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भारत में महिलाओं की पत्रकारिता के पूरे इतिहास और वर्तमान को दर्ज करती हुई किताब है 'आधी दुनिया की पूरी पत्रकारिता'। मंगला अनुजा की यह पुस्तक महिला पत्रकारिता के अध्ययन और दस्तावेज़ के लिहाज़ से देश भर में एक संदर्भ पुस्तक बन चुकी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के संदर्भ में इसी विषय पर उन्होंने यह दस्तावेज़ी लेख उपलब्ध करवाया है।

भारत में महिला पत्रकारिता, एक दस्तावेज़

भारतीय पत्रकारिता में महिलाओं से संबंधित ख़बरों ने पत्रकारिता जगत् को न केवल प्रभावित किया, अपितु प्रताड़ित भी कराया। भारत के पहले पत्र ‘हिकी गजट’ के संपादक जेम्स ऑगस्टस हिकी ने जब पत्र में तत्कालीन गवर्नर हेस्टिंग्ज़ की पत्नी और अन्य आला हस्तियों के विरुद्ध व्यक्तिगत और तीखे प्रहार करने प्रारंभ किये, तो वे अंग्रेज़ गवर्नर जनरल की आँख की किरकिरी बन गये। हिकी ने एक बार सात तुकबंदियाँ केवल इसी बात पर लिख डाली थीं कि श्रीमती हेस्टिंग्ज़ सच्ची ब्रिटिश महिलाओं की भाँति अपने पति वॉरेन हेस्टिंग्ज़ को सही रास्ते पर लाएँ। इसका परिणाम यह निकला कि भारत में पत्रकारिता के जनक को अपनी ही सरकार से घोर प्रताड़ना झेलनी पड़ी। जॉर्ज प्रिंटचार्ड ने द ओरिएंटल ऑब्ज़र्वर (1827) कोलकाता से निकाला था। जब प्रिटचार्ड की मृत्यु हो गयी तो उनकी पत्नी पत्र की मालिक हो गयीं। 2 मार्च, 1832 को कोलकाता से ही प्रकाशित ‘द स्पेक्टेटर इन इंडिया’ के संचालकों ने अपने पत्र में व्यक्तिगत लांछन और पगड़ी उछालने से परहेज़ करने का महिलाओं से वायदा किया था। इसी पृष्ठभूमि में भारत की पत्रकारिता में ऐनी बेसेंट युग आया।

पं. माधवराव सप्रे ने ‘स्त्री शिक्षण चंद्रिका’ में मिसेज़ बेसेंट पर छपे लेख को पुनः छापा, जिसमें लिखा था- “उन्हें पहले से समाचार-पत्रों तथा मासिक पुस्तकों में लेख लिखने का शौक़ था ही। अब इसी को उन्होंने द्रव्यार्जन का मार्ग बनाया। प्रसिद्ध समाचार-पत्रों और मासिक पुस्तकों में लेख लिखकर वे अपना चरितार्थ उत्तमता से चलाने लगीं।” उन्होंने चेन्नै से जनवरी 1914 में ‘साप्ताहिक कॉमनवील’ का प्रकाशन किया, जिसमें ‘स्वराज्य किस तरह का मिलना चाहिए’, के बारे में लिखा था- “राजनीतिक सुधारों से हमारा तात्पर्य ग्राम पंचायतों से लेकर जिला बोर्डों और नगर पालिकाओं, प्रांतीय विधानसभाओं और राष्ट्रीय संसद् तक स्वराज्य स्थापित करना है। इन सब संस्थाओं को वैसा ही स्वराज्य मिलना चाहिए जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के अन्य उपनिवेशों को मिला हुआ है।” सन् 1914 में ही उन्होंने ‘मद्रास स्टैंडर्ड’ अख़बार खरीद लिया और ‘न्यू इंडिया’ नाम से पत्र निकालने लगीं। तत्कालीन स्थितियों पर तटस्थ रूप से लिखकर अपने पत्रकारीय धर्म का निर्वाह करते हुए वे लिखती हैं- “जब भीड़ सैनिकों पर पत्थर फेंकना शुरू करे तो यह कितना दयनीय होता है कि सैनिकों को गोलियों की बाढ़ छोड़ने का आदेश दिया जाये।” इस टिप्पणी की देश भर में जन प्रतिक्रिया हुई। होमरूल विषयक लेखों के कारण ‘न्यू इडिया’ को दो हज़ार और दस हज़ार की दो ज़मानतें भी भरनी पड़ी थीं।

‘जयाजी प्रताप’ ने लिखा- “आज ‘न्यू इंडिया’ में पहली बार हिंदुस्तानी ज़बान में लेख निकल रहा है। अगर कोई पूछे कि यह नयी ज़बान क्यों तो हम यह जबाव देंगे कि होमरूल या स्वराज्य के लिए देश की एक भाषा होना बहुत ज़रूरी है।” ‘आन द लाइन’ स्तंभ में वे स्वयं अनेक ज्वलंत मुद्दों पर दृष्टिकोण रखती थीं इसमें महिला कल्याण और शिक्षा पर एक साप्ताहिक पृष्ठ निकला करता था। दांडी मार्च पर गांधीजी का साक्षात्कार छपा, जिसमें उन्होंने कहा था- “स्वयंसेवक को अपने प्राणों की तरह नमक की रक्षा उसी प्रकार करनी चाहिए, जिस प्रकार एक माँ अपने बच्चे को उससे छीनने वाले से बचाती है।” अडियार से उन्होंने मासिक ‘थियोसॉफ़िस्ट’ (1920) का प्रकाशन-संपादन किया तथा सन् 1927 में फ्री प्रेस समाचार अभिकरण प्रारंभ का स्वदेशी समाचार अभिकरणों की जन्मदात्री भी बन गयीं। उन्होंने समाचार-पत्रों द्वारा विचार स्वातंत्र्य और मुद्रण स्वतंत्रता के लिए आंदोलन चलाया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति पर लिखा- “जब इंग्लैंड संकटग्रस्त है (प्रथम विश्वयुद्ध) तो भारत को इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी माँगें सामने रखनी चाहिए।” पहली महिला प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाली ऐनी बेसेंट कहा करती थीं- “मैं भारतीय ढोल हूँ। अपनी ढम-ढम से मैं सब सोने वालों को जगा रही हूँ, ताकि वे उठकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करें।”

