
- November 28, 2025
- आब-ओ-हवा
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सिनेमैट्रिक्स भवेश दिलशाद की कलम से....
छावा या फुले.. देश को कैसा नायक चाहिए?
पानी बहता हुआ है अक्स बचा लो अपने
जिस सफ़र में भी हो किर्दार संभालो अपने
तक़रीबन डेढ़ दशक पहले की बात है, हिमस्खलन की तबाही को कम करने के लिए तकनीक विकसित करने वाली टीम में काम कर रहे वरिष्ठ वैज्ञानिक से भेंट हुई थी। कलाम साहब के साथ भी काम कर चुके कृष्णचंद्र शर्मा जी ने पुणे स्थित अपने घर में बहुत-सी बातें मार्के की कहीं, उनमें से एक जो याद में रहती है वह यह कि “हमारा कोई राष्ट्रीय चरित्र नहीं है। हमें अगर सच में प्रगति करना है तो हमें अपना चरित्र निर्माण और निर्धारण तो करना ही पड़ेगा”।
अपने गिरेबान में झांकने और अपने किर्दार को आंकने के लिए हर वक़्त ही सही वक़्त होता है। फिर भी, यह वक़्त तो कुछ ज़्यादा ही सही मालूम होता है। इस किर्दार को हम जाने कितने सिरों से आंक सकते हैं, लेकिन मैं यहां समकालीन सिनेमा के हवाले से कुछ बात करना चाहता हूं।
ऐसा लगता है पिछले कुछ वक़्त में सिनेमा के कबाड़ख़ाने में ‘बायोपिक’ का कचरा बहुत जमा हो गया है। दर्जनों बायोपिक बनी हैं, जिनमें से इनी-गिनी ही काम की निकलें तो ग़नीमत। आपको याद होगा सचिन तेंदुलकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक के जीवन और किर्दार पर फ़िल्में बनीं, लेकिन इनका हश्र क्या हुआ! इन दोनों फ़िल्मों में एक समानता यह रही कि दोनों किर्दारों को ‘भगवान’ से कम निरूपित करने का तो इरादा ही न दिखा। ख़ैर, इनके अलावा जाने कितने किर्दारों और ऐतिहासिक घटनाओं/युद्धों आदि को सिनेमा के परदे पर ढाला गया लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात…

इस साल चर्चाओं में रहीं दो बायोपिक को लेकर बात करने का मन है। मराठा शासक शिवाजी के बेटे संभाजी उर्फ़ छावा के जीवन के बजाय उसकी योद्धा छवि पर आधारित फ़िल्म ‘छावा’, और दूसरी, 19वीं सदी में देश के क्रांतिकारी समाज सुधारक ज्योतिराव फुले (11.04.1827—28.11.1890) के जीवन और संघर्ष पर आधारित फ़िल्म ‘फुले’। ‘छावा’ फरवरी में रिलीज़ हुई थी और ‘फुले’ अप्रैल में। इस लेख का पहला ड्राफ़्ट भी मैंने अप्रैल आख़िर तक लिखा था, लेकिन फुले की याद के दिन इसे जारी करने के लिए रोक रखा था।
इन दोनों किर्दारों में कोई समानता खोजना पता नहीं किसका काम हो, पर दोनों फ़िल्मों में समानता के नाम पर यह देखा जा सकता है कि दोनों किर्दार आज के महाराष्ट्र प्रांत से ताल्लुक रखते हैं, विशेषकर महाराष्ट्र में इन दोनों को इतिहासपुरुष के रूप में मान मिलता है। और यह भी कि दोनों ही ऐतिहासिक पात्रों पर अनेक प्रकार का साहित्य और कला सृजन होता रहा है। दोनों ही पात्र जीते जी ही किंवदंती का हिस्सा बन गये थे। हालांकि यह ज़रूर था कि संभाजी चूंकि रजवाड़े से ताल्लुक़ रखते थे तो राजकवियों ने उन पर लेखन अधिक किया और उधर, फुले जनमानस में, लोकगीतों में स्वत:स्फूर्त प्रेरणा से उभरकर आये।
अब इन दोनों फ़िल्मों (इतिहास नहीं) में किर्दारों की जो छवि प्रस्तुत की गयी, उस लिहाज़ से विरोधाभास देखने योग्य हैं। और, इसी रोशनी में वर्तमान संदर्भों को समझते हुए यह भी विचारना होगा कि हमें किस किर्दार की आज ज़्यादा ज़रूरत है।
- — एक चरित्र उस योद्धा का है जो तलवार और हथियारों के बूते अपने राज्य के लिए, अपने शासन की स्वायत्ता के लिए भीषण युद्ध करता है। और एक चरित्र उस योद्धा का है जो लोगों के मानसिक और सामाजिक उत्थान के लिए तमाम विपरीत परिस्थितियों के ख़िलाफ़ संघर्ष करता है।
- — एक चरित्र उस पुरुष का है, जिसके बारे में इतिहास बताता है कि कई स्त्रियों के साथ उसके संबंध थे। सावरकर की किताब में ऐसे उल्लेख हैं। और एक चरित्र उस पुरुष का है जो न केवल अपनी पत्नी बल्कि वंचित समाज की अनेक स्त्रियों का उत्थान शिक्षा, पुनर्विवाह आदि के माध्यम से करता है। शिक्षा की अलख जगाकर वह स्त्रियों के सम्मान का हिमायती तो बनता ही है, उन स्त्रियों को अधिकार की लड़ाई लड़ना सिखाता है।
