
- May 30, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग अरुण अर्णव खरे की कलम से....
व्यंग्य की काव्य-यात्रा: कबीर से समकाल तक
गद्य-व्यंग्य के सुव्यवस्थित रूप में विकसित होने से बहुत पहले ही हिंदी काव्य-परंपरा में व्यंग्य की एक सुदीर्घ, समृद्ध और प्रभावशाली धारा विद्यमान रही है। संस्कृत साहित्य में भी व्यंग्य की जड़ें प्राचीन तथा मध्यकालीन काव्य-परंपराओं में गहराई तक निहित हैं। आगे चलकर ब्रज, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली आदि लोक एवं जनभाषाओं की काव्य-परंपराओं में यह प्रवृत्ति और अधिक प्रखर रूप में विकसित हुईं, जहाँ व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और मानवीय दुर्बलताओं पर सीधा प्रहार करता है।
मध्यकालीन हिंदी साहित्य, विशेषकर भक्तिकाल में, व्यंग्य को एक नयी वैचारिक धार प्राप्त होती है। पंद्रहवीं शताब्दी में सक्रिय संत कबीर को इस परंपरा का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। कबीर ने जिस निर्भीकता से धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया, वह अभूतपूर्व है। उनके दोहों और साखियों में निहित व्यंग्य समाज को झकझोरने और सत्य के प्रति जागृत करने का कार्य करता है। इस दृष्टि से उन्हें हिंदी काव्य में व्यंग्य का आदिपुरुष कहना संगत प्रतीत होता है।
कबीर से सशक्त रूप में प्रारंभ हुई हिंदी काव्य की व्यंग्य-परंपरा समय के साथ निरंतर समृद्ध होती रही। इस परंपरा में व्यंग्य के विविध उपकरण – वक्रोक्ति, विडंबना, उपहास, व्याज-स्तुति, कटाक्ष, अतिशयोक्ति तथा प्रतीकात्मकता, विभिन्न कालखंडों की काव्य-रचनाओं में विविध रूपों में अभिव्यक्त होते दिखाई देते हैं। बदलते सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप इन उपकरणों का स्वरूप और तीव्रता भी परिवर्तित होती रही है, जिससे व्यंग्य की अभिव्यक्ति और अधिक बहुआयामी बनती गई। इसके अतिरिक्त कविता ने अपने स्वतंत्र अभिव्यक्ति-औजार भी विकसित किए, जिनमें ‘पैरोडी’ विशेष उल्लेखनीय है।
आधुनिक काल में यह प्रवृत्ति और अधिक सजग तथा प्रयोगशील रूप में सामने आई है।
यहाँ साहित्य के विकास-क्रम में विभिन्न कालखंडों के आधार पर हिंदी कविता की व्यंग्यात्मक यात्रा को विभिन्न कालखंडों, उसके अभिव्यक्ति-उपकरणों और वैचारिक संदर्भों के साथ समझने का प्रयास किया गया है।
भक्तिकाल: सामाजिक-धार्मिक पाखंड पर चोट
इस काल (लगभग 14वीं से 17वीं शताब्दी) में व्यंग्य का मुख्य उद्देश्य धार्मिक कुरीतियों और सामाजिक भेदभावों को मिटाना था। जैसा कि ऊपर उल्लेखित है, कबीर इस कालखंड के सबसे प्रखर प्रतिनिधि हैं। पंद्रहवीं शताब्दी में सक्रिय कबीर, भक्तिकाल की निर्गुण शाखा के ज्ञानमार्गी संत थे। उन्होंने हर धर्म, वर्ग, जाति व सभी प्रकार के भेदभावों पर तीखा कटाक्ष किया। उनकी काव्य-भाषा और शैली में एक विशेष प्रकार का व्यंग्यात्मक ओज मिलता है, जो सीधे जनमानस से संवाद करता है। वह मूर्ति-पूजा पर प्रश्न उठाते हुए कहते हैं- “पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार। ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥” इसी प्रकार वे मुस्लिम समाज की औपचारिक धार्मिकता पर भी व्यंग्य करते हैं- “कांकर पाथर जोड़ि के, मस्जिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥”
