर्मिंदा नहीं होना चाहिए और न ही उसे अल्फ़ाज़ देने में शर्म करनी चाहिए, क्योंकि दिल होंठों से ज़्यादा पवित्र है। वे कहती थीं अगर आपके मन और दिल में कोई बात है, लेकिन आप उसे कह नहीं सकते, तो उसे मन में दबाये रखना ज़्यादा बुरा है। उसे बोल देना बेहतर है…

मैं शुरू से ही तहरीक के साथ थी। लेकिन इतनी बेबाक थी कि मुझ पर ऐतबार नहीं किया जा सकता था; मैं इतनी खुले दिल की और इतनी बेख़ौफ़ थी कि कोई भी पार्टी मुझे अपना सदस्य नहीं बनाना चाहती थी। वे मुझे मेंबर नहीं बनाते थे, क्योंकि मैं तरह-तरह की बेतुकी बातें किया करती थी। मुझे बेतुकी बातें कहने से डर नहीं लगता—इस टेप रिकॉर्डर के सामने भी नहीं। क्योंकि मुझे नहीं लगता किसी का नाम इस तरह बदनाम हो सकता है या किसी की अच्छी प्रतिष्ठा इस तरह ख़राब हो सकती है। मैं यह भी नहीं मानती कि मेरा कोई इतना बड़ा या शानदार नाम है, जिसे ख़राब किया जा सके या जिसे नुक़सान पहुँचाया जा सके।

            महफ़िल: आप कहती हैं आप शुरू से ही तहरीक में थीं। तरक़्क़ीनसंद लेखक आपकी कहानियों को किस नज़र से देखते थे? आपने बताया कृष्ण चंदर दाद देते थे।

            इस्मत: उनमें से ज़्यादातर लोग मेरे दोस्त थे, यहाँ तक कि रिश्तेदारों से भी ज़्यादा क़रीबी दोस्त। इसलिए कभी वे मेरी तारीफ़ करते थे और कभी मेरे ऐब बताते। लेकिन मैंने किसी भी बात को बहुत गंभीरता से नहीं लिया—न तारीफ़ को, न बुराई को।

            महफ़िल: क्या आप कहेंगी तरक़्क़ीपसंद तहरीक आज भी उर्दू साहित्य में एक असरदार ताक़त है?

            इस्मत: इस तहरीक का अस्तित्व तबसे था, जब हमने इसे कोई नाम भी नहीं दिया था। मेरा मानना है भक्त कबीर एक प्रगतिशील लेखक थे। जिन लोगों ने भी मानवता की भलाई के लिए कोई अच्छी और सुंदर बात कही है, वे सब प्रगतिशील लेखक हैं। ऐसा नहीं है कि शुरूआत केवल 1935 या 1936 में हुई थी। वे अतीत में भी मौजूद थे; बस उस समय उन्हें यह नाम नहीं दिया गया था। और वे हमेशा मौजूद रहेंगे।

            महफ़िल: आप ‘तरक़्क़ीपसंद’ शब्द का इस्तेमाल बहुत बड़े मआनी में कर रही हैं—यानी ऐसा साहित्य जिसका किसी न किसी रूप में मानवता, सामाजिक चेतना और मानवतावाद से सरोकार हो। लेकिन उस तरक़्क़ीपसंद अदब का क्या, जिसका ज़िक्र मार्क्सवाद, समाजवादी यथार्थवाद, स्तालिनवाद जैसे लिहाज़ों से किया जाता है? ख़ास तौर से 1930 और 1940 की दहाइयों में उर्दू में लिखे गये उस साहित्य से मेरा मतलब है, जो काफ़ी सियासी था।

            इस्मत: लेकिन आप इन दोनों को अलग नहीं कर सकते। सियासत और अदब हमेशा से साथ-साथ रहे हैं—चाहे डिकेन्स ने जो लिखा हो या रूसी लेखकों ने इन्क़िलाब के बाद जो लिखा हो।

लेकिन अगर आप अंजुमन तरक़्क़ीपसंद की बात करना चाहते हैं, तो ठीक है। एक इदारे के रूप में वह अच्छा था। उसने हमें एक-दूसरे से मिलने का मौक़ा दिया, बातचीत करने और ज़िंदगी के नये मूल्यों को जानने का बहाना भी। हमें पता चला दुनिया में क्या हो रहा है।

सियासत में कभी कोई ख़ास दिलचस्पी मैं नहीं लेती थी। बहुत ज़्यादा पढ़े बिना भी, इन बैठकों के ज़रिये मैं बहुत कुछ सीख सकती थी। उस समय मैंने संजीदा अदब का बहुत मुतालअ नहीं किया था, लेकिन लोगों से बातचीत करके, लेक्चरों में शामिल होकर, लोगों से मिलकर और ज़िंदगी व कम्युनिज़म के बारे में जानकर बहुत कुछ सीखा।

साम्यवाद यानी कम्युनिज़म में मेरी दिलचस्पी रशीद आपा—यानी रशीद जहाँ—की वजह से पैदा हुई। फिर मुझे लखनऊ विश्वविद्यालय के इसाबेला थोबर्न कॉलेज (आई.टी. कॉलेज) में इसके बारे में पढ़ना पड़ा। वहाँ के प्रोफ़ेसर काफ़ी लिबरल विचारों वाले थे। उन दिनों भी वे हमारे और स्वतंत्रता आंदोलन से बहुत हमदर्दी रखते थे। वहीं मैंने सीखा कि अंग्रेज़ों ने हिंदोस्तानियों के साथ क्या किया था।

साम्यवाद में, बेशक, बहुत कुछ अच्छा है; लेकिन ज़रूरी नहीं कि साम्यवादी भी अच्छे हों। एक विचारधारा है, ठीक इस्लाम और ईसाई मज़हब की तरह। लेकिन आप यह नहीं कह सकते सभी मुसलमान वाक़ई इस्लाम के सबक़ के अनुरूप हैं या सभी ईसाई, ईसाई धर्म की शिक्षाओं के अनुरूप; उसी तरह सभी साम्यवादी भी साम्यवाद के आदर्शों के अनुरूप नहीं होते।

            महफ़िल: आपको लगता है इस तहरीक ने उर्दू अदब को बहुत कुछ दिया?

            इस्मत: हाँ।

            महफ़िल: आपको लगता है शायरी के लिए भी उतना ही अच्छा हुआ, जितना नस्र यानी गद्य के लिए?

            इस्मत: कविता को तहरीक से बहुत नुक़सान हुआ।

            महफ़िल: ऐसा लगता है इस तहरीक का वास्तविक योगदान कहानी में रहा। क्या आप इससे सहमत हैं?

            इस्मत: शायर बहुत जज़्बाती लोग होते हैं। उन्हें आप नारा-बाज़ कह सकते हैं—यानी नारे लगाने वाले। वे आसानी से जज़्बात में बह जाते हैं और अपनी बात उन जोशीले जुमलों में कहते हैं, जो गद्य में बहुत बनावटी लगेंगे। उन्हीं बातों को अगर गद्य में लिखा जाये, तो वे बहुत नक़ली मालूम होंगी, लेकिन शायरी में ऐसा किया जा सकता है।

शायर जज़्बाती होते हैं। फिर भी तहरीक के दौरान वे बहुत जल्दी अपने ख़याल बदल लेते थे। अक्सर शायरों ने अपनी कही हुई बातें वापस ले लीं। उनमें से बहुत-से लोगों को बाद में अपनी शायरी में संशोधन करना पड़ा, क्योंकि तहरीक को लेकर उनके ख़याल बदल गये थे। मैंने तो अपनी कही हुई कोई बात वापस नहीं ली!

