adam gondvi, अदम गोंडवी, हिंदी ग़ज़ल, hindi ghazal
पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

वो अदम जिनका दम भरती है हिंदी ग़ज़ल!

            आब-ओ-हवा में जब मेरा लेख ‘कब तक दुष्यंत की पीठ खुजाएगी हिंदी ग़ज़ल’ प्रकाशित हुआ, तो अनुमान के अनुसार कई टिप्पणियों में इसे नकारात्मक बताने की होड़ लगी। तत्संबंध में मुझे कहना है कि इस लेख के आरंभ में भी मैंने लिखा था कि दुष्यंत की ग़ज़लों के शुक्ल पक्ष पर बात बहुत होती (मैंने भी लिखा) रही है, मैं कृष्ण पक्ष पर करना चाहता हूं। (दुष्यंत पर मेरे दोनों लेखों का लिंक इस लेख के आख़िर में) लेकिन यह बात क़सीदे सुनने-लिखने-पढ़ने वालों के गले किसी भी तरह उतर नहीं पाती। फिर हर आठ-दस में से एक टिप्पणी ऐसी भी आयी जिसमें इस लेख के लिए बधाई थी। तब संपादक जी के साथ लंबी चर्चा के बाद तय किया गया कि हिंदी के कथित ग़ज़लकारों की रचनाओं के शिल्प की पड़ताल ऐसे की जाये क्योंकि जो है-सो है, उसे कहने में क्या गुरेज़। दुष्यंत पर लिखा लेख प्रस्तावना बन चुका है और अब मैं इस क्रम में समकालीन ग़ज़लकारों की बात करूंगा। कौन नहीं जानता दुष्यंत के बाद कथित हिंदी ग़ज़ल के द्वितीय पूज्य अदम गोंडवी ही हैं।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि जिस तरह हम प्रेमचंद की उँगली पकड़कर पूरे उत्तर भारत को समझ सकते हैं, ठीक वैसे ही अदम की उँगली पकड़कर सत्ता, सियासत और व्यवस्था के अंधेरे-से गलियारे की बड़ी ही बारीक पड़ताल कर सकते हैं। अदम का स्वर दुष्यंत से कहीं अधिक लाउड है। उनके शेरों में एक देहाती ठसक है। हमारे गाँव में एक कहावत है ‘जिसे मारो बल भर मारो’, अदम ने भी ठीक वैसा ही किया है। उन्होंने कुरीतियों पर प्रहार नहीं किया है बल्कि कुरीतियों को बल भर लतियाया है। कहीं कोई लाग-लपेट नज़र नहीं आता। कहीं कोई चिकनी-चुपड़ी बात करते दिखायी नहीं देते। उनकी हुँकार के सामने बड़े से बड़ा कवि निस्तेज हो जाता है।

इनके यहां कंटेंट बड़े ही मारक और प्रभावी हैं, किंतु इन सब के बाद काव्य का एक पक्ष उसका शिल्प तथा उसकी भाषा है। यहाँ अदम साहब थोड़े कमज़ोर दिखायी देते हैं। मुझे लगता है व्यक्ति जिस विधा में काम कर रहा होता है, उसे उस विधा का समुचित ज्ञान होना चाहिए। आख़िर कविता की भी अपनी माँग है। इस विषय पर लोगों से मेरी बहुत बहस हुई है। मैंने प्रायः तथाकथित हिंदी ग़ज़लकारों को यह कहते सुना है कि भावनाओं को व्यक्त करने में अगर फ़ॉर्म का शिल्प थोड़ा आहत भी होता है तो इससे क्या बिगड़ जाता है। मुझे लगता है इससे बहुत कुछ बिगड़ जाता है। सच कहें तो कविता एक स्त्री है तथा शिल्प और छंद उसके वस्त्र और आभरण हैं। इनके अभाव में कविता बे-पैरहन सी नज़र आने लगती है।

एक सज्जन ने इस विषय पर बहस करते हुए एक बार मुझसे कहा था, कोई स्त्री बहुत सुंदर कपड़े में है मगर अवगुणी है तो वह किस काम की है? ऐसे लोगों से मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि कोई स्त्री बहुत गुणी है मगर निर्वस्त्र है तो वह किस काम की है।

