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व्यंग्य आदित्य की कलम से....

भारत में परिवारवाद

            ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई? पृथ्वी कैसे बनी? देवता कहाँ से आए? स्वर्ग, नरक और पृथ्वी के नीचे पाताल लोक कहाँ स्थित है? आदि बातों पर अनेक मत-मतांतर प्रचलित है। चाय की टपरियों से लेकर पान के ठेलों तक सभी जगहों पर देश के ब्रह्मज्ञानी यह चर्चा करते हुए देखे जा सकते हैं। पता किसी को कुछ नहीं होता है लेकिन इनका वर्णन इतने दावे के साथ किया जाता है कि लोग विश्वास करने पर मजबूर हो जाते हैं। आयेदिन पंडाल लगाकर प्रवचन करने वाले बाबा और महाराज कथा वाचन करते हैं और अपनी बुद्धि तथा स्मृति के आधार पर स्थापित देवी देवताओं के कि़स्से-कहानियाँ सुनाते रहते हैं। बाबाओं के प्रवचनों से पता चलता है कि देवताओं के भी परिवार हुआ करते थे। स्थापित देवताओं के अपने-अपने परिवार हैं जो सुस्थापित हैं। अपने परिवार के प्रति देवी-देवताओं में भी माया-मोह देखा जा सकता है। कई अवसरों पर देवी-देवताओं ने अपने पुत्र-पुत्रियों को वरदान देकर पूजनीय देवताओं की श्रेणी में प्रतिष्ठित कर दिया है। इस तरह कुछ मायनों में देवताओं में भी परिवारवाद की परंपरा दिखायी देती है। शिव का परिवार इसमें अग्रणी माना जा सकता है। ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में परिवारवाद की परंपरा देवताओं की देन है। भारत में ज़्यादातर परंपराएं सनातन रही हैं। परिवारवाद भी शायद उसी का परिणाम है।

सनातन धर्म में 4 युगों की परिकल्पना हैः सतयुग विष्णु के अवतारों के लिए जाना जाता है, जिसमें परिवारवाद की स्थिति कमज़ोर थी। त्रेता में राजा दशरथ ने तथा द्वापर में पांडु तथा धृतराष्ट्र ने परिवारवाद को नयी ऊँचाई पर पहुंचाया। कलियुग में राजतंत्र परिवारवाद के पोषक के रूप में उभरा, जो प्राचीन और मध्यकालीन भारत के हिंदू और गै़र-हिंदू दोनों ही शासकों में दिखायी देता है। आधुनिक काल में परिवारवाद एक ओर रचनात्मक लोगों जैसे शिल्पकारों, चित्रकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, फि़ल्मी कलाकारों आदि में दिखायी देता है, यानी एक ही परिवार ने कई मूर्धन्य कलाकार दिये। दूसरी ओर स्वतंत्रता पूर्व के नेताओं और स्वतंत्रता पश्चात लोकतांत्रिक पद्धति से चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने नब्बे के दशक तक तो अवाम को खुश रखा लेकिन उसके बाद से परिवारवाद ने अवाम की नाक में दम कर रखा है। इनके परिवारों को पालते-पालते देश कंगाली की राह और भ्रष्ट आचरण पर चल पड़ा है।

इस देश के एक वर्ग विशिष्ट का ऐसा मानना है कि 15 अगस्त 1947 में भारत को ब्रिटिश सरकार द्वारा खै़रात में स्वतंत्रता दी गयी। उनका मानना है कि भारत की स्वतंत्रता वैश्विक महाशक्तियों के टकराव और मनमुटाव का परिणाम मात्र थी। कुछ देशी और विदेशी इतिहासकारों ने अपनी इतिहास की पुस्तकें प्रकाशित कर बिकवाने के उतावलेपन के कारण स्वतंत्रता का सेहरा कांग्रेस के सिर बांध दिया। इस बहाने से स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका को कठघरे में खड़ा करता है। इस बहाने यह वर्ग कांग्रेस के योगदान को ज़्यादा तरजीह नहीं देता। उनकी नज़र में भारत की स्वतंत्रता के लिए वर्षों किया गया संघर्ष एक मिथक है। जनता के सहयोग से कांग्रेस द्वारा वर्षों तक चलाये गये आन्दोलन बेमानी थे। यह परिवारवाद को बढ़ावा देने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मात्र थे। शायद कुछ प्रचंड देशभक्त कांग्रेस की इस रणनीति को भाँप गये थे इसीलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करने की नीति अपनायी। अपने अलग संघ का निर्माण किया और कांग्रेस का विकल्प खड़ा करने का महती कार्य किया। इस कार्य में सहयोग करने वालों को ब्रिटिश सरकार ने उपाधियों और पेंशन से भी नवाज़ा। उनके नज़रिये से देखें तो परिवारवादी कांग्रेस ने अवसर पाकर भारत की सत्ता हथियाने में सफलता प्राप्त की तो प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस के लीडरों ने बलिदान देकर भी पीढ़ी दर पीढ़ी देश की झूठी सेवा की और शहादत जैसी बड़ी क़ीमत सिर्फ़ परिवारवाद को कायम रखने के लिए चुकायी!