            महफ़िल: तहरीक से जो अच्छी नस्र सामने आयी, काफ़ी असरदार है। क्या शायरी भी वैसी लिखी जा सकी?

            इस्मत: उन बरसों में शायर बहुत नौजवान थे और उनमें उतनी मैच्योरिटी नहीं थी। मैं इन्क़िलाबी शायरों की बात कर रही हूँ। कुछ अपवाद थे, जैसे जोश साहब और फिर मजाज़, जो बहुत कम उम्र में फ़ना हो गये। वे बीमार रहते थे और लिख नहीं पाते थे। दूसरे शायर मैच्योर नहीं थे। नारेबाज़ी उनके लिए अभिशाप साबित हुई।

            महफ़िल: लेकिन नस्र का क्या? अच्छी कहानियाँ तो बहुत हैं, मगर उपन्यासों के बारे में?

            इस्मत: उपन्यास लिखने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। ज़्यादातर लेखकों के पास इतना समय नहीं होता कि वे लिखकर अपनी रोज़ी-रोटी चला सकें। लेखक को बहुत कम पैसा मिलता है। उचित पैसा सिर्फ़ फ़िल्मों में लिखने पर मिलता है। इसलिए अधिकतर अच्छे लेखक फ़िल्मों के लिए लिखने लगते हैं। वे फ़िल्मों से कमाते और फिर अपनी ख़ुशी के लिए साहित्य लिखते हैं। कोई एक ही वक़्त में दो काम कैसे कर सकता है और फिर भी सचमुच कोई क़ाबिले-ग़ौर रचना कैसे तैयार कर सकता है…

            महफ़िल: आपको लगता है फ़िल्मों के लिए लिखने से लेखकों पर कोई उलट असर पड़ता है? क्या बड़े अवाम के लिए कुछ लिखने में कोई मुश्किल है?

            इस्मत: वे रोटी कमाने के लिए लिख रहे हैं! ज़ाहिर है बेहतर लेखन के मामले में वे बहुत कुछ और नहीं कर सकते। मैं अपनी बात कैसे समझाऊँ… उनकी रोज़ी-रोटी इसी से चलती है। और मैं फ़िल्मों के ख़िलाफ़ कुछ कैसे कह सकती हूँ, जबकि फ़िल्मों की बदौलत ही हमारा पेट भरता रहा है…

            महफ़िल: इसका मतलब है हिंदोस्तानी लेखक बहुत मुश्किल हाल में है। एक तरह से वह अपने लिए और अपने कुछ मित्रों के छोटे-से समूह के लिए लिख रहा है।

            इस्मत: इसके अलावा, प्रकाशक बहुत बड़े धोखेबाज़ हैं। वे कहेंगे किसी किताब की एक हज़ार प्रतियाँ भी नहीं बिक सकतीं।

            महफ़िल: समझने की बात है कि कुछ प्रकाशक किताबें प्रकाशित करने के लिए रिश्वत लेते हैं और जो किताबें बेचते हैं, उनकी कमाई अपने पास रख लेते हैं। यह वाक़ई बदनसीबी है। शायद ऐसे मामले में सरकार से माली मदद कारगर हो सकती है।

            इस्मत: और आपको क्या लगता है, यह मदद किसे मिलेगी? उन्हीं लोगों को जो लिखना नहीं जानते! सरकार की मदद उन्हीं को मिलेगी। कौन जानता है!

            महफ़िल: लेकिन क़ुर्रतुलऐन हैदर को तो अभी हाल में सरकार से कुछ मदद मिली है।

            इस्मत: सरकार किसी चीज़ को संरक्षण नहीं दे सकती। उसने हिंदी को संरक्षण दिया है और देखिए, उसका क्या हाल कर दिया है। हिंदी की हालत कितनी ख़राब है! हर कोई उससे नफ़रत करता है। क्यों? मेरी राय में हिंदी की लिपि दुनिया की सबसे अच्छी लिपि है। वह बहुत आसान है और तलफ़्फ़ुज़ यानी उच्चारण के मुताबिक़ है।

उर्दू की लिपि बहुत ख़राब है; उसके अक्षर इतने उलझाने वाले हैं। मेरी बेटी उसे पढ़ने से इनकार करती है। वह कहती है, “मैं इन अक्षरों को याद कैसे रखूँ? सारी लकीरें लेटी हुई हैं और उनके आसपास बस बिंदियाँ लगी हैं।” फ़र्क़ सिर्फ़ बिंदियों का है। मेरे विचार से हिंदी की लिपि सबसे अच्छी है।

लेकिन हिंदी को सरकारी संरक्षण दिया गया है, इसलिए दूसरी भाषाओं को लगता है उनके साथ अलगाव हो रहा है। लोग पूछते हैं हिंदी को ही क्यों…

मान लीजिए सरकार उर्दू को संरक्षण देने लगे। भाषा को ख़त्म करने का इससे बेहतर तरीक़ा और क्या होगा! फिर सरकार लेखकों को संरक्षण कैसे दे सकती है? स्कॉलरशिप देकर? या साहित्य अकादेमी के पुरस्कार देकर? इसके अलावा, वे नक़द पैसे भी नहीं देते; वे ऐसे बॉण्ड देते हैं, जो बारह साल बाद भुना पाने के होते हैं।

            महफ़िल: हिंदी और उर्दू के इस सवाल पर थोड़ी और बात। हिंदी का मुस्तकबिल क्या होगा? और भारत में उर्दू का क्या?

            इस्मत: उर्दू लोगों की ज़ुबान पर बनी रहेगी। लोग यह भाषा बोलते रहेंगे। क्या आपने पाकिस्तानी उर्दू और भारतीय उर्दू के बीच फ़र्क़ देखा है? भारतीय उर्दू में संस्कृत और हिंदी के लफ़्ज़ अधिक हैं, जबकि पाकिस्तानी उर्दू में फ़ारसी और अरबी के। बाक़ी यह एक ही सरल ज़ुबान है, जिसे हर कोई समझता है और बोलता है।

इस भाषा को कोई ख़त्म नहीं कर सकता, क्योंकि इसे किसी एक समूह ने नहीं बनाया है। इस भाषा को बनने में बरसों लगे हैं; इसे लोगों ने बनाया है। कोई इसे छू नहीं सकता। लेकिन उर्दू की लिपि ख़त्म हो जाएगी, क्योंकि हमारे बच्चे उसे सीख नहीं रहे हैं।

            महफ़िल: क्या लोग हिंदी लिपि में लिखी हुई उर्दू स्वीकार कर लेंगे?