सीधी और खरी बात कहने वाले कबीर ने अपनी रचनाओं में उलटबांसियों का भी अत्यंत कलात्मक प्रयोग किया है। उनकी अनेक साखियों और पदों में व्यंग्योक्ति तथा हास्य का प्रभावशाली संयोजन मिलता है। उदाहरण के लिए- “मूँड मुड़ाये हरि मिलैं, तो सब कोई मुँडाय। बार-बार के मूंडते, भेड़ न बैकुंठ जाय॥”
कबीर होने की सार्थकता पर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का यह कथन अतिमहत्वपूर्ण है- “सच पूछा जाये तो आज तक हिंदी में ऐसा ज़बर्दस्त व्यंग्य-लेखक पैदा ही नहीं हुआ। उनकी साफ़ चोट करने वाली भाषा, बिना कहे भी सब कुछ कह देने वाली शैली और अत्यंत सादी, किंतु अत्यंत तेज प्रकाशन-भंगिमा अनन्य साधारण है।”
कबीर के अलावा भी कई सुर
भक्तिकाल के अन्य कवियों में रैदास (रविदास), मलूकदास और दादू दयाल की रचनाओं में भी सामाजिक-धार्मिक आडंबरों, जाति-व्यवस्था, पाखंड, कर्मकांड और हिंदू-मुस्लिम भेदभाव पर व्यंग्य मिलता है। ये सभी कबीर की परंपरा से जुड़े हुए माने जाते हैं और सरल भाषा में समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। रैदास (रविदास), जो कबीर के लगभग समकालीन थे और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय से आते थे, जाति-व्यवस्था पर अत्यंत मार्मिक प्रहार करते हैं – “जाति-जाति में जाति है, जो केतन के पात। रैदास मनुष न जुड़ सके, जब तक जाति न जात॥”
यहाँ व्यंग्य इस तथ्य पर है कि जाति-प्रथा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने के बजाय विभाजित करती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संत मलूकदास बाह्य आडंबर और ढोंगी फ़कीरी पर क़रारा व्यंग्य करते हैं- “भेष फकीरी जे करें, मन नाहीं आवै हाथ। दिल फ़कीर जे हो रहै, साहेब तिनके साथ॥” इसी तरह वे सामाजिक संवेदनहीनता पर भी प्रहार करते हैं- “मलूका सोई पीर है, जो जाने पर-पीर। जो पर पीर न जानहीं, सो काफिर बे-पीर॥” यहाँ व्यंग्य उन लोगों पर है जो संवेदनशील होने का दावा तो करते हैं, पर दूसरों की पीड़ा के प्रति उदासीन रहते हैं।
भक्तिकाल के एक अन्य महत्वपूर्ण संत दादू दयाल की साखियों में व्यंग्य का स्वर अपेक्षाकृत संयमित है, किंतु वे भी सामाजिक और धार्मिक असमानताओं, मिथ्या आडंबरों तथा तथा बाह्य साधना पर स्पष्ट प्रहार करते हैं। उनके यहाँ व्यंग्य अधिक संतुलित, नैतिक और उपदेशात्मक रूप में अभिव्यक्त होता है।
इसी कालखंड की सगुण भक्ति धारा में तुलसीदास और सूरदास जैसे महान कवि हुए, जिनकी रचनाएँ मुख्यतः भक्ति-रस प्रधान हैं। फिर भी, उनके काव्य में प्रसंगानुसार मानवीय दुर्बलताओं, सामाजिक व्यवहारों तथा चरित्रों के माध्यम से कहीं-कहीं सूक्ष्म और अंत:सलिला की भाँति प्रवाहित व्यंग्य दृष्टिगोचर होता है।
रीतिकाल: अन्योक्ति और परोक्ष व्यंग्य की प्रवृत्ति
रीतिकालीन हिंदी साहित्य का प्रमुख केंद्र राजदरबार और शृंगार-प्रधान काव्य रहा, जिसके कारण प्रत्यक्ष सामाजिक या राजनीतिक व्यंग्य की संभावनाएँ सीमित थीं। दरबारी आश्रय पर निर्भरता के कारण कवियों के लिए सत्ता पर खुलकर प्रहार करना सहज नहीं था, फिर भी कुछ कवियों ने अपने रचनात्मक चातुर्य से व्यंग्य को अन्योक्ति, संकेत और परोक्ष अभिव्यक्ति के माध्यम से व्यक्त किया।
