हिंदी पत्रकारिता नहीं, मानसिकता के 200 साल

हिंदी पत्रकारिता के 200 साल के सफ़र पर यह उड़ती-सी नज़र उस शख़्स की है, जिसने 1996 से 2019 तक सक्रिय तौर पर ज़िले से लेकर राजधानी तक हिंदी पत्रकारिता के भीतर काम किया। और यह व्यक्ति न्यूज़रूम में हाथ से लिखी ख़बरों से लेकर कंप्यूटर स्क्रीन तक जाने और पत्रकार के समाचार लेखक से कॉन्टेंट प्रोड्यूसर में बदलने का साक्षी रहा।

अजय शर्मा की कलम से....

हिंदी पत्रकारिता नहीं, मानसिकता के 200 साल

प्रमुख बिंदु:
— हिंदी का जन्म | रूढ़िवादी हिंदू छवि का निर्माण | हिंदी का राजनीतिक संस्कार
— हिंदी पट्टी का संकट और हिंदी पत्रकारिता का मूल ढांचा
— दलित, महिलाएँ, बच्चे और संवेदनहीनता | हिंदी में अल्पसंख्यक
— उदारीकरण, बाज़ार और नया हिंदी मीडिया | तकनीक, कार्पोरेट व डिजिटल भविष्य

           उत्सवधर्मी हिंदी पत्रकारिता की 200वीं सालगिरह को दुनिया की सबसे बड़ी भाषाई पत्रकारिता परंपराओं में से एक कहेंगे, उसके प्रसार, पाठक संख्या और लोकतांत्रिक पहुँच का गुणगान करेंगे। केवल भागीदारों के संख्या-बल के आधार पर भी कोई उत्सव मनाया जा सकता है।

अगर इन दो सदियों के भीतर झांकें, तो हम पाते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास, उत्तर भारतीय बहुसंख्यक हिंदू मानस के समानांतर चलता दिखता है। इस सफ़र के पड़ाव हैं, इस वर्ग की समाज-चेतना, असुरक्षाएँ, उसकी सांस्कृतिक महत्वाकांक्षाएँ, उसकी हीनता और दरिद्रता (सांस्कृतिक और आर्थिक दोनों), उसकी रूढ़ियाँ, उसके जातीय ढाँचे और सत्ता के प्रति उसका धीर-गंभीर सम्मोहन। दिलचस्प विरोधाभास यह है कि हिंदी पत्रकारिता इन 200 सालों में जितनी फैली है, उतनी ही संकुचित हुई है।

हिंदी का जन्म, हिंदू शुद्धतावादियों का आंदोलन

आधुनिक हिंदी किसी स्वाभाविक बहुभाषिक विकास की उपज नहीं थी।

उसकी शक्ल-सूरत फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (स्थापित-1800) और बाद में ईसाई मिशनरियों द्वारा तैयार गद्य परंपरा में तैयार होनी शुरू हुई।

जब उत्तर भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी और मिशनरी अपनी-अपनी ज़रूरतों के चलते आधुनिक छापेखाने, अंग्रेज़ी शिक्षा और प्रशासनिक ढाँचे खड़े कर रहे थे, तब उत्तर भारत की असल लिंग्वा फ्रांका (संपर्क भाषा) हिंदुस्तानी थी- मिश्रित, बहुलतावादी और अपने स्वभाव में खुली हुई। उसमें ब्रज शामिल थी, कुमाऊँनी और गढ़वाली थीं, बुंदेली थी, बघेली थी, मारवाड़ी थी, भोजपुरी, मैथिली, मगही थीं, छत्तीसगढ़ी थी, अवधी थी, और अरबी और फ़ारसी थीं। और इसी के साथ पुर्तगाली, फ्रैंच, अंग्रेज़ी, तुर्की आदि की अच्छी-ख़ासी शब्द-संपदा शामिल थी।

19वीं सदी के उत्तरार्ध में हिंदी आंदोलन हुआ और एक प्रक्रिया शुरू की गई। इस मिश्रित हिंदुस्तानी का “शुद्धिकरण” करके संस्कृतनिष्ठ करने की। भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) और उनके समकालीनों ने हिंदी को साहित्यिक और सार्वजनिक भाषा में बदलने का उद्यम किया। सोच यह थी कि उर्दू-फ़ारसी-अरबी उन मुस्लिम शासकों की भाषा रही हैं, जिन्होंने भारत पर आठ सौ साल शासन किया। इसलिए एक शुद्ध, अपनी, राष्ट्रीय भाषा चाहिए, जिसकी जड़ें भारत की मुस्लिम शासन पूर्व सांस्कृतिक परंपरा में हों। यह आग्रह केवल लिपि को देवनागरी में बदलने का नहीं था।