- — एक चरित्र उस राजपुत्र का है, जिसे सनकी, शराबी और झगड़ालू प्रवृत्ति का होना बताया गया। मामूली बात पर किसी को मौत के घाट उतारना जिसके लिए मामूली बात थी। और एक चरित्र वर्ण व्यवस्था के अनुसार उस दलितपुत्र का है, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ा तो उसे मार डालने की धमकियां सवर्ण समाज द्वारा मिलीं। जानलेवा हमले भी हुए लेकिन अहिंसात्मक संघर्ष का मार्ग उसने नहीं छोड़ा।
- — एक चरित्र उस शूरवीर का है, जिसकी अपनी ज़िद और वीरता का मद हज़ारों स्त्रियों की मांग का सिंदूर उजाड़ देता है। और एक चरित्र उस शूरवीर का है, जो समाज की संस्थागत मज़बूत कुरीतियों के विरुद्ध खड़ा होता है और विधवाओं को नये सिरे से जीवन शुरू करने के लिए रास्ते बनाता है।
- — एक चरित्र उस पराक्रमी का है, जो एक युद्ध में अंतत: दुश्मन द्वारा बंदी बनाया जाता है और हाड़ कंपा देने वाली यातनाएं झेलता है। सहनशक्ति का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। और एक चरित्र उस पराक्रमी का है, जो समाज के तमाम अभिशाप, अपमान, आक्रमण और क़दम-क़दम पर विरोध, षडयंत्र, रुकावट का सामना करता है, सब कुछ जीवन भर सहन करता है।
- — एक चरित्र उस मराठा का है, जो ज़ालिम व्यवस्था के विरुद्ध जंग छेड़ता है तो फ़िल्मी कहानी इस तरह कही जाती है कि धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक नफ़रत और बढ़े। एक चरित्र उस मराठी मानुस का है, जिसकी कहानी सांप्रदायिक सद्भाव के बीज बोती है। जो जातियों के द्वेष की खाई को पाटने के लिए जीवन होम कर देता है।
- — ऐसे और भी अनेक बिंदु हैं लेकिन अंतत: एक प्रश्न यह कि अपने गुणों और चारित्रिक सीमाओं के रहते कोई जीवन समाज में क्या बदलाव ला पाता है?
एक चरित्र छावा का है, जिसे आप शौर्यगाथा के रूप में प्रचारित कर भी दें, तब भी विचारणीय यह है कि समाज में बदलाव क्या आता है? किस कुरीति की दीवार गिर जाती है? किस नैतिकता की स्थापना हो पाती है? हम राष्ट्रीय चरित्र की प्रगति में कौन से मूल्यों की शिनाख़्त कर पाते हैं? किस प्रकार के संघर्ष, किस जिजीविषा का मंत्र फूंक पाते हैं? युद्ध तब भी हो रहे थे, आज भी हो रहे हैं। सांप्रदायिक द्वेष तब भी था, अब भी है। एक-दूसरे के गले काट देने वाली पशुता तब भी थी, अब भी है। इस चरित्र से क्या कोई सामाजिक सुधार हो पाता है? इधर, एक चरित्र फुले का है, इन्हीं प्रश्नों की रोशनी में उसकी ज़रूरत पर भी विचारना चाहिए।
ग़ुलाम भारत का पहला महात्मा
मोहनदास गांधी से बहुत पहले ‘महात्मा’ कहलाने वाले व्यक्तित्व, देश को पहली महिला शिक्षक देने वाली सोच, अनेक कुप्रथाओं को ख़त्म करने वाला जज़्बा, सहिष्णुता-अहिंसा-अथक संघर्ष की एक अलख, सदियों की ग़ुलामी से लोहा लेने वाली एक जिजीविषा और अपने अधिकारों व सत्य के लिए उठने वाली निडर आवाज़… एक टॉक शो में वयोवृद्ध इतिहासकार राम पुनियानी से पूछा गया कि छावा के बरअक्स हम कौन-से चरित्रों को खड़ा कर सकते हैं? इतिहास में ऐसे कौन-से चरित्र हैं जिनकी बायोपिक बनायी जा सकती है? जवाब में पुनियानी ने भक्तिकाल के संतों, संत कवियों के नामों का ज़िक्र किया लेकिन, इस वार्ता के समय फुले पर फ़िल्म निर्माण हो रहा था, तब भी पुनियानी ने फुले का नाम जवाब में नहीं लिया। बेशक लिया जाना चाहिए था। यह आज के समाज के लिए बहुत प्रासंगिक नाम है। लेकिन राजनीति ऐसे प्रासंगिक चरित्रों के पक्ष में नहीं है।
फ़िल्म पर विवाद से हासिल?

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले पर बनने वाली फ़िल्म थिएटरों में देर से आ पाती है क्योंकि उसे ग़ैर ज़रूरी विवादों और सेंसरशिप में उलझा दिया जाता है। नतीजा यह कि अपनी लागत की रक़म भी नहीं निकाल पाती। अपेक्षित दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती। उधर, छावा जैसी फ़िल्म लागत से कई गुना कमाई करती है, जिससे समाज को नफ़रत, ग़ुस्से और हिंसा के अलावा क्या मिलता है, समझना कठिन है। जिस देश के लिए ‘महात्माओं’ ने क़ुर्बानियां दीं, वह ‘अश्लील मनोरंजन’ पर क़ुर्बान हुआ जा रहा है। ‘विश्वगुरु’ धरती की पहचान क्या ‘(अ)जाग्रत’ व ‘(अ)शिक्षित’ समाज और ‘राष्ट्रीय (दु:)चरित्र’ की भेंट नहीं चढ़ रही!
(कार्टून साभार मंजुल के सोशल मीडिया हैंडल से)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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