इस संदर्भ में बिहारी का उदाहरण विशेष उल्लेखनीय है। उनकी ‘बिहारी सतसई’ मुख्यतः श्रृंगारिक दोहों के लिए प्रसिद्ध है, किंतु कुछ दोहों में उन्होंने समसामयिक जीवन और सत्ता के प्रति संकेतात्मक व्यंग्य भी किया है। कहा जाता है कि उन्होंने जयसिंह प्रथम को कर्तव्यपरायणता की ओर उन्मुख करने हेतु अन्योक्ति का सहारा लेते हुए लिखा था- “नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल॥” यहाँ भँवरे और कली के माध्यम से राजा की विलासिता पर सूक्ष्म चोट की गयी है।
इसी काल के एक अन्य प्रमुख कवि भूषण के काव्य में वीर रस के साथ-साथ मुग़ल सत्ता, विशेषकर औरंगज़ेब की नीतियों के प्रति विरोध और आलोचनात्मक स्वर मिलता है। केशवदास के काव्य में अलंकारिकता के भीतर व्यंग्यात्मक संकेत मिलते हैं। उनकी रचनाओं में दरबारी जीवन, नारी-स्वभाव और सामाजिक व्यवहारों पर हल्की चुटकी लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। पद्माकर के काव्य में भी समकालीन परिस्थितियों का चित्रण करते हुए यही प्रवृति दिखाई देती है। समग्रतः रीतिकाल में व्यंग्य प्रत्यक्ष और तीखा न होकर परोक्ष, अलंकारिक और सीमित रूप में उपस्थित है।

भारतेंदु युग: आधुनिक व्यंग्य की आधारशिला
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदी साहित्य में आधुनिक चेतना के साथ व्यंग्य को एक नई दिशा और स्पष्टता प्राप्त होती है। इस युग में व्यंग्य पहली बार प्रत्यक्ष, सजग और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिंदी नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। उनके साहित्य में तत्कालीन समाज की विसंगतियों, अंधानुकरण, सामाजिक रूढ़ियों, औपनिवेशिक शोषण और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य मिलता है। उन्होंने व्यवस्था की विसंगतियों को ‘प्रहसन’, ‘नाटक’ और ‘मुकरियों’ के माध्यम से प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया। उनकी एक प्रसिद्ध मुकरि में यह विडंबना देखी जा सकती है – “सब गुरुजन को बुरा बतावै, अपनी खिचड़ी अलग पकावै। भीतर तत्व न झूठी तेजी, क्यों सखि सज्जन? नहिं अँगरेजी॥” यहाँ अंग्रेज़ी भाषा और उससे जुड़े आडंबर पर तीखा व्यंग्य किया गया है।
भारतेंदु के समकालीन कवियों – बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट आदि की रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों, ढोंग और अंग्रेजी शासन की नीतियों पर व्यंग्य मिलता है। इस युग की विशेषता थी कि व्यंग्य परोक्ष और अलंकारिक अभिव्यक्ति से निकलकर प्रत्यक्ष, जनोन्मुख और उद्देश्यपरक हो गया।
द्विवेदी युग: संयमित, नैतिक और सुधारवादी व्यंग्य
द्विवेदी युग, हिंदी साहित्य में अनुशासन, गंभीरता और उद्देश्यपरकता के लिए प्रसिद्ध है। महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ पत्रिका ने साहित्य को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इस युग की एक उल्लेखनीय उपलब्धि काव्य-भाषा के रूप में ब्रज-भाषा के साथ-साथ खड़ी बोली हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा है, जिसने आगे चलकर आधुनिक हिंदी काव्य की आधारभूमि तैयार की।