            इस्मत: हाँ। ग़ालिब और मीर जैसे तमाम शायरों की रचनाओं का अनुवाद किया गया है—या कहें कि उन्हें दूसरी लिपि में लाया गया है।

            महफ़िल: तो आपके विचार में हिंदी एक बनावटी भाषा है, जिसे सरकार का संरक्षण मिला है, लेकिन जिसे कोई बोलता नहीं है।

            इस्मत: इसे तो सिर्फ़ आकाशवाणी बोलती है। कोई और नहीं। जैसे ही ऐसे लोग बोलना शुरू करते हैं, हर कोई रेडियो का स्टेशन बदल देता है।

उन्हें सरल हिंदी बोलनी चाहिए, या वह भाषा बोलनी चाहिए जिसे हर कोई बोलता है। ऐसी भाषा राजभाषा होनी चाहिए; उसकी लिपि हिंदी होनी चाहिए और उसे लोगों पर थोपा नहीं जाना चाहिए।

आपको पता है, हमारे नेताओं में एक बात की कमी है—उनमें व्यवहार-कुशलता नहीं है। मिसाल के लिए, अगर गांधीजी एक लफ़्ज़ भी कह देते, तो हम उसे सुनते और ऐसे यक़ीन करते, मानो वह ख़्रुदा का कलाम हो। जवाहरलाल जो कुछ कहते थे, हम उस पर भी यक़ीन करते थे। लेकिन आज जो लोग सत्ता में बैठे हैं, वे कुछ कहते हैं तो हम उनकी बात नहीं सुनते। वे अपनी अक़्ल का इस्तेमाल नहीं करते। उनकी बातों में ज़ुबान की ख़ूबसूरती नहीं होती। वे हसीन झूठ तक नहीं बोल सकते। क्या वे अपने भाषण लिखवाने के लिए कुछ अच्छे लेखकों को नहीं रख सकते…

मान लीजिए, सरकार कहती कि तीन महीने में हिंदी सीख लेने पर तुम्हारी तनख़्वाह इतनी बढ़ जाएगी या तुम्हें तीन हज़ार रुपये मिलेंगे। या अगर तुम दो महीने में हिंदी सीख लेते हो, तो तुम्हें छह हज़ार रुपये मिलेंगे। तब हर कोई हिंदी सीखने की कोशिश करता। हमें पीटने और हिंदी जबरन हमारे गले उतारने के लिए सरकार को और पुलिस की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। उसे हमें मजबूर या ज़लील नहीं करना पड़ता।

किसी से यह कहना कि “अगर तुमने यह ज़ुबान नहीं सीखी, तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी”—यह ज़िल्लत है। जब आपकी एक उम्र हो चुकी हो, आप परिवार के मुखिया हों और आपके बच्चे आपको हिंदी पढ़ते देखकर हँस रहे हों, क्योंकि हिंदी नहीं सीखने पर आपकी नौकरी चली जाएगी—तो क्या यह बच्चों के सामने ज़िल्लत की बात नहीं है…

अब गांधीजी को ही लीजिए। 1935 में मैं उनकी एक तकरीर सुनने गयी थी। सचमुच, मैं उससे बहुत मुतास्सिर हुई। उसी दिन से मैंने खादी पहनना शुरू कर दिया—आप जानती हैं, घर में काते-बुने कपड़े। मैंने अपनी सभी अच्छी साड़ियाँ हटा दीं। बाक़ी साड़ियाँ अपनी माँ या चचेरी बहनों को दे दीं।

खादी बहुत महँगी थी, जबकि बहुत अच्छा विदेशी कपड़ा बहुत सस्ता मिलता था। खादी महँगी थी, फिर भी हम उसका ख़र्च उठाते थे। हम अंग्रेज़ी दवाइयाँ तक ख़रीदना नहीं चाहते थे, क्योंकि हम समझते थे कि ऐसा करके हम अंग्रेज़ों को हरा सकते हैं। उनका व्यापार ख़त्म कर सकते हैं।

हम इस बात को समझते थे और गांधीजी की बातों पर अमल करते थे। लेकिन अब सरकार जो कुछ कहती है, हम उसका ठीक उल्टा करना चाहते हैं। सरकार के तरीक़ों में कुछ गड़बड़ है, ख़ासकर अपनी बात कहने के उसके तरीक़े में…

            महफ़िल: कुछ लोग, ख़ासकर वे बुज़ुर्ग जिन्होंने अंग्रेज़ों के राज में जीवन बिताया, ऐसा सोचते हैं शायद अंग्रेज़ों का यहाँ से चले जाना कोई अच्छा ख़याल नहीं था।

            इस्मत: उनके लिए ऐसा होगा! ऐसे लोग बहुत ही कम हैं—एक छोटा-सा अल्पसंख्यक वर्ग। मेरे चाचा कहा करते थे मुग़ल साम्राज्य का ख़त्म होना बहुत बुरा हुआ। उनका कहना था अगर मुग़ल भारत में बने रहते, तो उन्होंने हिंदोस्तान के लिए बहुत कुछ किया होता।

लेकिन जो चीज़ चली गयी, वह चली गयी। अंग्रेज़ों ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने अपने देश के लिए भी कुछ ख़ास नहीं किया। जब वे यहाँ थे, तो उन्हें हर हिंदोस्तानी चीज़ से नफ़रत थी। आज भी वे हिंदोस्तानी तहज़ीब को बहुत तवज्जो नहीं देते। भारत में जहाँ कहीं संभव हुआ, उन्होंने अपनी ब्रिटिश तहज़ीब को अपनाया और फैलाया।

            महफ़िल: लेकिन अंग्रेज़ों और दूसरे लोगों के कुछ ऐसे समूह भी थे, जिन्होंने हिंदोस्तान में संस्कृत, पालि, बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और इस्लाम के बारे में सबसे पहले लिखा। भारत पर संजीदा अकादमिक शोध के शुरूआती कामों में से कुछ अंग्रेज़ों ने ही किये थे।

            इस्मत: उन्होंने ये सब बातें अपने देश के लिए लिखीं, हमारे लिए नहीं। हमारे पाठ्यक्रमों और शिक्षा-योजनाओं को देखिए। हमें किस तरह का इंसान बनना था और किस तरह की चीज़ें पढ़नी थीं? हमें तो क्लर्क बनना था। आपने जिन विषयों का ज़िक्र किया, उन पर लिखी गई चीज़ें हिंदोस्तानियों के लिए नहीं थीं।

            महफ़िल: वे अंग्रेज़ी ज़ुबान लेकर आये थे।

            इस्मत: अंग्रेज़ी ज़ुबान! और उसे हम पर थोप भी दिया। उन्हें पता नहीं था कि हम उनकी भाषा के ज़रिये किताबें पढ़ेंगे, इल्म हासिल करेंगे और आख़िरकार उन्हें ही मुल्क से बाहर निकाल देंगे…

            महफ़िल: आइए, अब उर्दू लेखकों की बात करें। क्या आप मीराजी को जानती थीं?

            इस्मत: हाँ, मैं उनसे मिली थी। वे बहुत गंदे-से रहते थे; कभी नहाते ही नहीं थे। अहसासे-कमतरी से बुरी तरह आजिज़ थे और बेहद झिझके और घबराये हुए रहते थे। लोग उन्हें विकृत मानसिकता वाला कहते थे और उनके बारे में तरह-तरह की बुरी बातें किया करते थे। लेकिन वे कुछ बोलते नहीं थे। बहुत चुपचाप रहने वाले आदमी थे।

एक शायर के रूप में मुझे बहुत प्रभावित नहीं करते थे, सच कहूँ तो। लेकिन उस समय मैं बहुत कम उम्र की थी और मैंने अदब को गंभीरता से पढ़ना भी शुरू नहीं किया था।

            महफ़िल: मंटो के बारे में बताइए।

            इस्मत: शिल्प की दृष्टि से वे बहुत ख़ूबसूरत कहानियाँ लिखते थे। बेबाक थे और लोग उन्हें व्यभिचारी समझते थे। लेकिन वे बहुत प्यारे और घर-परिवार में रहने वाले इंसान थे।

उनके रचे में उनकी दबी-कुचली हसरतें आवाज़ पाती थीं। उनकी कहानियों के पात्र दरअसल वैसे ही लोग थे, जैसा वे ख़ुद बनना चाहते थे। वे सेक्स के बारे में लिखते थे और उसे कभी बहुत पुरकशिश, तो कभी नागवार बना देते थे।