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इस भूमिका को और तूल न देकर पहले अंक में हम अदम साहब की भाषा और शिल्प पर बात करते हैं। वैसे तो अदम साहब की भाषा में हिंदी और उर्दू का बड़ा ही सुंदर समन्वय और कसाव देखने को मिलता है किंतु कहीं-कहीं कुछ खटकती-सी चीज़ भी नज़र आ जाती है। एक शेर का मिसरा देखें–

“छाया मदिर महकती रहती जैसे तुलसी की चौपाई”

यहां जो उपमी दी गयी है उसमें ‘मदिर’ विशेषण है तथा ‘तुलसी की चौपाई’ विशेष्य है। यहाँ मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि तुलसी की चौपाई हिंदी और हिंदी जनमानस में बड़ा ही मुक़द्दस मुकाम रखती है। ऐसे में इसके लिए ‘मदिर’ जैसे तामसिक विशेषण का प्रयोग भाषा का स्खलन ही माना जाएगा।

अदम साहब कभी-कभी अपनी धुन और शेरों के भाव में इतने निमग्न हो जाते हैं कि यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि इस शेर में अन्य पुरुष या मध्यम पुरुष कौन है! यह संदिग्धता पाठक को कनफ्यूज़न में डाल देती है। एक शेर देखें-

इनके कुत्सित संबंधों से पाठक का क्या लेना-देना
लेकिन ये तो ज़िद पे अड़े हैं अपना भोग-विलास लिखेंगे

यह बात अदम साहब क्या रचनाकार के लिए लिख रहे हैं? अर्थात शायर के लिए लिख रहे हैं? शायर तो आप स्वयं हैं और अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह सर्वनाम किसके लिए आये हैं? इस शेर में आये ‘इनके’ और ‘ये तो’ कौन हैं? यह जान पाना थोड़ा कठिन हो गया है। अदम साहब एक गंभीर और ज़िम्मेदार शायर हैं। अतः इन्हें शब्दों के समुचित प्रयोग पर भी ध्यान देना चाहिए। इस तरह की ग़लती की उम्मीद हम अदम साहब से नहीं करते। शेर है-

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है

इस शेर में यह बात तो साफ़ समझ में आ रही है कि बच्चों की भूख, व्यक्ति या पिता के मन में बग़ावत पैदा कर रही है। मुझे ऐतराज़ तो इस बात पर है कि अदम साहब ने कमल को दरिया में क्यों खिलाया? झील या तालाब में क्यों नहीं? क्या सिर्फ़ बहर निभाने के लिए। दरिया में तो कमल खिलता ही नहीं। कमल तो हमेशा ठहरे हुए पानी में खिलता है। हरिऔध जी ने भी एक जगह इसी तरह लिखा था-

दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अविराजती,
कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा

अगर दिवस का अवसान समीप है तो कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा शाख़ों पर कैसे विराजमान हो सकती है। ऐसे में तो कमल कुल वल्लभ होना चाहिए था। कमलिनी कुल वल्लभ अर्थात चाँद तो रात में उदित होता है। एक हिचकिचाहट कमल को बग़ावत का प्रतीक मानने में भी हो रही है। यह बात मुहावरे में बैठ नहीं रही। एक और वाक्य देखते हैं जो भाषा की लय को बिगाड़ रहा है-

“महज़ सड़कों पे गड्ढे हैं न बिजली है न पानी है
हमारे शहर गोंडा की फ़िज़ा कितनी सुहानी है”

मुझे न जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि इस शेर में ‘महज़’ शब्द का प्रयोग ग़लत जगह हुआ है। ‘महज़’ शब्द का प्रयोग अगर ‘गड्ढे’ शब्द के पहले होता तो शेर का रुतबा बढ़ जाता। इस चूक को हम शब्दक्रम दोष के ख़ाने में तो डाल ही सकते हैं। एक और शेर की तरफ़ भी मैं पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा।

शहर के दंगों में जब भी मुफ़लिसों के घर जले
कोठियों की लॉन का मंज़र सलोना हो गया

यहां मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूंगा कि शहर के दंगों में क्या सिर्फ़ मुफलिसों के ही घर जलते हैं। अदम साहब की ग़ज़लों में तो कई ऐतिहासिक पहलू और पक्ष आये हैं। बहुत-से ऐतिहासिक किरदार भी आये हैं। फिर अदम साहब ने सैंतालीस के दंगों वाला इतिहास क्यों क्यों नहीं पढ़ा? कितने ही कोठी और बंगलों वाले लोग बेघर हुए और उनके घर जलाये गये। भारत के अन्य दंगों में भी बड़े-बड़े मकानात जलाये गये। सच तो ये है कि पागल भीड़ जब अपना आपा खोती है तो अमीर-ग़रीब, मकान-झोपड़ी कुछ नहीं देखती। एक और शेर देखते हैं। अदम साहब के इस शेर से भी मुझे काफ़ी शिकायत है-

