
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
नाम ही जिनका परिचय है, वह लता मंगेशकर कोरोना काल में अस्वस्थ होने के बाद जब ठीक होकर अपने निवास 'प्रभु कुंज' लौटीं तो स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से उनके कमरे में डॉक्टर और नर्स के सिवाय किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी। यही वह समय था जब भारतरत्न पंडित रविशंकर की जन्मशताब्दी के सिलसिले में संस्कृति विभाग के लिए वरिष्ठ लेखक डॉ. दिनेश पाठक एक मोनोग्राफ़ तैयार कर रहे थे। इसी सिलसिले में एक और भारतरत्न के संस्मरण सम्मिलित करने की प्रेरणा से उन्होंने लता जी से भेंट के निरंतर प्रयास किये। चिकित्सकीय कारणों से लता दीदी से प्रत्यक्ष भेंट संभव नहीं हो सकी। फिर भी किसी तरह तय हो गया कि उनकी सुविधानुसार थोड़ी-थोड़ी देर फ़ोन पर बात करके यह कार्य पूर्ण किया जा सकता है। फ़ोन पर बातचीत का सिलसिला निरंतर कई दिन चला और लता दीदी ने, 92 वर्ष की आयु के बावजूद न केवल पंडित रविशंकर बल्कि अपने जीवन, कला, संबंध और पसंद-नापसंद आदि को लेकर तमाम बातें साझा कीं। इन्हें लेखक ने अपनी शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'ऐसे भी बातें होती हैं' में सिलसिलेवार संजोया (दुर्लभ चित्रों सहित) है। लता मंगेशकर की पुण्य तिथि (6 फरवरी) पर विशेष रूप से यहां प्रस्तुत हैं चुनिंदा अंश...
मैं तुम्हारे लिए गा रही हूं... लता मंगेशकर का अंतिम इंटरव्यू
प्रत्येक व्यक्ति की आवाज़ की प्रकृति भिन्न होती है, अतएव, लता मंगेशकर अपनी आवाज़ को, अभिनेत्री की आवाज़ के अनुसार मॉड्यूलेट करके ही गीत गाती थीं। अनेक गीतों में उन्होंने दो अभिनेत्रियों को एक ही गीत में अपना स्वर दिया है और उन गीतों को लता जी ने अपने गायन में दो अलग अंदाज़ या अप्रोच के साथ गाया है।
शायद यही कारण था कि भारतीय फ़िल्मों की चोटी की अभिनेत्रियां प्रोड्यूसर, डायरेक्टर से अपने लिए उन्हीं के पार्श्वगायन की ज़िद करती थीं और कई तो इसी बात पर फ़िल्म छोड़ने तक के लिए तैयार रहती थीं। थिएटर्स के मालिक, फ़िल्म के वितरकों से माँग रखा करते थे कि फ़िल्म में लता जी के कम से कम इतने गीत तो चाहिए ही, जिससे फ़िल्म हिट हो सके। वितरक, इस माँग को आगे निर्माता, निर्देशकों के समक्ष रखते। लिहाज़ा, फ़िल्मों के निर्देशक संगीतकारों के सम्मुख यह शर्त रखने लगे कि उनकी फ़िल्म में लता जी के कम से कम पांच-छह गीत तो होने ही चाहिए, इससे कम उन्हें मंज़ूर नहीं। निर्देशकों की इन अपेक्षाओं को पूरा करते हुए कई संगीतकारों ने अपनी संगीत शैली तक बदल डाली। गीतकार इसी दृष्टिकोण से गीत लिखते कि ये बोल लता जी के सुरों से सजेंगे। देखते ही देखते लता मंगेशकर के सुरों ने पार्श्वगायन के मापदंड ही बदल दिये और यहीं से शुरूआत हुई थी, उस दौर की जिसे हम भारतीय फ़िल्म संगीत का स्वर्णिम युग मानते हैं।
लता मंगेशकर ने सर्वोत्कृष्ट गायिका की प्रतिष्ठा सन् 1949 में ही पा ली थी और वे चाहतीं तो अपने गायन को सिर्फ़ शीर्ष अभिनेत्रियों तक ही सीमित रखते हुए कम प्रसिद्ध या नयी अभिनेत्रियों के लिए गाने से मना भी कर सकती थीं लेकिन उन्होंने इस कारण से कभी भी किसी गीत को गाने से मना किया हो, ऐसा कभी सुनने में नहीं आया।