इस काल की कविताओं में प्रकृति-चित्रण, देशभक्ति, नारी उत्पीड़न, छुआछूत, बाल-विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं पर व्यापक लेखन हुआ। विशुद्ध व्यंग्य-रचनाएँ कम ही लिखी गईं, किंतु जहाँ भी व्यंग्य उपस्थित है, वहाँ उसका स्वर संयमित, नैतिक और सुधारवादी है। सामाजिक कुरीतियों, अज्ञान, अंधविश्वास, अशिक्षा और नैतिक पतन पर आलोचनात्मक दृष्टि इस युग की प्रमुख प्रवृत्ति रही।
द्विवेदी युग के प्रमुख कवियों में मैथलीशरण गुप्त, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, गोपालशरण सिंह, लोचन प्रसाद पाण्डेय, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’, कामता प्रसाद गुरु, रामनरेश त्रिपाठी, श्रीधर पाठक आदि उल्लेखनीय हैं।
नाथूराम शर्मा ‘शंकर’ की रचना “गर्भरण्डा रहस्य” इस काल की एक महत्वपूर्ण व्यंग्यात्मक कृति मानी जाती है। यह एक प्रबंध-काव्य है, जिसमें विधवाओं की दयनीय स्थिति और धार्मिक संस्थानों से जुड़े अनाचारों का यथार्थपरक एवं आलोचनात्मक चित्रण मिलता है। मैथिलीशरण गुप्त तथा अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आदि कवियों की रचनाओं में प्रत्यक्ष व्यंग्य अपेक्षाकृत कम है, किंतु उनकी कविता में सामाजिक चेतना और सुधार की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो व्यंग्य की पृष्ठभूमि तैयार करती है। उदाहरणार्थ, मैथलीशरण गुप्त की मशहूर पंक्तियाँ “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी। आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।” का उल्लेख किया जा सकता है। पहली दृष्टि में यह स्त्री की करुण स्थिति का चित्रण प्रतीत होता है, परंतु गहराई से देखने पर यह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पर एक निहित व्यंग्य भी है, जहाँ सृजन-शक्ति से संपन्न स्त्री ही सबसे अधिक उपेक्षित है।
छायावाद: सूक्ष्म, अंतर्मुखी और प्रतीकात्मक व्यंग्य
द्विवेदी युग के पश्चात हिंदी साहित्य में छायावाद का युग (1918-1936) प्रारंभ होता है जो एक महत्वपूर्ण मोड़ का द्योतक है। इस युग में कविता पारंपरिक बंधनों से मुक्त होकर आत्माभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध और भावनात्मक गहराई की ओर उन्मुख होती है। भाषा की दृष्टि से यह काल परिमार्जित, कोमल-कांत पदावली से युक्त तथा कलात्मक एवं अलंकारिक अभिव्यक्ति का युग है। इस दौर में कवियों ने पारंपरिक छंदों के साथ-साथ मुक्तछंद और विविध काव्य-रूपों का भी नवोन्मेषी प्रयोग किया। इस कालखंड को जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे महान कवियों का युग माना जाता है, जिन्हें छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ कहा जाता है। इन कवियों ने हिंदी कविता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
व्यंग्य के परिप्रेक्ष्य में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ इस युग के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताओं में व्यंग्य सबसे स्पष्ट, तीखा और वैचारिक रूप में व्यक्त हुआ है। वे सामाजिक-आर्थिक विषमता, धार्मिक पाखंड, पूँजीवादी प्रवृत्तियों और सामंती शोषण पर करारा प्रहार करते हैं। उनकी कविता ‘दान’ धार्मिक आडंबर और संवेदनहीनता पर व्यंग्य की उत्कृष्ट मिसाल है, जहाँ एक धर्मपरायण व्यक्ति मानवीय करुणा से शून्य दिखाई देता है। इसी प्रकार ‘कुकुरमुत्ता’ में पूँजीपति वर्ग की शोषणकारी प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य किया गया है। पूँजीपति वर्ग के प्रतीक ‘गुलाब’ को संबोधित करते हुए वे लिखते हैं-