तब बोलचाल की हिंदुस्तानी से चुन-चुनकर शब्द-विलोपन शुरू हुआ, फ़ारसी-अरबी शब्दों को विदेशी या अन्य के रूप में देखने की प्रवृत्ति आई और देवनागरी को सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान दी जानी शुरू की गई। हिंदी को जनभाषा के बजाय एक संस्कृत-आधारित मानकीकृत परियोजना के बतौर विकसित किया जाने लगा।

ऐतिहासिक अध्ययन जैसे क्रिस्टोफ़र किंग और आलोक राय की भाषाई राजनीति पर चर्चाएँ संकेत देते हैं कि हिंदी-उर्दू विभाजन केवल भाषाई नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासन की ओर से पहली बार कराई गई जनगणना और धार्मिक पहचान के मुताबिक़ आबादी का वर्गीकरण और पददलित हिंदू अस्मिता को फिर से प्रतिष्ठित करने की कोशिश भी थी।

हिंदी का मूल चरित्र यहीं से गढ़ा जाना शुरू हुआ। यह भाषा कृत्रिम थी और शुरू से ही बहुलतावादी गुंजाइशों को लेकर संदिग्ध थी। उसमें न केवल धार्मिक बल्कि भौगोलिक समावेशन भी सीमित था। उसकी आकांक्षा उस समाज के भूगोल को संबोधित करना और उसका प्रतिनिधित्व करना था जो नर्मदा से ऊपर तक सीमित था। यही आज तक हिंदी का सबसे बड़ा सामाजिक आधार है। यह सामाजिक भूगोल अंग्रेज़ी सत्ता-संरचना से बाहर रखा गया था। हिंदी इस वर्ग के आत्म-सम्मान को स्वर देती थी और उसकी कुंठाओं का विस्तार करती थी।

भौगोलिक सीमांकन ने हिंदी पत्रकारिता में शुरू से ही बाक़ी दुनिया को लेकर एक अजीब किस्म की उदासीनता, विरक्ति और तटस्थता की नींव रखी। 19वीं सदी में जब वह हिंदुस्तानी से अलग अपनी पहचान बनाने को उद्यत थी, तब ग्लोबल नॉर्थ में विज्ञान, दर्शन, समाजशास्त्र, आधुनिक विचार, वैश्विक राजनीति और औद्योगिकीकरण आगे बढ़ रहे थे। उस समय हिंदी के वितान पर धार्मिक रूढ़ियाँ, नैतिकतावादी सोच, पितृसत्तात्मक सामंतवाद, जातिवादी संकुचन और सांस्कृतिक असुरक्षा तने हुए थे।

शुरुआत: रूढ़िवादी हिंदू की छवि का निर्माण

हिंदी के इतिहासकार 1826 में ब्रज और खड़ी बोली में कलकत्ता से छपे उदन्त मार्तण्ड को हिंदी का पहला अख़बार मानते हैं। यह अख़बार मात्र डेढ़ साल में ही काल-कवलित हो गया। इसमें सरकारी सूचनाएँ, स्थानीय राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल और कुछ उस समय हो रही वैज्ञानिक खोजों आदि का ज़िक्र हुआ करता था। उदन्त मार्तण्ड के बाद भारतेंदु हरिश्चंद्र की हरिश्चंद्र मैग्ज़ीन (1873) के प्रकाशन तक बीसियों अख़बार छपे और बंद हुए, जिन्हें हिंदी के अख़बार या हिंदी प्रेस कहा जाता है।

शुरुआती हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा धार्मिक-पौराणिक आख्यानों, नैतिक साहित्य और समाज-सुधारवादी लेखन से भरा था। नवल किशोर प्रेस ने 19वीं सदी के दूसरे हिस्से में और गीता प्रेस ने 20वीं सदी के पहले हिस्से में इस धारा का प्रतिनिधित्व किया। हंस और सरस्वती जैसी पत्रिकाओं ने सामाजिक विमर्श का विस्तार किया, पर वहाँ भी लेखन का बड़ा हिस्सा नैतिक निष्कर्षों और सुधारवादी दृष्टि से संचालित था।