देखा जाये तो कांग्रेस का तथाकथित परिवारवाद ही गै़र-कांग्रेसी दलों के लिए संजीवनी साबित हुआ है, जिसके चलते ये दल अपना अस्तित्व बचा पाये हैं। ब्रिटिश सत्ता के समाप्त होने पर ब्रिटिश सत्ता पोषित देशभक्तों ने परिवारवाद विरोधी मुहिम पीढ़ी दर पीढ़ी चलायी। इस दल के कर्मठ और समर्पित लोगों में से कुछ ने अपनी ब्याहता स्त्रियों को त्याग दिया और कुछ ने अविवाहित रहने का संकल्प लिया ताकि परिवारहीन होकर परिवारवाद का विरोध किया जा सके। जो अपने परिवार का न हो सका वह राष्ट्र का हो गया। लेकिन कामिनी कंचन के जाल से बचना इतना आसान नहीं, अतः परिवारवाद विरोधियों ने भी घर बसाये और परिवार बढ़ाये। इस विचारधारा के स्वयंसेवकों ने बच्चे पैदा करने के कार्य को भी राष्ट्रहित से जोड़कर प्रचारित किया। करोड़ों रुपये खर्च कर परिवार नियोजन के लिए दशकों तक पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा किये गये प्रयासों को धूल धूसरित कर देश की जनसंख्या को डेढ़ सौ करोड़ के पार पहुंचाने के भागीरथ प्रयास किये जा रहे हैं। इस तरह कर्ज़ में डूबे हुए ग़रीबी, बेरोज़गारी और भुखमरी से जूझते हुए राष्ट्र की, आश्वासनों और खै़रात पर पल रही जनसंख्या को अनुकूल मतदाता के रूप में बनाने की कोशिश क़ब्र में पैर लटकाये सत्तासीन नेताओं द्वारा की जा रही है। परिवारवाद विरोधी मात्र चुनावी खर्चे उठाने और सरकार बनाने के लिए धन उपलब्ध कराने वाले सेठों की तलाश में दिखायी देते हैं। निर्लज्ज और बिकाऊ नेताओं की ख़रीद-फ़रोख़्त करने के प्रतिफल में राष्ट्र के संसाधनों के दोहन की खुली छूट दी जाती है। मार्क्स द्वारा चिन्हित शोषक वर्ग को भारत के विकास का प्रतिमान बताया जा रहा है, जिनकी बढ़ती हुई समृद्धि को भारत की समृद्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। देश का सारा आर्थिक बोझ राजनीति प्रभाव से हीन आम जनता के कंधों पर डाल कर परिवारवाद के विरोधी ऐश कर रहे हैं।