वाराणसी से प्रकाशित मासिक ‘थियोसॉफ़िकल रिव्यू’ (1904) की संपादक राधा एस. वर्नियर थीं। महिला पत्रकारिता का क्रांतिकारी नाम मैडम भीकाजी कामा 1905 से प्रकाशित ‘इंडियन सोशियोलिस्ट’ की नियमित लेखक रहीं। इसी में उनका वह संदेश प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने भारतीय युवकों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए कहा था। मदनलाल ढींगरा को गोली मारे जाने के बाद भीकाजी ने ‘मंदस तलवार’ (1909) निकाला। सितंबर में उसका नाम ‘वंदे मातरम्’ कर दिया गया। यह शीर्षक बंगाल से उधार लिया गया था, जहाँ इस नाम के पत्र पर सरकार ने रोक लगा दी थी। 9 वर्षों तक उनके पत्र ने जिनेवा तथा इंग्लैंड में भारतीयों का पक्ष रखने का काम किया। लाला हरदयाल ने कहा था- “जब मैं भारतमाता के साकार स्वरूप की कल्पना करता हूँ, तो मेरी आँखों में जो छवि उभरती है- वह है, मदाम भीकाजी की छवि।” ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया’ (1880) ने 1930 में बच्चों के लिए कॉलम शुरू किया, जिसे जेपसन की पत्नी आंटी विंडीज़ लिखा करती थीं। यह पृष्ठ इतना लोकप्रिय हुआ कि हज़ारों बच्चों के पत्र प्राप्त होने लगे। अंग्रेज़ी के पुराने पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ (1838) में चौधे पृष्ठ पर ‘पत्र महिलाओं के’ स्तंभ रहा करता था, जो प्रबुद्ध वर्ग की महिलाओं में काफ़ी लोकप्रिय हुआ। इसकी पहली विशेष संवाददाता उषा राय ने दिल्ली के अस्पतालों की दुर्दशा, मूल्यवृद्धि और थ्रेशर से हाथ कटने की घटनाओं पर लिखकर पत्रकारिता जगत् में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी थी। प्रसिद्ध पत्र ‘मॉडर्न रिव्यू’ (1907) का संपादन प्रकाशन रामानंद चटर्जी ने इलाहाबाद से किया तो भगिनी निवेदिता उनकी मुख्य सहयोगी बनीं। सन् 1910 में जब रामानंद बीमार हुए तो संपादकीय नोट्स उन्होंने ही लिखे। रामानंद उन्हें ‘जन्मजात पत्रकार’ कहते थे। श्रीमाँ ने पुडुचेरी से श्री अरविंद के साथ मिलकर एक दार्शनिक पत्रिका ‘आर्य’ का प्रकाशन किया। प्रवेशांक श्री अरविंद के जन्म दिवस 15 अगस्त, 1914 को इस उद्देश्य से निकला- “जीवन की उच्चतम समस्याओं का सुव्यवस्थित रूप में अध्ययन करना और एक विशाल समन्वयात्मक ज्ञात की रचना करना, जिसमें बौद्धिकता और विज्ञान आध्यात्मिक अनुभव के साथ संयुक्त हों।” श्रीमाँ द्वारा संचालित संपादित एक फ्रेंच पत्र भी था, जो एक वर्ष चलकर बंद हो गया।

