
सलाम मार्क टली… यादें, क़िस्से और किताबें
भारत में अंग्रेज़ी पत्रकारिता का पर्याय कहे गये तो कभी बीबीसी की भारत की आवाज़ तो कभी पत्रकारिता में विश्वसनीयता की कसौटी… मार्क टली (टुली ) (24.10.1935-25.01.2025) नहीं रहे। यह समाचार साहित्य और पत्रकारिता जगत में एक स्मृतिलोक को उजागर करने वाला रहा। यक़ीनन टली लगातार और देर तक याद किये जाते रहेंगे। सोशल मीडिया पर उनकी यादों को अनेक पत्रकारों व लेखकों ने दर्ज किया। यहां कुछ अंश…
80 के दशक में ही हो गये थे लीजेण्ड
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने लिखा… जिन दिनों हम जैसे लोग पत्रकारिता में आये, मार्क टली देश के एक बेहद प्रतिष्ठित और सक्रिय पत्रकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। देश के शीर्ष पदों पर बैठे सत्तारूढ़ नेता हों या विपक्ष के बड़े नेता हों, मार्क टली के लिए इनके पास पहुंचना और ख़बरें हासिल करना बहुत आसान था। उन्होंने अपने जीवन में ख़ूब घूमा, ख़ूब लिखा और ख़ूब बोला! कहने को तो वह अंग्रेज़ थे क्योंकि अंग्रेज़ मां-पिता की संतान थे पर सच पूछिए तो वह पक्के भारतीय थे। कलकत्ता में जन्मे अंग्रेज़ हिंदोस्तानी!
मार्क ने रिपोर्टिंग और विश्लेषण के अलावा कई किताबें लिखीं। मैने सबसे पहले उनकी ‘अमृतसर: मिसेज गांधी लास्ट बैटिल’ पढ़ी थी, जो उन्होंने अपने दोस्त-सहयोगी सतीश जैकब के साथ लिखी। द हार्ट ऑफ इंडिया, इंडिया स्लो मोशन, नो फुल स्टाॅप इन इंडिया और नाॅन स्टाॅप इंडिया सहित कई किताबें हैं उनकी!
सच पूछिए तो भारत सहित समूचे दक्षिण एशिया में मार्क अपनी रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक ख़बरों के लिए अस्सी के दशक में ही ‘लीजेण्ड’ बन चुके थे। भारत के हर प्रमुख नेता और अनेक गणमान्य लोगों से उनके अच्छे प्रोफ़ेशनल सम्बन्ध रहे। एक बार मैं चुनाव रिपोर्टिंग के लिए आंध्र प्रदेश में था और अविभाजित आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू से मिलने का समय लेकर उनके घर पहुंचा, पता चला, अभी नायडू साहब मार्क टली से गुफ़्तगू कर रहे हैं। अगर भूल नहीं रहा तो मार्क उन दिनों बीबीसी से रिटायर हो चुके थे और संभवत: वह कोलकाता से छपने वाले ‘द टेलीग्राफ़’ के लिए चुनाव पर लगातार लिख रहे थे। उनके बाहर निकलने के बाद मैं अंदर बुलाया गया। वह विदेशी मूल के ऐसे भारतीय पत्रकार थे जिसे लोगों की सिर्फ़ प्रतिष्ठा और प्रशंसा मिलती थी। आमतौर पर कोई निजी कारक या किसी तरह की ‘नकारात्मकता’ उनका पीछा नहीं करती थी।
आंदोलनों में शिरकत
वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान लिखते हैं… नब्बे की पकी उम्र में भी मार्क टली का विदा होना सालता है। वे थे ही ऐसे कमाल के पत्रकार। नर्मदा बांधों के विरोध में 28 सितंबर, 1989 को हरसूद में एक जमावड़ा- ‘संकल्प मेला’ हुआ था जिसकी रिपोर्टिंग करने मार्क अपनी टीम के साथ क़रीब हफ़्ता भर पहले आये थे। आंदोलन की तरफ़ से, अस्सी के दशक की देश की दस में से इस एक घटना में, संजय संगवी और क्लॉड अल्वारिस के साथ मुझे मीडिया को संभालने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी। यह दौर था जब मार्क के साथ ख़ूब समय बिताने और गपियाने का मौक़ा मिला था।
