
- January 20, 2026
- आब-ओ-हवा
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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-7...
परदेस में मूल्य निर्धारण
पर्यटन इन दिनों विश्व स्तर पर बहुत सहज है। इस स्थिति में दूसरे देश में चीज़ों की क़ीमत समझने का सबसे सही तरीक़ा सिर्फ़ अपनी मुद्रा में कन्वर्ट करना नहीं, बल्कि वहाँ की आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में सोचना है। जिस तरह भारत में 80, 100 रुपये की एक अच्छी चाट आम शहरी के लिए सामान्य मानी जाती है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 10 डॉलर की एक प्लेट चाट वहाँ के मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए उतनी ही सामान्य बात है। जब भारतीय पर्यटक किसी विदेशी रेस्तराँ के मेन्यू पर 10 या 15 डॉलर देखते हैं और तुरंत दिमाग़ में उसे 900 या 1200 रुपये में बदल देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से क़ीमत बहुत अधिक लगती है, लेकिन यह तुलना अधूरी है, क्योंकि यह केवल मुद्रा के गणित को देखती है। उस समाज की आय और ख़र्च की वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा।
किसी भी देश में कॉस्ट ऑफ लिविंग दो चीज़ों से मिलकर बनती है, रोज़मर्रा के ख़र्च और वहाँ की आमदनी। भारत में एक औसत व्यक्ति का मासिक व्यक्तिगत ख़र्च डॉलर में बदलने पर भले कुछ सौ डॉलर दिखे, पर इसी के साथ यह भी सच है कि औसत आय अपेक्षाकृत कम है, इसलिए 500 या 1000 रुपये का अतिरिक्त ख़र्च सोचे समझे बिना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। दूसरी ओर, अमेरिका, यूके, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में वही व्यक्तिगत ख़र्च डॉलर या पाउंड में देखने पर भारत की तुलना में कई गुना अधिक नज़र आता है, लेकिन उनकी टैक्स के बाद की औसत सैलरी भी अक्सर भारत के मुक़ाबले कई गुना अधिक होती है। इसीलिए जो चीज़ भारत के नज़रिये से फिज़ूलख़र्ची लग सकती है, वही उन देशों के निवासियों के लिए सिर्फ़ एक साधारण, रोज़मर्रा का व्यय होती है।
भारत से सीधी तुलना करें तो यूएई, यूके, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय देशों में जीवन यापन का औसत ख़र्च लगभग तीन से छह गुना तक अधिक दिखायी देता है। किराया, ट्रांसपोर्ट, बाहर खाना, सेवाएँ, सबकी क़ीमतें भारत से ज़्यादा दिखती हैं। विशेष तौर पर लंदन, दुबई, न्यूयॉर्क, सिडनी या टोरंटो जैसे बड़े शहर इस दृष्टि से और भी महँगे पड़ते हैं। किंतु वही चित्र तब संतुलित दिखने लगता है, जब यह देखा जाये कि इन देशों में औसत नेट सैलरी से किसी व्यक्ति का डेढ़ से दो महीने तक का व्यक्तिगत ख़र्च निकल सकता है। यानी वहाँ का निवासी, यदि अपने शहर की स्टैंडर्ड नौकरी पर है, तो उसे 10 डॉलर की कॉफ़ी या 15 डॉलर के लंच से उतना झटका नहीं लगता, जितना वह रक़म सीधे भारत की अर्थव्यवस्था में डालकर सोचने पर लगती है। इस अंतर को अनदेखा करके केवल कन्वर्ज़न करने से हर क़ीमत अस्वाभाविक रूप से महँगी लगने लगती है।