अरुणा आसफ़ अली ने हिंदी-अंग्रेज़ी में ‘चिल्ड्रन न्यूज़’ (1924) दिल्ली से निकाला। पत्रिका ‘सहेली’ में विज्ञापन छपा था- “इसको पाते ही बालक तथा बालिकाएँ फूल उठते हैं और इसके लेखों को पढ़ते ही इतने मग्न हो जाते हैं कि उसकी कुछ थाह ही नहीं मिलती। इस पत्रिका में बालक तथा चालिकाओं के कर्तव्य ज्ञान, बीसों रसीली कहानियाँ, क्लब और ऐसी-ऐसी चीज़ों के बारे में लेख रहते हैं, जिनसे छोटे-छोटे बालक और बालिकाएँ स्वाभाविक तौर से प्रेम करते हैं, ख़ासकर 12 वर्ष से लेकर 16 वर्ष तक के बालक और बालिकाओं के लिए यह अपार लाभदायक तथा संतोषजनक है। विज्ञापन पढ़ते ही आज ही से 2 रु. 1 वर्ष के लिए भेजकर ग्राहक बन जाइए। इस पत्रिका का जून मास में एक विशेषांक कन्याओं के लिए ही निकलता है। इस अंक को अवश्य पढ़िए।” उमा नेहरू द्वारा संपादन भार लेने पर ‘सहेली’ ने पुनः लिखा- “अब तक इसका संपादन श्रीमती अरुणा आसफ़ अली तथा आर. रमणजी के हाथों में था। अब श्रीमती उमाजी नेहरू इसका अवैतनिक संपादन करेंगी- आशा है, श्रीमती उमाजी की इच्छानुसार इसमें हिंदी स्तंभ भी पहले की तरह अवश्य रहा करेगा।” ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण अरुणाजी को भूमिगत होना पड़ा। उस समय डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ मिलकर उन्होंने ‘इंक़लाब’ (1944) निकाला, जिसमें युवक-युवतियों से अपील की गयी थी- “इस समय हिंसा-अहिंसा की बहस में न पड़कर हमें लड़ाई जारी रखनी चाहिए। मैं चाहती हूँ कि देश का हर नागरिक अपने ढंग से क्रांति का सिपाही बने।” ‘साप्ताहिक लिंक’ (1958) का प्रकाशन तथा ‘दैनिक पैट्रियट’ (1968) का 20 वर्षों तक कुशलतापूर्वक संपादन उनके द्वारा किया गया। ‘पैट्रियट’ में ‘स्फुट विचार’ के अंतर्गत अरुणा आसफ़ अली लिखती हैं- “तेईस साल पहले 15 अगस्त, 1947 को उपनिवेशवाद ने अपने राजनीतिक ज़ुल्मों की चक्की तो हमारे सान से हटा ली, मगर अपना पिंड हम अभी तक छुड़ा नहीं पाये हैं। अंग्रेज़ी अमलदारी के पहले के और उसके दौर के सामंती ऊपरी ढाँचे को ढहा देने का काम अभी तक इसालए पूरा न हुआ कि हमारी कोशिशें मिलाकर एक नहीं की गयीं। एक वे किसी एसे राष्ट्रीय प्रोग्राम की बिना पर की जा सकती थीं, जिसे सब मानते, मगर राजनीतिक आज़ादी मिलते ही ‘सबकी राय की राजनीति’ की जगह ‘होड़बंदी की राजनीति’ ने ले ली। राजनाति के मैदान में कभी हैसियत रखने वाला हर शख़्स सत्ता के संघर्ष में मशग़ूल हो गया था।” यह दिल्ली से प्रकाशित ऐसा दैनिक था, जहाँ सर्वप्रथम महिलाओं को प्रूफ़ रीडर की ज़िम्मेदारी दी थी। डॉ. सोना शर्मा ने ‘नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत : श्रीमती अरुणा आसफ़ अली’ में लिखा- “आपातकाल के दौरान ‘पैट्रियट’ ने संजय गांधी की नातियों का खुला विरोध किया था। नेहरू परिवार से मित्रता होते हुए भी अरुणाजी ने ग़लत नीतियों का कभी समर्धन नहीं किया- भले ही इस दौरान लिंक-हाउस को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ा हो।” रजनी पनिक्कर ने मुंबई से प्रकाशित होने वाली एक अग्रेज़ी कहानी पत्रिका का संपादन किया, और बाद में भारत-विभाजन के उपरात पंजाब सरकार के सूचना विभाग के पाक्षिक ‘प्रदीप’ (1947) की संपादिका बन गयीं। दिल्ली के अंग्रेज़ी ‘मासिक हैड्डे’ (1944) के संपादकों में ऊषा राजेंद्रनाथ और मसर्रत तैमूरी रही। यहीं से मासिक ‘करियर्स एंड कोर्सेज़’ (1949) निकाला गया, जिसकी प्रकाशक विद्यावती थीं। ‘हिंदू’ (1878) के लिए अंजलि सिन्हा लिखती रही हैं। अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों से जुड़ी महिलाओं में अंजलि सरकार के अलावा कमला मानेकर भी थीं, जो दिल्ली के मेनस्ट्रीम, इंडियन न्यूज़ ‘क्रॉनिकल’ में काम करने के बाद 1950 में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से जुड़ गयीं। इसी पत्र में 1940-50 के बीच मैनडोनका भी रही थीं। अंग्रेज़ी पत्रकारिता में कारोल आँद्रे का नाम भी पढ़ने को मिलता है। मुंबई की गुलशन इविंग, ‘संडे की संडे’ गपशप कॉलम से चर्चा में आयीं, 80 के अंत तक ‘ईव्स वीकली’ (1947) और त्रैमासिक ‘स्टार एंड स्टाइल’ (1952) में संपादक रहीं। 1960 में ‘ईव्स वीकली’ में आने से पहले इविंग ने ‘फ़िल्मफ़ेयर’ (1952) और ‘फ़ेमिना’ (1959) में सहायक संपादक के रूप में काम किया था। मुंबई के ‘ऑल इंडिया वीकली’ (1954) की प्रकाशक शारदा वी. राव थीं। पेरीन तलयार ख़ान पहली महिला थीं, जिन्होंने एक साथ दो पत्रिकाओं, ‘ट्रेंड’ (1948) और ‘फ्लेयर’ (1958) का संपादन किया। ‘फ्लेयर’ (1959) को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में मिला दिया गया, तो वे महिलाओं की नयी पत्रिका ‘फ़ेमिना’ की पहली संपादक बन गयीं। बिमला पाटिल ने 1966 में ‘फ़ेमिना’ में सहायक संपादक और ‘युनाइटेड स्टेट सूचना सेवा’ में फ़ीचर संपादक के रूप में काम सँभाला। एलिज़ाबेथ राव और ज्योत्स्ना कपूर 1960 से 70 तक अंग्रेज़ी की पत्रकारिता में सक्रिय रहीं। यही वह समय था, जब पत्रकारिता की दुनिया में ज़ीनत इस्माइल, दीना वकील, देवयानी चौबल जैसे नाम सामने आते हैं। ढुबल, जो डॉक्टर हॉपर के नाम से भी जानी जाती रही हैं, ने ‘फ़्रैंकली स्पीकिंग’ नामक गपशप कॉलम लिखा था। अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों के इस काल में पत्रकारिता से जुड़ी महिलाओं में नी. सेनगुप्ते एक महत्त्वपूर्ण नाम रहा है। 1969 में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की प्रशिक्षण योजना के ज़रिये नीलम उपाध्याय ने मुंबई के ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ (1962) में प्रवेश किया। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ (1924) में विशेष संवाददाता रहीं प्रमिला कल्हण की रचनाएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थीं। पंजाब वि.वि. से एम.ए. (अंग्रेजी) करने के पश्चात् उच्चतर शिक्षा के लिए लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइन्स में चली गयीं। 1965 में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘ट्रिब्यून’ (1881) के लिए लगभग एक वर्ष तक काबुल एवं अफ़गानिस्तान से राजनीतिक स्तंभ लिखती रहीं। विश्व प्रसिद्ध राजनेताओं और कलाकारों से समय-समय पर उनके द्वारा लिये गये साक्षात्कार काफ़ी चर्चित रहे।

