gollaguppa incident, गोल्लागुप्पा की घटना, malaria deaths, chloroquine case
नियमित ​ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....

गोल्लागुप्पा की घटना, मीडिया की सक्रियता: संदेश क्या?

            पिछले महीने के शुरू में आंध्र प्रदेश के एक गांव में एक ऐसी घटना घटी, जिससे अंदाज़ा लगा कि टीकाकरण को भविष्य में सर्वोत्तम विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किस तरह अभ्यास किया जाता है या हो सकता है। मज़े की बात यह कि आप इसे बड़ी सहजता से स्वीकार करेंगे और ऐसा करते हुए आप ख़ुद के आधुनिक और स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने का एक दंभ भी पाल सकते हैं।

घटना के मुताबिक़ सितंबर 2026 के शुरू में आंध्र प्रदेश के गोल्लागुप्पा गाँव में मलेरिया-रोधी अभियान के तहत लोगों को क्लोरोक्वीन दी गयी। अभियान के बाद सात साल की आदिवासी बच्ची मदिवी जमुना की मृत्यु हो गयी। दर्जनों अन्य ग्रामीणों के बीमार पड़ने की ख़बर आयी।

एक बच्ची की मौत और इतने लोगों का बीमार पड़ना अपने आप में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य घटना है। ऐसे मामले में, सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी तत्काल चिकित्सा सहायता, दवा की गुणवत्ता की स्वतंत्र जाँच, प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति के रिकॉर्ड की समीक्षा और मृत्यु के कारण का वैज्ञानिक निर्धारण।

यह घटना, कारण कुछ भी हो, दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है। कारण सामने आने ही चाहिए और स्पष्ट वैज्ञानिक तथ्यों के साथ, न कि मीडिया ट्रायल के द्वारा। इधर, जिस तरह मीडिया ने मात्र 3 से 6 घंटे के भीतर ऐसा छापा जैसे क्लोरोक्वीन दवा की वजह से यह सब कुछ हुआ या इस दवा का इस घटना से सीधा संबंध रहा। और ये दावे बिना किसी ठोस आधार के हैं। सनद रहे कि यह वही मीडिया है, जो आज तक कोविड वैक्सीन से हुए किसी दुष्प्रभाव पर कोई तथ्य नहीं खोज पायी, बल्कि इसके उलट हमेशा सरकारी लाइन पर चलती रही।

घटना के बाद सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली गयीं। दवा के संबंधित बैच के नमूने फ़ॉरेंसिक जाँच के लिए भेजे जाने की ख़बर आयी। लेकिन इसके बाद जाँच में क्या मिला, इस पर मीडिया की कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखी।

क्या बच्ची की मौत का कारण पहले से मौजूद हृदय रोग था? घटना के बाद कुछ रिपोर्टों में बच्ची को संभावित जन्मजात या आनुवंशिक हृदय समस्या होने की बात कही गयी। क्लोरोक्वीन से संबंधित संभावित हृदय-अतालता (हार्ट एरिथमिया) का भी उल्लेख हुआ। क्या पोस्टमॉर्टम और अन्य चिकित्सा जाँचों ने इसकी पुष्टि की? इन सवालों के जवाब के बिना किसी संभावित बीमारी को मृत्यु का निश्चित कारण बताना उचित नहीं होगा। इसी प्रकार, केवल घटनाओं के समय-संबंध के आधार पर दवा को मृत्यु का निश्चित कारण घोषित करना भी पर्याप्त नहीं है।

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ध्यान रहे मीडिया ने यह दावा नहीं किया कि क्लोरोक्वीन खाने से ऐसा हुआ, बस यह लिखा उसके बाद ये हुआ! लेकिन मीडिया और हममें से कितने हैं, जो इन बातों की बारीकी से जाँच करते है कि उसके बाद होने या उससे होने में बहुत बड़ा फ़र्क होता है। इसी तथ्य को आधार बनाकर तो फ़ार्मा सारी दावा और वैक्सीन “सेफ़ एंड इफ़ेक्टिव” कहकर बेच रही है। बहरहाल जो भी हो, मीडिया का इस तरह सक्रिय होना अपने आप में एक सामान्य बात नहीं है।

सबसे ज़रूरी दस्तावेज़ जनता के सामने कहाँ हैं? कुछ भी प्रामाणिकता के साथ कहने के लिए निम्नलिखित तथ्यों की आवश्यकता होगी:

  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मृत्यु के चिकित्सकीय कारण का निष्कर्ष।
  • विसरा तथा टॉक्सिकोलॉजी परीक्षण के परिणाम।
  • संबंधित दवा-बैच की गुणवत्ता और संदूषण संबंधी रिपोर्ट।
  • बीमार हुए अन्य लोगों के लक्षण, उपचार और चिकित्सकीय निष्कर्ष।
  • जाँच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट और ज़िम्मेदारी तय करने का आधार।