चीनी नहीं है घर में लो मेहमान आ गये
मँहगाई की भट्ठी पर शराफ़त उबाल दो

यह तंज़ आखिर किसको है? क्या अदम साहब यह कहना चाहते हैं कि मँहगाई में आदमी को शराफ़त छोड़ देनी चाहिए? मँहगाई के दौर में आदमी शराफ़त से काम न ले तो क्या करे? चोरी करे? डकैती करे? इस शेर में एक अजीब-सी नेगेटिव ध्वनि है, जो हमें ग़लत करने के लिए उकसा रही है। इसी तरह का एक और शेर- यहाँ अदम साहब साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि भूख लगे तो चोरी करो और झूठ बोलो। अदम साहब इस कर्मप्रधान देश में मेहनत करने वालों की बात न करके चोरी करने की बात कर रहे हैं। यदि देश का हर व्यक्ति इसी तरह सोचे और यही करे तो देश का क्या होगा। आख़िर इसे कहाँ तक न्यायोचित ठहराया जा सकता है। शेर-

चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें
चूल्हे पे क्या उसूल पकाएँगे शाम को

मैं मानता हूँ अदम साहब का जीवन या फिर यह कहें कि गाँव का जीवन बहुत कष्टकर रहा होगा किंतु इसका यह अर्थ तो नहीं कि लोग चोरी डकैती करने लगें। ख़ैर, व्याकरणिक अशुद्धता वाला एक और शेर-

सामने की झाड़ियों में जो उलझकर रह गयी
वह किसी डूबे हुए इन्सान की इक लाश है

इस शेर में दो ग़लतियाँ साफ़ नज़र आ रही हैं। पहले मिसरे में आये पदबंध ‘उलझकर रह गयी’ से ऐसा लग रहा है कि लाश अगर झाड़ी से न उलझती तो शायद कोई बहुत बड़ा कमाल कर देती। लाश तो हर हाल में अक्षम है उलझे या बह जाये। अब दूसरी ग़लती की तरफ चलते हैं। दूसरे मिसरे में ‘किसी’ शब्द आया है इसके बाद ‘एक’ शब्द भी आया है। मेरा कहना है कि ‘किसी’ शब्द पहले से ही एकवचन है फिर ‘एक’ लिखने की क्या ज़रूरत आ पड़ी।

अलग-अलग प्रान्तों तथा देशों के अलग-अलग झगड़े हैं। यही कारण है कि अदम साहब के ये मिसरे मुझे अखर रहे हैं। शेर-

इन्सान काले गोरे के ख़ेमे में बँट गया
तहज़ीब के बदन पर सियासी लिबास है

इस शेर में आये ‘काले-गोरे’ मुझे ज़्यादा असरदार नहीं लग रहे। कारण ये है कि ‘काला-गोरा’ जैसा कोई झगड़ा हिंदुस्तान में देखने को नहीं मिलता। यह तो अमेरिका या यूरोप का झगड़ा है। यहाँ इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। कहने वाले यह भी कह सकते हैं कि अदम साहब ने अगर अमेरिका या यूरोप की समस्याओं का ज़िक्र किया तो इसमें क्या ग़लत है। मानता हूं इसमें कोई दोष नहीं है पर क्या अदम साहब इतने यूनिवर्सल हैं कि उनका ये शेर देश की सीमा को पार कर सकेगा। अदम साहब एक आंचलिक कवि थे अतः ‘काले-गोरे’ वाली बात कुछ अधिक असर करती दिखायी नहीं देती। प्रभाव के नज़रिये से इस शेर का कोई विशेष औचित्य नहीं बनता। अदम साहब द्वारा किया गया एक तुलनात्मक विवेचन देखते हैं-

फूलों के जिस्म पर पहलू बदल रही तितली
पेट की आग में जलते हुए बशर की तरह

पहले मिसरे में आये फूल के जिस्म पर पहलू बदलने वाली बात विलासितापूर्ण जीवन की ओर इशारा कर रही है, जबकि ‘पेट की आग में जलना’ मुहावरा ग़रीबी और तंगहाली की ओर संकेत कर रहा है। ऐसे में यह तुलना या उपमा कुछ जंच नहीं रही।

