
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग शम्पा शाह की कलम से....
अक्षर ब्रह्म-नाद ब्रह्म और संत वाणियां
स्कूल के दिनों में जब संत कवियों को पढा था, तो उनके कहन के तरीक़े की सीधी चोट ने बेहद प्रभावित किया था। किन्तु, पढ़ाये जाने की पद्धति ऐसी थी कि वे सब एक जैसे लगते थे। कुमार गंधर्व के गाये सूर, कबीर, मीरा और तुलसी को सुना, तब इन संत कवियों की कविता, इनकी भावभूमि का फ़र्क क्या है, यह समझ में आया।
सूर के उनके गाये पदों में ग़ज़ब की मिठास है, इसकी वजह भी वे बताते हैं- ‘सूर पक्के गायक थे, उन्होंने अपने पद लिखे ही राग के सुंदर छंद में हैं।’ दूसरी ओर मीरा की सुध-बुध खोकर की जाने वाली भक्ति है- सगुण अपने चरम पर पहुँचता है, जब कुमार जी गाते हैं- ‘पिया जी म्हारे नैणा आगे रहियो जी जी जी..’
भाषा से सिर्फ़ साहित्यकार का ही गहरा नाता नहीं होता। उसे बहुत कुछ समृद्ध करता है, मसलन- धान रोपते हुए छत्तीसगढ़ की स्त्रियों द्वारा गाया जाता गीत या ईश्वर को श्राप देता हुआ उस औरत का वाक्य, जिसका सैनिक बेटा असमय मारा गया…
आधुनिक कविता ने शब्द की नाद शक्ति को महत्व नहीं दिया और इस तरह कविता से उसका ध्वन्यालोक ही जैसे छीन लिया। शब्द के उच्चार मात्र में, उसके स्वर-व्यंजन के विशिष्ट आपसी संयोजन में जो नाद है, वह बहुत हद तक उस शब्द के भाव को भी सम्प्रेषित करने की क्षमता रखता है, यह बात कुमार गंधर्व को सुनते हुए पता चलती है।
हमारे समय में किसी कवि से अधिक कुमार गंधर्व ने शब्द को उसका नाद लौटाया है। यह अकारण नहीं है कि ‘अक्षर ब्रह्म’ पर उनकी आस्था अटूट थी। यहाँ तक कि वे तमाम अन्य संगीतकारों के विपरीत स्वर को, शब्द से इतर देखते ही नहीं थे। वे कहते हैं- “मैं अक्षर को कम नहीं समझता। भाषा के स्वर-व्यंजन का यदि संगीतकार उपयोग नहीं करता तो उसका संगीत बहुत ऊँचा नहीं जा सकता। मैं अक्षर को ब्रह्म मानता हूँ, ब्रह्म स्वरूप।”
उन्होंने किसी शोधार्थी की लगन से संत कवियों के, विशेषकर कबीर के पद संकलित किये। उनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्टता, उसके ख़ास मिज़ाज, उसके स्वर को समझा और तब उसके अनुरूप संगीत में उसे निबद्ध किया। तुलसीदास को गाते हुए वे कहते हैं- “तुलसी को क्रमबद्ध रखने का विचार नहीं था क्योंकि सब लोगों को क़िस्सा मालूम है। मुझे मानस नहीं, तुलसी (को) व्यक्त करना था। तुलसी जटिल आदमी है, उसको कंपोज़ करना आसान नहीं। संगीत भाव कम है वहाँ।”
यह बात पढ़कर ख़याल आता है कि ‘तुलसीदास एक दर्शन’ की शुरूआत जब कुमार जी करते हैं तो कितनी कठिनाई से, एक आलापी पूर्व पीठिका बनाने के बाद तुलसी के पद- “अगणित रवि-शशि शिव चतुरानन” का वे न्यास करते हैं। रवींद्र भवन में वह शाम भी अविस्मरणीय थी, जब पहली बार कुमार जी से तुलसीदास को सुना। कार्यक्रम समाप्ति के बाद उन्होंने मंच से ही आवाज़ लगायी- “शिखर सम्मान बंधु (उन्हें और पिता, रमेशचंद्र शाह को एक ही वर्ष शिख़र सम्मान मिला था!) आनंद आया? तुलसी को आपके कहने से ही फ़िर से उठाया आज।”
उनके गाये कबीर की बात तो सब करते हैं, पर तुलसी को भी उनके जैसा किसी ने नहीं गया। “मैं केहि कहूँ बिपति अति भारी” में बिपति का भार ऐसे उठाया गया है, जैसे वह एक प्राचीन भुरभुराकर बिखर रही पांडुलिपि हो, जिसे कितने जतन से, किस उपाय से उठाया जाये?