आप उनकी रचनाएँ पढ़ें, तो पाएँगे कि उनके पात्र आपको ख़ुशी या रोमांच नहीं देते। वे आपको झकझोरते हैं…

            महफ़िल: मिसाल के लिए, उनकी बहुत मशहूर कहानी ठंडा गोश्त—

            इस्मत: बहुत ख़राब ढंग से लिखी गयी कहानी! शिल्प की दृष्टि से अच्छी है, लेकिन उसमें गंदे अल्फ़ाज़ भरे हुए हैं। हालाँकि मंटो बहुत चतुर लेखक थे और उन्होंने इसे बहुत चतुराई से लिखा है। शायद यह एक अच्छी कहानी है। उसे पढ़ते हुए आप गर्मी और गंध तक महसूस कर सकते हैं…

            महफ़िल: मैंने इस ख़ास अफ़साने को अलग नज़र से देखा है। इसमें जो ‘अश्लीलता’ और ‘गंदे अल्फ़ाज़’ हैं, उनके ज़रिये वह हिंदुओं और मुसलमानों के क़त्ले-आम के बारे में इशारे हैं। असली अश्लीलता उस वाक़िए में नहीं, जो इस मर्द और औरत के बीच घटता है या सिख और मुर्दा लड़की के बीच। असली अश्लीलता तो हिंदोस्तान और पाकिस्तान के बीच घट रही है—क़त्ल, बलात्कार और लूटपाट में।

            इस्मत: वह तो बलात्कार किये जाने पर होने वाली बातों के बारे में लिख रहा है!

            महफ़िल: ठीक है। लेकिन मैंने इसे अलामत यानी सिम्बॉलिक रूप में देखा चाहा है। मैंने इस कहानी को इस तरह पढ़ा है कि हिंदोस्तान के लोग हिंदोस्तान का ही बलात्कार कर रहे हैं और आख़िरकार ख़ुद भी मारे जाते हैं।

            इस्मत: मैंने इस कहानी में कभी कोई अलामती मतलब नहीं देखा। मेरी नज़र में मंटो बहुत प्यारे इंसान थे और उनकी मानसिकता बिल्कुल भी अश्लील नहीं थी। उनका चेहरा बहुत मासूम और भोला-भाला था, किसी संत जैसा। मैं उनसे अक्सर यही कहती थी और इस पर उन्हें बहुत बुरा लगता था।

वे कहते थे, “मैं कोई संत नहीं हूँ; मैं तो बहुत बुरा आदमी हूँ…”

            महफ़िल: आप उनसे पहली बार कब मिली थीं?

            इस्मत: शायद 1942, बंबई में। मुलाक़ात के दो मिनट के भीतर ही हम दोनों में झगड़ा शुरू हो गया। किसी मौक़े पर उन्होंने कहा, “तुम जानती थीं कि लिहाफ़ में क्या चल रहा था, है न? तुमने वह कहानी जान-बूझकर लिखी थी।”

मैंने जवाब दिया कि बेशक, मैंने उसे जान-बूझकर ही लिखा था। उस समय वह कहानी बस छपी-छपी थी और हम सब उसके बारे में चर्चा कर रहे थे और बहस कर रहे थे। मंटो बहुत बेबाक थे।

            महफ़िल: आपने अपना लेख मंटो मेरा दोस्त, मेरा दुश्मन किस मौक़े पर लिखा था?

            इस्मत: उनके गुज़रने के बाद। नक़ूश का एक शुमारा निकला था, जो ‘मंटो’ अंक ही था। ओह, उसने कितनी तकलीफ़ें झेली थीं!

इसी साल 18 जनवरी को पाकिस्तान में उनकी याद का दिन मनाया जा रहा था। उन्होंने मुझसे कहा कुछ लिखने को। मैंने उन्हें ख़त लिखकर पूछा कि क्यों मना रहे हैं!

हर दौर में, हर शहर में, हर मुल्क में कोई-न-कोई मंटो पैदा होता है। ऐसे लोग बुरे होते हैं, दूसरों को परेशान करते हैं, आपको चोट पहुँचाते हैं और अपने बारे में बहुत ऊँची राय रखते हैं, जबकि आप उनकी बातों पर विश्वास नहीं करते। वे ख़ुद को महान कलाकार और महान इंसान समझते हैं और इस बात से हैरान होते हैं कि आप उन्हें महान नहीं मानते।

वे चाहते हैं जब भी उन्हें ज़रूरत हो, आप उन्हें पैसे दें या उनकी कोई और मदद करें। वे समझते हैं आपको उनकी मदद करके ख़ुश होना चाहिए और उन्हें पैसे देना अपनी ख़ुशक़िस्मती माननी चाहिए। वे चाहते हैं आप उनका मनोरंजन करें, क्योंकि वे अपने आपको महान समझते हैं।

वे कंजूस होते हैं, झूठ बोलते हैं, धोखा देते हैं और नहाते तक नहीं। आप उन्हें आजकल की भाषा में ‘हिप्पी’ कह सकते हैं। वे झगड़ते हैं, दूसरों को चोट पहुँचाते हैं और फिर भी अपने आपको महान समझते हैं। अगर आप उन्हें पैसे नहीं देते, तो वे आपको गालियाँ देने लगते हैं। उनकी ज़ुबान बहुत गंदी होती है।

फिर एक दिन ऐसा आदमी मर जाता है, जैसे मंटो मर गये। आप उससे नफ़रत करते रहे होते हैं और उससे बचते फिरते हैं। वह आपका इस्तेमाल करता रहा होता है। लेकिन एक दिन उसकी मौत हो जाती है। और अचानक आपको एहसास होता है वह वास्तव में एक महान शख़्स था।

(इस्मत की आवाज़ भर्राती है)

ऐसा बहुत-से लोगों के साथ हुआ है। उनके जीते-जी उनसे नफ़रत की जाती है और उन्हें किनारे कर दिया जाता है। मीराजी भी ऐसे ही शख़्स थे। अब लोग उनके क़सीदे काढ़ते हैं। आज मीराजी को महान नक़्क़ाद और महान शायर कहा जाता है और उनके बारे में बढ़िया-बढ़िया लेख लिखे जाते हैं।

मुझे याद है, जब वे पूना में थे, तो भूखों मर रहे थे। वे भी महीनों तक नहाते नहीं थे। लोग उनसे नफ़रत करते थे और उनसे बचते थे, क्योंकि वे उनसे पैसे माँगते थे। लोगों को लगता था वे उनका फ़ायदा उठा रहे हैं। लेकिन जैसे ही उनकी मौत हुई, लोग उनकी पूजा करने लगे।

यह कैसी बकवास है! मरे हुए लोगों की पूजा करना!

            महफ़िल: क्या आप पाकिस्तान के लोगों को मंटो के बारे में लिखा अपना ख़त पढ़कर सुनाएँगी?

