
- November 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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अवधेश प्रीत (13.01.1958-12.11.2025) का नाम समकालीन कथा साहित्य में परिचय का मोहताज नहीं। इसी 12 नवंबर को उनका देहांत साहित्य जगत को झकझोर गया है। यहां उनका वह साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा है जो आब-ओ-हवा के लिए ग़ज़ाला तबस्सुम ने किया था और अक्टूबर 2024 अंक में प्रकाशित हुआ था। आब-ओ-हवा परिवार की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि तो है ही, यह साक्षात्कार साहित्य, भाषा, सामाजिक ताने-बाने और सृजन प्रक्रिया पर अवधेश प्रीत के मन की तहें खोलता है...
धर्म के नाम पर अलगाना अपराध, मेरी कथाएं प्रतिकार: प्रीत
ग़ज़ाला तबस्सुम : कहानी लेखन में नई हिंदी का बड़ा शोर है, यह क्या बला है और क्या यह आपके पीछे पड़ी? हां, तो कैसे और नहीं तो बचे कैसे?
अवधेश प्रीत : जैसा कि आपने कहा यह बला ही है। किसी भी भाषा का जो अपना स्वरूप होता है वही उसका सौन्दर्य होता है। कोई भी भाषा पीढ़ियों की यात्रा और बहुत श्रम के बाद अपना एक स्वरूप ग्रहण करती है, जिसे मानकीकरण कहते हैं। चार लोगों के हिंग्लिश बोल लेने से भाषा अपना स्वरूप नहीं बदल लेगी। जो इस तरह की भाषा इस्तेमाल करते हैं या तो वो हिंदी भाषा की ताक़त को समझ नहीं पा रहे या फिर यह समझ रहे हैं कि एक नया प्रयोग स्वीकार कर लिया जाएगा तो वे नादानी कर रहे हैं।
देखिए, हिंदी ने तो तमाम भाषाओं से शब्द इस तरह ग्रहण किये हैं, जो आपस में यूं घुलमिल गये हैं कि उन्हें अलग करना मुश्किल है। जो भाषा, फिल्मों, ओटीटी वगैरह पर विकसित हो रही है, और जिसे साहित्य में लाने की नाकाम कोशिश हो रही है। यह चलने वाली नहीं हैं और मैं उसका बिल्कुल पक्षधर नहीं हूं। मुझे अपनी भाषा का प्रयोग करना आता है। मैंने हमेशा ऐसी ज़ुबान में लिखा है जिसे प्रेमचंद, कमलेश्वर वग़ैरह ने इस्तेमाल किया है। किसी भी रचना में आप शिल्प, प्रस्तुति, चरित्रों में प्रयोग कर सकते हैं लेकिन भाषा में नहीं। मेरे लिए हिन्दुस्तानी भाषा ज़्यादा क़रीब है, मुझे किसी भाषा से बचने की ज़रूरत ही नहीं है।
ग़ज़ाला : आपकी ‘अली मंज़िल’ के किरदार भी ऐसी ही हिन्दुस्तानी ज़ुबान बोलते हैं। यह भी लगता है कि अक्सर आपकी कहानियां सामाजिक सौहार्द्र, भाईचारे से जुड़ती हैं। इस समय समाज पर सांप्रदायिकता का जो दबाव है, ऐसी कहानियां क्या दरारों को भर सकती हैं?
