तारिक़ क़मर, tariq qamar

इंद्रधनुष-7 : डॉ. तारिक़ क़मर

 

‘नयी ग़ज़ल में इमेजरी’ विषय पर अपना शोध प्रबंध लिखने वाले डॉ. तारिक़ क़मर उर्दू शाइरी में अपनी एक ख़ास पहचान बना चुके हैं। ‘शजर से लिपटी हुई बेल’ और ‘पत्तो का शोर’ आपके चर्चित ग़ज़ल संग्रह हैं और इनके अलावा ‘जादूनामा’ जैसी किताब का अनुवाद आपके नाम है। कुछ अदीबों की रचनाओं को आप पुस्तक रूप में संकलित, संपादित एवं प्रस्तुत कर चुके हैं। उर्दू के साथ ही अंग्रेज़ी और पत्रकारिता में भी डिग्रियां हासिल कर एक मल्टीनैशनल में सेवारत और कई साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध तारिक़ क़मर के कलाम में नयी शाइरी का तेवर है लेकिन उनके अपने दस्तख़त के साथ। वह आज के शाइरों के बीच अलग सुनायी देने वाली आवाज़ की तरह उभर रहे हैं। आब-ओ-हवा के लिए ग़ज़ाला तबस्सुम प्रस्तुत कर रही हैं उनकी कुछ सुनी कुछ अनसुनी ग़ज़लें…

तारिक़ क़मर, tariq qamar

डॉ. तारिक़ क़मर की ग़ज़लें

1
रिआया ज़ुल्म पे जब सर उठाने लगती है
तो इक़्तेदार¹ की लौ थरथराने लगती है

ये मसलहत है बुझाने का जब इरादा हो
हवा, दिये की कमर थपथपाने लगती है

ख़बर नहीं है मेरे ग़म पे हँसने वालों को
कभी-कभी ये फ़ज़ा रास आने लगती है

ये रोशनाई जो फैली हुई है काग़ज़ पर
ये सिसकियों की सदाएं सुनाने लगती है

बुलंदियों के सफ़र में मज़ा तो आता है
मगर ज़मीन जब वापस बुलाने लगती है?

हक़ीर करती है यूँ भी कभी-कभी दुनिया
मेरे ज़मीर की क़ीमत लगाने लगती है

मैं उसको भूल चुका हूँ ये बात सच है मगर
कभी-कभी वो बहुत याद आने लगती है

1—हुकूमत का ज़ोर

————*————

2
दा’वा तो है उसे भी बहुत आन-बान का
लेकिन कहाँ छुपाये असर ख़ानदान का

दीवार में जो कील भी ठोकें ज़रूरतन
चेहरा उतरने लगता है मालिक मकान का

तलवार टूटने की ख़बर तक नहीं इसे
या रब गुमान टूटे न ख़ाली मियान का

गुज़रा कोई ख़याल तो आँसू निकल पड़े
नक़्शा बना रहा था मैं हिन्दोस्तान का

बेहतर यही है ज़ादे-सफ़र अब समेट ले
लहजा बदल रहा है तेरे मेज़बान का

————*————

3
पाँव जब हो गये पत्थर तो सदा दी उसने
फ़ैसला करने में ख़ुद देर लगा दी उसने

अब जो आँखों में धुआँ है तो शिकायत कैसी?
यार ख़ुद ही तो चराग़ों को हवा दी उसने

ये अलग बात कि वो मेरा ख़रीदार नहीं
आके बाज़ार की रौनक़ तो बढ़ा दी उसने

रात ज़ंजीर की आवाज़ ज़रा तेज़ हुई
सुबह दीवार पे दीवार उठा दी उसने

कोई शिकवा न शिकायत न वज़ाहत कोई
मेज़ से बस मेरी तस्वीर हटा दी उसने

मेरे हमराह ज़रा देर को चलकर ‘तारिक़’
और कुछ वक़्त की रफ़्तार बढ़ा दी उसने

————*————

4
दलील पुख़्ता न थी मोतबर हवाला न था
चिराग़ जल तो रहे थे मगर उजाला न था

हर एक लब पे था तंगी-ए-रिज़्क का शिकवा
किसी हथेली पे मेहनत का कोई छाला न था

भंवर उठे थे मेरे नाखु़दा की आंखों से
वगरना ये दरिया मुझको डुबोने वाला न था

कमाल ये है कि उस बेवफ़ा को इल्म नहीं
कि रोग हमने भी संजीदगी से पाला न था

तो मैंने अपनी सदा को ही कर लिया ज़ख़्मी
दुखों का नोहा कोई और पढ़ने वाला न था

————*————

5
आब-दर-आब मेरे साथ सफ़र करते हैं
तश्नालब ख़्वाब मेरे साथ सफ़र करते हैं

ये बताते हैं कहां बैठना उठना है कहां
मेरे आदाब मेरे साथ सफ़र करते हैं

दश्ते-अहसास तेरी प्यास से मैं हार गया
वरना सैलाब मेरे साथ सफ़र करते हैं

जानते हैं कि मुझे नींद नहीं आएगी
फिर भी कुछ ख़्वाब मेरे साथ सफ़र करते हैं

मैं हूं बुनियाद का पत्थर तुझे मालूम नहीं
ताको-मेहराब मेरे साथ सफर करते हैं

————*————

6
ज़ाएक़ा बदलेंगे? कैफ़-ओ-वज्द में आएँगे क्या?
ख़ून है मेहनतकशों का नोश फ़रमाएँगे क्या?