अब ज़रा दूसरे गलियारे में प्रवेश करते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं हिंदी वाले अदम साहब पर भी अपना दावा ठोकते हैं। हिंदी वाले अदम साहब को दुष्यंत का उत्तराधिकारी मानते हैं। कैफ़ भोपाली साहब ने ‘समय के मुठभेड़’ पुस्तक के फ़्लैप पर लिखा भी है कि दुष्यंत ने अपनी ग़ज़लों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरूआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ एक-एक चीज़ बग़ैर धुँधलके के पहचानी जा सकती है। ऐसे में क्या यह जांच लेना ज़रूरी नहीं हो जाता कि अदम साहब अपनी भाषा के आधार पर किस ख़ेमे के लगते हैं?

अदम साहब की ग़ज़लों में पचास प्रतिशत से अधिक शब्द अरबी और फ़ारसी के हैं। मैं कुछ ऐसे शब्दों की फ़ेहरिस्त आपके सामने रखूंगा जो न तो हिंदी के शब्दकोश में मिलते हैं न तो हिंदी की बोलचाल में। शब्द इस प्रकार हैं- हरम, फ़ैसलाक़ुन, साहिबे-किरदार, जाँफिशानी, तालिबे-शोहरत, नाशाद, मेआर, मुंतज़िर, मौज़ू, रूदाद, फ़लसफ़ा, उरियाँ, इसरार, ख़ुशगवार, तख़य्युल, दीगर, पसमंज़र, ग़मशिनास, आसूदगी, रूबरू, इज़ारेदार, कुदूरत, उरियानियत, तमद्दुन, तहरीर, बर्गो-गुल, वहशतनाक, जाफ़ाश, तामीर, सरबुलंद, बाहमी, ज़ीस्त, ख़ानाबदोश, नख्खास, तवारीख़ी, सदाकत, वल्दियत, ख़ुदसरी, ज़िना, तबीब आदि शब्दों को हम इनके यहाँ देख सकते हैं।

इस तरह के शब्दों की इतनी बड़ी भीड़ तो दुष्यंत के यहाँ भी नहीं है। इन शब्दों के लिए मैं अदम साहब को तो कुछ नहीं कह सकता क्योंकि इन्होंने स्वयं कोई दावा नहीं किया है, किंतु हिंदी के स्वनामधन्य ग़ज़लकारों से ज़रूर जानना चाहूंगा कि वे इन्हें हिंदी के किस ताकखाने में बंद करना चाहेंगे। जहाँ तक मैं जानता हूँ अरबी-फ़ारसी का इतना बड़ा हुजूम तो जावेद अख़्तर, बेकल उत्साही, निदा फ़ाज़ली और राहत इंदौरी तक के पास नहीं है। क्या वे शाकुंतल, संत्रास, करुण, मदिर, स्वप्निल, मरुथल और वल्कल जैसे शब्दों के बल पर इन्हें हिंदी की चौहद्दी में खींच लेना चाहते हैं। मैं हिंदी या उर्दू की बात इसलिए नहीं कर रहा कि मैं इन्हें हिंदी या उर्दू के ख़ाने में डालना चाहता हूँ। यह बात तो मैं सिर्फ़ इसलिए कह रहा हूँ कि हिंदी या उर्दू का ग़ज़लकार होने की एक बहुत बड़ी बहस है और खींचा-तानी है। मेरे हिसाब से तो इस तरह की बहस ही नहीं होनी चाहिए। ग़ज़लकार को सिर्फ़ ग़ज़लकार होना चाहिए।

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अदम साहब ने दुष्यंत की तरह अपनी ग़ज़लों के लिए किसी तरह का दावा नहीं किया, किन्तु इसके बावजूद भी अदम साहब की कच्ची और उबड़-खाबड़ पगडंडियों की शिनाख़्त ज़रूरी है। ग़ज़ल जैसी नाज़ुक सिन्फ़ के लिए कुछ बेसिक ज़रूरतें हैं, जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। कैफ़ भोपाली के अनुसार भले ही अदम की शायरी, शायरी न होकर सीधी बात अधिक है किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि शायरी के शिल्प की धज्जियाँ ही उड़ा दी जाएँ। बातें मारक होने की वजह से हम उनकी शायरी के इकहरेपन को भले ही स्वीकार कर लें किंतु शिल्प की अराजकता को स्वीकारना न्यायोचित नहीं होगा। अदम के यहाँ भाषा का तेवर तो ज़रूर है, इनका अपना एक डिक्शन भी है, मगर ग़ज़ल की तहदारी का अभाव है। ख़ैर, ग़ज़ल के शिल्प को लेकर आगे बढ़ते हैं। ज़रा ठोकते-बजाते हैं। बहर पर चर्चा करने से पूर्व मैं यह बता देना भी ज़रूरी मानता हूँ कि बहर की सिर्फ़ उतनी ही ग़लतियाँ नहीं हैं, जितनी मैं दिखा रहा हूँ। बल्कि इससे बहुत अधिक हैं। यहाँ सबको बता पाना संभव नहीं है। चलिए कुछ शेर देखते हैं-

