
कम शब्दों में अधिक अर्थ की कविताएं
नई दिल्ली। “चित्रा की कविताएं आकार में या अपने गठन में ज़रूर छोटी लगती हैं लेकिन उनमें मार्मिकता व संवेदनाओं का टोटा या छोटापन नहीं है। अपने प्रभाव और अपने उद्देश्य में ये कविताएं स्वत: ही बड़ी सिद्ध हो जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे एक छोटी-सी आंख में पूरी नदी समाहित हो…” हिन्दी काव्य जगत में अपना एक हस्ताक्षर बना रहीं प्रोफ़ेसर चित्रा सिंह की कविताओं के नये संग्रह पर बातचीत करते हुए वरिष्ठ लेखक उर्मिला शिरीष ने जब ये बातें कहीं तो विश्व पुस्तक मेले के वाणी साहित्य घर में मौजूद साहित्यप्रेमी और पाठक इस संग्रह का स्वागत करते नज़र आये।
चित्रा सिंह के काव्य संग्रह “नदी की गीली आँखें” का लोकार्पण 10-18 जनवरी 2026 तक आयोजित वर्ल्ड बुक फ़ेयर परिसर में वाणी साहित्य घर में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन के प्रबंध-निदेशक श्री अरुण माहेश्वरी सहित अन्य गणमान्य साहित्यप्रेमी मौजूद रहे। कार्यक्रम में देश की जानी-मानी कथाकार उर्मिला शिरीष के साथ लेखिका चित्रा सिंह की बातचीत इस मौक़े पर एक विशेष अवसर की तरह रेखांकित की गयी।
उर्मिला शिरीष ने कहा कि वह चित्रा सिंह के लेखन कर्म से शुरूआत से परिचित रही हैं और उनकी संवेदनशील कविताओं की प्रशंसक भी। संवाद सत्र में जब उन्होंने आगे कहा कि अगले संग्रह के बारे में चित्रा की पाठकों से अपेक्षा को सुनना चाहिए, तब चित्रा सिंह ने कहा कि वे अपने पिछले दो संग्रहों की तरह ही इन कविताओं के लिए भी पाठकों का भरपूर प्यार चाहती हैं।

चित्रा ने इन कविताओं को एक परिपक्व स्त्री कवि के अंतर्मन से जन्मी कृतियां बताते हुए कहा, ज़ाहिर सी बात है कविताओं का स्वर और भी अधिक आत्मविश्वासी होगा। अगर मेरे भीतर की स्त्री मुझसे पूछेगी कि तुमने मेरे लिए क्या किया? तो उसके सवाल का उत्तर ये कविताएं देंगी।
संवाद के साथ ही उर्मिला शिरीष और चित्रा सिंह ने “नदी की गीली आँखें” संग्रह से कुछ रचनाओं का सरस पाठ भी किया। इनमें से दो कविताएं:
1. चाँद की आत्मा
रात जब सो रही होती है गहरी नींद में
तारों से छुप-छुपाकर
चाँद की आत्मा कर जाती है प्रवेश, पवित्र नदी की देह में
सतह पर बैठा पहरा देता है जल
सूर्य देता है अर्घ्य किरणों से
पवित्र नदी का ध्यान भंग करने…
उनके द्वारा की गयी
सामूहिक प्रार्थनाओं का
सच केवल सुबह को पता होता है
2. प्यार तो देने का नाम है ना?
पहले-पहल वे छीनेंगे
तुमसे तुम्हारी हँसी
फिर छीनेंगे बेहद धीमे-से
तुम्हारे हिस्से का वह सुख
जिसके बल पर तुमने दोबारा
खड़ा किया ख़ुद को
किसी को यह जाने दिये बग़ैर
कि इस सब में
कितनी बार लड़खड़ाते हुए
गिरी तुम औंधे मुँह
और रिसता रहा
हर ज़ख्म दिनों-महीनों तक
आखिर में तुम पाओगी कि
तुम्हारे जीने का
हक़ और हुनर दोनों छिन गये हैं
बड़े अदब और
अदायगी से कहकर कि
प्यार तो देने का नाम है-ना
—प्रेस विज्ञप्ति
