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पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....

नामचीन साहित्यकारों की चुटकियां-6

             पिछली कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुलों/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया, जिसे पाठकों ने पसंद किया। रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर के लेखकों के भी ऐसे प्रसंग पेश किये जा चुके हैं। इस बार पढ़िए फिर हिंदी पट्टी के चर्चित नामों से जुड़ी कुछ रंग-बिरंगी यादें। विशुद्ध हास्य-व्यंग्य से गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए …

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कंसेशन

एक बार दुष्यंत कुमार का उनके मित्र लेखक दामोदर सदन से झगड़ा हो गया।

“तुम बहुत घटिया, हल्के और ओछे शख़्स हो। मैं तुमसे बात नहीं करना चाहता”, दुष्यंत ने क्रोध में कहा।

“देखो दुष्यंत, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं। बहुत प्यार करता हूं। मैंने तुम्हें खिलाने-पिलाने में अब तक कितना रुपया ख़र्च कर दिया, तुम जानते हो”, सदन ने अत्यंत कोमल स्वरों में कहा।

“कितना ख़र्च किया, बोलो”, दुष्यंत ने चीखकर कहा।

“पांच-छह सौ तो हो गये होंगे।”

“मैंने तुम्हारे साथ कंसेशन किया है जनाब, नहीं तुम जैसे घटिया आदमी से हज़ार-डेढ़ हज़ार फुंकवाये बिना मैं दोस्ती नहीं तोड़ता हूं”, दुष्यंत उठे और क्रोध में घर चले गये।

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एक कचौड़ी और

जगदीश गुप्त के यहां कुछ साहित्यकारों का भोजन था। भोजन के बाद साहित्यकारों की तरफ़ से धन्यवाद-ज्ञापन के लिए अश्क जी खड़े हुए। आधे घंटे तक अपनी कहानियों की तारीफ़ करने के बाद वह मूल विषय पर आये।

“जहां तक खाने का सवाल है, वह बेहद लज़ीज़ बना था। यक़ीन मानिए अगर मैं एक कचौड़ी और खा गया होता तो मेरा बोलना भी मुश्किल हो जाता।”

“गुप्त जी, इन्हें एक कचौड़ी और खिला दीजिए, प्लीज़”, ऊबे हुए भैरवप्रसाद गुप्त ने उबासी लेते हुए कहा।

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सिविलाइज़्ड

एक दोपहर हरिशंकर परसाई और उनके मित्र हनुमान वर्मा ‘जबलपुर समाचार’ के दफ़्तर में मायाराम सुरजन के पास बैठे गप्पें हांक रहे थे। पास ही रहने वाले मायाराम के आत्मीय डागाजी का लड़का उन्हें भोजन करने के लिए बुलाने आया। उसने कहा, “दाल-बाटी बनी है। आपको भोजन करने बुलाया है।”

मायाराम दोनों मित्रों को लेकर पहुंचे। ख़ूब दाल-बाटी खाने के बाद परसाई ने जिस पतल में खाना खाया उसी में छेद करने की आदत के मुताबिक़ कहा, “आज बीस साल बाद बाटियां खायीं।”

हनुमान वर्मा ने पूछा, “अच्छा, बीस साल पहले खायी थीं। उसके बाद खायी ही नहीं!”

परसाई ने कहा, “हां, बात यह है कि उसके बाद मैं सिविलाइज़्ड (सभ्य) हो गया।” इस पर ठहाका लगा।

लेकिन आख़िरी ठहाका परसाई की तरफ़ देखकर तब लगा, जब मायाराम ने धीरे-से कहा, “अच्छा, यह आज ही मालूम हुआ कि तुम बीस साल पहले सिविलाइज़्ड हो चुके थे। यों तो कुछ पता ही नहीं चलता था।”

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प्राध्यापकीय वक्तव्य

अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने की ख़ुशी में अमृतलाल नागर जी का एक अभिनंदन समारोह लखनऊ में हुआ। सभी प्रख्यात लेखक बधाई देते हुए अपनी अपनी सद्भावना प्रकट कर रहे थे। अंग्रेज़ी के प्राध्यापक कृष्णनारायण कक्कड़ ने अपने संक्षिप्त भाषण में कहा, “यों आप लोग जानते ही हैं कि हिंदी उपन्यास पढ़ना कितना कष्टसाध्य है और मैंने ‘अमृत और विष’ शुरू से आख़िर तक पढ़ डाला है- इसी से आपको अनुमान लगाना चाहिए कि उपन्यास कितना रोचक होगा।”

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विवेक मेहता, vivek mehta

विवेक मेहता

पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470

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