(इस्मत कमरे से जाती हैं और कुछ देर बाद लौटती हैं।)

            इस्मत: (उर्दू में पढ़ते हुए)

“1944 में इम्पीरियल क्राउन ने मंटो और मेरे ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया था। इल्ज़ाम था—फ़ह्हाशी यानी अश्लीलता का।

उन दिनों बुज़ुर्ग और अपने आपको सभ्य समझने वाले लोग मंटो को गालियाँ देना अपना फ़र्ज़ मानते थे। उन्हें लगता था ऐसा करना उनके मज़हब का हिस्सा है। लोगों को यक़ीन था कि मंटो को खुलेआम गालियाँ देकर वे नजात पा लेंगे।

मंटो को हर दिन धमकियों और गालियों से भरे ख़त मिलते थे। मैं इन सारी मुसीबतों से बची रही, क्योंकि कुछ संपादकों को छोड़कर किसी को मेरा पता मालूम न था। इसके अलावा, ऐसे ख़तों की शुरूआती दो-चार पंक्तियाँ पढ़ने के बाद मैं उन्हें फाड़कर फेंक देती थी। फिर मैं उन्हें पूरी तरह भूल जाती थी।

लेकिन मंटो उन ख़तों को बार-बार पढ़ते थे और अपने दोस्तों को भी ज़ोर से पढ़कर सुनाते थे। इन ख़तों ने उनके मन का सुकून छीन लिया था।

एक दिन मैंने छेड़ में कहा, ‘मंटो, जब तुम मर जाओगे, तो लोग तुम्हारी इबादत करेंगे और तुम्हें महानता का अलमबरदार कहेंगे। तुम्हारे नाम के साथ हमेशा के लिए ‘महान’ शब्द जोड़ दिया जाएगा। वे तुम्हें महान मनोवैज्ञानिक और मुआशरे का ख़ादिम कहेंगे।’

मंटो इस बात पर बहुत ग़ुस्सा हो गये। बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे घूरते हुए जितना मुँह बिगाड़ सकते थे, बिगाड़कर चिल्लाने लगे। उन्होंने कहा, ‘ख़ुदा की क़सम, अगर ऐसा हुआ, तो मैं अपनी क़ब्र से निकलकर उन्हें सताऊँगा।’

क्या आपने हाल में मंटो की क़ब्र देखी है? क्या आपने उसे ध्यान से देखा? क्या उसमें कहीं दरारें दिखीं? मुझे नहीं मालूम। उनकी क़ब्र बहुत भव्य ढंग से बनायी गयी है। संगमरमर की क़ब्र है। मंटो को ग़लतफ़हमी थी कि फ़ौत होने के बाद उसमें से वे बाहर निकल आएँगे।

मौत के बाद इंसान पूरी तरह माज़ूर हो जाता है—चाहे उसके मुर्दा जिस्म को जलाकर राख इधर-उधर बिखेर दी जाये, चाहे उसे मिट्टी के ढेरों के नीचे दफ़ना दिया जाये, या चाहे किसी शाहराह पर उसका बुत लगा दिया जाये, ताकि चीलों और कौवों को उस पर बीट करने की जगह मिल सके।

जब मंटो ज़िंदा थे, तब आप कहाँ थे? जब अख़बार और रिसाले उनके सिर पर गंदगी और कीचड़ की टोकरियाँ उड़ेल रहे थे, तब आप कहाँ थे? जब वे पागलख़ाने में थे और अपने आसपास भूत-प्रेत तथा काल्पनिक आकृतियाँ देखते थे, तब आप कहाँ थे?

शायद उस समय आप बहुत छोटे थे। लेकिन उन लोगों से तो पूछिए जो उस समय इतने छोटे नहीं थे। उनसे पूछिए वे क्या कर रहे थे। क्या उन्हें मंटो के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था? वे क्या तलाश रहे थे? उनके जीवन में कौन-सा मोड़ आया था? क्या उन्हें कुछ भी पता नहीं था? क्या वे उनके लिए कुछ नहीं कर सकते थे?

तो फिर आज आप उनके नाम पर इतने जलसे क्यों कर रहे हैं? आप किसके हाथों से गंदगी धोने की कोशिश कर रहे हैं? किसके अंतःकरण के अँधेरे कोनों में इस कलंक की शर्म को कम करना चाहते हैं? क्या आपने कभी इस बारे में सोचा है?

मंटो के साथ क्या हुआ और ऐसा क्यों हुआ? अब उनकी याद का दिन मनाकर और उनकी मौत पर अफ़सोस जताकर क्या आप उन तमाम वाक़ियात की भरपाई कर सकते हैं, जो उनके साथ हुए थे?

क्या सदियों तक छाती पीटने से वह तीर कभी निकाला जा सकता है, जो अली असग़र के गले में चुभा हुआ है? क्या वियतनाम में आख़िरी साँसें ले रहे उन मासूमों को कोई ऐसा शानदार जलसा फिर ज़िंदा कर सकता है? क्या हिटलर की ओखली में चूर-चूर कर दी गयी हड्डियों के चूरे को फिर से जोड़कर इंसान बनाया जा सकता है?

क्या कोई ऐसी अदालत है, जो मंटो के सानिहे के लिए ज़िम्मेदार लोगों से जिरह कर सके? क्या किसी में इतना दम है कि सामने आकर अपनी ग़लती माने?

यह सही है कि आप बीस साल पहले पैदा नहीं हुए थे, लेकिन क्या उस समय कोई और भी पैदा नहीं हुआ था?

मंटो एक ऐसे निर्जन जंगल में रहते थे, जहाँ उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था। क्या आप मुझे बता सकते हैं किसी इंसान को इस तरह अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है? उसके आसपास के लोग कहाँ ग़ायब हो गये थे? वे सो क्यों गये, अंधे और बहरे क्यों हो गये और फिर पत्थर क्यों बन गये?

और इस अकेले आदमी की मौत की तमाम ज़िल्लत मौत पर ही डाल दी जाती है! मौत अपना महान वरदान दे चुकी होती है, फिर लोग जम्हाइयाँ लेते हैं और अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। हर कोई अब अपने आपको महान समझने लगता है।

अब यही लोग मंटो की शान में ज़ोरदार लेख लिखते हैं। मशहूर हो जाते हैं। उनकी मौत का दिन पूरी धूमधाम से मनाया जाता है। इस तरह, जो शख़्स दुनिया छोड़कर चला जाता है, जो मर जाता है, ज़िंदा लोगों की नज़रों में प्यारा बन जाता है।

मंटो हमेशा बनावट और पाखंड से नफ़रत करते थे। उनके बारे में घुमा-फिराकर बात करते हुए मुझे सचमुच डर लगता है। अगर कभी दोबारा उनसे सामना हो गया, तो शायद वे मुझसे झगड़ने लगें।

वे कितने आला कहानीकार थे! लेकिन मैं इस बात से बिल्कुल मुतास्सिर नहीं हूँ। न ही इस बात से कि वे कितने आला फ़नकार थे। वे एक इंसान थे, बच्चों के पिता थे, किसी औरत के शौहर थे। क्या इस दुनिया में इंसान होना और जीना ही अपने आप में काफ़ी नहीं है?

हज़रात, मुझे माफ़ कीजिए। हो सकता है, आपका जलसा पहले ही हो चुका हो। मैं जो कुछ लिख रही हूँ, वह न कोई लेख है, न क़सीदा; न उसका कोई आग़ाज़ है, न अंजाम। यह ज़िंदगी की सख़्तियों के ख़िलाफ़ एक बहुत भोली-सी मुख़ालिफ़त है।

उनके लिए ये सारे जलसे और सभाएँ करने से क्या फ़ाएदा है? मैं आपको यक़ीन दिला सकती हूँ अगर मंटो बीस साल बाद पैदा हुए होते, या आप बीस साल पहले पैदा हुए होते, तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

हर ठीकरा पैदाइश या मौत पर डाल देने से कुछ हासिल नहीं। और हज़रात, मेरी बात याद रखिए: बीस साल बाद भी मंटो जेल की सलाख़ों से अपना सिर टकरा रहे होते, जैसा उन्होंने अस्ल में किया था। और उनकी मौत के बाद लोग उनके जलसे कर रहे होते, जैसे आप आज मना रहे हैं।

लेकिन अपनी ज़िंदगी में लोगों से उन्हें फिर भी ठोकरें ही मिलतीं।

ग़ौर से देखिए क्या आपके बीच क्या कोई मंटो मौजूद है। क्या आपमें कोई ऐसा है जो बेतुकी बातें करता है, जो बेहद संवेदनशील है, जो बहुत-सी मूर्खतापूर्ण ग़लतियाँ करता है और ऐसी बातें कहता है, जिन्हें कोई समझ नहीं पाता?

