
- October 27, 2026
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भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दर देस में लेखक-21....
ब्रिटिश डाक टिकट और लंदन-भारत रिश्तों की यादें
डाक टिकट अब धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी से ओझल हो रहे हैं। मोबाइल संदेशों और ईमेल के इस दौर में पत्र लिखने की परंपरा भी सिमटती जा रही है। लेकिन डाक टिकट केवल डाक शुल्क चुकाने का माध्यम नहीं रहे, वे इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सभ्यता के छोटे-छोटे दस्तावेज़ रहे हैं। लंदन में डाक टिकटों और डाक इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो भारत और ब्रिटेन के संबंधों की अनेक रोचक परतें खुलती हैं।
इस कहानी की शुरूआत 1840 में ब्रिटेन में जारी पेनी ब्लैक से होती है, जिसे दुनिया का पहला नियमित चिपकने वाला डाक टिकट माना जाता है। उस समय भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था। ब्रिटेन और भारत के बीच व्यापार, प्रशासन और निजी पत्राचार के लिए समुद्री डाक सेवा महत्वपूर्ण थी। लंदन से भारत आने वाले पत्र केवल संदेश नहीं लाते थे, एक विशाल साम्राज्य की गतिविधियों और संबंधों के साक्षी भी थे।

ब्रिटेन के डाक इतिहास में भारत के लिए 1815 में शुरू हुई नियमित समुद्री पैकेट सेवा का विशेष महत्व है। 1819 में भारत भेजे जाने वाले पत्रों के लिए विशेष समुद्री डाक दरें निर्धारित की गयीं। ऐसे पत्रों पर INDIA LETTER जैसी मुहरें लगायी जाती थीं। आज पुराने लिफ़ाफ़ों पर अंकित ये मुहरें इतिहासकारों को उस समय के डाक मार्गों और संचार व्यवस्था की जानकारी देती हैं।
भारत और लंदन के बीच डाक पहुंचाने की कहानी में थॉमस फ्लेचर वाघॉर्न का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने मिस्र के रास्ते भारत तक डाक पहुंचाने वाले स्थल मार्ग को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस मार्ग से यात्रा का समय काफ़ी घटा। उनके माध्यम से भेजे गये कुछ पत्रों पर CARE OF MR WAGHORN जैसी पहचान मिलती है। पुराने लिफ़ाफ़ों पर लगी ऐसी मुहरें आज इतिहास के दुर्लभ साक्ष्य हैं।
भारत में डाक टिकटों का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। 1852 में सिंध क्षेत्र में जारी स्किंडे डाक भारत के आरंभिक डाक टिकटों में गिना जाता है। 1854 में ब्रिटिश भारत के लिए व्यापक उपयोग वाले डाक टिकट जारी हुए। बाद में विभिन्न रियासतों की अपनी डाक व्यवस्थाएं भी विकसित हुईं। कहीं स्थानीय लिपियों का प्रयोग हुआ, तो कहीं ब्रिटिश भारतीय टिकटों पर रियासत की पहचान अंकित की गयी। इन टिकटों में भारत की भाषाई विविधता और तत्कालीन राजनीतिक संरचना की झलक मिलती है।
डाक इतिहास का एक अनूठा पक्ष भाषाओं से जुड़ा है। 1877 में भारतीय डाक प्रशासन ने लगभग 70 भाषाओं और बोलियों की लिखावट के नमूने संकलित किये थे। यह तथ्य बताता है कि पत्रों को सही पते तक पहुंचाना केवल प्रशासनिक काम नहीं, भारत की भाषाई विविधता के बीच संवाद क़ायम करने की चुनौती भी था।
लंदन और भारत के डाक संबंधों का सबसे भावनात्मक प्रसंग महात्मा गांधी से जुड़ा है। स्वतंत्र भारत ने 15 अगस्त 1948 को गांधीजी की स्मृति में विशेष डाक टिकट जारी किये। इसके बाद 1969 में ब्रिटिश पोस्ट ऑफ़िस ने भी गांधीजी की जन्मशती पर उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। उसका डिज़ाइन भारतीय मूल के कलाकार बिमन मलिक ने बनाया था। यही नहीं, इस ख़ूबसूरत और प्रतीकात्मक डिज़ाइन के लिए मलिक और ब्रिटिश पोस्ट ऑफ़िस को 1970 की ‘लंदन फ़िलीमिया’ प्रदर्शनी में स्वर्ण पदक मिला था।
जिस ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध गांधीजी ने अहिंसक संघर्ष किया, उसी देश के डाक टिकट पर उनका चित्र सम्मान के साथ प्रकाशित होना इतिहास की एक अर्थपूर्ण विडंबना नहीं तो और क्या है। यह घटना बताती है कि राजनीतिक संघर्षों के पार भी स्मृति और सम्मान की अपनी यात्रा होती है।
लंदन में स्थित द पोस्टल म्यूज़ियम और ब्रिटेन के डाक अभिलेख भारत ब्रिटेन के इस साझा इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। पुराने पत्र, डाक मुहरें, समुद्री मार्गों के विवरण और टिकटों के संग्रह बताते हैं कि संचार व्यवस्था किस तरह व्यापार, शासन और समाज के विकास से जुड़ी रही है।
खोजने पर एक और डाक टिकट के बारे में पता चलता है कि ब्रिटेन की रॉयल मेल ने महिला मताधिकार आंदोलन की शताब्दी पर जो विशेष टिकट जारी किये थे, उनमें सोफ़िया दलीप सिंह को स्थान दिया। महाराजा दलीप सिंह की पुत्री और महाराजा रणजीत सिंह की पौत्री सोफ़िया, जिन्होंने ब्रिटेन में महिला अधिकारों और कर-विरोध आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी।
डाक टिकटों का महत्व उनकी दुर्लभता या बाज़ार क़ीमत तक सीमित नहीं है। उनके रंग, काग़ज़, चित्र, भाषा और छपाई में अपने समय की पहचान दर्ज होती है। फिलाटेली अर्थात डाक टिकट संग्रह और अध्ययन इसी छोटे-से माध्यम में छिपे बड़े इतिहास को सामने लाता है। कभी किसी टिकट की मामूली छपाई की त्रुटि उसे दुर्लभ बना देती है, तो कभी किसी पुराने लिफ़ाफ़े की मुहर किसी भूले हुए डाक मार्ग का रहस्य खोल देती है।
आज संदेश पलक झपकते सात समंदर पार पहुंच जाते हैं, लेकिन तेज़ संचार के साथ इतिहास के इन छोटे दस्तावेज़ों का महत्व कम नहीं हुआ है। लंदन के डाक टिकटों में भारतीय संदर्भ तलाशना दरअसल दो देशों के साझा अतीत, औपनिवेशिक सत्ता, स्वतंत्रता संघर्ष और सांस्कृतिक स्मृति को समझना है।

