AI graphics, AI market, AI economy
नियमित ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

एआई के इस डर में कितना है बाज़ार का खेल?

            यह ख़बर है तो छोटी-सी, मगर है बड़ी चिंताजनक। गूगल ने एक ऐसा AI एजेंट पेश किया है, जो सिर्फ़ एक कर्मचारी का काम ही नहीं करेगा, बल्कि पूरी टीम को संभाल लेगा। इस आधार पर हम सहज ही यह कल्पना कर सकते हैं कि आगे जाकर वह सिर्फ़ टीम नहीं, बल्कि पूरी कंपनी भी संभाल सकता है! इस लेवल को बढ़ाते जाइए तो अंतत: पूरा देश! पूरी दुनिया! पूरी इंसानियत! यानी इंसानों पर पूर्ण नियंत्रण!

गूगल, ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी दुनिया की बड़ी एआई कंपनियां जिस तरह से अपने इनोवेशन को विस्तार दे रही हैं, वह भयावह तो है, लेकिन इससे भी ज़्यादा डरावनी बात वह विरोधाभास है कि यही कंपनियां और इसके दिग्गज मालिकान एआई के विनाशकारी होने की आशंका पर हाय-तौबा भी मचा रहे हैं। जैसे ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई ने विभिन्न वैश्विक मंचों पर बार-बार दोहराया है कि एआई से पैदा होने वाला जोखम परमाणु युद्ध या महामारी जितना ही गंभीर है।

ऑल्टमैन ने तो एक्स पर यहां तक लिख दिया, ‘हम एआई के हाथों भविष्य पर अपना नियंत्रण खो सकते हैं। यह स्वीकार्य नहीं है। हम मानवता के पक्ष में हैं और एआई को हमेशा इंसानों की सेवा करनी चाहिए।’ वहीं, xAI के संस्थापक इलॉन मस्क ने कहा कि अनियंत्रित सुपर-इंटेलिजेंट एआई इंसानी सभ्यता को ख़त्म कर सकता है। उनके मुताबिक़, एआई के कारण मानवता के नष्ट होने की आशंका 10 से 20 फ़ीसदी तक है।

इस हौवे के पीछे की कुमंशा…

सवाल यही है कि एआई को लेकर इतना हौवा खड़ा करने वाले ये दिग्गज आख़िर स्वयं रुकने को तैयार क्यों नहीं हैं? ठीक है, आपने अरबों डॉलर का निवेश कर लिया, मगर जब दुनिया ही नहीं बचेगी (जैसा कि आपकी आशंका है) तो आपका यह निवेश भी किस काम का रह जाएगा? यही विरोधाभास अधिकांश आम लोगों की समझ से परे है। लेकिन इस क्षेत्र को जानने-समझने वाले विशेषज्ञ इन एआई दिग्गजों की (कु)मंशा से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं।

AI graphics, AI market, AI economy

अरबों डॉलर का कारोबार करने वाली कंपनियों के संचालक जब अपनी ही तकनीक को ‘दुनिया के लिए ख़तरा’ बताने लगें तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि इसके पीछे कौन-सा अर्थतंत्र काम कर रहा है। इन कंपनियों की चाल और चलन पर नज़र रखने वाले नीति-विश्लेषकों के अनुसार इन सार्वजनिक चेतावनियों का सीधा संबंध ‘रेगुलेटरी कैप्चर’ यानी कड़े नियमों के ज़रिये बाज़ार पर एकाधिकार स्थापित करने की चालाक कॉर्पोरेट रणनीति से हो सकता है।

जब सैम ऑल्टमैन जैसे दिग्गज सरकारों से आग्रह करते हैं कि किसी बड़े एआई मॉडल के लिए लाइसेंसिंग प्रणाली और कड़े सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया जाये, तो वास्तव में वे प्रतिस्पर्धा का रास्ता बंद कर रहे होते हैं। वे जानते हैं किसी नये एआई मॉडल को बाज़ार में लाने के लिए अगर इस तरह की शर्तें अनिवार्य कर दी जाएं तो नये स्टार्टअप या स्वतंत्र शोधकर्ता के लिए इन्हें पूरा करना काफ़ी मुश्किल हो जाएगा और वह रेस में कहीं टिक नहीं पाएगा। इस प्रकार, ‘सुरक्षा’ के नाम पर बनायी गयी नीतियां सिलिकॉन वैली के केवल तीन-चार दिग्गजों के लिए एक अभेद्य सुरक्षा-घेरा तैयार कर देंगी।

खुल रही है कथित ‘डर’ की पोल

दिग्गजों के इस कथित ‘डर’ की पोल दुनिया के कई नामचीन तकनीकी विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों ने खोल दी है। उनका साफ़ मानना है कि अस्तित्व के ख़तरे का यह हौवा पूरी तरह स्वार्थ से प्रेरित और वास्तविक चिंताओं से ध्यान भटकाने का महज़ ड्रामा है। असली खेल कुछ और है।