लता मंगेशकर के गीत को सुनकर श्रोता के मन में तुरंत उसे पर्दे पर गाने वाली अभिनेत्री की छवि साकार हो उठती थी। वह सन् 1949 की फ़िल्म ‘बरसात’ में “हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुप्पटा मलमल का…” गाने वाली विमला हो या 1971 की फ़िल्म ‘बॉबी’ में “अक्सर कोई लड़की इस हाल में, किसी लड़के से सोलहवें साल में…” गाने वाली डिंपल, या 1995 की फ़िल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में, “मेरे ख़्वाबों में जो आये, आ के मुझे छेड़ जाये…” गाने वाली काजोल। यह वो सिलसिला था जो दशक दर दशक अभिनेत्रियों की कई पीढ़ियों तक निरंतर चलता रहा।
युगल गीतों में हेमंत कुमार, मुकेश, मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, मन्ना डे और तलत मेहमूद से लेकर शैलेंद्र सिंह, उदित नारायण, सोनू निगम और अभिजीत तक पीढ़ी दर पीढ़ी पुरुष स्वर बदलते रहते लेकिन लता वही रहीं।
जब हमने उनसे यह पूछा कि, पिछले आठ दशक के दौरान आपने भारतीय फ़िल्म जगत की लगभग सभी अभिनेत्रियों के लिए अपनी आवाज़ दी, आपके विचार से आपकी आवाज़ कौन-सी अभिनेत्री के ऊपर सबसे अधिक फबती है तो लता जी कहने लगीं:
“मैं सोचती हूं मेरी आवाज़ मीनाकुमारी, नरगिस, नूतन और साधना पर अधिक अच्छी लगती है और उनकी भाव-भंगिमा के साथ मैच भी करती है। सायरा जी की आवाज़ भी पतली होने के कारण उन्हें भी मेरी आवाज़ सूट करती थी।”
एक ओर जहां लता के स्वर पर ओंठ हिलाने वाली हर एक अभिनेत्री को यही लगता था जैसे लता के ये सुर केवल उसी के लिए बने हैं, दूसरी ओर उनके लाखों-करोड़ों श्रोताओं को भी उनके गीत सुनकर ऐसा आभास होता था, मानो वे गीत सिर्फ़ उसके लिए ही गाया जा रहा हो। इस व्यक्तिगत अहसास के कारण ही उनके श्रोता उनकी आवाज़ में अपने मन की कोमल भावनाओं का स्पर्श पाते हैं क्योंकि ‘सामूहिक’ संबोधन को, वह हर व्यक्ति के लिए एकदम निजी अनुभव बना देती थीं। यक़ीन न हो तो किसी सुरमई रात के एकांत में, “तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यों मुझको लगता है डर…” या फिर “तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो…” सुनकर देखिए!

पण्डित नरेंद्र शर्मा की इन पंक्तियों में लता दीदी ने मानो अपने मन की बात कह दी थी:
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हूँ
क्षितिज पार की नील झनकार बनकर
मैं सतरंग सरगम लिये आ रही हूँ
सुनो मीत मेरे, कि मैं गीत ज्वाला
तुम्हारे लिए हूँ मैं, स्वर का उजाला
मैं लौ बन के, जल-जल जिये जा रही हूँ
मैं स्वरताल लय की, हूँ लवलीन सरिता
मैं अनचीन्हे, अनजाने कवि की हूँ कविता
जो तुम हो वो मैं हूँ, ये बतला रही हूँ
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हूँ।
दीदी के पिताजी शास्त्रीय गायक मास्टर दीनानाथ मंगेशकर के असामायिक निधन और सभी भाई-बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण घर चलाने की ज़िम्मेदारी के चलते किशोरावस्था से ही लता का जीवन संघर्ष शुरू हो गया था। बचपन के दिनों को याद करके बताने लगीं-
“हम लोग 1942 के अंत में कोल्हापुर पहुंचे थे। मास्टर विनायक ने अपनी फ़िल्म कंपनी प्रफुल्ल पिक्चर्स की मराठी फ़िल्म ‘माझे बाल’ में मुझे एक रोल दिया था। संगीत से तो मेरा लगाव था लेकिन मेकअप लगाकर तेज़ रोशनी में अभिनय करना मुझे बड़ा कठिन लगता था। तब मैं मुश्किल से चौदह साल की थी, यह उम्र तो खेलने खाने और इधर-उधर घूमने की होती है, लेकिन परिवार की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर ही होने से कोई विकल्प भी नहीं था। मेरा पूरा दिन स्टूडियो में गुज़रता था। विनायक राव ने अपने स्टाफ़ के कर्मचारियों के लिए घोडागाड़ी किराये पर ले रखी थी लेकिन मुझे कभी उस पर चढ़ना पसंद नहीं आया, मुझे मेरी साइकिल ही पसंद थी। मैं शुरू-शुरू में फ़्रॉक या परका पोलका भी पहनती थी। लेकिन जब 1944 में बंबई आयी तो मैंने अपने लिए पायजामा और कुरता सिलवा लिया। में इसे इसलिए भी पसंद करती थी क्योंकि यह मेरी साइकिल सवारी करने के लिए आसान था। उन दिनों मेरे पास एक पुराना भूरा कोट था जो मेरे कंधों से थोड़ा ढलका हुआ था, मैं उसी को पहनकर स्टूडियो में घूमती थी। दत्ता दावजेकर कंपनी के मुख्य संगीत निर्देशक थे, उनके संगीत निर्देशन में मैंने “माझे बाल” में दो गीत भी गाये थे।”