प्रीत : साहित्य धीरे धीरे असर करता है और लोगों के सोचने समझने के तरीक़े को बदलता है। एक लेखक की ज़िम्मेदारी होती है कि समाज में बढ़ रही कटुता और ग़लतफ़हमियों कौ दूर करने का प्रयास करे। जो सवाल समाज को परेशान कर रहे हैं, समाज की समरसता और सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है, उसकी साइकी को समझे और अपनी कहानियों, आलेखों द्वारा उसके निदान का प्रयास करे। ‘कजरी’, ‘अली मंज़िल’ जैसी मेरी कहानियां आपने पढ़ी हैं तो देखा होगा मैं मनुष्यता का उजला पक्ष सामने लाता हूं। बेशक ऐसी कहानियां, धीरे धीरे ही सही, दरारों को भरेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
ग़ज़ाला : ‘कजरी’, ‘अली मंज़िल’, ‘अम्मी’ और आपकी कई अन्य कहानियों में मुस्लिम समाज का मर्मस्पर्शी चित्रण मिलता है। इसके बारे में बताइए।
प्रीत : मैं साझी संस्कृति और समाज में पला बढ़ा हूं। मेरे लिए मुस्लिम समाज कोई अलग या अजनबी क़िस्म का समाज नहीं रहा। यही वजह है कि मैंने अपनी ऐसी कहानियों के ज़रिये उस साइकी को डिकोड करने की कोशिश की है, जो हमें संचालित करती है. देखिए व्यक्ति के तौर पर हम सभी अपनी आस्थाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं, पर विविध आस्थाओं के साथ रहते हुए, एक दूसरे के लिए समान भाव वाला सामाजिक बनना आसान नहीं होता। यह अर्जित होता है एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे के प्रति सम्मान और संयम के दीर्घकालिक अभ्यास से। इस अर्जित सद्भाव और समरस समाज के ताने-बाने को छेड़ने का अर्थ है, अपनी सांझी विरासत का अनादर। मैं उसी विरासत को लेकर चिंतित होता हूं और मनुष्य के भीतर बचे हुए उसी सद्भाव में विश्वास करता हूं। मेरी ऐसी तमाम कहानियों में न दंगा है, न सांप्रदायिकता की थोपी हुई कोई घटना है, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में निहित सांप्रदायिकता की जो साइकी है और उसके कार्य-कारण हैं, वही मेरे टूल्स हैं जिनसे कहानियों में, मैं अपने समाज को, उसकी अभिन्नता को, देखने, समझने और जानने की कोशिश करता हूं। एक मनुष्य को दूसरे से धर्म के आधार पर अलगाने, पहचाने जाने और व्यवहृत करने से बड़ा अपराध कुछ नहीं हो सकता। मेरी कहानियों में उसी का प्रतिकार है।
ग़ज़ाला : ‘कजरी’ जैसी कहानियों की समालोचना आपको प्रेमचंद की परंपरा का लेखक मानती है। इस परंपरा के लेखक आधुनिक साहित्य में क्या नयापन ला रहे हैं? और कुछ नयापन नहीं है तो यह आधुनिक साहित्य कैसे?
प्रीत : प्रेमचंद एक परंपरा का नाम है, विचार का नाम है। विचार एक सतत यात्रा है।प्रेमचंद की वैचारिकता के साथ आज का साहित्यकार भी खड़ा है। प्रेमचंद ने आम आदमी, ग़रीबों, किसानों के पक्ष में लिखा, समाज के शोषित, वंचित, प्रताड़ित वर्ग की आवाज़ बने। आज मैं भी यही कर रहा हूं लेकिन आज हल्कू या पूस की रात की कहानी नहीं लिखूंगा क्योंकि समय बदल गया है। आज अगर कोई लेखक इक्कीसवीं सदी की जटिलताओं पर, यथार्थ पर, समाज के दबे कुचले वर्ग पर लिखता है, उनके साथ खड़ा होता है तो प्रेमचंद की ही परंपरा का निर्वाह करता है।
आज का किसान प्रेमचंद के समय का किसान नहीं है। आज का किसान शंभू बॉर्डर पर संघर्ष कर रहा है। उसकी अलग समस्याएं हैं जिन्हें स्वर देना होगा। आज के किसानों पर बैंकों का कर्ज़ है, मल्टिनैशनल कंपनियों का शोषण है। हम आज के मनुष्य की समस्याएं रखकर यथार्थ की बातें करेंगे तभी आधुनिक साहित्य में प्रेमचंद परंपरा का निर्वहन कर पाएंगे।
ग़ज़ाला : अधिकांश कथाकार उपन्यास की ओर जाते ही हैं। ‘अशोक राजपथ’ के बाद आपका दूसरा उपन्यास ‘रूई लपेटी आग’ आया है, उपन्यास की ओर आपके शिफ्ट को कैसे देखा जाये?