कबीर और कुमार गंधर्व के जोड़ का तो कहना ही क्या? जिस सबसे ऊँचे जोड़ की हमारे यहाँ कल्पना है, वह ‘नर-नारायण’ का है। कुमार जी और कबीर की पारस्परिकता नर-नारायण की है। इसमें दोनों ही एक दूसरे के लिए नर भी हैं और नारायण भी हैं। कुमार जी को सुनते हुए कबीर जी उठते हैं। पहले से कहीं अधिक सघन होकर। वर्षों पहले ओंकारेश्वर में एक रात का स्मरण होता है। आधी रात किसी के गाने का स्वर उस जैन धर्मशाला तक चला आया, जहाँ हम लोग रुके हुए थे। पापा ने कहा, यह साधारण भजन नहीं है, यह आवाज़ ही कुछ और है।

हममें से कुछ लोग आवाज़ का पीछा करते नर्मदा किनारे पहुँचे। उजियारी रात में एक अकेली आकृति, नर्मदा की ओर मुँह किये, अपने तम्बूरे पर गा रही थी। हम सब उससे काफ़ी दूरी पर ही बैठ गये। वह गाता रहा शून्य शिखर का गान। उसके गान से फूटी नर्मदा सामने बहती रही। पौ फटने को हुई, तब उसकी आवाज़ थमी। वह कनफटा जोगी था। हिमाचल से था। नर्मदा यात्रा पर था। निविड़ अकेला। तम्बूरे और एक छोटे-से झोले के अलावा कुछ भी नहीं। उसने कुमार गंधर्व का गायन सुना हुआ था। माँ ने जब उनसे पूछा तो उनके चेहरे पर अपूर्व मुस्कान छा गयी – “वो तो बहुत पहुँचा हुआ गान है- संत का!” वे बोले थे।
एक और रात की स्मृति इस प्रसंग के साथ लिपटी चली आयी है। 1994, जैसलमेर। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के साथ जुड़ने के बाद, गाँव-देहात का मेरा पहला दौरा। इस यात्रा की अंतिम रात। मित्र जेठू सिंह भाटी (अनुपम मिश्र के साथ इन्होंने वहाँ के पानी के स्रोतों पर काम किया था) रात ग्यारह बजे ख़बर लेकर आये कि जोगियों का डेरा आज ही जैसलमेर पहुँचा है। इस डेरे के अमरनाथ जोगी के बीन वादन की चर्चा जेठू पहले मुझसे भोपाल में कर चुके थे। ख़्याल आता है कि वे उनके बनाये कच्ची मिट्टी के खिलौने भी लाये थे।
जोगियों का डेरा शहर से दूर वीराने में था। अमावस्या की रात। हाथ को हाथ न सूझने वाले अंधकार में मित्र जया और जेठू के साथ रेत में धँसते, चढ़ते-उतरते आख़िर हम तम्बुओं के बीच पहुँचे। डेरे में लोग प्रायः सो चुके थे। इधर-उधर जलते अलाव की आग मद्धिम पड़ चुकी थी। डेरे के अंतिम छोर पर जल रहे अलाव के पास वे बैठे थे। जेठू ने मिलवाया, और भी कुछ कहा। शायद यह कि हमें कल सुबह ही दूर निकल जाना है। एक स्त्री उनकी बीन ले आयी। इसके बाद कोई दो घंटे तक वे बजाते रहे। उनकी बीन से उठते सुरों से रेगिस्तानी विस्तार में अनंत काल से तिर रही विरह गाथाएं घनीभूत हो उठीं।
