
- May 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....
उपन्यास 'चौरंगी' और शंकर का जाना
मुझे शंकर के बारे में पहली बार लगभग 2011 में पता चला, जब द हिन्दू में विवेकानंद पर लिखी उनकी किताब के अंग्रेज़ी अनुवाद को लेकर चर्चाएँ और समीक्षाएँ छप रही थीं। मैं उस समय उस्ताद राशिद ख़ान और नचिकेता का बंदिश और रवींद्र-संगीत आधारित एल्बम ‘यात्रा’ सुना करता था, जिसकी भद्र बंगाली हलक़े में ख़ासी आलोचना थी। सुचित्रा मित्रा और पंकज मलिक सुनती हुई, वीरेंद्र कृष्ण भद्र का ‘महालय’ सुनती हुई यह पीढ़ी “एकि लाबोण्ये पूर्ण प्राण, प्राणेश हे” के टेम्पो पर खीझती थी।
मणि शंकर मुखर्जी, या शंकर, का उपन्यास ‘चौरंगी’ 1962 में प्रकाशित हुआ था और आते ही लोकप्रिय हो गया। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद बहुत बाद में आया, शायद इसीलिए बंगाल के बाहर इसकी चर्चा धीरे-धीरे पहुँची। लेकिन इसका हिंदी अनुवाद 1964 में ही प्रकाशित हो गया था। राजकमल चौधरी द्वारा किया गया ‘चौरंगी’ का हिंदी अनुवाद उल्लेखनीय है। बंगला गद्य की जो सहज, बातचीत वाली लय है, वह अक्सर हिंदी में आते-आते बनावटी या अत्यधिक साहित्यिक हो जाती है। राजकमल चौधरी उस लय को बचाये रखते हैं और इसे अमृत राय के किये हुए अनुवादों जैसी प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।
उपन्यास की शुरूआत साधारण है। अब जिसे जवाहरलाल नेहरू रोड से याद करें, कर्ज़न पार्क से याद करें या बिड़ला प्लेनेटेरियम से याद करें, इस महानगर में अपनी खो चुकी नौकरी पर दुखी एक आदमी नित बदलते, रहस्यमयी कोलकाता पर और अपने अभी-अभी घटे दुर्भाग्य पर बातें कर रहा है। हावड़ा का रहवासी है, काम ढूँढ रहा है और फ़िलहाल दफ़्तर-दफ़्तर टोकरियाँ बेच रहा है।

उसकी मुलाक़ात बायरन नाम के एक रहस्यमयी व्यक्ति से होती है। बायरन वैसा किरदार है जैसा बंगाली कथा-साहित्य के जासूस होते हैं, अप्रत्याशित, जेबों में ख़बरें और संपर्क ठेले हुए, विडंबनापूर्ण जीवन जीने वाला। उपन्यास में बायरन एक जगह कहता है कि कथाओं में जो डिटेक्टिव ख़ूब पसंद किये जाते हैं, असल जीवन में उनका कोई काम नहीं रह गया है। बायरन अपने परिचित होटल-मालिक मार्कोपोलो से बात करके नौकरी के लिए परेशान इस किरदार को होटल शाहजहाँ में नौकरी दिलवा देता है।
‘चौरंगी’ होटल शाहजहाँ का उपन्यास है और इसके आगे कथा होटल शाहजहाँ के भीतर ही पसरती है। रिसेप्शन, रसोइए, बैंक्वेट, बैरे, कमरों के तकिये-चादर बदलने वाले कर्मचारी और “पूर्व के सबसे बड़े होटल” में आने वाले भद्र, अभिजात्य, समृद्ध तथा भिन्न-भिन्न पदानुक्रमों से आने वाले मेहमान, इन सबके अंतर्संबंधों से उपजी यह कहानी है।
‘चौरंगी’ महानगरीय विडंबनाओं और विरोधाभासों को हरसंभव समेट लेता है, फिर भी इसकी अंतर्धारा में ऐसा कोई बोझिल प्रयास दिखायी नहीं देता। संवाद और कथानक की गति इस उपन्यास को नाज़ुक और इतने पहलुओं वाले विषयों को भी बहुत रवानी से प्रस्तुत करने में सक्षम बनाती है। यह शंकर का औपन्यासिक वैशिष्ट्य है। वे निश्चित ही शानदार पाठक रहे होंगे और शायद इसी कारण उनका कैनवास कभी बिखरता नहीं।
‘चौरंगी’ में कलकत्ता झलकियों से आता है, इसीलिए इसे उस अर्थ में कलकत्ता का उपन्यास नहीं कह सकते। कलकत्ता का संदर्भ इसमें शाहजहाँ होटल के भीतर इकट्ठे हुए व्यापारियों और भिन्न आर्थिक वर्गों के अंतर्व्यवहार से है, जिसमें महानगरीय अहमन्यताएँ हैं और नागरिकों का चारित्रिक गठन है। यह कलकत्ता को देखने-जानने का उपन्यास नहीं है, लेकिन यह आज़ादी के बाद एक महान भारतीय नगर की कथा अवश्य है, जिसमें महत्वाकांक्षाओं और जीवनशैली के टकराव हैं।
शंकर इस उपन्यास में स्वातंत्र्योत्तर भारत की एक नयी आकांक्षा को सटीक पकड़ते हैं। ऐसे होटल वे जगहें थीं, जहाँ नया संपन्न वर्ग आधुनिकता का अभ्यास करता था, अंग्रेज़ी बातचीत, महँगी शराब, सुसंस्कृत व्यवहार, अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक दिखने की होड़, एक सांस्कृतिक नकचिढ़ापन। जैसा कि लेखक को करना चाहिए, शंकर इस दुनिया का उपहास नहीं करते। वे उसकी कृत्रिमता को भी देखते हैं, उसकी विडंबना को भी और उसके आकर्षण को भी।
मेरे पसंदीदा किरदारों में शाहजहाँ होटल का मुख्य संगीत-प्रदर्शक प्रभातचंद्र गोमेज़ और नित्याहारी मुखर्जी हैं। गोमेज़ संगीत के क्लासिकी आदर्श और सौंदर्य में अपनी अस्मिता और प्रतिष्ठा ढूँढता है। नित्याहारी मुखर्जी लॉन्ड्री सर्विस में हैं, जिनका अपने काम से सम्बन्ध ऐसा है जैसे गिलहरी और मूँगफली के बीच। इस साधुता का भी, हालाँकि, एक इतिहास है। उपन्यास में स्त्रियाँ प्रतीक नहीं हैं। वे अपनी सभी मानवीय क्षुद्रताओं, क्षयों और आदर्शों के साथ मौजूद हैं और उन पर कोई औपन्यासिक वर्गीकरण, पूर्वाग्रह लक्षित तथा आरोपित नहीं है। यह 1962 की बात है और इसी कारण यह बात और भी उल्लेखनीय लगती है।
‘चौरंगी’ शंकर को याद करने का पहला क़दम है। उनके कुछ उपन्यास अब अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं और हिंदी में ‘चौरंगी’ के सिवाय मैंने उनका कोई उपन्यास नहीं पढ़ा। उनका निधन फ़रवरी 2026 में हुआ। उन पर अधिक चर्चा होनी चाहिए और उससे भी अधिक उनके अनुवाद सामने आने चाहिए, क्योंकि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अब भी हमारी दृष्टि से ओझल है।

निशांत कौशिक
1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
