
कौन-सी कविता पर हुई एफआईआर? क्यों?
रूपम मिश्र समकालीन गद्य कविता जगत में एक चर्चित हस्ताक्षर मानी जाती हैं। उनकी एक कविता पर यह आरोप लगाते हुए एफ़आईआर करवाने का मामला सोशल मीडिया पर छाया हुआ है कि उस कविता की कुछ पंक्तियां या विशेषण आदि डॉ. भीमराव आंबेडकर के संदर्भ में आपत्तिजनक या अपमानजनक हैं।
हालांकि एफ़आईआर के संबंध में पुष्ट रिपोर्ट व सूचनाएं नहीं हैं लेकिन सोशल मीडिया में साहित्य जगत के बीच ख़ासा हंगामा है। वरिष्ठ, चर्चित और युवा साहित्यकार इस बहस में शामिल होकर मुखरता से कह रहे हैं कि कविता पर एफ़आईआर करवाया जाना क़तई ठीक नहीं है। यहां साहित्य जगत की कुछ प्रतिक्रियाओं के साथ ही रूपम मिश्र की वह कविता भी, जो एफ़आईआर के कारण अधिक चर्चा में आ गयी है…
“मैं सच में नहीं जानता कि किसने और क्यों FIR करवाई है, रूपम मिश्र जी को भी निजी तौर पर नहीं जानता लेकिन कल रूपम मिश्र की कविता जब ढूंढ कर पढ़ी तो प्रभावित हुआ। इस पर FIR लिखवाना और लिखना, दोनों थोड़ा अजीब है लेकिन वक़्त बहुत बदल गया है तो किसी अच्छे वकील की राय ले लेनी चाहिए। बाक़ी तो क्या ही कहा जाये!”
— अशोक कुमार पांडे“कविता समझने और डीप डाइव करने की चीज़ होती है, इस कविता के मर्म को भी उसी तरह समझना होगा। एफ़आईआर निंदनीय है!”
— वंदना राग“मेहनतकश होना अपमानजनक है और शोषक/परजीवी होना सम्मान की बात है ? ये आपको किसने सिखाया, जातिवाद ने ? वही जातिवाद, जिसके ख़िलाफ़ अंबेडकर ने अगुआई की ? वही जिससे आप भी खार खाये बैठे हैं ? फिर भी आप अंबेडकर को चमार लिखे जाने पे ऑफ़ेंड हो जाते हैं ? तब भी जब कवयित्री की मंशा (अगली ही लाइन में) अंबेडकर को ‘जेंडर दलित’ स्त्री का मुक्तिदाता कहने की है ? अगर इन सब सवालों के जवाब ‘हाँ’ में हैं, तो माफ़ कीजिए ! आपने अंबेडकर को अभी समझा ही नहीं।”
— दीपक तिरुवा“अब जिनको ‘सटायर’ समझ नहीं आता, वे सिर्फ़ शब्दों को पकड़कर बैठ गये हैं। उन्हें लग रहा है यह बाबा साहब की तौहीन है, जबकि सच तो यह है कि यह कविता बाबा साहब के दिये हुए अधिकारों का जश्न मनाती है। यह बताती है कि आज की औरत ‘आग मूत रही है’ यानी वह अब बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है, वह दहक रही है। जो लोग शोर मचा रहे हैं, उन्हें ठंडे दिमाग से सोचने की ज़रूरत है। अब दबाने वाले दिन लद गये। अब चाहे कोई कितना भी ज़ोर लगा ले, चाहे कितनी भी लानत-मलानत कर ले, औरतें अपनी आवाज़ कम नहीं करेंगी। यह कविता किसी जाति या व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस घटिया सोच के ख़िलाफ़ है, जो औरतों की आज़ादी को अपनी हार मानती है।”
— रश्मि दीक्षित
कविता, जिस पर हुई एफआईआर
जिस कविता के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करवायी गयी है, वह सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। पाठ यहां भी प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि पाठक ख़ुद भी कविता पढ़, समझकर तय कर सकें कि कविता का मंतव्य क्या है और कौन सा पक्ष उचित है…
रूढ़ियों और मिरजई में बंधे एक महाकाव्य के जादू को
तार-तार करते जब मैं कविता की जमीन पर
सिर तान कर खड़ी हुई
तो वे बोली की सबसे भद्दी गाली बुदबुदाते हुए हँसे
ये गाली उन्होंने अपने पिता से सीखी थी
और पिता ने अपने पिता से
अर्थात वहाँ पिता जो गाली माँओं को देते
उनके बच्चे उसे भाषा के पहले शब्द की तरह सीख लेते
इस तरह बपंसी में मिलता स्त्रीडाह उनके साथ उनकी यूनिवर्सिटी भी गया
जहाँ उन्होंने उसे अकेडमिक्स से नहलाया-धुलाया
और अंग्रेजी का तेल-फुलेल लगाया
भाषा मेरे लिए औजार भर थी
जिसे मैंने उनके लिए सुरक्षित छोड़ दिया
और अपनी बोली-ठोली में कहा बड़कऊ हमहूँ बोलब!