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परिवारवाद विरोधियों ने राष्ट्र के लिए त्याग करते हुए राजनीति और देश की अर्थ व्यवस्था के लिए अपने परिवार के सदस्यों की आहुति दे दी है। एक मंत्री जी के सुपुत्र क्रिकेट का ‘क’ भी नहीं जानते थे लेकिन दूध के दाँत टूटने से पहले ही क्रिकेट के माध्यम से राष्ट्रसेवा के लिए देश और विश्व में क्रिकेट के सबसे बड़े संस्थान का कार्यभार वहन कर रहे हैं, जिन्हें इस पद पर बनाये रखने के लिए आयेदिन नियम बदलने पड़ते हैं। भारतीय क्रिकेट पर नेताओं के परिवार गुड़ पर मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहते हैं। मध्य भारत के राजपरिवार से आये एक मंत्री जी ने विदेश नीति की लंका लगा रखी है। जनता के पैसों से विदेशों में डंका बजवाने में इनको महारत हासिल है, जिसमें उनके होनहार पुत्र अमेरिका में भारत की साख बनाने का रोज़गार पाकर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। और तो और बाप बेटे मिलकर देश को ट्रंप की खरी-खोटी भी सुनवा रहे हैं।

भारत के जेम्स बॉन्ड के सुपुत्र पिता के प्रभाव से विदेशों में रहकर अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए अपना आर्थिक साम्राज्य फैला रहे हैं। मुनाफ़ा कमाने में विश्व के स्थापित उद्योगपतियों के कान काट रहे हैं। पहाड़ों से आये एक होनहार सुपुत्र मंत्री बनकर अपने पिता की विरासत को सम्हाल रहे हैं, इन्होंने देश के क्रिकेट की सबसे बड़े संस्थान को नेतृत्व दिया किन्तु अपने से राजनीतिक स्तर पर बड़े नेता के योग्य पुत्र के लिए स्थान छोड़ना पड़ा। इनकी ख्याति हनुमान जी को प्रथम अंतरिक्ष यात्री बनाने और कांग्रेस को घेरने के चक्कर में चुनाव आयोग के नकारेपन को उजागर करने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए भी है।

भारत में सड़क और परिवहन में क्रांति लाने वाले नेताजी स्पेस टेक्नोलॉजी से ऐसे सड़क, पुल, फ्लाईओवर आदि बना रहे हैं, जो बनते ही ध्वस्त हो जाते हैं। इससे अनवरत निर्माण के अवसर बने रहते हैं। इस तरह इस महान निर्माणकर्ता द्वारा सड़क निर्माण का विश्व रिकॉर्ड भी बनाया जा रहा है। इनके योग्य पुत्र और परिवार के सदस्य पर्यावरण की रक्षा करने के लिए लिए ग्रीन फ्यूल के निर्माण और वितरण के कारोबार से जुड़े हुए हैं। भारत में लाखों उद्यमियों और पेट्रोलियम व्यवसाय से जुड़े लोगों के होने के बावजूद बायोफ्यूल का इनोवेटिव आइडिया सिर्फ़ इसी परिवार के दिमाग़ में पैदा हुआ। इस कारोबार में क़दम रखते ही इस परिवार ने सफलता के झंडे गाड़ दिये। 3 से 4 वर्षों के सीमित अन्तराल में कुछ करोड़ से सैकड़ों और हज़ारों करोड़ तक कारोबार कैसे बढ़ाया जाता है, देश के कारोबारियों को सीखना चाहिए ताकि देश की आर्थिक उन्नति में सहयोग दे सकें।

यहाँ बहुत सीमित उदाहरणों का जि़क्र किया गया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो भारत की संसद से लेकर पंचायत तक दिखायी देते हैं, बशर्ते आपके पास नज़र हो।

भारत में परिवारवाद का विरोध सत्ता के गलियारे में घुसने के लिए अवसर तलाशने के लिए किया गया था। जिसके लिए परिवारवाद की धारणा गांधी परिवार तक सीमित कर दी गयी। परिवारवाद विरोधियों ने गांधी परिवार के तिलिस्म को तोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए भरोसेमंद और आर्थिक रूप से मज़बूत सहयोगियों की तलाश में स्वयं परिवारवाद की शरण में चले गये। अगर यह देश सच में परिवारवाद के विरोध में है तो जल्द ही सत्तासीन परिवारवादियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ेगा बशर्ते जनता का मताधिकार सुरक्षित रहे, जिस पर आजकल आशंका के बादल मंडरा रहे हैं।

aditya, आदित्य

आदित्य

प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।

1 comment on “भारत में परिवारवाद

  1. Well said Aditya ji , आपने भारत में परिवार बाद का बहुत सही विश्लेषण कर व्यंग के माध्यम से प्रस्तुत किया है

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