क्या आपमें कोई ऐसा है जो सोचता है कि कोई उसे समझता ही नहीं, जो अपनी ज़िद पर अड़ा रहता है, जो हर आने-जाने वाले के कपड़े के दामन में काँटे की तरह अटक जाता है, यहाँ तक कि असहनीय हो उठता है?

क्या आपमें कोई ऐसा है जो अपने आपको महान मुसन्निफ़ समझता है, लेकिन कोई उसकी महानता पर कोई राज़ी नहीं? कोई ऐसा कंगाल या भिखारी, जो सही-ग़लत किसी भी तरीक़े से पैसे माँगता है और जिससे लोग इसलिए बचते हैं कि वह अकेला है?

ऐसे ढोंगी से सावधान रहिए। अगर वह कल मर गया, तो हो सकता है आपको उसके सामने सिर झुकाना पड़े। आपको उसकी शान में लेख लिखने पड़ें और उसके सम्मान में सभाएँ करनी पड़ें।

लेकिन इन चीज़ों से मौत की भरपाई नहीं हो सकती। और अली असग़र के गले में चुभा हुआ तीर आपकी ज़ात आपकी ख़ुदी के गले में भी चुभता रह सकता है।”

(कुछ लमहों तक ख़ामोशी)

            महफ़िल: क्या आप अपनी कुछ हमअस्र लेखिकाओं और लेखकों के बारे में तनक़ीदी तौर पर कुछ कहना चाहेंगी? मसलन, ऐनी—यानी क़ुर्रतुलऐन हैदर—के बारे में?

            इस्मत: वे सचमुच पुख़्ता हो रही हैं और अपनी अलग पहचान बना रही हैं। उनका अंदाज़े-ािसिन्फ़ हमेशा से बहुत आकर्षक रहा है, लेकिन कभी-कभी उनके लिखे के मौज़ू उबाऊ हो जाते थे और कभी उनके किरदार भी। अब वे लेखन के इन पहलुओं में अधिक गहराई हासिल कर रही हैं।

            महफ़िल: उर्दू के एक नक़्क़ाद के मुताबिक़, उनका उपन्यास ‘आग का दरिया’ शायद हिंदोस्तान में लिखा गया सबसे महान उपन्यास है। आप इस जुमले के बारे में क्या सोचती हैं?

            इस्मत: ऐसा हो सकता है… मुझे नहीं मालूम। उसमें कुछ कमियाँ भी हैं। लेकिन वह बहुत ख़ूबसूरती से लिखा गया है। उसका पूरा ख़द-ओ-ख़ाल बहुत अच्छा है। ख़ास तौर पर उसकी एक बात यह है कि उसे पढ़ना बहुत आसान और दिलचस्प है।

मेरे भी सनमख़ाने (1947) और सितारों से आगे (1949) को मैं पूरा नहीं पढ़ सकी। मुझे वे उबाऊ लगे। आप कितने ही पन्ने पढ़ लें, कुछ वाक़े ही नहीं होता। बस ख़ूबसूरत फ़िक़रे—ख़ूबसूरत, ख़ूबसूरत फ़िक़रे।

लेकिन ‘आग का दरिया’ में उनके पास बहुत अच्छा कच्चा माल है।

            महफ़िल: उनके उस हालिया कहानी-संग्रह के बारे में क्या कहेंगी, जिसे अभी साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है?

            इस्मत: उनकी पिछली कहानियों से बहुत बेहतर है। उनका जो नया उपन्यास गुफ़्तगू में सिलसिलेवार प्रकाशित हो रहा है, उसे मैंने अभी नहीं पढ़ा है। उसका नाम ‘आख़िर-ए-शब के हमसफ़र’ है। वे मुझसे उसे पढ़ने के लिए कहती रही हैं। मैंने उनसे कहा मुझे उपन्यास किश्तों में पढ़ना पसंद नहीं है। मैं उसका एक हिस्सा पढ़कर फिर तीन महीने तक अगले हिस्से की प्रतीक्षा नहीं करना चाहती। इतने समय में मैं पिछला हिस्सा भूल जाती हूँ। जब उपन्यास पूरा हो जाएगा, तब पढ़ने का इरादा है।

            महफ़िल: बेदी के बारे में आपका क्या ख़याल है?

            इस्मत: उनके पास अपना अंदाज़ है और अच्छे किरदार भी। लेकिन उनके किरदारों में तरक़्क़ीपसंदी क्या है? और यह ज़रूरी ही क्यों है कि वे तरक़्क़ीपसंद हों?

उनकी कहानी ‘एक चादर मैली-सी’ एक इंसान का बहुत सुंदर और मुकम्मल ख़ाका पेश करती है। कुछ लोग कहते हैं उनकी ज़ुबान में बहुत नुक़्स हैं, लेकिन मुझे उनकी बहुत दिलकश लगती है। उनकी कहानी में बिजली की कड़क जैसी ताक़त है।

            महफ़िल: इसका अंग्रेज़ी में तर्जुमा हुआ है। लेकिन उसमें बहुत कुछ छूट गया है…

            इस्मत: तो क्या किसी रचना का अंग्रेज़ी में तर्जुमा न हो तो उसकी कोई वक़अत नहीं है? और अगर तर्जुमा हो भी जाये, तो वह ठीक से नहीं होता! क्या आप यही कहना चाहते हैं?

मुझे अपनी रचनाओं का तर्जुमा देखकर ख़ुशी होती है। लेकिन उर्दू की बारीकियों को अंग्रेज़ी में पूरी तरह नहीं उतारा जा सकता।

एक बार पतरस ने मुझसे कहा था वे मेरी कहानियों का अंग्रेज़ी में तर्जुमा करवाना चाहते हैं। उन्होंने पूछा, “क्यों? क्या आपकी कहानियों के बिना अंग्रेज़ी अदब ग़रीब हो जाएगा?”

            महफ़िल: मैं आपकी जानिब से इसका जवाब दूं—बिल्कुल, हो जाएगा!

            इस्मत: एक कहानी है, जिसका तर्जुमा मैं सचमुच देखना चाहूँगी। वह एक ऐसी औरत की कहानी है, जो अपने शौहर के लिए बीवियां ढूँढ़कर लाती है। वह उसके लिए दो और बीवियां ले आती है। उनमें से एक उससे बहुत छोटी है।

बड़ी बीवी जानती है उसका शौहर बाहर जाता है और दूसरी औरतों पर पैसे ख़र्च करता है। वह सियासत और इकोनॉमिक्स की समझ रखती है। इसलिए वह सोचती है अगर वह एक और बीवी घर ले आये, तो वह घर में नौकरानी की तरह काम करेगी और शौहर के दूसरी औरतों पर ख़र्च होने वाले पैसे भी बच जाएँगे। इसीलिए वह अपने शौहर के लिए एक और बीवी ले आती है।

शौहर इस बात से फूला नहीं समाता और अब वह अपनी बड़ी बीवी का एहसानमंद हो जाता है। बड़ी बीवी एक जवान लड़की को ले आती है, जो सच में काफ़ी बदसूरत है, लेकिन फिर भी जवान है।