अंग्रेज़ी समाचार-पत्रों में पत्रकारिता से जुड़ी महिलाओं में ब्लू रंगनाथन, एम. रत्नाकुमारी के अलावा मधुमिता मजूमदार भी रहीं, जो पहली सहायक संपादक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (1932) थीं, बताती हैं- “दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ का एक वर्षीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम कर लिया। पत्रकारिता के ग्लैमर से मैं बहुत प्रभावित थी।-राजनीति के बारे में लिखने का बेहद शौक़ था। यहाँ आकर सारा शौक़ पूरा हो गया।” ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में कूमी कपूर संवाददाताओं की प्रमुख रहीं। यह ऐसा पहला अख़बार था, जहाँ महिला उप-संपादकों से रात्रिकालीन सेवाएँ ली गयीं। इसी पत्र की विशेष संवाददाता शिवानी भटनागर की 23 जनवरी, 1999 को पूर्वी दिल्ली में हत्या कर दी गयी थी। उस समय वे अपने तीन माह के शिशु के साथ घर पर अकेली थीं। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के वरिष्ठ संवाददाता राकेश भटनागर की 31 वर्षीय पत्नी शिवानी की गरदन, छाती और पेट पर चाकुओं से गोदे जाने तथा गरदन पर फंदा लगाने के निशान थे। हत्यारे किसी ख़ास चीज़ की तलाश में थे, क्योंकि उन्होंने सभी कमरों की तलाशी ली, किंतु कोई क़ीमती सामान नहीं उठाया। छुट्टी से पूर्व शिवानी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के लिए रिपोर्टिंग कर रही थीं। इस हत्याकांड में ज़िम्मेदार रहे आई.पी.एस. रविकांत शर्मा को सज़ा हुई थी। हिंदी, अंग्रेज़ी द्वि-मासिक ‘विदुर’ (1964) का प्रकाशन दिल्ली से हुआ। इसके संपादकों में रूपा जॉनसन का नाम मिलता है। इसी समय ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से पत्रकारिता जगत् में क़दम रखनेवाली प्रभा दत्त ने खोजपूर्ण पत्रकारिता द्वारा अपनी विशिष्ट पहचान बनायी। उन्होंने गृहविहीन लोगों के लिए आधी रात को जनगणना-कार्य की रिपोर्टिंग कर जो पोल खोली, तो लोग उनकी प्रशंसा किये बग़ैर नहीं रह सके। ‘चमेली देवी पुरस्कार’ पाने वाली चीफ़ रिपोर्टर प्रभा के बारे में वरिष्ठ पत्रकार बी.जी. वर्गीज़ ने लिखा था- “एक सजग, निर्भीक और खोजपरक पत्रकार के रूप में इन्होंने सदैव ही भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के खिलाफ अनवरत संघर्ष किया, विशेषकर शहरी मामलों में इनकी दृष्टि अधिक पैनी है।” बी.ए. करने के बाद चंडीगढ़ से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेने वाली और वाक्पटु सौम्य एवं खुले विचारों वाली प्रभा की दृष्टि में पत्रकारिता एक पेशा नहीं, एक गंभीर ज़िम्मेदारी का काम था। एक साक्षात्कार में वे कहती हैं, “मेरी उम्र के लोगों में पत्रकारिता के प्रति निष्ठा व उत्तरदायित्व का बोध था। आज की पीढ़ी में इस भावना का अभाव है। ‘फ़ीलिंग ऑफ़ रिस्पॉन्सिबिलिटी’ नहीं है। आज इस क्षेत्र में शौक़ की ख़ातिर या इसके प्रति निष्ठा के कारण नहीं, बल्कि इसके ग्लैमर के आकर्षित होकर आते हैं।- पत्रकारिता इतनी आसान नहीं, जितना लोग मान बैठे हैं कि मन में आया, लिख दिया। यह एक बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। एक सफल पत्रकार के लिए तथ्यों का छिद्रान्वेषण सबसे पहले ज़रूरी है।” पुरस्कार मिलने पर प्रतिक्रिया देती हैं- “अवॉर्ड चाहे छोटा हो या बड़ा, महत्व इसके छोटे-बड़े होने का नहीं होता, बल्कि इसके पीछे निहित भावना में होता है।” प्रेस की स्वतंत्रता पर मत व्यक्त करती हैं- “अगर ऐसा न होता तो आज देश के अख़बार शासन के ख़िलाफ़ कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं कर सकते थे। क्या इसे आप प्रेस की स्वतंत्रता नहीं मानते कि बिहार के मुख्यमंत्री अपने ही प्रेस विधेयक पर पुनर्विचार करने की सोचें?” पद्मा मिश्रा से की गयी बातचीत में नयी पीढ़ी से कहती हैं- “पत्रकारिता के ग्लैमर में न भटककर ज़िम्मेदारी से काम करें। नये पत्रकारों को एक-एक क़दम फूँक-फूँककर रखना होगा। जोश में व उतावलेपन में कोई काम न करें। जो भी काम मिले पूरी, खोज व जाँच-पड़ताल के बाद ही छपने को दें। पेशे व देश के लिए ईमानदार रहें।”

‘संस्कृति प्रतिष्ठान’ नई दिल्ली ने ‘प्रभा दत्त अध्येतावृत्ति’ प्रारंभ की है, इसमें एक लाख रुपये की राशि प्रदान की जाती है। यह अध्येतावृत्ति केवल प्रिंट पत्रकारों के लिए है, ताकि वे 25 से 40 आयु वर्ग की महिला पत्रकारों के समर्पण को बढ़ावा दे सकें कि वे सार्थक परियोजनाओं में काम करें, जिनमें अंग्रेज़ी, हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा में अनुसंधान करना या पुस्तक लिखना भी शामिल है। ‘स्टेट्समैन’ में कहा गया कि “संस्कृति प्रभा दत्त अध्येतावृत्ति स्वर्गीय प्रभा दत्त के सम्मान और स्मृति में स्थापित की गयी है, जिन्होंने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘इंडिया टुडे’ में निर्भीक पत्रकार का आभावान प्रगतिशील कॅरियर शुरू किया था।” ‘आनंद बाज़ार पत्रिका’ की संगीता घोष ने माना- “पुरुष प्रधान मानसिकता के चलते देश ही नहीं, दुनिया भर में महिला पत्रकारों को तमाम तरह के भेदभाव व उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। महिला पत्रकारों को पुरुषों की तुलना में दस गुना अधिक मेहनत करनी पड़ती है। फिर भी उन्हें दर्जा दोयम ही मिलता है। पुरुष की मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत है और इसमें महिला पत्रकार बहुत सशक्त भूमिका निभा सकती हैं। क़लम की ताक़त से कोई भी डर सकता है। क्षेत्र में जाकर, देखकर ही महिलाओं की स्थिति की सही जानकारी व उनके विकास की दृष्टि मिलेगी।” महिला पत्रकार यदि स्वयं भी एकजुट हो जाएँ और अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ तो स्थिति में कुछ सुधार आ सकता है।