पण्डित रविशंकर का ज़िक्र करने पर लता दीदी कहने लगीं-
“मेरे पिताजी मास्टर दीनानाथ मंगेशकर, क्लासिकल सिंगर थे और पांच-छह वर्ष की उम्र से ही उन्होंने मुझे गाना सिखाना शुरू कर दिया था। इस कारण मुझे क्लासिकल म्यूज़िक से बहुत प्रेम हो गया था और उसे सुनने की बड़ी ललक भी मुझे हमेशा रहती थी। हम सभी भाई-बहनों में सभी शास्त्रीय संगीतज्ञों के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण था। पिताजी की मृत्यु के बाद भी मैं हमेशा ऐसी कोशिश करती थी कि जितने बड़े क्लासिकल कलाकार हैं उनका गायन, वादन सुन सकूं…
हर साल जब हम पिताजी की बरसी करते थे, तो बहुत सारे क्लासिकल सिंगर्स को भी उसमें बुलाते थे। जब मैं अपने पिताजी का गायन सुनती थी या फिर बड़े ग़ुलाम अली ख़ां साहब या आमिर ख़ां साहब को गाते हुए सुनती थी तो मुझे यह लगता था, मैंने कोई ख़ास मुक़ाम हासिल नहीं किया है। हालांकि इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए भी मुझे बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ी थी। लेकिन जब प्रख्यात सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ान ने फ़िल्म ‘सीमा’ के मेरे गीत “सुनो छोटी सी गुड़िया की ये लंबी कहानी…” में सरोद बजाया था या फिर ख्यात बांसुरी वादक पन्नालाल घोष जी ने ‘बसंत बहार’ फ़िल्म के मेरे गीत, “मैं पिया तेरी तू माने या ना माने…” में बांसुरी बजायी थी तब मुझे ऐसा प्रतीत हुआ था कि ईश्वर का मेरे ऊपर बहुत बड़ा आशीर्वाद है और मैं अत्यंत सौभाग्यशाली हूं कि इतने बड़े कलाकार अपनी कला से मेरे गीतों का शृंगार कर रहे हैं, लेकिन साथ ही यह विचार भी मन में आया था कि मुझे और अधिक रियाज़ करना चाहिए था।”
लता दीदी ने यह भी बताया कि “मैं अपने गाये लगभग सभी गीतों को जब कभी फिर से सुनती हूं तो लगता है कि इसे और बेहतर गया जा सकता था।”
शायद यह दीदी का बड़प्पन था। मशहूर शहनाईनवाज़ भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कहते थे- “लता मंगेशकर सुरीली है, मानना पड़ेगा। आप पूछ रहे हैं, उन्हें पसंद करते हैं? अरे भई उसके कहने में वो जादू है जादू… हम कहे यह बात हर आदमी नहीं कह सकता, जब हमने सुना लता को… जब उससे मुलाकात हुई तो हम यह देखना चाहते थे कि ये कहीं बेसुरी होती है कि नहीं, कहीं कमसुरी होती है या नहीं और दूसरी गानेवालियां कहीं-कहीं कमसुरी हो जाती हैं… जानने वाले लोग कहते हैं, हां यार वो फ़लानी जगह कमसुरी हो गयी थी या बेसुरी, लेकिन लता के साथ ये बात बिलकुल नहीं है, जब बोल रही है सुरीली बोल रही है।”
कई दिनों की लंबी बातचीत के दौरान मैंने एक दिन लता दीदी से पूछा, दीदी आप आजकल अस्वस्थ हैं, फिर भी मेरे अनुरोध पर मेरे साथ इतनी बातें इतने दिनों से कर रही हैं, मैं तो आपकी जिजीविषा देखकर अचंभित हूं! क्या कभी ऐसा भी हुआ कि किसी शारीरिक परेशानी, कोई दर्द तकलीफ़ या मूड ठीक नहीं होने के कारण उसका प्रभाव आपके गीत पर भी पड़ा या आपको रिकॉर्डिंग कैंसल करनी पड़ी?