आमतौर पर ‘संकल्प’ जैसी औपचारिकताएं कार्यक्रम के अंत में होती हैं, लेकिन हरसूद में मार्क के आग्रह पर इसे दोपहर में किया गया ताकि वे अपनी रिपोर्ट में उसे शामिल कर सकें। मार्क शाम चार बजे भोपाल के लिए निकले, आधी रात को दिल्ली की गाड़ी पकड़ी, अलसुबह अपने स्टूडियों में रिपोर्ट संपादित की और डिप्लोमेटिक बैग में लंदन रवाना किया। हमारे लिए यह कमाल ही था कि 28 के कार्यक्रम की रिपोर्ट 29 को सुनने मिली।
हरसूद छोड़ने के पहले मार्क ने मुझसे लोगों की संख्या के बारे में पूछा था। अपने मीडिया के तम्बू में भोर से कसा-कसाया बैठा मैं उन्हें ठीक संख्या नहीं बता सका। बाद में उन्होंने अपने अंदाज़ से मेरी बतायी संख्या का दोगने से अधिक बताया। बाद में भी आंदोलन के धरनों के दौरान दिल्ली में मार्क से कई बार मुलाक़ातें होती रहीं। आज वे सब मुलाक़ातें, बातें याद आ रही हैं। एक बेहतरीन पत्रकार और उससे भी बेहतर इंसान को श्रद्धांजलि।
“यह है तो फ़ास्ट ट्रेन, चलती धीमे है”
लेखक रामनगीना मौर्य के शब्द… पत्रकारिता जगत के जाने-माने नाम मार्क टली ने पूर्वांचल की क़स्बाई ज़िन्दगी के क़िस्सों को पुरवैया की लय और “विट” की धार देते हुए नायाब कहानियां प्रस्तुत की हैं, जिसे फोटोजर्नलिस्ट और सुप्रसिद्ध अख़बारनबीस एवं संपादक श्री प्रभात सिंह जी ने अस्सी, नब्बे के दशक के क़स्बाई भारत के बहुविध जटिल एवं जीवनानुभाव से लबरेज़ इन कहानियों को उनकी स्पिरिट के अनुरूप ही इस बारीकी से अनुवाद किया है कि संग्रह की सातों कहानियां लम्बी होने के वाबजूद इस क़दर रोचक बन गयी हैं कि कोई भी कहानी पढ़ना शुरू करने के बाद, बिना ख़त्म किये रुकना संभव नहीं है।
कहानी संग्रह की लगभग बारह पेज की शुरूआती लंबी, शोधपरक भूमिका, अस्सी-नब्बे के दशक के भारतीय परिवेश में इन कहानियों के बनने की प्रक्रिया में आये विभिन्न पड़ावों की तफ्सील से बयान प्रस्तुत करती हैं। “कहानी टीले वाली मंदिर की” जहां पुलिस, राजनेता, स्थानीय प्रधान के बीच राजनीतिक खींचातानी का जीवंत ख़ाका खींचती है, वहीं “मिलनपुर में क़त्ल” कहानी में थाने के दरोग़ा और सीआईडी की समानांतर जांच पड़ताल का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है…

पत्रकारिता में विश्वसनीयता का मार्क
ख़बरनवीस जय नागड़ा ने दर्ज किया… जिस दौर में ख़बरों की प्रामाणिकता ही संदेह के दायरे में खड़ी हो, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने इसे कुहासे को और बढ़ा दिया हो तब कौन-सी कसौटी रह जाती है जिस पर कोई विश्वास करे? किसी को समझ नहीं आ रहा कि मणिकर्णिका घाट पर क्या हुआ? क्या हो रहा है? शंकराचार्य का विवाद हो या कोई और मसला, चाहे अख़बार के पाठक हों या न्यूज़ चैनल के दर्शक, बहुत कंफ्यूज़ हैं कि सही क्या है? तब क्या कोई अख़बार या न्यूज़ चैनल प्रामाणिकता की कसौटी पर टिकता है? कोई सरकार के पक्ष में तो कोई उसका धुर विरोधी, तटस्थ पाठक या दर्शक कहाँ जाएँ? तब मार्क टली होना मायने रखता है, जो प्रामाणिकता की हर कसौटी पर खरे उतरे, उनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध रही।