सन् 1966 में मीनाक्षी रजी ‘फ़ेमिना’ में कार्यरत थीं। रतन करका ने अपने भाई के अख़बार ‘करंट’ (1949) में महिलाओं के लिए एक पृष्ठ शुरू किया था। पाँचवे दशक में रज़िया इस्माइल राजधानी के ‘स्टेट्समैन’ (1875) में डेस्क पर कार्यरत थीं। दूसरी महिला पत्रकारों में राज चावला एवं रीमा कश्यप थीं। लता राजे ने इसी समय मुंबई के ‘लोकसता’ (1948) से काम शुरू किया, बाद में वे उसकी सहायक संपादक बनीं। लखनऊ के ‘नेशनल हेरॉल्ड’ (1938) में कार्य करनेवाली विद्या नेहरू (विद्या दत्त) पहली ऐसी महिला पत्रकार थीं, जिन्होंने रात की पाली में काम किया। इसी पत्र से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाली शिल्पा श्रीवास्तव ‘पायनियर’ और ‘इंडियन रीडर’ से भी जुड़ीं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (1932) की पहली महिला ट्रेनी संध्या रंगाचारी बाद में स्टेट्समैन में चली गयीं। शहनाज़ अंकलेसरिया को पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिबद्ध कार्य हेतु ‘इंडिया टुडे पी.यू.सी.एल. पुरस्कार’ से नवाज़ा गया था। इंडियन एक्सप्रेस में पाँचवें दशक की अरुणा मुखर्जी और अमृता रंगास्वामी उन महिलाओं में से रहीं, जो सहायक संपादक बनीं। ‘लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स’ की स्नातक मुखर्जी ने समाचार एजेंसी में भी काम किया था। कालबादेवी ने मुंबई से साप्ताहिक ‘महाराष्ट्र ट्रेड बुलेटिन’ (1968) का प्रकाशन किया। यह व्यापारिक पत्र हिंदी-अंग्रेज़ी दो भाषाओं में निकलता था। सुभद्रा जोशी ने मासिक ‘सेकुलर डेमोक्रेसी’ इसी वर्ष निकाला। राजनीतिक लेखन करने वाली पत्रकार अनीस जंग, नई दिल्ली के पाक्षिक ‘यूथ टाइम्स’ (1972) की संपादक बनीं। इसी समय, पुडुचेरी से मासिक ‘योगा लाइफ़’ (1973) निकली, जिसकी संपादक ए.वी. मीनाक्षी देवी रहीं। इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘इंडिया’ (1974) की संपादक मीरा सिन्हा और गीति सेन बनीं। अंग्रेज़ी मासिक ‘सर्च इंटरनेशनल’ (1976) नई दिल्ली से उमा वासुदेव ने निकाला। वे अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी लेखन किया करती थीं। ‘इंडिया मैगज़ीन’ (1980) मुंबई से मल्लिका सिंह द्वारा निकाली गयी। ‘स्टेट्समैन’ नई दिल्ली की संवाददाता तवलीन ने रजनी माथुर से बातचीत में कहा था- “पत्रकार एक मानव इकाई है- लड़की या लड़का नहीं।” पत्रकारिता की देहरी पर नारी की दस्तक में सीमा मुस्तफ़ा बताती हैं- “मुझे लखनऊ में ही, जहाँ हम रहा करते थे, ‘पायनियर’ अख़बार में संवाददाता का काम मिल गया। तीन वर्ष मैंने वहाँ नगर संवाददाता की हैसियत से काम किया। उसके बाद दिल्ली आयी तो ‘लिंक’ में काम मिल गया। यहाँ मैं उप-संपादिका और संवाददाता हूँ।” माया शर्मा उप-संपादिका, ‘नवभारत टाइम्स’ पहले आकाशवाणी में थीं, पर पत्रकारिता में रुचि होने के कारण अवसर मिलते ही प्रिंट मीडिया में आ गयीं। नवभारत टाइम्स की संवाददाता मणिमाला ने खोजपूर्ण पत्रकारिता में काफ़ी ख्याति प्राप्त की। राजनीतिक भ्ष्टाचार को उजागर किया। विभिन्न पारिवारिक-सामजिक सरोकार से संबंधित समस्याओं पर लेख लिखे। संवाददाता के रूप में उत्कृष्ट रिपोर्टिंग की। उनका स्वर स्पष्ट, निर्भीक और क्रांतिकारी रहा। भारत की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख छपे। कूमी कपूर संवाददाता, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ बताती हैं- “मैं फ़ोटोग्राफ़र पत्रकार बनना चहती थी। मैंने फ़ोटोग्राफ़ी सीखी भी, लेकिन बंबई मे पत्रकारिता पाठ्यक्रम करने के बाद दिल्ली में पत्रकार बन गयी।” ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रूपा कहती हैं- भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता का डिप्लोमा कर लिया। फिर अख़बार मे आ गयी। हालांकि मैं पत्रकार बनना चाहती थी, पर भाग-दौड़ मुझे पसंद नहीं। समाचार संपादन मुझे पसंद है इसलिए उप-संपादिका बनी।”