जैसे यह समझना उल्लेखनीय है कि British Indian Ocean Territory (BIOT) डाक सेवा यानी ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र की यह डाक सेवा एक छोटे, सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण ब्रिटिश-प्रशासित द्वीपीय क्षेत्र की व्यवस्था थी। इसका संबंध भारत की डाक सेवा या ब्रिटिश भारत के डाक विभाग से सीधे तौर पर नहीं था।
डाक टिकट छोटा होता है, उसकी कहानी नहीं। वह याद दिलाता है कि इतिहास केवल राजमहलों, युद्धों और बड़े नेताओं में नहीं बसता। कभी पुराने संदूक़ में रखे एक पीले पड़ चुके लिफ़ाफ़े के कोने पर लगा टिकट भी हमें समुद्र पार की यात्रा कराते हुए अतीत के ऐसे दरवाज़े खोल सकता है, जिनकी ओर हमारा ध्यान कभी गया ही न हो।
(चित्र परिचय: पहला चित्र अपने डिज़ाइन किये डाक टिकट के साथ बिमन मलिक जिन्हें विमान मलिक भी पुकारा जाता है। मलिक के वेबपेज से ही साभार। दूसरे चित्र में सोफ़िया दलीप सहित कुछ और ब्रितानी डाक टिकट।)

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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