बेशक मार्क टली ब्रिटिश मूल के होने के बावज़ूद भारतीय पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे। मेरा सौभाग्य रहा कि जीवन में उनसे एक यादगार मुलाक़ात, जो सिर्फ़ एक फ़ोटो भर में सिमटकर नहीं रही बल्कि मुझे पत्रकारिता के मूल मन्त्र दे गयी। प्रख्यात पत्रकार मार्क टुली भारत में न केवल बीबीसी बल्कि पत्रकारिता के ही का पर्याय रहे हैं। वे देश में पत्रकारिता का सबसे ज़्यादा विश्वसनीय चेहरा रहे हैं। जब भी देश में कोई बड़ी घटना होती तो आम आदमी से लेकर देश के कर्णधार तक ख़बर की सच्चाई जानने के लिए सबसे पहले बीबीसी पर यह सुनने की चेष्टा करते कि मार्क टुली क्या कह रहे हैं? तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की जब 31 अक्टूबर 1984 को हत्या हुई तो इस ख़बर को कन्फ़र्म करने के लिए राजीव गाँधी जी ने सबसे पहले रेडियो पर बीबीसी ही लगाया और ख़बर की पुष्टि की।
मार्क टुली की पसंदीदा किताबें
पत्रकार विवेक शुक्ला ने याद किया… सर मार्क टली से अगस्त, 2014 में उनके वेस्ट निज़ामुद्दीन वाले घर में मुलाक़ात हुई थी। तब नवभारत टाइम्स ने एक कॉलम शुरू किया था मेरी पांच पसंदीदा किताबें। उनके लैंड लाइन वाले फोन पर बात हुई और फिर मिलने का टाइम फिक्स हुआ था। उसी दिन उनकी साथी जिलियन राइट से भी मिलना हुआ था और फिर मिलना होता रहा। कुछ दिन पहले ही सतीश जैकब और कुर्बान अली ने आईआईसी में बताया था कि मार्क टली गंभीर रूप से बीमार हैं। आज उनका निधन हो गया। तब मार्क टली ने अपनी पांच प्रिय पुस्तकों के बारे में बताया था।
1. My Autobiography – Jawaharlal Nehru
2. The English Teacher – R.K. Narayan
3. My Experiments with Truth – Mahatma Gandhi
4. Hindu Views of Life – Sarvepalli Radhakrishnan
5. Freedom at Midnight – Dominique Lapierre & Larry Collins
एक नज़र में मार्क टुली
ख़बरनवीस पुष्प रंजन का इंदराज… पादरी बनते-बनते रह गये और फिर पत्रकार बन गये मार्क टली। कोलकाता के टॉलीगंज में जन्मे थे मार्क टली। उनके पिता विलियम स्कार्थ कार्लाइल टली, एक ब्रिटिश बिजनेसमैन थे। कलकत्ता में ‘गिलैंडर्स अर्बुथनोट’ नाम की एक मैनेजिंग एजेंसी में पार्टनर थे। मार्क टली ने अपने पिता को एक सख़्त “नैतिकवादी” निरूपित किया था, जो स्वभाव से ग़ुस्सैल थे और जिन्होंने अपने परिवार को भारतीय समाज से दूर रखा था। बंगाल में बचपन गुज़ारने के बाद, स्कूली शिक्षा के लिए मार्क टली इंग्लैंड चले गये। उनका शिक्षण ट्वाईफोर्ड स्कूल, मार्लबोरो कॉलेज तथा ट्रिनिटी हॉल, कैम्ब्रिज में हुआ जहां उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया। मार्क को चर्च रास नहीं आया, चुनांचे पत्रकारिता को करियर के रूप में चुना।

सादर श्रद्धांजलि एक बेहतरीन समर्पित पत्रकार को