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नई दिल्ली से मनोरमा जफ़ा ने अंग्रेज़ी त्रैमासिक ‘राइटर एंड इलस्ट्रेटर’ (1982) निकाली। ‘बाल साहित्य लेखन प्रयोग और समस्याएँ’ में लिखती हैं- “कुछ वर्ष पहले बालकों में विशेष रचि रखने वालों को यह महसूस हुआ कि बच्चों के लिए सहित्य का दायरा बढ़ाना ही होगा और नये साहित्य की रचना भी करनी होगी। यह नया साहित्य बाल दृष्टिकोण, वास्तविकता पर आधारित रोचक मौलिक कथाएँ व साइन्स फ़िक्शन ज़रिये बच्चों के आयुवर्ग को ध्यान में रखकर ही बनाना होगा, पर यह कैसे बनाया जाये, इस पर किसी वर्ग ने ध्यान नहीं दिया।” सबीना इंद्रजीत सन् 1983 में ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से जुड़ीं और मेहनत, सूझ एवं लेखन क्षमता के बल पर पहचान बनाते हुए विशेष संवददतता बनीं। टाइम्स कर्मचारी संघ ने उनको तीन बार उपाध्यक्ष चुना। सन् 1998 में प्रेस परिषद् में टाइम्स समूह के मालिक अशोक जैन के ख़िलाफ़ शिकायत पहुँची कि वे अपने ख़िलाफ़ चल रहे विदेशा मुद्रा विनियमन क़ानून उल्लंघन के मामले में बचाव के लिए अख़बार को मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। चूंकि सबीना परिषद की सदस्य थीं, अतः उनका स्थानांतरण गुवाहाटी कर दिया गया। उसके बाद उनकी पत्रकारिता पर विराम लग रया। कुलसुम मुस्तफ़ा ने 1983 में नॉर्दर्न इंडिया से पत्रकारिता प्रारंभ की। तत्पश्चात् ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में काम किया और उत्तर प्रदेश में रात्रि में काम करने वाली पहली महिला पत्रकार बनीं। इन्होंने वर्ष 2004 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की प्रमुख संवाददाता के पद कार्य किया। मुंबई से हिंदी-अंग्रेज़ी मासिक ‘स्टार डस्ट’ (1984) के संपादक मंडल में प्राची बादशाह, निशी प्रेम, अश्चिन बर्वे थीं। डॉ. शशिप्रभा आर्य मुंबई से 1985 में प्रकाशित ‘द वर्ल्ड साइंटिस्ट’ की संपादक रहीं। वर्ष 1987 में मुंबई से निकला मासिक ‘इनसाइड आउटसाइड’ की संपादक शौला शाहनी हैं। चित्रा सुब्रह्मण्यम को वर्ष 1989 में ‘चमेली देवी पुरस्कार’ दिया गया। छोटी उम्र में बड़ा पुरस्कार प्राप्त करने वाली, बोफ़ोर्स से चर्चित हुई इस पत्रकार ने सात वर्ष के अल्प समयकाल में अपनी साख बना ली थी। भारत का सर्वोच्च पत्रकारिता पुरस्कार ‘भगवानदास गोयनका पुरस्कार’ और ‘सर्वोत्तम महिला पत्रकार पुरस्कार” पाने वाली चित्राजी ने जिनेवा में रहते हुए बोफ़ोर्स के तथ्य जुटाये और निजी जोखिम उठाते हुए दलाली से लाभ लेने वाले लोगों के सभी प्रयासों को नकारते हुए सभी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ हासिल करने में सफलता प्राप्त की। मेघना बी. कुमार को दिये साक्षात्कार में वे स्वीकार करती हैं, “महिलाएँ इस व्यवसाय के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक उपयुक्त हैं- नारी का स्वभावगत गुण ही उसे पत्रकारिता के लिए पुरुष की तुलना में अधिक उपयुक्त बनाता है, उसे घटनाओं को अधिक निष्यक्ष रूप में व सही संदर्भों में देख पाने की दृष्टि देता है।” इस पुरस्कार ने उन्हें एक निर्भीक, लगनशील और जोखिम से खेलने वाली पत्रकार के रूप में स्थापित कर दिया। पुरस्कार समिति ने टिप्पणी की थी- “चित्रा को यह सम्मान भ्रष्टाचार व सत्ता पर व्यावसायिक एकनिष्ठा के विषय स्वरूप दिया गया है।” अनुराधा थारेश्वर मुंबई से प्रकाशित मासिक ‘वन इंडिया वन पीपॅल’ (1997) की संपादक तथा सब एडिटर राजलक्ष्मी पिल्लई हैं। दिल्ली की गीतन बत्रा 1998 से 2008 तक ‘इंडिचन डिसीज़न एंड इंटीरियर्स’ की संपादक रहीं। भोपाल से प्रकाशित मासिक ‘मध्य भारत’ (2008) की डेस्क एडिटर एवं ट्रांसलेटर वंदना माथुर थी। स्वाति देशपांडे सीनियर असिस्टेंट एडिटर (लो) ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बारे में बताती हैं- “जब सी.एस.टी. में फायरिंग शुरू हुई, मैं ऑफ़िस में थी। मैं एक रिपोर्टर के साथ तुरंत वहाँ गयी। मैंने देखा, स्टेशन के अंदर से एक ज़िंदा ग्रेनेड सड़क पर फेंका गया था। रेलवे के एक कमचारी ने ऑफ़िस सिक्योरिटी को तुरंत सारे एंट्रेंस बंद करने के निर्देश दिये।” चंडीगड़ की युवा स्वतंत्र पत्रकार किरण जोशी के संपादन में पंजाबी व अंग्रेज़ी में मासिक ‘आधी दुनिया’ का प्रकाशन हुआ। ‘पायनियर’ की कंचन गुप्ता उस समय सुर्ख़ियों में आयीं, जब सरकार ने असम हिंसा पर अफ़वाहों को मद्देनज़र रखते हुए कई ट्विटर एकाउंट्स ब्लॉक किये। उनमें से एक एकाउंट कंचन गुप्ता का भी था। निवेदिता शाह मासिक ‘बजाज कैपिटल इन्वेस्ट इंडिया’ (2001) की प्रोडक्ट मैनेजर हैं। यह न्यू देहली से निकला। प्रेरणा शाह फ़ीचर राइटर हैं और ‘बड़ौदा टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से जुड़ी हैं, लिखती हैं- “मुझे लेखन कार्य के प्रति रुचि तथा अलग-अलग लोगों से मिलने की चाह ने पत्रकारिता के प्रति आकर्षित किया।”

