ज्ञानरंजन, gyan ranjan
याद बाक़ी ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....

ज्ञानरंजन का जाना

              फ़ेन्स के इधर-उधर, पिता, बहिर्गमन और घंटा जैसी अद्भुत कहानियाँ लिखकर नयी कहानी के संसार में अपना स्थाई स्थान बनाने वाले ज्ञानरंजन के फैन्स की तादाद भी बहुत ज़्यादा है। उनकी कहानियाँ केवल कथा नहीं रचतीं, बल्कि पाठक के भीतर एक बेचैनी, एक प्रश्नाकुलता और एक नैतिक दबाव छोड़ जाती हैं। वे रोज़मर्रा की साधारण स्थितियों में छिपे असाधारण यथार्थ को पकड़ने वाले लेखक थे।

उनके पिता रामनाथ सुमन भी छायावाद के ज़माने की सशक्त आलोचना के लिए जाने जाते थे। लगभग एक साल पहले फ़ोन पर हुई एक तवील बातचीत में ज्ञानरंजन जी ने स्वयं बताया था कि उनके पिता एक बड़े लेखक थे, लेकिन उन्होंने अपनी पहचान स्वयं बनायी। यह बात वे किसी गर्व के साथ नहीं, बल्कि सहज आत्मस्वीकृति के साथ कहते थे। साहित्य में वंश परंपरा से नहीं, अपने श्रम और दृष्टि से जगह बनाने का उनका आग्रह इसी में झलकता था।

इलाहाबाद से जबलपुर आये तो आये ही आये- जैसे किसी उद्देश्य ने उन्हें वहाँ खींच लिया हो। 101 आधार ताल, जबलपुर और पहल पत्रिका से उनका जुड़ाव केवल भौगोलिक नहीं, वैचारिक और सांस्कृतिक था। प्रगतिशील साहित्य और चुनिंदा लेकिन क्लासिक वैश्विक साहित्य-दर्शन की पत्रिका पहल इतने बड़े स्तर तक पहुँची कि उसमें प्रकाशित होना लेखकों का सपना हुआ करता था।

पहल वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित सामग्री प्रकाशित करने वाली लगभग एकमात्र पत्रिका बनी। इसमें उनकी एक ज़िद थी- विज्ञापन हर कहीं से नहीं लिये जाएँगे। सामग्री के चयन का आधार केवल उत्कृष्ट वैचारिक चिंतन होगा, कोई समझौता नहीं। यही कारण था कि पहल में छपी हर सामग्री पाठक को बौद्धिक रूप से समृद्ध करती थी। एक से बढ़कर एक वैचारिक और साहित्यिक शृंखलाएँ हमने वहाँ पढ़ीं और अपने भीतर को सँवारने की चेष्टा की।

ज्ञानरंजन, gyan ranjan

मुझे भी पहल में दो बार, बहुत अच्छे कथन के साथ, उन्होंने प्रकाशित किया। उनकी तीन-चार पंक्तियों की चिट्ठियाँ आती रहीं- छोटी, संक्षिप्त, लेकिन अर्थ से भरी हुई। हम उन्हें बार-बार पढ़ते थे, जैसे किसी वरिष्ठ का मौन आशीर्वाद हो। मेरे पिता के निधन पर भी उनका फ़ोन आया था, फिर एक चिट्ठी भी। मुझे उनका एक वाक्य अब भी स्मृति में है-

“हमारे जीवन में एक दिन ऐसा आता ही है जब हम पिता को अजीवित देखते हैं।”

इस वाक्य के आशय की एक पंक्ति मेरी कविता पिता के बाद माँ में भी आयी है। यह बताता है कि वे केवल संपादक या लेखक नहीं थे, बल्कि दूसरे के दुःख को शब्दों में थाम लेने वाले संवेदनशील मनुष्य भी थे।

ज्ञानरंजन जी के बारे में अनेक किवदंतियाँ भी साहित्यिक वातावरण में उपस्थित हैं और आगे भी रहेंगी। वे अपने साहित्यिक और साहित्यिक पत्रकारिता के जीवन में विशिष्ट अनुशासन और प्रबंधन के क़ायल थे और ऐसा होना ही चाहिए, इस पर वे अडिग थे। पहल के एक-एक पृष्ठ को वे स्वयं पढ़ते थे। उन्होंने पहल को अपने बलबूते अच्छे पाठकों तक पहुँचाया। नगर-नगर, गाँव-गाँव उसके पाठक अपने बटुए से सदस्यता शुल्क मनीऑर्डर के माध्यम से भेजते थे। यह भरोसा आज दुर्लभ है।

आज भी हम सभी की बुकशेल्फ़ में पहल के अंकों की एक दीर्घा मौजूद है- एक जीवित इतिहास की तरह। मेरे पास उनके अद्भुत गद्य की किताब कबाड़खाना भी है, जिसके मैंने एकाधिक पाठ किये हैं और हर बार कुछ नया सीखा है। उनका गद्य वैचारिक होते हुए भी मानवीय ताप से भरा हुआ है।

उनसे पिछली मुलाक़ात गत वर्ष भोपाल में हरि भटनागर की छोटी बेटी के विवाह में हुई थी। वहाँ भी उन्होंने एक आत्मीय संवाद किया- “आज ही विश्वरंग में मैंने तुम्हारी कविताएँ पढ़ीं। भाई, अच्छा लिखते हो।” ऐसे वाक्य किसी युवा लेखक के लिए पुरस्कार से कम नहीं होते। दो माह पहले जन्मदिन पर फ़ोन करके हालचाल पूछा तो बोले- “अब इस उम्र में तबीयत कैसे ठीक रहेगी। अच्छा लगा तुमने याद किया। लिखते रहो, पढ़ते रहो।”

अब उनके अवसान पर एक गहरा अवसाद मन को घेर रहा है। यह ख़ालीपन केवल एक व्यक्ति के जाने का नहीं है, बल्कि उस आवाज़ के खामोश हो जाने का है जो ईमानदारी, साहस और वैचारिक स्पष्टता के साथ बोलती थी। अब उनका मोबाइल फ़ोन कौन उठाएगा, और वैसी बातचीत कौन करेगा जैसी वे करते थे- यह प्रश्न भीतर लगातार गूँज रहा है।

हमने कमलाप्रसाद, भगवत रावत जैसे आत्मीयों की फ़ेहरिस्त में पहले मलय को और अब ज्ञानरंजन को भी खो दिया। मेरे जैसे, बल्कि मुझसे भी कहीं अधिक उनके प्रिय पात्र होंगे, जो इस अवसाद में डूबे होंगे कि अब एक आत्मीय, ईमानदार और निर्भीक साहित्यिक आवाज़ सदा के लिए ख़ामोश हो गयी।

ब्रज श्रीवास्तव

ब्रज श्रीवास्तव

कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।

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