19वीं सदी के आख़िर में भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी पत्रकारिता के सबसे प्रभावशाली संपादकों में थे। 1857 के विद्रोह के बाद किसी भी तरह की पत्रकारिता के लिए ज़्यादा विकल्प नहीं बचे थे। तो हिंदी की पत्रकारिता का कलेवर मूलत: साहित्यिक, विचार-प्रधान, ख़बरों के पीछे के मज़ेदार तथ्यों और क़िस्सों (ट्रीविया) और संपादकीय-नैतिक स्वरों से संचालित होता था। इसका स्वनिर्धारित लक्ष्य समाज को समझना या उसके भूगोल, समाज या इतिहास की सूचना देना नहीं, बल्कि समाज को सुधारना और उसे दिशा देना था। यानी संवाद कम, उपदेश अधिक।

हिंदी का राजनीतिक संस्कार

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के साथ ही हिंदी पत्रकार की नज़र कांग्रेस की भूमिका और कार्रवाइयों पर जाने लगी थी। कांग्रेस के आर्थिक संरक्षक और समर्थक तो अंग्रेज़ीदां इलीट जैसे बड़े कारोबारी, ज़मींदार, उद्योगपति और ख़ुद अंग्रेज़ अफ़सर थे। मगर यह संगठन व्यापक उत्तर भारतीय हिंदुस्तानी भाषा-भाषियों की उम्मीदों को स्वर देता था।

20वीं सदी शुरू होते-होते गांधी का मंच पर उदय हुआ और नवोदित हिंदी आंदोलन को मानो लक्ष्य मिल गया। हिंदी पत्रकारिता का दूसरा अहम चरित्र विकसित हुआ, राजनीतिक पक्षधरता। कांग्रेस समर्थक संपादकों और लेखकों का एक नेटवर्क खड़ा होने लगा, जिसे आज़ादी के बाद तक बने रहना था। कई प्रकाशनों को कारोबारियों और ज़मींदारों का समर्थन हासिल था।

कांग्रेस और गांधी के सहारे चल रही हिंदी प्रेस धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन का भाषा-तंत्र बनकर खड़ी हो गई। इसमें अंग्रेज़ी पत्रकारिता जैसी इंस्टीट्यूशनल रिपोर्टिंग की परंपरा नहीं थी। इसलिए उसमें न शोध था, न रिपोर्टिंग, न आंकड़ों पर आधारित विश्लेषण। वह मूलतः भावनात्मक राष्ट्रवाद की वाहक थी।

हिंदी पत्रकारिता के पास औपनिवेशिक अंग्रेज़ी प्रेस का ही एकमात्र ढाँचा था, जिससे वह कुछ प्रेरित होती थी, मगर उसके पास अंग्रेज़ी प्रेस जैसा पत्रकारीय टूल बॉक्स भी नहीं था। न प्रशिक्षण था, न संस्थागत ढांचा, और न ही बौद्धिक तेज।

आज़ादी के बाद सरकारी भोंपू

1947 में आज़ादी के साथ ही हिंदी पत्रकारिता ने जो राष्ट्रवादी मिशन लिया था, वह पूरा हो चुका था। उसे लोकतांत्रिक सामाजिक ढाँचे में जगह बनानी थी, पर न तो ऐसा कोई विमर्श पहले उसमें था और न ही तैयारी। हिंदी पत्रकारिता ख़ुद किंकर्तव्यविमूढ़ थी।

व्यवस्था-विरोध, खोजबीन से भरपूर पत्रकारिता, सत्ता संरचनाओं पर पैनी नज़र और उससे सवाल, ये लोकतांत्रिक टूलकिट उसमें नहीं था। ऐसे में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियाँ, मंत्रालयों की गतिविधियाँ, नेताओं के भाषण, यही उसकी प्रमुख खाद्य सामग्री बने। इसके बाद जो बचा, वह थी धर्म और साहित्य के घालमेल से पनपी सोच-समझ। इसलिए अर्थशास्त्र, विज्ञान, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, भौगोलिक घटनाएँ, दार्शनिक बहसें, संस्थागत भ्रष्टाचार, ये विषय हिंदी पत्रकारों के लिए शुरू से ही हाशिए पर रहे।

कई अध्ययन बताते हैं कि 1950–70 के बीच हिंदी अखबारों में सरकारी विज्ञप्तियों और आधिकारिक रिपोर्टों का अनुपात बहुत ज़्यादा था। इसकी वजह सिर्फ़ राजनीतिक दबाव नहीं था। हिंदी की बुनियादी संरचना में ही आलोचनात्मकता और प्रश्न पूछने की परंपरा नहीं थी, इसलिए वही विरासत में आज़ादी के बाद भी आई।