नई दिल्ली के ‘लाइफ़ पॉज़िटिव’ की प्रधान संपादक सुमा वर्गीज़ ने ‘आपकी बात को प्रधानता’ में लिखा- “संपादकीय के माध्यम से पुनः एक बार आपसे संवाद स्थापित करने का अवसर मिला। मैं आपकी उत्साहजनक व अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिए आभारी हूँ। हमें अपने पाठकों से प्रतिदिन इतने पत्र प्राप्त हो रहे हैं कि हमने ‘आपकी बात’ कॉलम को दो पृष्ठों का करने का निश्चय किया।” ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ भोपाल की सुचाँदना (विशेष संवाददाता) अंजना गुप्ता को बताती हैं- “मैं मूलतः कोलकाता की रहने वाली हूँ। मैंने धीरे-धीरे स्पेशल स्टोरीज़ करनी शुरू कर दी। ये सभी क्राइम स्टोरीज़ होती थीं। मुझे तीन-चार साल बाद ओडिशा में नंबर तीन पोज़ीशन में ही भेजा गया। ‘टेलिग्राफ़’ में गयी। वहाँ से मध्य प्रदेश आयी। पहले ‘टेलिग्राफ़’ में, बाद में टाइम्स आफ़ इंडिया से जुड़ी। जब समाचार-पत्र में पहले पन्ने पर आपका लिखा छपता है, तो उस आनंद, उस ख़ुशी को समझ पाना कठिन होता है।” ‘टाइम्स नाउ, मुंबई’ की ब्यूरो चीफ़ दीप्ति मेनन ने 26 नवंबर, 2008 को 9 बजकर 45 मिनट की घटना का बयान इस तरह किया- “मैं घर में घुसी ही थी कि मेरे कैफ़ै लियोपॉल्ड से अटैक का मैसेज आया, तुरंत दो रिपोर्ट्स को जगह पर पहुँचने के निर्देश दिये। एक सबसे सीनियर पुलिस अफ़सर हमसे यह कहते रहे कि यह एक गैंगवॉर है, लेकिन जब कुछ सानियर पुलिस अफ़सर मारे गये तो हमें एहसास हुआ कि यह आतंकवादी हमला है। इसके बाद हमने ओबरॉय आर फिर ताज होटल में कवरेज किया। मैंने ताज से लाइव रिपोर्टिंग 27 नवंबर को शाम 5 बजकर 30 मिनट से शुरू की। हमने वहाँ साठ घण्टे बिताये। ऑपरेशन के अंत में एन.एस जी. कमांडो ने कहा, “हमारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है।” पारिवारिक प्रतिक्रिया के बारे में कहती हैं, “मैं आठ सालों से इस प्रोफ़ेशन में हूं। मैंने इससे पहले ट्रेन ब्लास्ट और सुनामी का कवरेज भी किया है। मेरा परिवार मेरे लिए सबसे बड़ी शक्ति है। पहली बार लाइव एनकाउंटर का कवरेज किया है, लेकिन मुझे अपनी सुरक्षा का ख़याल ही नहीं था। समाचारों को ऑन एयर करने के अलावा मेरी और कोई चिंता थी ही नहीं, हालाँकि मैंने सिक्योरिटी पर्सनल की सभी गाइडलाइन्स फॉलो कीं और यह ध्यान रखा कि कोई भी सेंसिटिव सूचना ऑन एयर न होने पाये। यह जानना कि आप जो कर रहे हैं, वाक़ई दूसरों के लिए अच्छा है।”

अनु आनंद प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की पत्रिका ‘ग्रास रूट’ की एसोसिएट एडिटर रही हैं। उन्होंने 1986 में बैंगलोर यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की डिग्री प्राप्त की और पत्रकारिता क्षेत्र में आ गयीं। उनकी विशेष रुचि विकास पत्रकारिता करना रही। किताबें भी लिखी हैं। डेवलपमेंट जर्नलिज़्म पर कहती हैं- “मीडिया एक ऐसा माध्यम है, जिसके ज़रिये हम समाज में फैल रही बुराइयों को, अंधविश्वासों को सही मूल्यांकन के साथ लिखकर जनमानस को जानकारी देते हैं। साथ ही, आगाह करते हैं कि वे सावधानी से सच्ची बात को जानें। 1998 में पैनोस लंदन से फ़ेलोशिप मिली, जिसमें मुझे सुरक्षित मातृत्व पर कार्य करना था, आदिवासी पहाड़ी महिलाओं पर कार्य किया। लगातार छह माह मैं घने जंगलों के गाँवों में भी गयी- जीवन की अनमोल धरोहर रही यह फ़ेलोशिप।” इसी में अंग्रेज़ी ‘आउटलुक’ से जुड़ी शाइनी मानती हैं कि सकारात्मक लेखन माहौल बदलता है- “ससुराल वालों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में आने का सुझाव दिया। ससुर पी.टी.आई. में थे। मुझे इस फ़ील्ड में काम करते हुए कई साल हो गये हैं- समाज में मीडिया बहुत बड़ा रोल अदा करता है। उसकी ज़िम्मेदारी बहुत ज़्यादा होती है।” फ़ीचर राइटिंग करने वाली बड़ौदा की श्रद्धा व्यास ने बताया- “लिखने का जोश मुझे लंदन स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म तक ले जा पहुँचा और मैंने 80 प्रतिशत से फ्रीलांस और फीचर राइटिंग में ऑनर्स डिप्लोमा किया। इस बीच गुजराती ज़ोन ‘वी.एन.एम. टाइम्स’ और ‘न्यूज़ कॉर्ट’ जैसे प्रिंट माध्यम में काम करने का मौक़ा मिला।”

‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ और ‘इंडिपेंडेंट’ में रहीं रंजना माथुर ने अमेरिका के ऐशबर्न में रहते हुए स्त्री मुद्दों पर लेखन किया। ‘अहा ज़िंदगी’ में ‘हमारी दुनिया कल आज और कल’ में ‘लड़की को दिखता आकाश’ शीर्षक से लिखती हैं- “सहानुभूति दया-त्याग सालों से ये गुण स्त्री के पर्याय बना दिये गये हैं, बिल्कुल चेहरे पर लगने वाले मेक-अप की तरह। इसी सब के चलते नब्बे के दशक तक स्त्री की दुनिया भरी रही, ऊबड़-खाबड़ रास्तों से और पुरुष खोजता रहा ‘नयी दुनिया’, नये विचार, नये रास्ते हक़ीक़त यह रही न तो पति ने उसे खाना-कपड़े देने में दिलचस्पी ली और बुढ़ापे में पुत्र ने जब चाहा, उसे घर से बाहर फेंक दिया। तब समाज ने कार्य क्षेत्र में स्त्री का आना स्वीकार किया।” ‘बिज़नेस लाइन’ की संपादक रशीदा भगत मानती हैं- “महिला पत्रकार औरतों से जुड़े मामलों पर लिखने के लिए अधिक सहज व सक्षम हैं। स्वयं महिला होने के कारण वे उन परिस्थितियों और मजबूरियों को बेहतर समझ सकती हैं, जिनमें भारतीय स्त्रियों को रहना पड़ता है।” भारत की स्त्री की स्थिति दुनिया के अन्य देशों की तुलना में अधिक अस्पष्ट, अस्थिर, असुरक्षित और असामान्य मानी जाती है। भारत में अंग्रेज़ी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में दिनो-दिन समृद्ध होती जा रही है, क्योंकि अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़कर निकलने वाली और पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने वाली लड़कियाँ पत्रकारिता के ग्लैमर से प्रभावित हैं। यही कारण है कि नित नये नाम अंग्रेज़ी पत्रकारिता में जुड़ते जा रहे हैं।