“अबे सुन बे गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू रंग-ओ-आब,
खून चूसा तूने खाद का अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट।”
उनकी कविता ‘भिक्षुक’ में एक भूखे, दरिद्र व्यक्ति और उसके बच्चों का मार्मिक चित्रण करते हुए समाज की संवेदनहीनता पर गहरा व्यंग्य किया गया है, जहाँ मनुष्य की करुणा क्षीण पड़ती दिखाई देती है और स्थिति ऐसी हो जाती है कि पशु भी उससे अधिक संवेदनशील प्रतीत होते हैं। इसी प्रकार ‘रानी और कानी’, ‘ठूँठ’ आदि कविताओं में नारी-शोषण, बाल-वैधव्य तथा सामाजिक स्वार्थपरता पर तीखा व्यंग्य मिलता है। समग्रतः निराला का व्यंग्य एक विद्रोही, मानवीय और प्रगतिशील चेतना से जुड़ा हुआ है, जो छायावाद की भावुकता के भीतर सामाजिक यथार्थ का सशक्त हस्तक्षेप प्रस्तुत करता है।
छायावाद के अन्य प्रमुख कवि – जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा, की रचनाएँ मुख्यतः भावुकता, सौंदर्यबोध और आत्मानुभूति से ओत-प्रोत हैं, इसलिए इनमें व्यंग्य का स्वर प्रत्यक्ष और तीखा न होकर अत्यंत सूक्ष्म, अंतर्धारात्मक और कलात्मक रूप में व्यक्त होता है।
जयशंकर प्रसाद मुख्यतः भावुक, रहस्यवादी और दार्शनिक कवि हैं। उनके काव्य (और नाटकों) में मानवीय दुर्बलताओं, जीवन की क्षणभंगुरता और ऐतिहासिक परिस्थितियों के माध्यम से कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक संकेत मिलते हैं। उनका व्यंग्य भावनात्मक, प्रतीकात्मक और चिंतनप्रधान होता है तथा प्रत्यक्ष प्रहार न होकर चरित्रों और परिस्थितियों के माध्यम से उभरता है, जो पाठक को स्वयं अर्थ ग्रहण करने के लिए प्रेरित करता है। उनकी प्रमुख कृतियों- ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘झरना’ आदि में गहन अर्थ लिए सूक्षम व्यंग्य मिलता है। प्रसिद्द आलोचक डॉ नागेंद्र ने प्रसाद के काव्य में प्रकृति की सहजता और मानव-चेतना की जटिलता के अंतर्विरोध को रेखांकित किया है।
सुमित्रानंदन पंत के काव्य में आरंभिक चरण में प्रकृति और सौंदर्य का प्रभुत्व है, किंतु उत्तरवर्ती काव्य में उन्होंने आधुनिक जीवन, भौतिकता और मानवीय विडंबनाओं की ओर ध्यान दिया। इस दौर में उनके यहाँ सूक्ष्म व्यंग्यात्मक दृष्टि विकसित होती है, जो आधुनिक मनुष्य की असंतुलित जीवन-शैली पर संकेत करती है। उनकी एक कविता की पंक्तियाँ हैं – “मुक्त करे नारी को मानव, चिर बंदिनी नारी को। युग-युग की निर्मम कारा से जननी सखि प्यारी को।” ये पंक्तियाँ नारी की परंपरागत स्थिति, नियति और बंधनों पर कटाक्ष हैं। पंत की कविताओं में व्यंग्य ऐसे ही छायावादी कोमलता के घेरे में रहकर सामाजिक जागरण की ओर इशारा करता है।
महादेवी वर्मा के काव्य में करुणा और संवेदना का प्रवाह है। उन्हें छायावाद की मीरा कहा जाता है। उनकी कविताओं में व्यंग्य प्रायः अनुपस्थित है, यदि कहीं मिलता भी है तो यह बहुत सूक्ष्म और आत्मीय रूप में है, जो अक्सर स्त्री-जीवन की विडंबना, समाज की उदासीनता या प्रेम की नश्वरता के संदर्भ में प्रकट होता है।
