beyond the brain, AI, artificial intelligence, human brain
पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

तो क्या इंसानी दिमाग़ की उल्टी गिनती शुरू?

            कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने हाल के दिनों में कई तरह की चिंताएं पैदा की हैं। नौकरियों पर संकट से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में अराजकता फैलने की आशंका तक। और अब मनुष्य के एक विशिष्ट गुण पर लटकी ख़तरे की तलवार को लेकर भी बात हो रही है। यह वही गुण है, जिसकी बदौलत हम दुनिया के बाकी प्राणियों से अलग हैं और जिसकी वजह से ही विभिन्न नवाचार करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के आविष्कार तक आये हैं। कुछ वैज्ञानिक इस सवाल पर मंथन करने लगे हैं कि क्या एआई से हमारी थिंकिंग कैपेसिटी अर्थात सोचने-समझने की ताकत कम हो सकती है? और अंतत: पूरी तरह ख़त्म भी?

इसको लेकर हाल के महीनों में कुछ शोध और अध्ययन हुए हैं। एक महत्वपूर्ण अध्ययन मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे जून 2025 में प्रकाशित किये गये थे। इन नतीजों को MIT की ऑफिशियल साइट पर देखा जा सकता है।

यह अध्ययन एक छोटे-से समूह पर किया गया था, मगर नतीजे दूरगामी असर की झलक पेश करते हैं। अध्ययन में एमआईटी से ही संबद्ध 54 लोगों को शामिल किया गया था। इन सभी प्रतिभागियों से एक निबंध लिखवाया गया। इन 54 लोगों को तीन समूहों में बांटा गया था। एक समूह को केवल LLM (यानी एआई टूल्स) के ज़रिये, दूसरे समूह को सर्च इंजनों की सहायता से और तीसरे समूह को किसी भी टूल्स का इस्तेमाल किये बग़ैर निबंध लिखने को कहा गया। निबंध लिखते समय दिमाग़ पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को मापने के लिए EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफैलोग्राफी) तकनीक का उपयोग किया गया। निबंधों का विश्लेषण भाषा विज्ञान से जुड़े सॉफ्टवेयर, मानव शिक्षकों तथा एक AI जज की मदद से किया गया।

अध्ययन का नतीजा, AI से कमजोर हुई दिमाग़ी गतिविधि

जो नतीजे आये, वे उन आशंकाओं की ओर इशारा कर रहे हैं कि एआई किस तरह मानवीय दिमाग़ को कुंद कर सकती है। जिन लोगों ने बिना किसी टूल्स के निबंध लिखे, उनके दिमाग़ में न्यूरल नेटवर्क सबसे मज़बूत और व्यापकता के साथ सक्रिय पाये गये। सर्च इंजन का उपयोग करने वालों में मध्यम स्तर की सक्रियता देखने को मिली। जबकि LLM यानी AI का उपयोग करने वालों में ब्रेन कनेक्टिविटी अपेक्षाकृत कमजोर पायी गयी।

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अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे बाहरी टूल्स पर निर्भरता बढ़ी, दिमाग़ी गतिविधि कमज़ोर होती चली गयी। तकनीकी भाषा में कहें तो एआई टूल्स का इस्तेमाल करने वाले समूह के दिमाग़ की ‘अल्फ़ा’ और ‘बीटा’ तरंगों की एक्टिविटी कम रही। ‘अल्फ़ा’ कनेक्टिविटी दिमाग़ के विभिन्न हिस्सों के बीच सामंजस्य को बढ़ाने से जुड़ी होती है। बीटा कनेक्टिविटी का संबंध सोचने-समझने, समस्या का समाधान करने, निर्णय लेने और फोकस करने की क्षमताओं से होता है। इनकी एक्टिविटी के कम होने का मतलब था दिमाग़ का पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाना। अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि AI पर निर्भर प्रतिभागियों का प्रदर्शन दिमाग़ी सक्रियता, भाषा की गुणवत्ता और व्यवहार, तीनों स्तरों पर कमज़ोर रहा।

सरल शब्दों में कहें तो ‘AI से तुरंत सुविधा तो मिल जाती है, लेकिन इसकी बड़ी मानसिक क़ीमत चुकानी पड़ सकती है।’ इसका मतलब है कि किसी निबंध में एआई की बदौलत छात्र को नंबर तो अच्छे मिल जाएंगे, लेकिन अगर वह पूरी तरह से एआई के ही आसरे रहा, तो उस विषय को लेकर उसकी समझ बिल्कुल विकसित नहीं हो पाएगी। जैसा कि यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड एजुकेशन पर रिसर्च करने वाले प्रो. वायने होम्स बीबीसी से कहते हैं, ‘एआई की मदद से आउटपुट्स बेहतर हो सकते हैं, लेकिन समझ बदतर होती चली जाएगी।’