प्रीत : कहानी या उपन्यास दोनों में काॅमन है कथा, यानी वह कथ्य जिसे कहने के लिए लेखक एक विधा चुनता है। उपन्यास का कैनवास बड़ा होता है। कथ्य में निहित बहुस्तरीयता को ट्रीट करने की पर्याप्त गुंजाइश होती है। ऐसी कथा के ज़रिये जीवन की व्यापकता, उसकी जटिलता और बहुरंगी छवियों, छटाओं को रचने के लिए लेखक को पर्याप्त अवकाश मिल पाता है। एक मुकाम पर लेखक के सामने अक्सर यह स्थिति आती है, जब वह जो कहना चाहता है, उसकी समाई एक कहानी में संभव नहीं लगती। मेरे इस शिफ्ट को कथा कहने की इसी ज़रूरत के तहत देखा जा सकता है।
ग़ज़ाला : कहानी हो या उपन्यास, लेखक वस्तुगत होकर लिखे या व्यक्तिगत होकर?
प्रीत : मेरे लिए व्यक्तिगत के मुक़ाबले वस्तुगत ज़्यादा महत्वपूर्ण है। आपके बहुत सारे अनुभव व्यक्तिगत होते हैं लेकिन उसे आप किस तरह वस्तुगत में बदलते हैं यही आपका हुनर है। किसी चीज़ को देखने के बाद मेरे जो अनुभव होते हैं, जो फ़ीलिंग होती है, मैं उसे इस तरह विस्तारित करूंगा कि वो सार्वजनिक हो जाये, हर किसी की फ़ीलिंग बन जाये। अनुभव का दायरा व्यक्तिगत होता है लेकिन लेखन का दायरा बहुत विस्तृत। जो आपबीती हो वह जगबीती भी। मैंने जो प्रेम कथाएं भी लिखीं, जब विस्तार किया तो उसमें सार्वजनिक व्यापक जीवन का अक्स नज़र आता है। मेरे लिए प्रेमकथा या कोई भी कथ्य व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है, उस अनुभव का जो प्रक्षेपण है वह वस्तुगत हो जाता है।
ग़ज़ाला : लेकिन लेखक यह करता कैसे है और क्यों?
प्रीत : इस तरह समझिए, हिंदी कहानियों के बड़े आलोचक हैं, वह एक बात कहते हैं — प्रत्येक स्थिति में कथाकार, जो ऑब्ज़र्वेशन का सच है, उसे रूपांतरित कर अपनी रचना का स्वरूप विधान करता है। उसकी प्रतीति क्षमता को हम उसके विशेष क्षेत्र के विस्तार उद्बोध और तत्परता से माप सकते हैं। जब वह निर्विशेष रूप से वस्तुगत परीक्षण करता है तो उसे अपने विषय के अनुरूप वर्ण प्राप्त होता है।
तो यह है, मैं अपनी कहानी कहूंगा तो लोग क्यों पढ़ेंगे, जब लोगों को अपनी कहानी नज़र आएगी तभी पढ़ेंगे ना! मैंने आपको एक कहानी भेजी थी ‘मेरा मज़हब मेरी जान’। यह कहानी तब लिखी थी, जब राम जन्मभूमि का फ़ैसला आने को था। उस कहानी का किरदार है जिसके मन में द्वंद्व है, मैं हिंदू बन जाऊं तो बच जाऊंगा, दूसरे के मन में यह द्वंद्व कि मैं मुस्लिम बन जाऊं तो बच जाऊंगा। ये मेरे मन के द्वंद्व थे, मैंने इन्हें वस्तुगत किया और उस समय काफ़ी अल्पसंख्यकों के द्वंद्व में यह रूपांतरित हुआ।
ग़ज़ाला : अल्पसंख्यकों के साथ ही साहित्य में दलित विमर्श और स्त्री विमर्श जैसे आलोचक प्रदत्त विशेषणों/संज्ञाओं/बहसों की गूंज भी रही है। क्या लेखक की रचना प्रक्रिया इन आवाज़ों से प्रभावित होती है?