एआई वैज्ञानिक और ट्यूरिंग पुरस्कार विजेता यान लेकुन ने इन चेतावनियों को सरासर बेतुका करार दिया है। उनका तर्क है कि एआई से दुनिया ख़त्म होने का डर केवल इसलिए फैलाया जा रहा है, ताकि सरकारें ऐसे कड़े नियम और क़ानून बना दें, जिससे ‘ओपन-सोर्स’ मॉडल बंद हो जाएं। अगर ओपन-सोर्स तकनीक प्रतिबंधित होती है, तो आम जनता और शोधकर्ताओं को केवल उन क्लोज़्ड और महंगे मॉडलों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिन्हें ये एकाधिकारवादी कंपनियां बेचती हैं।

स्टैनफोर्ड से जुड़े अग्रणी एआई शोधकर्ता एंड्रू एनजी भी इस हौवे को ख़ारिज करते हैं। उनका कहना है बड़ी टेक कंपनियां ओपन-सोर्स डेवलपर्स को कुचलने के लिए लाइसेंसिंग को हथियार बना रही हैं। दबाव में सरकारें ऐसे नियम बनाने को मजबूर हो सकती हैं, जो बड़ी टेक कंपनियों की मौजूदा स्थिति को और मज़बूत कर सकते हैं और प्रतिस्पर्धा को नुक़सान पहुंचा सकते हैं। विख्यात एआई एथिक्स शोधकर्ता टिमनिट गेब्रू का कहना है काल्पनिक ‘टर्मिनेटर’ जैसी रोबोट क्रांति का डर दिखाकर ये कंपनियां आज की उन वास्तविक समस्याओं को छिपा रही हैं, जिनसे आम जनता जूझ रही है।

‘मसीहाई बोध’ का एक पहलू और

आप जो दुनिया के लिए ‘मसीहा’ बन रहे हो, उसका एक बड़ा पहलू और भी है। जब आप कहते हैं कि आपने इतना शक्तिशाली एआई बना लिया है कि उससे एक दिन दुनिया ‘तबाह’ हो जाएगी तो ऐसा कहकर आप अप्रत्यक्ष रूप से अपने उत्पाद की ताक़त का एक ‘हाइप’ क्रिएट कर रहे होते हैं। इससे शेयर बाज़ार में कंपनी के वैल्युएशन में भारी इज़ाफ़ा हो जाता है। निवेशक भी ऐसी ‘शक्तिशाली तकनीक’ में निवेश करने को आतुर हो उठते हैं। यानी पांचों उंगलियां घी में और सर कड़ाही में।

इसके अलावा, ‘भविष्य के काल्पनिक ख़तरे’ का शोर मचाकर ये कंपनियां वर्तमान समय में अपने द्वारा किये जा रहे क़ानूनी अपराधों, जैसे बड़े पैमाने पर डेटा की चोरी, कॉपीराइट का उल्लंघन और प्राइवेसी के हनन से ध्यान भटकाने में सफल हो जाती हैं।

मगर ख़तरों से इनकार भी नहीं

भले ही एआई दिग्गजों के बयानों के पीछे उनका कॉर्पोरेट स्वार्थ, बाज़ार पर क़ब्जे की होड़ और पीआर स्टंट छिपा हो, लेकिन इस कड़वे सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि एआई से उपजे ख़तरे पूरी तरह काल्पनिक भी नहीं हैं। यदि हम ‘मानव जाति के नामो-निशान मिट जाने’ जैसे एक्स्ट्रीम सिनेरियो को छोड़ भी दें, तब भी यह तकनीक आज मानव समाज की बुनियाद के लिए वास्तविक और गंभीर चुनौतियां खड़ी कर रही है।

पहला सबसे बड़ा और तात्कालिक ख़तरा रोज़गार और आर्थिक असमानता का है। जब गूगल कहती है कि उसका एक एआई एजेंट पूरी टीम को संभाल सकता है तो इस दावे में निहित ख़तरे की कल्पना की जा सकती है। फिर साइबर सुरक्षा और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में इसके दुरुपयोग की आशंकाएं अत्यंत भयावह हैं। एआई मॉडल्स का इस्तेमाल करके अब बिना किसी विशेष ज्ञान के भी घातक जैविक हथियार विकसित किये जा सकते हैं। एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई ने इसके संकेत कई बार दिये हैं।

एक अन्य ख़तरा डीपफ़ेक और फ़र्ज़ी जानकारियों का है। एआई जनरेटेड झूठे ऑडियो, वीडियो और टेक्स्ट किसी भी देश की लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं, दंगे भड़का सकते हैं और सामाजिक ताने-बाने को पल भर में छिन्न-भिन्न कर सकते हैं।

इसलिए क्या बेहतर नहीं होगा कि एआई के ये तीन-चार दिग्गज स्वार्थ प्रेरित ख़तरों की बात न करते हुए असल ख़तरों पर अपनी चिंता जताएं और इसको लेकर ज़मीनी स्तर पर काम भी करें। ऐसा नहीं हो सकता कि आप एक उड़नखटोला बनाकर कहें कि इस पर सवारी करते ही यह गिर जाएगा और साथ में यह भी कहें कि आओ, इस पर सवारी करें।

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!