हिंदी पट्टी का संकट

हिंदी पत्रकारिता के लिए उत्तर भारतीय सामाजिक-आर्थिक बुनावट को समझना ज़रूरी है। जिस इलाक़े में हिंदी पत्रकारिता फली-फूली, वे थे संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, राजपूताना, यानी मौजूदा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा के बड़े हिस्से, जो आज़ादी से पहले और उसके बाद भी सामाजिक विकास, शिक्षा, सार्वजनिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवहार के मामले में पिछड़े रहे हैं।

यह वही भूगोल है जहाँ जाति सामाजिक संगठन का मुख्य आधार है, पितृसत्ता सामान्य सामाजिक व्यवहार है, धार्मिक पहचान सत्ता का स्थायी ईंधन है और सामंती मानसिकता हर तरह की लोकतांत्रिक समझ के ऊपर राज करती है।

ऐसे समाज में पत्रकारिता करना हमेशा से ख़तरनाक काम रहा है।

हिंदी पट्टी का बड़ा हिस्सा पत्रकार से सच नहीं, अपने पूर्वाग्रहों की पुष्टि चाहता है। अगर पत्रकार जाति पर लिखता है, तो जातीय दुश्मनी झेलेगा, धर्म पर लिखेगा तो धर्मद्रोही कहलाएगा, सत्ता पर लिखेगा तो देशद्रोही का तमग़ा लेकर राजनीतिक और कभी-कभी हिंसक शारीरिक हमले झेलेगा, अगर स्त्रियों, दलितों या आदिवासियों की बात करेगा तो उसे उसका एजेंडा कहकर खारिज किया जाएगा।

यानी हिंदी पत्रकारिता का बड़ा संकट सिर्फ़ सत्ता नहीं है, उसका अपना पाठक भी है।

चूँकि समाज ऐतिहासिक तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों से अपरिचित रहा है, तो हिंदी पत्रकारिता को आसानी से भावनात्मक उन्माद, नैतिक रूढ़ियों, राष्ट्रवाद और सामुदायिक पूर्वाग्रहों की तरफ़ धकेले जाना और हिंदी पत्रकार को इन वजहों से बरगलाना आसान रहा है।

हिंदी पत्रकारिता का असल ढाँचा

मुख्यधारा के मीडिया में बहुसंख्यक हिंदूवादी और राष्ट्रवादी चश्मे से लिखी गई ख़बरों की संरचना अक्सर एकतरफ़ा और असंतुलित रहती है। जाति, सामाजिक हैसियत, धर्म, राज्य के पूर्वाग्रह उसके केंद्र में रहते हैं। निष्पक्षता की तो उम्मीद नहीं की जा सकती पर वस्तुनिष्ठता का भी उसमें हमेशा से अभाव रहा है।

सूचनाओं और विचारों का अति-सरलीकरण हिंदी पत्रकारिता का स्थायी रोग है। जटिल सामाजिक प्रश्नों को उचित शब्दावली छोड़कर पर्यायवाची शब्दों के सहारे अर्थहीन या अर्थच्युत करना और उसके आधार पर सनसनी फैलाना उसका एक गुण रहा है। सामाजिक जटिलताओं को समझने का आग्रह रखने के बजाय हमेशा बाइनरी नैतिक फ़्रेमों का इस्तेमाल किया जाता है, यानी अच्छा-बुरा, देशद्रोही-देशभक्त, संस्कारी-असंस्कारी आदि।

दिलचस्प चीज़ यह कि प्रसार और रीडरशिप के आंकड़ों को छोड़ दें तो बिना किसी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण, शोध या आंकड़ों की मौजूदगी के अधिकांश हिंदी संपादकों को हमेशा यह भ्रम रहा है कि वे हिंदी पट्टी के मानस के प्रतिनिधि, उसके पैरोकार और उसके संरक्षक हैं। अपने ही सामाजिक वर्ग की सीमाओं को वे जनमत समझने का धोखा खाते रहे हैं। इसी दृष्टि-दोष के चलते वे हिंदी जनमानस के लक्षणों और ख़ासियतों को लेकर ग़लतबयानी या सरलीकरण करते हैं।

दलित, महिलाएँ, बच्चे और संवेदनहीनता

हिंदी पत्रकारिता का एक स्थायी अपराध उसकी सामाजिक दृष्टिहीनता है।

हिंदी पत्रकारिता में दलित केवल दुख, हिंसा और राजनीति में अस्तित्व में आता है। वहाँ दलित कभी भी एक पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक समुदाय नहीं होता। दलित हमेशा एक निष्क्रिय पीड़ित है, जिसके पास एजेंसी नहीं है, विचार नहीं हैं, राजनीति नहीं है, इतिहास नहीं है। हिंदी पत्रकारिता जटिल सामाजिकता वाले समुदाय को स्थायी रूप से पीड़ित दिखाती है। अगर वह किसी संघर्ष में संगठित रूप से खड़ा दिखाई देता है तो वह उसे “हिंसक भीड़” कहती है जो “उग्र प्रदर्शन” और “जातीय संघर्ष” में मुब्तिला है।