हीरामन बेज़ार है उफ़ किस क़दर महंगाई है
आपकी दिल्ली में उत्तर आधुनिकता आई है

इस शेर का रुक़्न है-
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
SISS SISS SISS SIS

इस लिहाज़ से देखें तो इस शेर का पहला ही शब्द ‘हीरामन’ एड़ी उठाकर दूर से ही आँखें मटका रहा है। एक और शेर-

इक नयी जंग छिड़ी है इधर विचारों में
रोज़ इस मोर्चे पर शह व मात होती है

इस शेर के मतले का रुक़्न है-
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
ISIS IISS ISIS ISS

जबकि ऊपर लिखा शेर इस रुक़्न पर सही नहीं बैठ रहा। एक और शेर देखते हैं-

उससे मिलने को कई मोड़ से गुज़रना है
अभी तो आग के दरिया में भी उतरना है

ऐसा लग रहा है जैसे शेर ने मयनोशी कर रखी हो। इधर-उधर डगमगाता-सा दिखायी दे रहा है। ‘उससे’ और ‘अभी’ की वजह से यह शेर पहले ही ख़ारिज हो गया है। इस ग़ज़ल के अशआर में कई बहरें दिखती हैं। कुछ और शेर देखते हैं-

सुरा व सुंदरी के शौक़ में डूबे हुए रहबर
दिल्ली को रंगीले शाह का हम्माम कर देंगे

सदन को घूस देकर बच गयी कुर्सी तो देखेंगे
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे

इन शेरों में भी बहर की ख़ामी साफ़ नज़र आ रही है। इस ग़ज़ल की मूल बहर है-
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
ISSS ISSS ISSS ISSS

उपर्युक्त दोनों ही शेर इस कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे। कुछ और शेर देखते हैं-

घर के ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है

भटकती है हमारे गाँव में गूंगी भिखारी-सी
सुबहे-फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है

इस ग़ज़ल की मूल बहर है-

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
ISSS ISSS ISSS ISSS

पहले शेर के पहले मिसरे में ‘घर’ की वजह से तथा दूसरे शेर के दूसरे मिसरे में ‘सुब्हे-फरवरी’ की वजह से शेर ख़रिज हो गया है। इसी बहर पर और एक ग़ज़ल के कुछ और शेर-

अपना घर नहीं है राम का घर हम बनाते हैं
इसे जादूगरी कहिए या कहिए लनतरानी है

किलो के भाव नैतिकता को हम नीलाम करते हैं
दावा यह कि अपनी अस्मिता हमको बचानी है

पूरी ग़ज़ल में कई जगह बहर का अनुपालन नहीं हुआ है। अदम साहब का एक और लोकप्रिय शेर है-

काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में
आया है रामराज विधायक निवास में

इस शेर का रुक़्न है-
मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन
SSI SISI ISSI SIS

इस लिहाज़ से देखने पर पहले मिसरे में प्लेट तक पहुँचते-पहुँचते मिसरा लड़खड़ा गया है। इसे मीटर में बांधने के लिए ‘पलेट’ या ‘पिलेट’ लिखना, बोलना पड़ता है। बहर की इतनी ग़लतियाँ दुष्यंत जी के यहाँ भी नहीं है। अब ज़रा अन्य ग़लतियों की तरफ़ चलते हैं।

काफ़िये की ग़लतियाँ भी अदम साहब के यहाँ कम नहीं हैं। सबको दिखा पाना तो संभव नहीं है, कुछ एक दिखा देना ज़रूरी समझता हूँ। अतः उनकी ओर आपकी दृष्टि ले चलता हूँ।