प्रीत : जो केंद्र से बाहर परिधि पर होता है या परिधि से भी बाहर होता है, उपेक्षित होता है उसे विमर्श के ज़रिये केंद्र में लाया जाता है। अगर हमारे समाज की स्त्रियां उपेक्षित हैं, पीड़ित हैं तो उन्हें विमर्श के केंद्र में लाया जाता है। नतीजा यह होता है कि स्त्रियां स्वयं बोलना, लिखना शुरू करती हैं। आप देखेंगी कि फ़िल्मों में भी स्त्री किरदारों ने बोलना शुरू किया है, यहां तक कि ‘मी टू’ तक का कैंपेन चला। यह स्त्री विमर्श का ही परिणाम है कि उनमें बोल्डनेस आयी।
इसी तरह दलितों के साथ भी है। यह एक ऐतिहासिक संदर्भ की त्रासदी है। एक लेखक का काम है कि तार्किकता के साथ किसी स्त्री या दलित के पक्ष में खड़ा हो। अपनी कहानी में उन्हें सपोर्ट करे, उनके जीवन की अस्मिता के संघर्ष के पक्ष में आवाज़ उठाये। सबसे महत्पूर्ण यह है कि शोषित वर्ग स्वयं हस्तक्षेप करे। अगर स्त्रियां कविता या कहानी या अन्य विधा के ज़रिये अपनी अपनी बात रखेंगी तो उनके संघर्ष को स्वर मिलता है क्योंकि वो भुक्तभोगी हैं। एक दलित ने जो जीवन जिया है जो अपमान सहा है, समाज में जो उपेक्षा सही है इन त्रासदियों को उनसे बेहतर कोई नहीं लिख सकता। शोषित वर्ग अगर स्वयं लिखे तो यह अनुभूति होती है लेकिन अगर दूसरा पक्ष लिखता है तो वह महज सहानुभूति। इस पूरे संदर्भ में, कभी – कभी कुछ रचनाकार ऐसे भी आते हैं, जो विमर्श को फ़ॉर्मूले की तरह इस्तेमाल करते हैं, जो ग़लत है। आज हर स्त्री ने स्त्री विमर्श पर ही लिखना शुरू कर दिया है, यह एक फ़ैशन बन गया है।
ग़ज़ाला : एक फ़ैशन कहानियों के फ़िल्मांकन का भी है। यह बताइए एक समय था जब लेखक कहते थे फ़िल्में कहानी का सत्यानाश कर देती हैं, लेकिन अब साहित्य को परदे पर लाने के लिए फ़िल्मकार से अधिक लेखक उतावले हैं?
प्रीत : पहले सिनेमा को हमारे समाज का भद्रलोक हेय समझता था। उस समय के साहित्यकार भी मानते थे कि सिनेमा दोयम दर्जे की चीज़ है लेकिन सिनेमा भी साहित्य की तरह ही एक विधा है, यह बात आज का साहित्यकार समझ गया है। आज उसके सामने ओटीटी है, सिनेमा के अन्य तंत्र हैं। चार पंक्तियों में जो बात लिखी जाती है, उसे फ़िल्माने के लिए पूरा दृश्य क्रिएट करना पड़ता है। ये बातें लेखक समझने लगे हैं। उनकी कहानियों पर फ़िल्में बन रही हैं लेकिन यहां महत्वपूर्ण है, कि कहानी की जो मूल आत्मा है, वह डिस्टर्ब नहीं होनी चाहिए।
रेणु की कहानी पर जब फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ बन रही थी तब उसके डायरेक्टर कहानी के अंत को बदलना चाहते थे क्योंकि उस समय फ़िल्मों में हैप्पी एंडिंग पसंद की जाती थी लेकिन बदलाव के लिए न तो लेखक रेणु तैयार हुए और न निर्माता शैलेंद्र। क्योंकि अंत बदल दिया जाता तो कहानी का मर्म ही बदल जाता, आत्मा ही मर जाती।
हर कहानी या उपन्यास पर फ़िल्म नहीं बन सकती, उसके लिए कहानी में गति होनी चाहिए। मेरी कहानियों में गति है इसलिए रंगमंच पर मेरी कहानियों के ख़ूब नाट्य मंचन हुए हैं और बहुत पसंद किए गए। मैं इसे अपनी सफलता मानता हूं। एक विधा से दूसरी विधा तक कोई कहानी जाती है तो ज़्यादा लोग उससे जुड़ पाते हैं, ज्यादा प्रचार प्रसार होता है इसीलिए आज के लेखक साहित्य को परदे पर लाने के लिए उतावले हैं।
ग़ज़ाला : क्या आपकी कोई कहानी हम जल्द परदे पर साकार होती हुई देखने वाले हैं?