हिंदी पत्रकारिता का ढाँचा मूलत: हिंदू सवर्ण और मध्यवर्गीय है। ऑक्सफैम-न्यूज़लॉन्ड्री की 2019 की रिपोर्ट बताती है कि हिंदी सहित भारतीय मीडिया में दलितों और आदिवासियों की उपस्थिति लगभग नगण्य है।

हिंदी भाषा का साँचा गहरा जातिवादी है। दलितों की बात करते समय यह भाषा सिर्फ शब्दांश या वाक्यांश नहीं होती, यह सत्ता-संबंधों का आर्तनाद बन जाती है। यह भाषा दलित पहचान को अनावश्यक रूप से उछालती है, जबकि सवर्ण पहचान को अदृश्य रखती है। यानी जाति केवल “दूसरे” की होती है। 1990 के बाद हिंदी पत्रकारिता में दलितों को वोट बैंक की तरह स्थापित किया गया।

पहली बार डिजिटल मीडिया पर दलित पत्रकारों, लेखकों ने अपनी आवाज़ की दावेदारी पेश की है, जिसे मुख्यधारा की हिंदी प्रेस और मीडिया ने पूरी तरह से कुचल रखा है। अब दलित पत्रकार खुद अपनी भाषा में, अपने अनुभव लिख पा रहे हैं। यह बदलाव अहम है क्योंकि पहली बार दलित कहानी नहीं, कथाकार बना है।

हिंदी पत्रकारिता की सबसे गहरी संरचनात्मक समस्याओं में से एक है महिलाओं के बारे में रिपोर्टिंग। ऐतिहासिक तौर पर हिंदी ने औरतों को बहुत कम एक स्वतंत्र नागरिक, राजनीतिक व्यक्तित्व, आर्थिक इकाई या जटिल बौद्धिक अस्तित्व माना है। इसकी जड़ें भी उसके ऐतिहासिक हिंदू सवर्ण पुरुषवादी पितृसत्तात्मक ढाँचे में निहित है। इस भाषाई पत्रकारिता को औरत या तो पीड़िता चाहिए या देवी या त्यागमयी माँ या ग्लैमरस जिंस या फिर संस्कृति पर खतरा।

हिंदी पत्रकारिता ऐतिहासिक तौर पर स्त्री को जटिल मनुष्य की तरह देखने में विफल रही है। यह भाषा अपराध को स्त्री के शरीर और उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ती है, अपराधी की हिंसा से नहीं। यानी बलात्कार को हिंदी पत्रकारिता ने स्त्री के सम्मान के नुक़सान की तरह देखा, न कि उसकी एजेंसी और अधिकारों पर हमले की तरह। वह महिलाओं की रिपोर्टिंग में अक्सर नैतिक फ़तवे देती है। यानी अपराधी की नहीं स्त्री की जीवनशैली कटघरे में खड़ी करती है।

जब हिंदी मीडिया महिलाओं की सफलता की कहानियाँ दिखाता है, तो उन्हें भी प्रेरणात्मक मेलोड्रामा में बदलता है, मसलन, घर सँभालते हुए बेटी बनी अफ़सर, माँ ने चूल्हे से निकलकर रचा इतिहास। इस भाषाई पत्रकारिता में पुरुष वैज्ञानिक सिर्फ़ वैज्ञानिक है, महिला वैज्ञानिक दो बच्चों की माँ भी है।

हिंदी न्यूज़रूम लगभग पूरी तरह पुरुष-प्रधान रहे हैं। महिला पत्रकारों को लंबे समय तक सॉफ्ट स्टोरीज़ दी जाती रही हैं, जबकि सत्ता, अपराध, रक्षा, राजनीति जैसी बीट्स पुरुषों के कब्जे में रही हैं। और जब वो इन क्षेत्रों में दावेदारी पेश करती हैं, तो उन्हें सेक्सिज़्म, उत्पीड़न और उपहास झेलना पड़ता है। हिंदी पत्रकारिता में स्त्री-विरोध बहुत गहराई से पैठ बनाए रहा है। हिंदी टेलिविज़न ने स्त्री को लगातार रहस्य, ख़तरे और सेक्शुएलिटी के फ़्रेम में क़ैद रखा है।

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