दृष्टिकोण, आंदोलन, मौलिकता और क़ैफ़ी आज़मी
पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

दृष्टिकोण, आंदोलन, मौलिकता और क़ैफ़ी आज़मी

         ‘गूंजती आवाज़ें’ में प्रस्तुत आलेख मेरी स्मृति के पन्ने थे, जिन्हें मैं आपके सामने पलटता रहा। शायरी/ग़ज़ल से संबंधित शायर, किताब, शब्द या कोई घटना जिसने मुझे उद्वेलित किया या जिसकी छाप मेरे मन में रह गयी, उन्हें लिखता रहा। अभी भी ऐसा नहीं है कि स्मृति के सारे पन्ने पलटे जा चुके हैं, कुछ न कुछ शेष रह जाता है। लेकिन कुछ वक़्त के लिए इस मोनोटोनी को तोड़ना चाहता हूँ। इसलिए ‘गूंजती आवाज़ें’ का ये अंतिम आलेख है। अंतिम आलेख भी क्या चन्द शब्द हैं, कुछ बातें जाते-जाते कहना चाहता हूँ।

मैं सोचता हूँ कविता या शायरी में नये दृष्टिकोण और नये विषयों की सतत खोज शायर के स्वभाव में होनी चाहिए लेकिन बाज़ारवाद का फेर है या मंच की लालसा, शायर नये प्रयोग नहीं कर पाता है। शायरी की राह में बहुत-से अनछुए विषय और समस्याएं प्रतीक्षा करती रहती हैं मगर शायर उनसे बचकर निकल जाता है। दूसरी बात यह भी है कि शायर नये-नये दृष्टिकोण या नये विषय का चयन न भी करे, फिर भी वर्तमान समय उसके लिए एक तहरीक या आंदोलन बचा ही देता है, जिस पर वह अपनी पूरी शायरी न्योछावर कर सकता है।

यह बात तय है कि विषय की दृष्टि से शायरी का कैनवस बहुत व्यापक नहीं है फिर शायर को अपनी पूरी शायरी समय की परतों में छुपे हुए उसी आंदोलन की पहचान करने और उसको मुकाम तक पहुंचाने में समर्पित कर देनी चाहिए। आंदोलन का अर्थ है-सामर्थ्य, आंदोलन का अर्थ है- प्रतिरोध, आंदोलन का अर्थ है- न्याय। हिंसा, अन्याय और असत्य जब धर्म, सभ्यता और देशप्रेम का चोग़ा पहनकर सामने आ जाएं तब शायर उसे पहचान सकता है। समय की समझ उसकी शायरी में नयी कैफ़ियत पैदा करती है। आंदोलन से अभिव्यक्ति में नये तेवर आते हैं। वह शायर ही नहीं है, जिसकी शायरी में सामर्थ्य न हो, प्रतिरोध की ध्वनि सुनायी न दे या जो न्याय की बात न कहे।

आज का समय शब्दों पर भारी है, वास्तव में शब्द आज मुर्दा हो रहे हैं। शब्दों में वे अर्थ बचे ही नहीं हैं, जो हिंसा की समर्थक सांप्रदायिकता से, अन्याय की समर्थक सत्ता से, असत्य के समर्थक उपभोक्तावाद से मुक़ाबला कर सकें। शायर को आलोचना की तराज़ू के पलड़ों पर अपने भाव, अपने अनुभव और अपनी नयी-पुरानी धारणाएं रखकर देखना चाहिए। वह स्वयं लिजलिजी और ठोस नैतिकताओं के भार में अंतर कर सकता है। वह शब्द जिसने कविता के घेरे में प्रवेश पा लिया है, अर्थ की अनगिनत सरहदों को पार करके वहाँ तक पहुँचता है, इसके बावजूद शब्द और उसके मुहावरे से खिलवाड़ न करते हुए शायर को शब्द के अर्थ बदलने चाहिए। शब्द जहाँ भावनाओं की छत में सुरक्षित हैं, फिर भी शब्दों के बर्ताव में है कि वे भेड़चाल से जुदा हो सकते हैं। उनमें भेड़ियों की तरह चपलता और उद्दंडता भी हो सकती है। शायर को उस हर शब्द से मिलने और उसका प्रयोग करने के लिए उत्सुक होना चाहिए, जो कविता या शायरी को जीवित कर सके। कविता के जीवित होने से तात्पर्य है कि वह वर्तमान से संबंधित हो। शब्दों की शैली, शब्दों में विचार, शब्दों से बिम्ब उभरें वे सब आज की बात कहें। उनमें अनछुई-सी रूमानियत हो, उनमें अनसुने-से प्रतीक होने चाहिए। शब्दों को मौलिकता कठिनाई से मिलती है। शायर को उसकी तलाश में भटकते रहना चाहिए। शायर शब्दों को पहेली की तरह सामने नहीं रख सकता। चित्रकार आड़ी-तिरछी रेखाओं से एब्सट्रेक्ट बना सकता है। संगीत में लयकारी के बहुत-से अंदाज़ पेश किये जा सकते हैं लेकिन शब्दों में उलझाव नहीं होना चाहिए। शब्द जो प्रेम से संबंधित हैं, शब्द जो संघर्ष की बात करते हैं, शब्द जो प्रश्न उठाते हैं उन्हें सटीक और स्पष्ट होना चाहिए।

इस आलेख में अब तक जितने शब्द मैंने लिखे वे सब इस एक नज़्म को ध्यान में रखकर लिखे गये हैं-

उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं
जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे

ग़ोशे-ग़ोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए

क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए

रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे…

क़ैफ़ी आज़मी साहब ने अपने लिए जिन दृष्टिकोणों और विषयों का चयन किया, वह उस पर अडिग रहे। उन्होंने जिस तहरीक़-आंदोलन को हवा दी, उसकी ख़ातिर समर्पित रहे। शब्दों का प्रयोग भी शायरी के तेवर को बरक़रार रख सका। उनकी शायरी ने जिस राह को चुना, उस पर चलकर ही उनमें मौलिकता आयी।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

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