प्रीत : मेरी कहानियों पर भी फ़िल्म की बात चल तो रही है लेकिन अभी कुछ तय नहीं हुआ है इसीलिए इस पर कुछ कहना बेमानी है।
ग़ज़ाला : विधाओं की आवाजाही का आपका अनुभव क्या रहा? आप शुरू से गद्य लेखन में ही हैं?
प्रीत : आम तौर पर हर लेखक शुरूआत कविताओं से ही करता है। मैं भी अलग नहीं हूं। शुरू में मैंने कविताएं,ग़ज़लें लिखीं। कुछ शेर मशहूर भी हुए जैसे :
टूटकर भी रोज़ मैं मुकम्मल खड़ा हूं
ऐ ज़िंदगी मैं तुझसे कितना बड़ा हूं
लेकिन धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि मैं बॅंध रहा हूं, पूरी बात कह नहीं पा रहा। वहां से मैंने कहानियां लिखना शुरू किया। मक़बूल होने लगीं तो मैं कहानियों में ही रमता चला गया। मेरी कहानियों पर जब बड़े बड़े समीक्षकों, आलोचकों ने लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि मैं यहां बेहतर कर पा रहा हूं। एक कारण यह भी था कि उस समय प्रकाशक कविताओं के संग्रह जल्दी नहीं छापना चाहते थे, स्थापित कवियों की ही किताबों को प्राथमिकता देते थे। आज हालात बदल गये हैं, प्रकाशकों की बाढ़ आ गयी है और कैसी भी किताब हो, छप जाती है।

ग़ज़ाला : कविता, ग़ज़ल फिर कथा… लेखक से इतर आपके भीतर का पाठक ज़रा दिलचस्प मालूम होता है।
प्रीत : मैं किसी भी पत्रिका में पहले कविता या ग़ज़ल का कॉलम ढूंढता हूं। सबसे पहले ग़ज़ल पढ़ता हूं। इस बार भी पत्रिका ‘हंस’ जब मेरे हाथ में आयी, तो मैंने भवेश दिलशाद की ग़ज़ल पढ़ी। मैंने साहिर लुधियानवी, जिगर मुरादाबादी, इक़बाल और मजाज़ को ख़ूब पढ़ा है। बाद में, जब दुष्यंत आये तो उन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया। मुझे उर्दू से भी ख़ासा लगाव है। आपने देखा होगा मेरी कहानियों में उर्दू की चाशनी है। मुझे कविताएं भी अच्छी लगती हैं लेकिन कई बार गूढ़ कविताएं मज़ा किरकिरा कर देती हैं। ग़ज़लें मनुष्य के भीतर के रागबोध को छूती हैं फिर भी मेरी सबसे प्यारी विधा आलोचना है। जो वैचारिक रूप से विचारों को उत्तेजित करती हो, ऐसे लेख और आलोचनाएं पढ़ना मैं पसंद करता हूं, उसके बाद मैं कहानी या उपन्यास पढ़ता हूं।
ग़ज़ाला : लेखन समाज को और समाज लेखन को कैसे प्रभावित कर सकता है और कैसे?
प्रीत : मैंने शुरूआत में भी कहा कि साहित्य असर करता है, पर समय लगता है। समाज लेखन को जल्द प्रभावित करता है लेकिन लेखन समाज को धीरे धीरे। कोई भी रचना एक दिन में क्रांति या परिवर्तन नहीं लाती, परिवर्तन की ज़मीन तैयार करती है। रचनाएं पाठकों की दृष्टि को विकसित करती हैं, ज़्यादा वैज्ञानिक, तार्किक और उदार बनाती हैं। साहित्य धीरे धीरे समाज को बदलता है। साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है, जो रास्ता दिखाती है, हमारी सोच का अंधेरा हटाती है।

ग़ज़ाला तबस्सुम
साहित्यिक समूहों में छोटी-छोटी समीक्षाएं लिखने से शुरू हुआ साहित्यिक सफ़र अब शायरी के साथ अदबी लेखन और प्रेरक हस्तियों के साथ गुफ़्तगू से लुत्फ़अंदोज़ हो रहा है। एक ग़ज़ल संग्रह ने अदब की दुनिया में थोड़ी-सी पहचान दिलायी है। लेखन में जुनून नहीं, सुकून की तलाश है। आब-ओ-हवा के पहले अंक से ही जुड़े होना फ़ख़्र महसूस कराता है।
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