वह हामिला हो जाती है और फिर शौहर की पसंदीदा बीवी बन जाती है। बड़ी बीवी घबरा जाती है। अपने पति से कहती है उसे एक और बीवी ले आनी चाहिए, क्योंकि हामिला औरत मर्द की सेहत के लिए, ख़ासकर उसकी सेक्सुअलिटी के लिए, अच्छी नहीं होती।

वह बेवकूफ़ शौहर डर जाता है और थोड़ी-सी नानुकुर के बाद एक और लड़की ले आता है। अब बड़ी बीवी के पास दो औरतें हैं, जिन पर वह हुकूमत कर सकती है।

वह उनसे कढ़ाई करवाती है और उसे बेचती है। छोटी बीवियों को बड़ी बीवी की सेवा करनी पड़ती है—उसे नहलाना और उसके पैरों की मालिश करना। बड़ी बीवी बड़े आराम से रहती है और बूढ़ा शौहर भी ख़ुश रहता है।

हर शाम वह छोटी बीवियों में से किसी एक को शौहर के पास भेज देती है। अगर वह किसी एक से नाराज़ हो, तो दूसरी को उसके पास भेजती है या धमकाती है कि जिस बीवी से नाराज़ है, उसे बेच देगी।

इस कहानी पर सियासतदानों ने भी काफ़ी बातें की थीं। सभी ने इसकी तारीफ़ की और इसे पसंद किया। इसका नाम मोजज़ा है—यानी ‘चमत्कार’। इस कहानी में पहली बीवी ही चमत्कार है। यह दो हाथ नाम के संग्रह में शामिल है।

उस संग्रह की शीर्षक-कहानी भी दिलचस्प है। वह एक लड़के की कहानी है, जो सफ़ाई का काम करता है। वह जंग में जाता है और दो साल बाद घर लौटता है। उसे पता चलता है उसकी बीवी के एक बच्चा हो चुका है, जबकि वह उस दौरान घर से बाहर था।

वह इस बात से ख़ुश होता है। उसकी माँ और दादी भी ख़ुश होती हैं। कोई यह सवाल नहीं उठाता कि बच्चा जायज़ है या नहीं। वे उसे इसलिए अहमियत देते हैं, क्योंकि लड़का है।

दरअसल, उस बच्चे का पिता लड़के का चचेरा भाई है। सफ़ाईकर्मी का बाप अपने बेटे को इस नाजायज़ बच्चे को मंज़ूर करने के लिए डाँटता है। लड़का जवाब देता है, “मैं क्या कर सकता हूँ? हमारा अपना ख़ून है।”

आप जानती हैं, मैं कोई नक़्क़ाद नहीं हूँ। अगर मुझे कोई कहानी पसंद आती है, तो वह पसंद आती है। मुझे इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि लिखने वाला नामी है या नया। कहानी अच्छी है, तो मुझे अच्छी लगती है। उस कहानी के कारण लेखक का क़द बढ़ जाता है।

इसीलिए मुझे यह कहने का शौक़ नहीं है कि फलाँ सबसे अच्छा है या फलाँ सबसे महान है। जैसा मैंने बातचीत की शुरूआत में कहा था, मुझे लोगों को दर्जे देने का यह चलन पसंद नहीं है…

            महफ़िल: क्या आप ख़ुद को महान लेखिका नहीं मानतीं?

            इस्मत: नहीं। मुझमें महानता नहीं है; मुझमें कुछ और है।

            महफ़िल: कुछ लोगों ने आपको महान कहा है।

            इस्मत: कहा होगा, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती। मेरे लिए मेरा घर और मेरे बच्चे ज़्यादा अहम हैं। वे उर्दू साहित्य से भी ज़्यादा अहम हैं।

            महफ़िल: क्या आप अंग्रेज़ी में लिखने वाले भारतीय लेखकों को पढ़ती हैं—जैसे राजा राव या आर. के. नारायण?

            इस्मत: उनका लिखना वैसा है, जैसा उन अंग्रेज़ों का था, जो उर्दू में लिखा करते थे। उनकी रचनाएँ अच्छी हैं, कभी-कभी काफ़ी अच्छी भी, लेकिन बस इतना ही। जदीद उपन्यासों के रूप में उनकी रचनाओं में बहुत दम नहीं है। मैं मग़रिब के महान उपन्यास नियमित रूप से पढ़ती रहती हूँ; उनकी तुलना में ये रचनाएँ उस स्तर तक नहीं पहुँचतीं।

शायद इसकी वजह ज़ुबान है। मौज़ू भी बहुत गहरे या तीखे नहीं होते।

मेरा ख़याल है हिंदोस्तानी ज़ुबानों के साहित्य में लेखन कहीं बेहतर है। क्या आपने चेम्मीन पढ़ा है? वह द ओल्ड मैन ऐंड द सी जैसा है। एक महान उपन्यास।

            महफ़िल: भारत में अंग्रेज़ी का भविष्य क्या है?

            इस्मत: सत्ता में बैठे लोग अंग्रेज़ी के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं जानते, इसलिए वे इसे बनाये रखना चाहते हैं। लेकिन यह बहुत लंबे समय तक नहीं चलेगी।

अंग्रेज़ी का स्तर जिस तरह गिर रहा है, वह भयानक है। हर दिन उसका स्तर नीचे जा रहा है। पिछले बीस वर्षों में इसमें बहुत गिरावट आयी है।

मैंने बंबई में देखा है कि यहाँ तालीम का ज़रिया अंग्रेज़ी होने के बावजूद उसका दर्जा उत्तर भारत से कहीं बेहतर है, जहाँ अंग्रेज़ी का दर्जा बहुत नीचे है। सबसे अच्छी अंग्रेज़ी दक्षिण भारत में बोली जाती है।

उत्तर में बच्चे छठी कक्षा से अंग्रेज़ी पढ़ना शुरू करते हैं। चार साल बाद, जब वे मैट्रिक का इम्तिहान देते हैं, तो उनकी अंग्रेज़ी बहुत ख़राब होती है। जो चीज़ें दूसरी जगहों पर दसवीं कक्षा में पढ़ायी जाती हैं, वे बंबई में पाँचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाई जा रही होती हैं।

नहीं, अंग्रेज़ी बहुत लंबे समय तक नहीं टिकेगी। अंग्रेज़ी को सब्जेक्ट के तौर पर में बनाये रखना चाहिए। जो लोग अंग्रेज़ी पढ़ना चाहते हैं, उन्हें पढ़ने की सुविधा मिलनी चाहिए।

लेकिन कुछ लोग चाहते हैं हम दुनिया से कटकर रह जाएँ। दुनिया का अदब अंग्रेज़ी में मुहैया है। हालाँकि आपको पता है वास्तव में कितने लोग अदब पढ़ते हैं? लोग ट्रू रोमांस जैसी किताबें पढ़ते हैं। ज़्यादातर लोग इसी तरह की चीज़ें पढ़ते हैं।

जो लोग कॉमिक्स और ऐसी बेहूदा किताबें पढ़ते हैं, उन्हें संजीदा अदब में कोई दिलचस्पी नहीं होती।

बहरहाल, अंग्रेज़ी एक पसंद के तौर पर रहनी चाहिए। जो लोग सच में पढ़ना चाहते हैं, पढ़ें। दूसरी हिंदोस्तानी ज़ुबानों की किताबों का तर्जुमा करने के लिए भी अंग्रेज़ी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जैसा आपको पता है, हिंदोस्तान में तर्जुमे का काम बहुत कम होता है।

            महफ़िल: अब बताइए कि आप छोटी कहानी लिखने की शुरूआत कैसे करती हैं? क्या पहले उसका कोई ख़ाका बनाती हैं, या कहानी एक साथ आपके मन में आती है?