यह पूछने पर लता दीदी कहने लगीं-
“जहां तक मुझे याद पड़ता है, कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरी किसी व्यक्तिगत तकलीफ़ को मैंने अपने गीतों पर हावी होने दिया। मैं कितनी भी परेशानी में क्यों न रही हूँ, मगर जब एक बार स्टूडियो पहुँच जाती थी, तो जैसे सब कुछ भूल जाती थी। बस एक संगीत ही याद रहता था। अगर तकलीफ़ ऐसी है कि वह बर्दाश्त से बाहर है या मैं इस तरह परेशान हूँ कि कुछ और सूझ नहीं रहा, तब मैं घर से ही नहीं निकलती थी। उस समय मैं अपने म्यूज़िक डायरेक्टरों से यह रिक्वेस्ट कर लेती थी कि आप रिकॉर्डिंग को थोड़ा टाल दें। हालांकि ऐसा बहुत कम होता था क्योंकि कितनी ही बड़ी बात क्यों न हो, कैसी भी हालत हो, मैं गाना छोड़ती नहीं थी। मुझे यह भी लगता था कि स्टूडियो जाकर गाना गाने से भी शायद मेरी तबीयत सुधर जाये या मन बहल जाये।”
जीते जी किंवदंती बन चुकीं लता मंगेशकर ने 36 भाषाओं में 30,000 से अधिक गीत गाये हैं। जिनमें शास्त्रीय, सुगम, भजन, ग़ज़ल, पॉप सभी कुछ शामिल है। उनकी आवाज़ में माँ की ममता, नवयौवना की चंचलता, प्रेम की मादकता, विरह की टीस, बाल-सुलभ निश्छलता, भक्त की पुकार और स्त्री के तमाम रूपों के दर्शन होते हैं। आधा सैकड़ा से भी अधिक अभिनेत्रियों के ओठों पर लता जी के सुर मचले हैं, इनमें, नरगिस, मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, ज़ीनत अमान, रेखा से लेकर काजोल और माधुरी दीक्षित तक शामिल हैं।
लता मंगेशकर की आवाज़ की यह ख़ूबी थी कि वे तीनों सप्तकों- मंद्र, मध्य और तार में बड़ी सहजता से गा लेती थीं। उन्होंने जो भी गाया दिल से गाया। वे कहती थीं-
“मेरे लिए गीत ऐसा होना चाहिए, जिसमें मैं पूरी तरह खो जाऊँ, ख़ुद को पूरी तरह मिटाकर भूल सकूँ। गीत के जो बोल हैं, उसकी जो धुन है, अगर वह दुःख के लिए बनायी गयी है, तो मैं यह कोशिश करती हूँ कि उसका प्रभाव इतना दुःख भरा निकले कि लोगों को भले हिचकी नहीं सुनायी दे, पर ऐसा लगे कि वाक़ई कोई रो रहा है। यह कोशिश मैं ज़्यादा से ज़्यादा करती रही हूँ, ताकि फ़िल्म में जो सिचुएशन है, वह आसान हो जाये। गाते हुए गीत की शक्ल उभरनी चाहिए।”

डॉ. दिनेश पाठक
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं हेतु दीर्घ काल से कला, संस्कृति, संगीत एवं सामायिक लेखन एवं संपादन। आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं विभिन्न टी.वी. चैनलों हेतु कार्यक्रम/वृतचित्र लेखन, निर्माण, प्रस्तुतकर्ता के रूप में संबद्ध। विविध क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों के शताधिक विस्तृत साक्षात्कार जिनमें लता मंगेशकर का अंतिम इंटरव्यू सम्मिलित है। तानसेन समारोह शताब्दी वर्ष हेतु निर्मित विशेष वृतचित्र, 'सुरों और संस्कृतियों का वैश्विक समागम तानसेन समारोह' सहित ऐसे अन्य प्रोजेक्टों में लेखन। 'स्वरित' का संपादन । साहित्य अकादमी म.प्र. सहित अन्य संस्थानों से सम्मानित। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर में पूर्व कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक। संपर्क: dpathak2005@gmail.com
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

लता मंगेशकर कुछ ऐसी हस्तियों में से हैं जिनके बारे में जानना, पढ़ना हमेशा अच्छा लगता है।
यहाँ काफी कुछ नवीन बातें हैं उनके जीवन की ।
बहुत सराहनीय।।