स्वर कभी इतने कोमल हो आते कि भ्रम होता कि वे बीन से नहीं, अँधेरे में खिले किसी अदृश्य फूल के भीतर से आ रहे हैं। और कभी भाले की नोक-सा तीक्ष्ण हो उठता वही स्वर। अमावस्या के अंधकार ने दृश्य को निराकार बना दिया था, लेकिन बावजूद इसके अमरनाथ जी और हम सबकी आँखें बंद थीं।
जब अमरनाथ जी की बीन का गान थमा तब तक डेरे की सारी स्त्रियाँ, बच्चे आ कर घेरे में बैठ चुके थे। बीन के स्वर उन्हें नींद से खींच लाये थे। सब मौन थे। बीन के स्वर के थम जाने के बाद भी कोई कुछ न बोला। सबके भीतर-बाहर केवल बीन के स्वरों विस्तार था।
उस रात मुझे कुमार जी बेहद याद आते रहे। एक तो नाथ जोगियों की धुनों का एक निस्संग, निर्गुणी एकांत भाव। दूसरा उनके स्वर लगाने में स्वर के वज़न का वैविध्य।
कुमार जी के गायन में वज़न के तराज़ू पर स्वर के भारहीन हो धीरे-धीरे अखिल व्योम में वाष्प बन उड़ जाने, तो कभी भारी हो आये बादल-सा बरस पड़ने का खेल चलता रहता है। उनके स्वर लगाने, में कभी बहते पानी-सी तरलता है, तो कभी हीरे-सी कठोर मर्मभेदी सघनता, कभी स्निग्ध आँच, तो कभी धधकता दावानल, कभी अबोध बच्चे की प्रच्छन्न किलकारी, तो कभी धरती-आकाश को एक करता विप्लवी काल गर्जन सुनायी देता है। इतने विविध स्वराघात और उनसे इतने ध्वन्यात्मक मूल्यों की सृष्टि उन्होंने कहाँ-कहाँ से खोज कर की होगी? कुमार जी कहते हैं- “एक जगह कोई सुंदर चीज़ दिखती ही नहीं। उसके बिखरे हुए हिस्से सब जगह गिरे हैं- कहीं हाथ है, तो कहीं उँगली! पूरा सुंदर आदमी एक जगह नहीं मिलता!”
क्या पृथ्वी पर गिरे सती की देह के असंख्य टुकड़ों को जोड़कर ही रची जा सकेगी संपूर्ण सुंदरता?

शम्पा शाह
कला की दुनिया में रमी हुई यह कलाकार सिरैमिक की लोक कला और आधुनिक अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाती रही है और मृदा कला के संरक्षण/संवर्धन में योगदान देती रही है। भारत के अनेक शहरों सहित अनेक देशों में कला प्रदर्शनियां आपके नाम हैं। आपकी शिल्प कला में मानवीय, प्राकृतिक एवं मिथकीय रूपों का एक अंतर्गुम्फन एक थीम की तरह प्रतिध्वनित होता है। भोपाल स्थित मानव संग्रहालय में 20 और कला के क्षेत्र में 30 से अधिक सालों तक सेवाओं के साथ ही साहित्य, संगीत व सिनेमा जैसे कलाक्षेत्रों में भी ख़ासा दख़ल।
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बहुत ही सुंदर लेख है पुरानी स्मृतियाँ ताजी हो गयी धन्यवाद