            इस्मत: कभी-कभी मुझे कहानी का कोई छोटा-सा टुकड़ा मिलता है, लेकिन उसका अंजाम नहीं सूझता। कभी कहानी का बीच का हिस्सा होता है, मगर शुरूआत नहीं होती।

किसी-न-किसी तरह एक और ख़याल आ जाता है। वह पहले ख़याल से मेल खाता है और मुझे लगता है कहानी आगे बढ़ रही है। फिर मैं उसे भूल जाती हूँ।

कभी कोई दूसरी चीज़ दिखती है, कभी कहानी का अंजाम सूझता है। मैं उसे पहले से लिखे हुए में जोड़ देती हूँ और जल्दी-जल्दी सब कुछ काग़ज़ पर उतारने लगती हूँ।

आप अपनी यादों से चीज़ें निकालते हैं। मुझमें पुरानी बातचीत को याद रखने की एक ख़ास क्षमता है। मुझे बहुत पहले हुई बातचीत हर्फ़-ब-हर्फ़ याद रह जाती है।

मेरी शुरूआती कहानियां इसी तरह की थीं। मैंने आपको बताया था कि मैं बहुत बड़े परिवार से आयी हूँ। घर की औरतें बहुत ख़ूबसूरत ज़ुबान में बात करती थीं।

जब मैं पढ़ाई कर रही होती थी, तो आसपास शोर होने पर मेरा ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता था। कोई अड़चन होती, तो मैं बहुत जल्दी-जल्दी लिख डालती कि कौन क्या कह रहा है। इस तरह दो-तीन पूरे पन्ने भर जाते थे।

फिर मैं वह बातचीत उन लोगों को ज़ोर से पढ़कर सुनाती। वे मेरी लिखी हुई बातों में बहुत दिलचस्पी लेने लगते। जल्द ही पूरा परिवार मेरे आसपास इकट्ठा हो जाता और अंदाज़ा लगाने लगता कि किस जुमले में किसने क्या कहा था।

कोई कहता, “यह बात तुमने कही थी।”

दूसरा जवाब देता, “नहीं, मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”

और फिर इसी तरह बहस चलती रहती। मैं उनकी यह बहस भी लिख लेती। जब दोबारा पढ़कर सुनाती, तो सब फिर कहने लगते कि उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं था।

मैं उन्हीं लोगों के बारे में लिखती हूँ जिन्हें मैं जानती हूँ या जानती रही हूँ। आख़िर लेखक को लिखना किसके बारे में चाहिए? किसी ऐसे शख़्स या चीज़ के बारे में क्यों लिखना, जिसे वह जानता ही नहीं?

हाँ, मैंने बंबई के फ़िल्मी सितारों के बारे में एक कहानी लिखी थी। वे सब मुझसे बहुत नाराज़ हो गये थे। फ़िल्मों में काले धन के बारे में लिखने वाली मैं पहली थी।

जब मैंने ‘शमा’ कहानी लिखी, तो फ़िल्म उद्योग के लोग नाराज़ हो गये। उन दिनों फ़िल्में बनाते समय मैं ख़ुद भी काला धन दिया करती थी। इसलिए मैंने बताया कि ये लोग किस तरह काला धन लेते हैं।

बाद में हमने इस पर एक फ़िल्म भी बनायी। उसका नाम सोने की चिड़िया था। उसमें बताया गया था फ़िल्मों की नायिकाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।

इस फ़िल्म के कारण मेरे शौहर को भी परेशानी उठानी पड़ी। फ़िल्म निर्माता और संगीत निर्देशक, सभी हमसे नाराज़ हो गये थे। वे सब कितने लालची हैं!

इस समय मैं एक उपन्यास लिख रही हूँ, जो… अरे! उसका नाम मत लिखिएगा!

एक बार मैंने एक कहानी में असल शख़्स का नाम इस्तेमाल कर लिया था। मैं उसका नाम बदलना भूल गयी थी। आज तक उसका नाम याद है। आपको मालूम है, मुझे दो साल की उम्र की बातें तक याद हैं! लोगों को यह बहुत हैरान करने वाली बात लगती है।

ख़ैर, किसी ने मुझे एक डॉक्टर के बारे में बताया था—मान लीजिए, उनका नाम फ़लाँ डॉक्टर था—जिसकी अंग्रेज़ बीवी थी। उसने कथित तौर पर अपनी बीवी की एफ.आर.सी.एस. की डिग्री पर से रसायनों की मदद से उसका नाम मिटाकर अपना नाम लिख दिया था।

मैंने इस मौज़ू पर एक कहानी लिखी और उसमें उस डॉक्टर का नाम भी इस्तेमाल कर लिया। मुझ पर दो सौ रुपये का जुर्माना लगा और फिर उसने मुझ पर दो लाख रुपये के हर्जाने का मुक़द्दमा कर दिया।

आख़िरकार अदालत के बाहर समझौता हुआ और रकम दो हज़ार रुपये तय हुई। इसकी मुनादी रेडियो पर भी की गयी थी। यह बात बस दो महीने पहले की है। मैंने अभी तक पैसे नहीं दिये हैं।

रेडियो पर कहा गया कि मैं एक आदमी के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा हार गयी हूँ और चूँकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी इस कहानी को प्रकाशित किया था, इसलिए वह उस अख़बार पर भी मुक़द्दमा कर रहा है।

लेकिन अपनी बात पर लौटती हूँ। मैं फ़िल्मों के बारे में एक और उपन्यास लिख रही हूँ। उसमें मैं दिखाती हूँ फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग कितने चालाक होते हैं।

क्या आप चमचा शब्द से वाकिफ़ हैं? इसका अर्थ किसी की चापलूसी करना या किसी का चहेता बनकर रहना है।

            महफ़िल: यानी चापलूस या ख़ुशामदी लोग।

            इस्मत: लेकिन ‘चमचा’ में जो बात है, वह ‘चापलूस’ में कहाँ!

बहरहाल, मेरा यह उपन्यास एक फ़िल्म निर्माता के बारे में है, जो ख़ुदकुशी कर लेता है। मैं बताती हूँ उसने ख़ुदकुशी क्यों की, लड़कियाँ उसके पीछे क्यों भागती हैं और उसके जैसे बड़े निर्माताओं तथा उनकी बीवियों के लिए किस तरह जहन्नुम पैदा कर देती हैं।

जिस नयी अदाकारा की उसने मदद की होती है, वह बड़ी स्टार बन जाने के बाद उसे छोड़कर चली जाती है। वह उसे छोड़ देती है और बेचारा आदमी बिल्कुल लाचार रह जाता है।

आपको लगता है ऐसा सिर्फ़ हॉलीवुड में होता है?

लेकिन मैं आपसे पूछना चाहती हूँ। अमेरिका में इस यौन-क्रांति को लेकर इतनी चर्चा क्यों होती है…

[और यहां से अब तक जवाब देने वाला, अब तक सवाल करने वाले से सवाल करने लगता है]

(यह नायाब इंटरव्यू ‘महफ़िल’ पत्रिका में दक्षिण एशियाई साहित्य केंद्रित अंक में प्रकाशित हुआ था, जो मूल रूप से अंग्रेज़ी में इंटरनेट पर उपलब्ध है। आब-ओ-हवा के पाठकों के लिए इसके ख़ास अंश साभार हिंदी में। चित्र परिचय: ​वरिष्ठ पत्रकार दिव्या जैन के निजी संग्रह से, जो उन्होंने 1990 के आसपास खींचा था।)

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