जिसके सम्मोहन में पागल धरती है आकाश भी है
एक पहेली-सी ये दुनिया गल्प भी है इतिहास भी है

इस शेर का आपसी रब्त चाहे जो भी हो, पाठक समझ सकते हैं तो समझ लें। मुझे तो सिर्फ़ इतना कहना है कि ‘आकाश’ और ‘इतिहास’ आपस में हमकाफ़िया नहीं होते। चलिए दूसरा दरवाज़ा खटखटाते हैं। एक और शेर देखें-

यह अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी
फिर कहाँ से बीच में मस्जिद व मंदिर आ गये

जिनके चेहरे पर लिखी है जेल की ऊँची फ़सील
रामनामी ओढ़कर संसद के अंदर आ गये

अदम साहब कबीर की तरह खोखली धार्मिकता पर भी तगड़ा प्रहार करते दिखायी देते हैं। वेदों से भी इनकी नाराज़गी कम नहीं है। ये अलग बात है कि इनकी नाराज़गी एकपक्षीय है। अरे! मैं भी किस पचड़े में पड़ रहा हूँ। मुझे तो बस यह बताना था कि ‘मंदिर’ और ‘अंदर’ भी हमकाफ़िया नहीं हैं। इसी ग़ज़ल का अंतिम काफ़िया ‘कैलेंडर’ भी है यह काफ़िया दूर से ही मुँह चिढ़ा रहा है। एक और शेर देखें-

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए
आप भी इस भीड़ में घुसकर तमाशा देखिए

इस शेर के ‘ख़ुलासा’ और ‘तमाशा’ में भी छत्तीस का ही आँकड़ा है। एक और शेर देखें-

चाँद है ज़ेरे-क़दम सूरज खिलौना हो गया
हाँ मगर इस दौर का किरदार बौना हो गया

अब किसी लैला को भी इक़रारे-महबूबी नहीं
इस अहद में प्यार का सिंबल तिकोना हो गया

यहाँ पहले शेर में किरदार का बौना होना तो समझ में आता है किंतु प्यार के सिंबल के तिकोना होने का संकेत भ्रम पैदा कर रहा है। ख़ैर, कहना तो यह है कि ‘खिलौना’ ‘बौना’ तो ठीक है किंतु तिकोना इनकी जमात में मिलने से साफ़ मना कर रहा है। एक और ग़ज़ल का काफ़िया देखते हैं। इस ग़ज़ल में मतले के काफ़िये ‘गुलमोहर’ और ‘कहर’ हैं, मतले के ही काफ़िये मूड बिगाड़ देते हैं, शेष काफ़ियों पर बात करना बेकार है। काफ़िया संबंधी एक भूल और देख लेते हैं। शेर देखें-

निस्फ़ आबादी अगर भूख के शोलों में जले
ग़ज़ल फिर कैसे सुख़नवर के तसव्वुर में पले

इस ग़ज़ल की बेबहरी को छोड़ इतना ज़रूर कहूँगा कि ‘जले’ ‘पले’ ‘ढले’ ‘गले’ की सफ़ में काफ़िये, ‘खिले’ और ‘सिले’ बिल्कुल रिफ़्यूजी लग रहे हैं। काफ़िये को लेकर अब इससे अधिक क्या लिखूँ, अदम जी के यहाँ काफ़िये के अनगिनत दोष हैं। अब ज़रा रदीफ़ का हाल भी जान लेते हैं। एक-दो ग़लतियाँ देख लेते हैं।

जिसकी क़ीमत कुछ न हो इस भीड़ के माहौल में
ऐसा सिक्का ढालिए मत जिस्म की टकसाल में

दोनों मिसरों के अंत में ‘में’ होने की वजह से शेर में तक़ाबुले-रदीफ़ दोष आ गया है। एक और शेर देखें-

जिससे बुद्ध के किरदार की महकार आती है
उस जनपद की पीड़ा एक शायर की ज़ुबानी है

इस शेर के दोनों मिसरों के अंत में भी ‘है’ आ रहा है, अतः यहाँ भी तक़ाबुले-रदीफ़ दोष है।

यक़ीनन कुछ और पहलू हैं, जिन पर मैं लिखना चाह रहा था, मगर इस मुख़्तसर-से लेख में सब कुछ लिख पाना संभव नहीं है। इस लेख को मैं यहीं समाप्त करता हूँ, अगले अंक में किसी और ग़ज़लकार को ठोक-बजाकर देखते हैं।

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ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

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