
- September 14, 2025
- आब-ओ-हवा
- 0
संदर्भ : 14 सितंबर 1947, महेश अनघ की जयंती
ग़ज़ल तब : महेश अनघ
1
मुस्कानों का आना जाना पल दो चार रहा
एक पुराना छाला दिल पर पहरेदार रहा
ख़ुशबू मरहम प्यार तसल्ली सब सौदागर हैं
इस बस्ती में वो रह पाया जो मन मार रहा
उनकी यादों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं
आंसू आंखें चाक गरेबां सब बेकार रहा
गीतों की ख़ातिर पुरखों ने कितना कर्ज़ लिया
हम बंधुआ हैं दर्द हमारा साहूकार रहा
सब तो नाता तोड़ चुके हैं जितने थे अपने
पर ख़ाली घर के भीतर से कौन पुकार रहा
अब क्या शिकवा है मांझी से ऐ दुनिया वालो
नैया को उस पार लगाकर ख़ुद मंझधार रहा
————*————
2
ग़म से ज़्यादा ज़िंदगी क्या है
इश्क़ भी है तो कमी क्या है
मुस्कुराते चंद आंसू हैं
और मंशा आपकी क्या है
छोड़िए अहसास की आदत
सोचिए फिर त्रासदी क्या है
बांट दी है उम्र बच्चों में
काटने को अब बची क्या है
जिन्स हैं जज़्बात आख़िर तो
दोस्ती क्या दुश्मनी क्या है
मौत से पूछा मुहब्बत से
दर्द तू है तो ख़ुशी क्या है
————*————
3
बोलो कितने दिन में बालिग़ हो पाएंगे ऐसे हम
सारी दुनिया देख रहे हैं रोशनदानों में से हम
अपने सारे तन में केवल पेट दिखायी देता है
अब तक इतनी आंख खोल पाये हैं जैसे तैसे हम
एक शब्द सिर पर लटका हो तो आधे मर जाते हैं
अपना कोई वाक्य बनाकर लिख दें आख़िर कैसे हम
जब सूरज का चारों ओर प्रखर विज्ञापन होता है
नीचा सिर करके लटके रहते चमागदड़ जैसे हम
कहने को हम भी दौलत हैं पर अपना बाज़ार नहीं
पुरातत्व से निकले हैं संग्रह के क़ाबिल पैसे हम

महेश अनघ
साहित्य के अनेक विधाओं में पर्याप्त लेखन। कहानी, उपन्यास, निबंध के साथ ही काव्य सृजन। नवगीतों और 'हिंदी ग़ज़ल' में विशेष ख्याति। 1977 में ग्वालियर बाज़ार पत्रिका के लिए 'हिंदी ग़ज़ल की रूपरेखा' के सिलसिलेवार लेखन से चर्चित। 14 सितंबर 1947 में जन्म और 4 दिसंबर 2012 को निधन।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