निष्कर्षतः ‘भारतीय पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में महिला पत्रकारिता’ सर्वप्रथम एक अंग्रेज़ महिला श्रीमती प्रिंटचार्ट के ‘इंग्लिशमैन’ की मालिक बनने से प्रारंभ होती है। इसी तरह के अनेक उदाहरण रहे हैं, जब पति के निधन पर या जेल जाने पर पत्नियों ने पत्र-पत्रिकाओं को सँभाला है। पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में अंग्रेज़ी पत्रकारिता में पहला नाम श्रीमती ऐनी बेसेंट का है। वे ऐसी पहली महिला पत्रकार थीं, जिन्होंने पत्रकारीय लेखन द्वारा अपनी जीविका चलायी। ‘कॉमनवील, न्यू इंडिया’ जैसे पत्रों का न केवल प्रकाशन-संपादन किया, अपितु पत्रकारिता के माध्यम से राजनीतिक हस्तक्षेप भी किया। फ्री प्रेस समाचार अभिकरण की शुरूआत कर, स्वदेशी समाचार अभिकरणों की भी जन्मदाता बनी। पहला महिला प्रिंटिंग प्रेस उनके द्वारा ही खोला गया और भारत में पत्रकारिता शिक्षा की जनक भी वे ही रहीं। भारतीय युवकों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने की हुंकार भरने वाली पत्रकार मैडम भीकाजी कामा ने इंडियन सोशियोलिस्ट, मंदस तलवार, वंदे मातरम् के द्वारा पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखने की भूमिका निभायी। उस समय के पत्रकार उनमें ‘भारत माता’ का साकार रूप देखा करते थे। बच्चों के लिए पहला कॉलम लिखने वाली आंटी विंडीज़ थी, उनके बाद पत्रिकाओं में महिलाओं द्वारा कॉलम लिखे जाने लगे। अरुणा आसफ़ अली ने पत्रकारिता की शुरूआत बच्चों से की। राष्ट्रीय आंदोलन के दौर से गुज़रते हुए आपातकाल तक के समय की पत्रकारिता करने वाली अरुणा हिंसा-अहिंसा की बहस में कभी नहीं पड़ीं और आज़ादी की लड़ाई को हर क़ीमत पर जारी रखने के पक्ष में रहीं। आज़ादी के बाद पत्रकारिता में भी, उन्होंने ‘सबकी राय की राजनीति’ की जगह, ‘होड़बंदी की राजनीति करने वालों को ख़ूब लताड़ा था। सबसे पहले महिलाओं को प्रूफ़ रीडर की ज़िम्मेदारी सौंपने वाली वे ही थीं।

आज़ादी के बाद की अंग्रेज़ी महिला पत्रकारिता विकास के साथ-साथ नये युग की पत्रकारिता के रूप में सामने आयी, ऊषा राजेंद्रनाथ, मशरत तेमूरा, अंजलि सिन्हा, अंजलि सरकार, कमला मानेकर, मैनडोनका, गुलशन इविंग, शारदा वी. राव जैसी अनेक महिला पत्रकारों ने अंग्रेज़ी भाषा की पत्रकारिता को गति प्रदान की। पेरीन तलयार ख़ान अंग्रेज़ी की ऐसी महिला पत्रकार रहीं, जिन्होंने एक साथ दो-दो पत्रिकाओं ‘ट्रेंड’ और ‘फ्लेयर’ का संपादन किया था। देवयानी ढुबल जो ‘डॉक्टर हॉपर’ के नाम से जानी जाती थीं, ने ‘फ्रेंकली स्पीकिंग’ गपशप चर्चित कॉलम लिखा। प्रमिला कल्हण ने एक वर्ष तक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘ट्रिब्यून’ के लिए काबुल और अफ़गानिस्तान से राजनीतिक स्तंभ लिखे थे और संसार भर के अनेक कलाकारों, विश्व प्रसिद्ध हस्तियों से साक्षात्कार लेकर इतिहास रचा। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की प्रभा दत्त ने खोजी पत्रकारिता करते हुए, लीक से हटकर जनसामान्य से जुड़े मुद्दों को पत्रकारिता का विषय बनाते हुए, गृहविहीन लोगों के लिए आधी रात को जनगणना कार्य की रिपोर्टिंग कर भ्रष्टाचार और अव्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष किया। पुरुष प्रधान मानसिकता के चलते अंग्रेज़ी पत्रकारिता में महिला पत्रकारों को भेदभाव और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना के बावजूद अंग्रेज़ी पत्रकारिता में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत सम्मानजनक रही। उनके कृतित्व को समय-समय पर नवाज़ा भी जाता रहा। अंग्रेज़ी पत्रकारिता का ग्लैमर महिलाओं में कुछ अधिक ही देखा गया। उन्होंने अपने कार्य द्वारा यह सिद्ध किया कि ‘पत्रकार एक मानव इकाई है, स्त्री या पुरुष नहीं’। महिला पत्रकार संगठनों में भी अंग्रेज़ी की महिला पत्रकारों की अच्छी ख़ासी उपस्थिति देखने को मिलती है। यह अलग बात है कि उसके कारण कई बार उन्हें अपने संस्थान की प्रताड़ना का भी शिकार होना पड़ा। फिर भी वे निर्भीक, लगनशील और जोखिम से खेलने वाली, पुरुषों से क़दमताल करने वाली पत्रकार सिद्ध हुईं।

मंगला अनुजा, mangla anuja

डॉ. मंगला अनुजा

वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और लेखक। आधी दुनिया की पूरी पत्रकारिता, भारतीय पत्रकारिता के नींव के पत्थर जैसी शोधपरक पुस्तकों के साथ ही हेमंतकुमारी देवी चौधरी और सुभद्राकुमारी चौहान पर मोनोग्राफ़ भी प्रकाशित। आधा दर्जन संदर्भ पुस्तकें आपके नाम। आंचलिक पत्रकार, कर्मवीर जैसे पत्रों के संपादन के साथ ही अनेक संकलनों एवं ग्रंथों का संपादन भी। सप्रे संग्रहालय में शोध में निरंतर संलग्न। अध्यापन एवं शोधार्थियों के मार्गदर्शन का अनुभव। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित। संपर्क: 9827510592

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