छायावाद से संबंधित या उसके प्रभाव में आने वाले अन्य कवियों में मुकुटधर पांडेय, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सोहनलाल द्विवेदी, सियारामशरण गुप्त, श्याम नारायण पांडे, नंददुलारे वाजपेयी, रामकुमार वर्मा, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, हरिवंशराय बच्चन के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं लेकिन इन कवियों की कविताओं में व्यंग्य प्रायः प्रमुख स्वर नहीं है, यह अधिकतर अंतर्धारा के रूप में, प्रसंगानुसार, कहीं-कहीं प्रकट होता है।
प्रगतिवाद: यथार्थवादी और जनपक्षधर व्यंग्य
1936 के बाद हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद (1936-1943) के उदय के साथ व्यंग्य का स्वर अधिक स्पष्ट, तीखा और यथार्थपरक हो जाता है। प्रयोगवाद और नई कविता के दौर में व्यंग्य अधिक बौद्धिक, आत्मपरक और संरचनात्मक रूप लेता है, जहाँ भाषा और शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग किए जाते हैं। नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों ने सामाजिक असमानता, राजनीतिक भ्रष्टाचार और शोषण पर करारा प्रहार किया। यहाँ व्यंग्य सीधे जनता के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है और सत्ता-विरोधी चेतना को अभिव्यक्त करता है।
इस संदर्भ में नागार्जुन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने हिंदी कविता में व्यंग्य को कबीर, भारतेंदु और निराला के बाद एक नई पहचान दी। डॉक्टर नचिकेता के अनुसार- “व्यंग्य विदग्धता नागार्जुन की कविता की असली जमीन है। कबीर के बाद नागार्जुन ही हिंदी कविता के बड़े व्यंग्यकार हैं।” उनकी कविताओं में सत्ता, राजनीति और व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य मिलता है। उदाहरण के लिए, उनकी प्रसिद्द कविता “आओ रानी हम ढोएँगे पालकी” की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-
“आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की।
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की,
यही हुई है राय जवाहरलाल की॥”
यह कविता 1961 में महारानी एलिजाबेथ के भारत आगमन के अवसर पर लिखी गई मानी जाती है। उस समय सरकार द्वारा उनके स्वागत के लिए की गई भव्य तैयारियों और आम जनता की गरीबी के बीच विद्यमान विरोधाभास ने कवि को उद्वेलित किया, जिसे उन्होंने सशक्त व्यंग्य के रूप में व्यक्त किया।
नागार्जुन ने तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक जीवन से जुड़े विविध पक्षों पर अत्यंत प्रचुरता और तीखेपन के साथ लेखन किया। विष्णु नागर के अनुसार, “उन्होंने कविता में अपने समय को दर्ज करने की कोशिश की। उनकी कविताओं में व्यंग्य की अनेक परतें हैं।” ‘शासन की बन्दूक’, ‘तीनों बन्दर बापू के’, ‘मंत्र’, ‘रामराज’, ‘उधर घिन तो नहीं आती’, ‘आए दिन बहार के’, ‘बाढ़ : 67, पटना’, ‘इन्दुजी, क्या हुआ आपको’ आदि उनकी प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक कविताएँ हैं। इन रचनाओं में सत्ता, समाज और नैतिक मूल्यों की विसंगतियों पर उन्होंने बेबाक प्रहार किया है, जिसे निम्न पंक्तियों से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है-
“बापू के भी ताऊ निकले, तीनों बन्दर बापू के,
सरल सूत्र उलझाऊ निकले, तीनों बन्दर बापू के।” (‘तीनों बन्दर बापू के’)
“सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक,
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बन्दूक।
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक,
बाल न बाँका कर सकी शासन की बन्दूक।” (‘शासन की बन्दूक’)
“रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है,
सूरत-शक्ल वही है भैया, बदला केवल ढाँचा है।” (‘रामराज’)
इसी प्रकार त्रिलोचन की कविताओं में व्यंग्य अत्यंत सहज, मितभाषी और यथार्थ से जुड़ा हुआ है। उनका व्यंग्य शोरगुल या तीखे कटाक्ष के रूप में नहीं, बल्कि सामान्य जीवन-स्थितियों के भीतर छिपी विडंबनाओं को उजागर करता है। वे विशेषतः सामाजिक असमानता, बौद्धिक आडंबर और साहित्यिक कृत्रिमता पर व्यंग्य करते हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’ की पंक्तियाँ देखिए-
“चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती,
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है,
खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है।”
यहाँ अशिक्षा की स्थिति के माध्यम से समाज की संरचनात्मक विफलता पर सूक्ष्म व्यंग्य व्यक्त हुआ है। इस प्रकार त्रिलोचन का व्यंग्य संयत, अंतर्निहित और यथार्थनिष्ठ है, जो बिना तीखेपन के भी गहरी चोट करता है।
केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में श्रम, प्रकृति और जनजीवन के साथ-साथ सामाजिक विषमताओं पर एक तीक्ष्ण आलोचनात्मक दृष्टि मिलती है, जो प्रायः व्यंग्यात्मक संकेतों के माध्यम से व्यक्त होती है। कई स्थानों पर ये संकेत इतने स्पष्ट और चुभते हुए हैं कि वे विशुद्ध व्यंग्य को भी मात देते प्रतीत होते हैं। ‘कहें केदार खरी-खरी’ में उनकी ऐसी ही अनेक रचनाएँ संकलित हैं। ‘आग लगे इस राम-राज में’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
“ढोलक मढ़ती है अमीर की,
चमड़ी बजती है गरीब की,
खून बहा है राम-राज में,
आग लगे इस राम-राज में।”
इन पंक्तियों में सामाजिक शोषण और वर्ग-विषमता पर अत्यंत तीखा व्यंग्य व्यक्त हुआ है, जहाँ अमीरी की चमक गरीब के शोषण पर टिकी हुई दिखाई देती है। इसी संग्रह की एक अन्य कविता ‘मिल मालिक’ की ये पंक्तियाँ भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-
“मिल मालिक का बड़ा पेट है,
बड़े पेट में बड़ी भूख है,
बड़ी भूख में बड़ा ज़ोर है,
बड़े ज़ोर में जुल्म घोर है।”
यहाँ पूँजीपति वर्ग की अतृप्त लालसा और उसके परिणामस्वरूप होने वाले शोषण पर सशक्त व्यंग्य किया गया है। इसी संदर्भ में उनकी एक अन्य कविता में तथाकथित “रामराज” की विडंबना को रेखांकित करते हुए एक गरीब, बेनाम और असहाय व्यक्ति की उपेक्षा-जनित मृत्यु पर तीखा व्यंग्य मिलता है-
“आज मरा फिर एक आदमी! रामराज का एक आदमी!!
बिना नाम का / बिना धाम का / बिना दाम का / बिना काम का
मुई खाल का / धँसे गाल का / फटे हाल का / बिना काल का
अंग उघारे / हाथ पसारे / बिना बिचारे / राह किनारे!”
इस लेख के अगले भाग में हम प्रयोगवाद और उससे आगे की कविता की यात्रा पर जाएंगे और देखेंगे कि हिंदी काव्य संसार में व्यंग्य किस तरह परिमार्जित होता हुआ लगभग मुख्य स्वर बनता चला गया।

अरुण अर्णव खरे
अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।
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