इसके अतिरिक्त इसमें कई अन्य परतें भी हैं। तब जो ख़बरें रहीं, उनके अनुसार उक्त बच्ची की मृत्यु और दर्जनों बच्चों का उल्टी और दस्त के कारण अस्पताल में भर्ती होना कई अन्य प्रश्नों को जन्म देता है, मसलन:

  1. चूंकि दावा डॉक्टर की उपस्थिति में दी गयी, अतः यह मुमकिन नहीं है कि बिना कुछ खाना खिलाये दी गयी हो क्योंकि इसके दुष्प्रभाव और भयंकर हो सकते हैं, हर कोई जानता है।
  2. क्लोरोक्वीन को पूरी तरह से शरीर में अवशोषित होने में 3 से 5 घंटे लगते हैं, तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है दवा खाने के कितनी देर बाद शिकायत हुई? जबकि मीडिया रिपोर्ट 3-6 घंटे के भीतर छप गयी?
  3. दवा विद्यालय में दी गयी थी तो ज़ाहिर है कि कुछ खाने को दिया गया होगा, पानी था या और क्या था? क्या उनकी जाँच हुई? लेकिन यह चर्चा मीडिया के परिदृश्य से ग़ायब रही।
  4. दवा नक़ली थी या नहीं, ख़बरों में इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं।

बताते चलें कि मलेरिया के लिए यह अभी तक की विश्व भर में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाने वाली दवा है, जो मुद्दत से प्रचलन में है। जाँच लंबित होने की सूचना, जाँच के परिणाम के बराबर नहीं है। इसी तरह, किसी प्रयोगशाला को नमूना भेज देना यह प्रमाण नहीं कि उसकी रिपोर्ट में क्या निकलेगा। और कुछ निकलेगा भी या नहीं, और निकला तो क्या मीडिया उसे उतनी ही बड़ी ख़बर बनाएगी? इनके उत्तर आपको भी पता है और मेरे निष्कर्ष की ज़रूरत नहीं है।

लेकिन इन सारे तथ्यों के अभाव में मीडिया का इस तरह का शीर्षक प्रकाशित करना “मलेरिया की दवा खाने बाद एक बच्ची की मौत, दर्जनों भर्ती”। इससे कोई आम आदमी क्या समझेगा? या उसे किस तरह लेगा? सहज अनुमान लगता है, लेकिन मीडिया ने अपना काम कर दिया।

मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा

इस घटना पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया और जाँच की। निगरानी आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय को सौंपने का निर्देश दिया। न्यायालय में प्राथमिकी दर्ज होने और फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट की प्रतीक्षा की बात भी सामने आयी।

अब अपेक्षा यह है कि जाँच केवल औपचारिकता बनकर न रह जाये। संबंधित दस्तावेज़ों, नमूनों, चिकित्सा रिकॉर्ड और निर्णयों की ऐसी समीक्षा हो जिससे वास्तविक कारण सामने आ सकें। इसके इतर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जवाबदेही वैकल्पिक नहीं हो सकती।

विशेष रूप से बच्चों के मामले में यह जानना ज़रूरी है कि दवा किस आधार पर दी गयी, ख़ुराक कैसे निर्धारित हुई, जोखिम का आकलन कैसे किया गया और गंभीर प्रतिक्रिया की स्थिति में क्या व्यवस्था थी।

अब यहां एक और प्रश्न आपके लिए छोड़ता हूं। अगर इसी तरह 3 या 4 घटनाएं आपके सामने निकट भविष्य में आएं, जैसा अमली जामा इस ख़बर को पहनाया गया, तो आपके मन में पहला विचार क्या आएगा? यही कि मलेरिया की दवा कारगर नहीं है। या कुछ और?

और यदि आपका उत्तर भी यही है, जो मैंने कहा तो विकल्प क्या होगा आपके पास? मच्छर तो हमें छोड़ के जा नहीं रहे निकट भविष्य में! और जो सबसे कारगर दवा थी वो भी “काम नहीं” कर रही है!

तब आगे क्या? तो आपको बता दें कि मलेरिया की दो वैक्सीन, जो WHO ने सत्यापित (इसी वर्ष फरवरी महीने में दूसरी की है) कर दी हैं, तो काफ़ी संभावना है कि भारत में भी देर-सवेर संस्तुति मिल सकती है। इस तरह की और ख़बरों के लिए तैयार रहें। और यह आख़िरी भी नहीं होंगी, उसका ज़िक्र आगे कभी करूंगा। अंततः अवश्य कहूंगा कि वैक्सीन पूरी प्रतिरक्षा नहीं है, उसका एक हिस्सा है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी

डॉ. आलोक त्रिपाठी

2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।

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