यूएई का उदाहरण लें तो दुबई जैसे शहर में किराया, बिजली, पानी और रोज़मर्रा के सामान की कीमतें भारत के औसत से कई गुना ऊपर हैं, लेकिन वहाँ बहुत से पेशों में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली उच्च आय मिलती है, जो इन ख़र्चों को संतुलित कर देती है। लंदन में सार्वजनिक परिवहन, किराया और बाहर खाना सब महँगे हैं, पर एक सामान्य प्रोफ़ेशनल की आय ऐसी है कि इन ख़र्चों के बाद भी उसके पास बचत की पर्याप्त गुंजाइश रह जाती है। अमेरिका में भोजन, सेवाएँ और स्वास्थ्य सुविधाएँ भारत के मुक़ाबले बेहद महँगी मानी जाएँगी, फिर भी एक औसत कामकाजी व्यक्ति की सैलरी उनकी भरपाई कर पाती है। कनाडा में मौसम कठोर है, और कई चीज़ें आयात पर निर्भर हैं, इसलिए ख़र्च ऊँचे हैं, पर सामाजिक सुरक्षा और वेतन स्तर उन्हें वहां के लोगों के लिए व्यावहारिक बनाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में खाने पीने और सेवा क्षेत्र की क़ीमतें भारत से कहीं ऊपर हैं, मगर न्यूनतम वेतन और औसत आय दोनों इन्हें वहां के निवासियों हेतु सामान्य बनाते हैं।
पर्यटक के लिए सबसे व्यावहारिक नज़रिया यह है कि हर क़ीमत को अपनी घरेलू मुद्रा में बदल बदलकर चौंकने के बजाय दैनिक बजट के रूप में देखे। यदि भारत में कोई व्यक्ति दिन भर के खाने पीने पर लगभग 800, 1000 रुपये ख़र्च करता है, तो अमेरिका या यूके जाते समय उसे यह देखना चाहिए कि वहाँ उसी तरह के सरल, लेकिन आरामदायक दिन के लिए कितना बजट उचित होगा, उदाहरण के लिए 30, 40 डॉलर प्रतिदिन। इस तुलना में केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि स्थानीय आय और वहाँ का सामान्य जीवन स्तर भी शामिल होना चाहिए। साथ ही, हर जगह ख़र्च कम रखने के व्यावहारिक तरीक़े मौजूद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना, सुपरमार्केट से तैयार या अर्ध तैयार भोजन खरीदना, ऐसे हॉस्टल या सर्विस्ड अपार्टमेंट चुनना जहाँ किचन की सुविधा हो और अत्यधिक पर्यटक केन्द्रित महँगे इलाकों की बजाय थोड़ा अंदरूनी, स्थानीय मोहल्लों के कैफ़े, रेस्तराँ आज़माना। इस तरह, अत्यधिक महँगे दिखने वाले देशों में भी यात्रा का कुल ख़र्च काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
सबसे दिलचस्प और उपयोगी मानसिक अभ्यास यह है कि जब भी किसी बोर्ड पर 10, 15 डॉलर या 8, 12 पाउंड की क़ीमत देखकर झटका लगे, तो अपने आप से एक छोटा सा प्रश्न पूछा जाये, यदि मेरी तनख़्वाह भी इस देश की औसत सैलरी जितनी होती, तो क्या यह दाम उतना ही चुभता! बहुत बार इसका उत्तर होगा ‘नहीं’, और वही क्षण होता है जब समझ में आता है कि दिक़्क़त वास्तविक क़ीमत से ज़्यादा, तुलना करने की हमारी मानसिकता में है। करेंसी कन्वर्ज़न का यह जाल जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही भ्रामक भी है। उससे बाहर निकलकर, जब कोई भारतीय यात्री यूएई, लंदन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की कीमतों को उनकी स्थानीय आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में देखना शुरू कर देता है, तो उसकी यात्रा न केवल कम तनावपूर्ण होती है, बल्कि एक तरह से आर्थिक और सांस्कृतिक समझ को भी गहरा करती है। तब 10 डॉलर की चाट केवल 950 रुपये की फ़िज़ूलख़र्ची नहीं, बल्कि एक नये समाज के जीवन स्तर की छोटी सी झलक बन जाती है, और यात्रा का अनुभव सचमुच ज्ञानवर्धक और रोचक हो उठता है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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