ध्यान रहे कि यह केवल चार महीने का प्रयोग था और इसमें एआई से केवल एक निबंध लिखवाया गया था। लेकिन अब तो हममें से कई लोग लगातार हर चीज़ के लिए एआई पर निर्भर हो रहे हैं। ऐसे में सहज कल्पना की जा सकती है कि अगले कुछ वर्षों में दिमाग़ की क्या स्थिति हो सकती है।

कुछ और भी अध्ययन इसकी पुष्टि करते हैं। जैसे कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी और माइक्रोसॉफ्ट के संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि यदि लोग AI पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर हो जाये तो समस्या-समाधान की क्षमता कमज़ोर पड़ सकती है। शोधकर्ताओं ने 319 ऐसे व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों का सर्वे किया, जो अपने काम में सप्ताह में कम से कम एक बार AI टूल्स का इस्तेमाल करते हैं। उनसे पूछा गया कि वे AI का उपयोग करते समय क्रिटिकल थिंकिंग को किस तरह से अप्लाई करते हैं? अध्ययन में सामने आया कि जिन लोगों ने एआई पर ज़्यादा भरोसा किया, उन्होंने क्रिटिकल थिंकिंग के लिए बेहद कम प्रयास किये।

मानव विकास की थ्योरीज़ में जवाब की पड़ताल!

इन रिसर्च और स्टडीज़ के आलोक में हम उस हाइपोथेटिकल सवाल पर फिर आते हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो क्या हमारे दिमाग़ के दिन लदने वाले हैं? क्या मनुष्य का दिमाग़ पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा? इसके जवाब की तलाश मानव विकास की कुछ थ्योरीज़ में की जा सकती है।

मानव मस्तिष्क पर ‘इवॉल्यूशनरी इकोलॉजी ऑफ सोशल बिहेवियर’ की स्टडी कहती है कि तीन हज़ार साल से होमोसेपियन्स के मस्तिष्क के आकार में आश्चर्यजनक रूप से कमी आयी है। पुरा-मानव विज्ञानी और अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नैचुरल हिस्ट्री न्यूयॉर्क के क्यूरेटर एमेरिटस इयान टैटरसाल के अनुसार मनुष्य के दिमाग़ के आकार में गिरावट हिमयुग तक आते-आते यानी एक लाख साल साल पहले से होनी शुरू हुई है और तबसे अब तक इसमें क़रीब 13 फ़ीसदी तक की कमी आ गयी है।

इसके लिए एक वजह तो मनुष्य के शरीर का छोटा होना भी है। लेकिन इवॉल्यूशनरी इकोलॉजी ऑफ़ सोशल बिहेवियर के शोधकर्ताओं का मानना है कि इंसान का दिमाग़ हाल के हज़ारों सालों में महज़ इसलिए छोटा नहीं हुआ क्योंकि हमारा शरीर छोटा हो गया, बल्कि इसलिए भी हुआ क्योंकि अब हमें कई चीज़ों के लिए दिमाग़ की ज़रूरत कम पड़ रही है। पहले हर इंसान को ज़्यादा जानकारी ख़ुद याद रखनी पड़ती थी, जैसे शिकार कैसे करें, मौसम कैसे पहचानें, रास्ते कैसे याद रखें। इसलिए बड़ा दिमाग़ फ़ायदेमंद था। लेकिन धीरे-धीरे इंसानों ने ज्ञान व जानकारियों को अन्य साधनों में स्टोर करना शुरू कर दिया, जैसे किताबों में या परम्पराओं के ज़रिये। ज़्यादा दूर न जाएं तो एहसास होगा कि नयी टेक्नोलॉजी के आने के बाद दिमाग़ को और भी कई चीज़ें याद रखने की ज़रूरत नहीं रह गयी, जैसे फ़ोन नंबर्स। पुराने लोगों को दसियों लैंडलाइन नंबर्स मुंहज़बानी याद रहते थे, लेकिन स्मार्टफ़ोन आने के बाद हमें कई बार अपनी पत्नी या पति या ख़ास मित्रों के फ़ोन नंबर के लिए भी अपने फ़ोन के कांटैक्ट में झांकना पड़ता है। यानी सोचने और याद रखने का बोझ सिर्फ़ दिमाग़ पर नहीं रहा। इसके अलावा, इंसान समूह में फ़ैसले लेने लगा। समाज में हर व्यक्ति सब कुछ नहीं जानता, लेकिन सब मिलकर काम करते हैं। कोई खेती जानता है, कोई औज़ार बनाना, कोई शासन चलाना। इस तरह कई दिमाग़ मिलकर एक तरह की सामूहिक बुद्धि (कलेक्टिव इंटेलिजेंस) बना लेते हैं। तो शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जैसे-जैसे दिमाग़ की ज़रूरत कम होती गयी, वैसे-वैसे दिमाग़ का आकार कम होता गया।