ख़ुशलिबासी ज़ेब देती है मुबारक आपको
ये जो दामन चाक है इसको भी सी पाएँगे क्या?

मज़हबी शिद्दत तो अपना काम पूरा कर चुकी
अब ज़रा अल्फ़ाज़ का मरहम लगा आएँगे क्या?

हम भी देखें झूठ का होता है कितना हाफ़िज़ा
आप कुछ फ़रमा रहे थे फिर से फ़रमाएँगे क्या?

इन चराग़ों को भड़कना है भड़कने दीजिए
आप ये सोचें हवा को हुक्म फ़रमाएँगे क्या?

अब जो मज़लूमों के हक़ में करने आये हैं दुआ
आँसुओं का फिर कोई तावीज़ पहनाएँगे क्या?

मुश्त’इल होने लगी है मुंतज़िर लोगों की भीड़
अब हरम से इक ज़रा तशरीफ़ ले आएँगे क्या?

————*————

7
धुंध छूटती हुई मंज़र से निकलते हुए तुम
नक़्श उभरते हुए पत्थर से निकलते हुए तुम

अपने हाथों की लकीरों से उलझता हुआ मैं
और फिर मेरे मुक़द्दर से निकलते हुए तुम

आयते-इश्क़ उतरती हुई दिल पर मेरे
एक इक हर्फ़े-मुनव्वर से निकलते हुए तुम

वरना ये घर भी चला आएगा पीछे-पीछे
मुड़ के मत देखना अब घर से निकलते हुए तुम

पुश्त’ में मेरी उतरता हुआ ख़ंजर कोई
और फिर मेरे बराबर से निकलते हुए तुम

अपने गुमनाम अंधेरों में सिमटता हुआ मैं
चाहने वालों के लश्कर से निकलते हुए तुम

एक-इक सांस किसी से वो बिछड़ जाने का ख़ौफ़
फिर उसी ख़ौफ़ उसी डर से निकलते हुए तुम

7 comments on “इंद्रधनुष-7 : डॉ. तारिक़ क़मर

  1. क्या बात है!
    बहुत बढ़िया collection किया आपने आपा।

    इन बेहतरीन ग़ज़लों से अपने पसंदीदा अशआर और ग़ज़लें रखने में बड़ी ख़ुशी महसूस कर रही हूँ।

    अशआर,,
    तलवार टूटने की ख़बर,,,
    गुज़रा कोई ख़याल,,,
    बेहतर यही है,,,
    ये अलग बात कि,,
    कोई शिकवा न शिकायत,,
    आँसुओं का तावीज़,,,,

    और,
    आब-दर-आब,,
    धुंध छूटती हुई,,
    ग़ज़लें,,,,क्या कहने!

  2. गुज़रा कोई ख़याल तो आँसू निकल पड़े
    नक़्शा बना रहा था मैं हिन्दोस्तान का..

    बहुत ही उम्दा प्रस्तुति,
    लाजवाब

  3. बहुत शुक्रिया ग़ज़ाला जी
    एक से बढ़कर एक ग़ज़ल हैं।
    तारिक़ साहब का यह शेर
    “ये रोशनाई जो फैली हुई है काग़ज़ पर
    ये सिसकियों की सदाएं सुनाने लगती है।”
    क्या कहने …
    “लहजा बदल रहा है तेरे मेज़बान का”
    शानदार, लाजवाब
    सभी शेर कमाल

  4. डॉ. तारिक़ क़मर साहब की ग़ज़लों में केवल अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि पूरा दौर बोलता हुआ महसूस होता है। उनकी शायरी में इमेजरी की ताज़गी, एहसास की आँच और फ़िक्र की गहराई है, जो हर शेर के साथ सोच की नई खिड़की खोलती है। नई ग़ज़ल की नई ज़ुबान और अपनी अलग पहचान के साथ उनका कलाम रूह तक उतर जाता है। इंद्रधनुष के ये रंग देर तक आँखों और दिल में ठहरे रहते हैं। ऐसी उम्दा, जीवंत और यादगार प्रस्तुति के लिए दिल से दाद और मुबारकबाद

  5. कुछ ग़ज़लें पढ़ी जाती हैं,
    कुछ ग़ज़लें महसूस की जाती हैं —
    और डॉ. तारिक़ क़मर साहब की ग़ज़लें
    रूह तक उतर जाती हैं।
    बेहद उम्दा और यादगार कलाम

  6. दीवार में जो कील भी ठोकें ज़रूरतन
    चेहरा उतरने लगता है मालिक मकान का

    कितना अच्छा कलेक्शन है ये जनाब तारिक़ क़मर साहब का…

    बहुत शुक्रिया गज़ाला दीदी इसे हम तक पहुंचाने के लिए❤️

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