बढ़ता ध्वनि प्रदूषण
पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

अपने साइलेंस ज़ोन के विकास का समय

         पर्यावरण पर विमर्श करते समय हमारी दृष्टि अक्सर उन संकटों पर ठहरती है, जो प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं, यथा प्रदूषित नदियाँ, धुएं से भरा आसमान या बंजर होती ज़मीन। इनके सिवाय भी एक ऐसा अदृश्य प्रदूषण है, जो हमारे पारिस्थितिक तंत्र की जड़ें खोखली कर रहा है। ध्वनि प्रदूषण, बढ़ता हुआ कोलाहल, वह समस्या है, जो निरंतर बढ़ रही है। आधुनिक शोर ने न केवल प्रकृति के ‘साउंडस्केप’ (ध्वनि-परिदृश्य) को बदला है, बल्कि हमारे सामाजिक और क़ानूनी ढांचे को भी चुनौती दी है।

प्रकृति का अपना एक संगीत होता है। पत्तों की सरसराहट, बहते पानी की कल-कल और पक्षियों का वह मधुर कलरव जिसे पारिस्थितिकी विज्ञानी ‘साउंडस्केप’ कहते हैं। यह मनोरम नैसर्गिक ध्वनि प्रकृति का एक अत्यंत परिष्कृत संचार तंत्र है। जब हम विकास के नाम पर जंगलों के बीच से राजमार्ग निकालते हैं या शांत ग्रामीण अंचलों में मशीनों और लाउडस्पीकरों का अनियंत्रित शोर ले जाते हैं, पहाड़ काटकर टनल बनाते हैं, या समंदर में निर्माण करते हैं, युद्ध के बारूदी धमाकों से शहर तबाह करते हैं, तो हम केवल शांति भंग नहीं करते, बल्कि उस जैविक संवाद की कड़ियाँ काट देते हैं, जो सृष्टि के आरंभ से चली आ रही हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं यह शोर पशु-पक्षियों के ‘म्यूटिंग सिग्नल’ को बाधित करता है, जिससे उनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लगता है।

विडंबना यह है कि जिसे हम उत्सव का नाम देते हैं, वह अक्सर दूसरों के लिए पीड़ा का सबब बन जाता है। हमारी शादियाँ, धार्मिक आयोजन और सार्वजनिक समारोह अब बिना कानफोड़ू संगीत के अधूरे माने जाने लगे हैं।

डीजे का संगीत इतना तेज़ होता है कि साउंड बॉक्स के निकट खड़े होने पर हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, कान जवाब दे देते हैं और सिर दर्द देने लगता है। यहीं मानवीय संवेदनाओं का क़ानून से टकराव शुरू होता है। भारतीय क़ानून और ‘ध्वनि प्रदूषण विनियमन और नियंत्रण नियम, 2000’ के अनुसार, ध्वनि की तीव्रता के स्पष्ट मानक तय किये गये हैं। आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा निर्धारित है। औद्योगिक क्षेत्रों में यह 75 डेसिबल तक जा सकती है, लेकिन सार्वजनिक समारोहों में अक्सर इन नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं।

क़ानून कहता है रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच लाउडस्पीकर या सार्वजनिक संबोधन प्रणालियों का उपयोग प्रतिबंधित है, सिवाय उन विशेष परिस्थितियों के जहाँ प्रशासन से अनुमति ली गयी हो। लेकिन अनुमति का अर्थ ‘असीमित शोर’ क़तई नहीं है। उत्सवों के दौरान भी ध्वनि का स्तर परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के भीतर ही होना चाहिए। जब डीजे और लाउडस्पीकर 100 डेसिबल से ऊपर जाते हैं, तो वे न केवल क़ानूनी अपराध करते हैं, बल्कि आस-पास रहने वाले बुज़ुर्गों, बीमारों, अबोध शिशुओं और पशुओं के स्वास्थ्य के साथ क्रूर खिलवाड़ भी करते हैं। निरंतर उच्च ध्वनि से मानवीय मस्तिष्क में ‘कॉर्टिसोल’ का स्तर बढ़ता है, जो हमें अधिक आक्रामक और कम संवेदनशील बना देता है।

तत्वान्वेषी दृष्टिकोण से देखें तो भारतीय चिंतन में ‘नाद ब्रह्म’ की परिकल्पना है, जहाँ शब्द और ध्वनि को आकाश तत्व का गुण माना गया है। आज का कथित ‘विकास’ इसी पवित्र आकाश तत्व को कोलाहल से भर रहा है। शांति केवल शोर की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ एक लयात्मक सामंजस्य है। जिस समाज में उत्सव की परिभाषा ‘दूसरे की शांति भंग करना’ हो जाये, वहाँ संवेदनाओं के अकाल की पदचाप सुनायी देने लगती है।

अब समय आ गया है हम ‘साइलेंस ज़ोन’ को केवल अस्पतालों या शिक्षण संस्थानों की तख़्तियों तक सीमित न रखें। हमें अपने भीतर एक ‘साइलेंस ज़ोन’ विकसित करना होगा। हमें समझना होगा कि धर्म, संस्कृति और खुशियों का प्रदर्शन शोर का मोहताज नहीं है।

यदि जल और ज़मीन शरीर हैं, तो ध्वनि और मौन उस पर्यावरण की आत्मा हैं। जिस दिन हम प्रकृति के इस सूक्ष्म संगीत को सुनने की क्षमता खो देंगे, उसी दिन हम एक मनुष्य के रूप में भी अपनी मौलिक पहचान खो देंगे। मौन का यह क्रंदन आज हमसे आत्म-चिंतन की मांग कर रहा है। क्या हम अपनी ख़ुशियों के शोर को थोड़ा कम कर के प्रकृति और पड़ोसी की कराह सुनने का साहस जुटा पाएंगे?

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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