लेकिन मसला केवल इंसानी दिमाग़ के आकार का नहीं है। आकार कम होने से उतना फ़र्क नहीं पड़ेगा। पड़ा भी नहीं है, क्योंकि इतने वर्षों के दौरान नित अनेक नवाचार आख़िर इसी दिमाग़ की बदौलत हुए हैं। लेकिन ये नवाचार हम इसलिए कर पाए क्योंकि दिमाग़ के आकार में कमी आने के बावजूद उसका उपयोग बढ़ता चला गया। किंतु जब दिमाग़ का कोई काम नहीं रह जाएगा, तब ज़रूर फ़र्क पड़ सकता है और वैज्ञानिक इसीलिए आशंकित भी हैं। सनद रहे कि अभी तो केवल एआई भी पूरी तरह बालिग़ नहीं हो पायी है। एजीआई (Artificial General Intelligence) के बाद वह मानव की तरह सोचने-समझने और काम करने लगेगी, तब क्या होगा? और फिर आने वाले दशकों में एएसआई (Artificial Superintelligence) आ जाएगी, तब? माना जा रहा है कि एएसआई तो सोचने-समझने के मामले में मानव से भी कई गुना आगे निकल जाएगी। तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि मानव दिमाग़ महज़ चंद सदियों का मेहमान है?

मानव दिमाग़ को किस तरह प्रभावित करेगी एआई?

हां, इस सवाल को भी देख लेते हैं। इवॉल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट रॉबर्ट सी. ब्रुक्स ‘द क्वार्टरली रिव्यू ऑफ़ बायोलॉजी’ में प्रकाशित अपने रिसर्च पेपर ‘कृत्रिम बौद्धिकता मानव विकास को किस तरह प्रभावित कर सकती है?’ में लिखते हैं कि जैसे प्रकृति में दूसरे प्राणियों के बीच संबंधों के कारण विभिन्न प्राणियों का विकास प्रभावित हुआ, उसी तरह मानव-एआई इंटरैक्शन्स भी दीर्घकालिक रूप से मानव विकास पर असर डाल सकते हैं। ब्रूक्स यह कहना चाहते हैं कि किसी भी जीव का विकास अकेले नहीं होता, बल्कि वह उन चीज़ों से प्रभावित होता है, जिनके साथ वह लगातार संपर्क में रहता है। प्रकृति में देखें तो शेर तेज़ होता गया क्योंकि हिरण तेज़ दौड़ने लगे। वहीं (शेर जैसे) शिकारियों की मौजूदगी की वजह से हिरणों में सतर्कता की प्रवृत्ति पैदा हुई। यानी दूसरे जीवों के साथ रिश्ता किसी प्रजाति के शरीर, दिमाग़ और व्यवहार को बदल देता है। ब्रूक्स इसी बात को एआई पर लागू करते हैं, क्योंकि उनके मुताबिक़ आज के समय में AI केवल एक तकनीक नहीं रह गयी है। यह हमारे जीवन में एक Co-Actor (सह-जीव) की तरह प्रवेश कर चुकी है। एआई अब केवल टूल नहीं है, वह हमारे एवज़ में सोच भी रही है। तो इसका इवॉल्यूशन (क्रमिक विकास) से क्या संबंध है? ब्रुक्स के अनुसार एआई मानव (यहां मानव मस्तिष्क पढ़ें) को उसी तरह से बदल देगी, जैसे हिरण ने शेर को और शेर ने हिरण को बदल दिया। हालांकि यह बदलाव कितने समय में होगा, यह कहना अभी मुश्किल है।

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इसे चार्ल्स डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत (Theory of Natural Selection) से और आसानी से समझा जा सकता है। डार्विन अपने इस सिद्धांत में समझाते हैं कि प्रकृति वही गुण बचाये रखती है, जो जीव को जीवित रहने और आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। तो अगर इंसान नामक जीव को जीवित रहने के लिए दिमाग़ की ज़रूरत नहीं रह जाएगी और उसका स्थान मशीन ले लेगी तो फिर ख़ाली दिमाग़ क्या करेगा? या तो शैतानी करेगा? या उससे भी बड़ी आशंका, ख़त्म हो जाएगा!

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

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