
- September 14, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
हिंदी, भाषा, आवाज़ और अपने सवाल
अरुंधति रॉय ने अपनी नयी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ में भाषा के बारे में चिंतन करते हुए एक मार्के की बात कही है कि भाषा अपनी होना चाहिए। अर्थात् ऐसी भाषा जिसका इस्तेमाल हम करें न कि भाषा हमारा इस्तेमाल करे। इस विचार के आईने में अपनी मातृभाषा के बारे में जब सोचता हूं तो इस सवाल से सामना करता हूं कि मेरी भाषा क्या है? हिंदी को हमने कैसी भाषा बना दिया है? और बतौर लेखक मैं भाषा के लिए अपनी ज़िम्मेदारी, अपनी भूमिका किस तरह देख रहा हूं?
अरुंधति के इस चिंतन पर हो रहा विमर्श सीधे तौर से भाषा के प्रयोग पर विचार कर रहा है। यह कि भाषा को तोड़ने वाला होना चााहिए या जोड़ने वाला, भाषा को संवेदनहीन होना चाहिए या जज़्बाती, बनी-बनायी भाषा हो या अनुभवजन्य… कुल मिलाकर यह सारा विमर्श सियासत की तरफ़ रुख़ करता है और प्रपंच को उजागर करता है। इन विमर्शों से गुज़रते हुए लगता है जैसे भाषा का मानक राजनीति हो।
साहित्य समाज के सामूहिक अवचेतन की भाषा होता है। साहित्य का काम होता है वह गूंगे समाज के मुंह और दिमाग़ में वह भाषा भरे, जिसकी उसे ज़रूरत है। जिस समय में राजनीति भाषा की नियंता और संचालक हो जाये, वह निश्चित ही साहित्य के अप्रासंगिक हो जाने का समय ही है।

साहित्य के दायरे में किसी हद तक पत्रकारिता का समावेश भी रहा है। वह साहित्यकार फणीश्वर नाथ रेणु ही थे, जो रिपोर्ताज विधा के पुरोधा बने थे, जब उन्होंने 1950 में हुई ‘नेपाली क्रांति कथा’ में क्रांति का आंखों देखा एक लेखा-जोखा, एक दस्तावेज़ तैयार कर दिया था। अब युद्धों, विद्रोहों या आंदोलनों की रिपोर्टिंग कैसे होती है? भाषा किस तरह अपनी झील, नदी या सागर से बेदख़ल होकर दलदल में फंस जाती है?
भारत के ‘चाटुकार’ मीडिया ने नेपाल में हुए बड़े बदलाव को विचित्र ढंग से पेश किया। कहीं सुशीला कार्की को ‘कट्टर हिंदू’ बता दिया तो कहीं जेन-ज़ी की मांगों में ‘हिंदू राष्ट्र’ को हेडिंग बना दिया। बदलाव का कारण बनने वाली किसी भी शख़्सियत या घटना के पीछे विदेशी ताक़तों का हाथ बता देना, सियासत/मीडिया के सस्ते दांव का इस्तेमाल भी हुआ। भारतीय समाचार चैनलों ने नेपाली युवा आबादी का मज़ाक़ बना दिया। ‘नेपाली यूथ को आटा नहीं डाटा चाहिए’, ‘नेपाली युवा नींद से ज़्यादा मोबाइल को वक़्त दे रहे हैं’… हर बार, हर घटना को पेश करते हुए सियासत के चरणसेवक मीडिया की इस तरह की भाषा से क्या हिंदी सम्मानित होती है?
क्या आप विश्वास कर सकते हैं मनोरंजन मात्र के लिए तख़्तापलट आंदोलन हो सकता है? क्या यह यक़ीन किया जा सकता है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा लेने वाला हर व्यक्ति ‘कट्टर हिंदू’ ही है? ऐसी रिपोर्टिंग अहम मुद्दों को पीछे धकेलती है। नेपाल के युवाओं ने सत्ता के निरंकुश भ्रष्टाचार, मुट्ठी भर अमीरों और बहुसंख्यक ग़रीबों के बीच आर्थिक असमानता की चौड़ी हो रही खाई और आम जनमानस के जीवन स्तर के लगातार बदहाल रहने जैसे मुद्दों को उठाया, सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा और हमारे चैनलों की विक्षिप्तता ने अलग ही रंग दे दिया। चाटुकार मीडिया जानता है जब ऐसे मुद्दों पर बात होती है, तो प्रतिध्वनि कहां किस तरह सुनायी देती है।
इस हिंदी दिवस पर चिंता कर रहा हूं हिंदी भाषा किस समाज की है या अब कैसा समाज बना रही है? सोशल मीडिया और ओटीटी पर हिंदी का मेला बहुत बड़ा है। इसमें से अधिकांश चिंता का विषय ही है। क्या हिंदी को हम नफ़रत, गाली, सस्ते मनोरंजन, खोखलेपन, दोग़लेपन… ऐबों की भाषा ही बनते देखना चाह रहे हैं?
जिस भाषा के चेहरे सियासत और बाज़ार (मीडिया भी शामिल) बन गये हों और शायरी हाशिये पर बैठी मुंह ताक रही हो, तब उस समाज की गति की निशानदेही की जा सकती है। क्या एक लेखक, शायर यह हलफ़नामा दाख़िल करना नहीं चाहेगा कि उसकी भाषा ऐसी नहीं है? वह झूठी, बनावटी और थोपी हुई भाषा का हामी नहीं है। क्या हमारे समय के लेखकों/शायरों को भाषा की छवि और ध्वनि के लिए अपने आपको एक कारगर औज़ार नहीं बना लेना चाहिए? हमारी भाषा जितनी लिजलिजी हो जाएगी, हमारी आवाज़ उतनी ही पिद्दी होती चली जाएगी। तब हम बस चिल्लाते ही रहेंगे, हम देखेंगे, हम बोलेंगे, और यह आवाज़ कानों से टकराना बंद कर देगी…
(नेपाल के प्रदर्शनकारियों की तस्वीर एपी के लिए निरंजन श्रेष्ठ ने क्लिक की, यहां साभार ली गयी है।)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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