जल तो उनका सर्वांग गया
लेकिन मूंछों पर ही हाथ फेरते हुए उन्होंने हँसकर कहा
‘केहू रोकत कहाँ बा!’
और उसी घरी उन्होंने मन में
सदी भर की डाह से सनी किरिया खाई
और बोली के सबसे क्रूर पठारों पर दौड़ लगाई
उनकी दुनिया में माएँ कितनी कम होती हैं
जहाँ पिता के पेशाब का हलफ उठाया जाता है
लेकिन हाय समय की मार
कि अवध में औरत को गरियाने के लिए अकेडमिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है
नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का
जिसके कारण औरतें आग मूत रहीं हैं
सोहरों से सींचे वे मस्तक बहुत नाराज़ थे मुझसे
दरअसल सारा कुसूर मेरी स्त्रीदेह का था
जिसमें सवालों से भरी आत्मा थी
और तरह तरह के ताजन झेलती माँओं के निःसहाय किस्से
जहाँ उनसे इतना भी नहीं कह पायी
कि उनके मुड़कटवा उनके पिता ही होते हैं
ख़ैर सई, गंगा, गोमती नदियों के
सहने-बहने की कथा मेरी कथा थी
अवध का मर्दवादी पठार
मेरे पगचिन्हों से धूल-धूल हो रहा था
जौनपुर मेरे खून में था
और वामिक, आलम मेरे पुरखे थे
पुरखिनों को मनुष्य द्रोहियों ने
इतिहास में दबा दिया था
और उसी घूर की खाद से मेरा जन्म हुआ था
सताये गये लोगों की आह से मैंने धुनें बनाई है
जिसकी जिढ़ उनसे काटे नहीं कट रही है
हर चईत में आग से जली फसलों की राख
मेरी पलकों पर आ बैठी थी
रूमान मेरे भीतर उतना ही रहा
जितना स्वस्थ मनुष्य में होना चाहिए
लेकिन याद में वही रह गये जो वसंत में भी लड़ते रहे
आजादी के किसी ब्रांड पर मुझे भरोसा नहीं हुआ
घुमंतू स्त्रियों से मैंने “कहीं नहीं ठहरना” सीखा था
जिससे मैंने उनके अहंवाद को
जब तब चाहे-अनचाहे कचर दिया होगा
तब से वो अपना सारा पौरुष, ज्ञान, डिग्री यहाँ तक अपने पर्चा लिखने का कौशल भी झोंककर मुझे सबक सिखाने में लग गये
और मैं इतिहास की धमनियों में वो निशान ढूढने लगी कि कैसे कमजोरों का हिस्सा भी समय की देह में रक्त की तरह ही बहा लेकिन कहीं दर्ज नहीं हुआ
कछारों और बाजारों की बदमली वाली उसी जमीन पर
पैरों के नाखून धंसा कर मैं अपना काम कर रही हूँ
और वे अपना काम कर रहे हैं
एक ऐतिहासिक लड़ाई छेड़ दी गयी है
हमारी ओर से भी
उनकी ओर से भी।
