
- October 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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#नयेसुर... इस अंक में नियमित ब्लॉग्स के अलावा जो भी सृजन है, सब बाक़ायदा विद्यार्थियों के द्वारा। इस अंक में चार पीढ़ियों के वो रचनाकार शामिल हैं, जो उम्र के विभिन्न पड़ावों पर किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हैं। यह लेख महाविद्यालयीन छात्रा के उन प्रश्नों से आकार लेता है, जो महाविद्यालय के साथ ही व्यापक समाज और व्यवस्था से ताल्लुक रखते हैं...
दीपा शर्मा की कलम से....
सहमति का लोकतंत्र
जब ‘हाँ’ हमारी होती है, तो ‘नहीं’ कहने का अधिकार भी हमारा होना चाहिए।
लोकतंत्र शब्द सुनते ही मन में सबसे पहले स्वतंत्रता, समानता और अपने निर्णय स्वयं लेने की छवि उभरती है। हमें लगता है कि लोकतंत्र का अर्थ है—अपनी बात कह सकना, अपनी पसंद चुन सकना और आवश्यकता पड़ने पर असहमति व्यक्त कर सकना। लेकिन कभी-कभी लोकतंत्र का सबसे कठिन प्रश्न वहीं पैदा होता है, जहाँ सब कुछ स्वेच्छा से होता हुआ दिखायी देता है।
क्या हर ‘हाँ’ सचमुच हमारी अपनी होती है?
यह प्रश्न जितना सरल दिखायी देता है, उतना है नहीं।
कई बार कोई हमें आदेश नहीं देता, कोई हमारे सामने दबाव नहीं रखता, फिर भी हम किसी काम के लिए तैयार हो जाते हैं। हमारे सामने विकल्प होते हैं, लेकिन उनमें से किसी एक को स्वीकार करना अधिक सहज लगता है। कभी किसी के सम्मान के कारण, कभी किसी की अपेक्षा के कारण, कभी अपनी छवि के कारण और कभी इस डर से कि मना करने पर हमें गलत समझ लिया जाएगा।
तब हमारी सहमति केवल हमारी इच्छा नहीं रह जाती; उसमें परिस्थितियों का भी एक हिस्सा शामिल हो जाता है।
यही वह बिंदु है, जहाँ सहमति और स्वतंत्रता का संबंध विचार करने योग्य बनता है।
कई बार यह परिस्थिति केवल किसी एक व्यक्ति के कहने से नहीं बनती। धीरे-धीरे हमारे आसपास कुछ ऐसी धारणाएँ बन जाती हैं कि किस व्यवहार को अच्छा माना जाएगा और किसे नहीं। हमें बताया नहीं भी जाये, फिर भी हम समझने लगते हैं कि सक्रिय रहना अच्छा है, आगे आना अच्छा है, हर अवसर को स्वीकार करना अच्छा है। इस तरह बाहरी दबाव के बिना भी एक आंतरिक अपेक्षा जन्म ले सकती है। तब व्यक्ति स्वयं अपने व्यवहार को उसी दिशा में ले जाने लगता है, जिस दिशा में संस्था उससे अपेक्षा करती है।
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विद्यार्थी जीवन में ‘हाँ’ का अर्थ
एक विद्यार्थी के रूप में मैंने कई बार महसूस किया है कि हमारी दिनचर्या केवल हमारी अपनी पसंद से नहीं बनती। कॉलेज में कार्यक्रम होते हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, कार्यशालाएँ होती हैं, सभाएँ होती हैं। इनमें भाग लेना अपने आप में बुरा नहीं, बल्कि कई बार बहुत सुखद और उपयोगी अनुभव होता है।
लेकिन प्रश्न वहाँ पैदा होता है जहाँ भागीदारी धीरे-धीरे अपेक्षा में बदलने लगती है।
किसी कार्यक्रम के लिए नाम पहले ही दे दिये गये। हमें पता चलता है हमारा नाम भी उसमें है। हम सोचते हैं— चलो, जाना ही है। फिर कभी मन में उत्साह भी होता है, कभी दोस्तों के साथ जाने की इच्छा, कभी किसी विशेष व्यक्ति को देखने का आकर्षण, कभी यह भाव कि शायद इससे कुछ नया सीखने को मिलेगा।
और इन सबके बीच एक छोटी-सी बात चुपचाप मौजूद रहती है—
“मना करूँगी तो अच्छा लगेगा क्या?”
शायद यहीं से सहमति का दूसरा अर्थ शुरू होता है।
हमने ‘हाँ’ तो कह दी, लेकिन उस ‘हाँ’ में हमारी इच्छा कितनी थी और परिस्थिति कितनी—यह पूछना हम भूल गये।
और कई बार हमारी सहमति के पीछे केवल दबाव ही नहीं होता। उसमें हमारी अपनी इच्छाएँ भी शामिल होती हैं— कुछ नया देखने की इच्छा, दोस्तों के साथ समय बिताने की इच्छा, किसी अवसर को हाथ से न जाने देने की इच्छा या अपने नाम के चुने जाने की खुशी। इसलिए हर ‘हाँ’ को दबाव का परिणाम मान लेना भी ठीक नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या हम उन सभी कारणों को पहचानकर निर्णय ले पा रहे हैं, या धीरे-धीरे हमारी अपनी इच्छा और दूसरों की अपेक्षा के बीच का अंतर ही मिटता जा रहा है।
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अच्छा विद्यार्थी कौन है?
शिक्षा-संस्थाएँ विद्यार्थियों में सक्रियता चाहती हैं। यह स्वाभाविक भी है। एक विद्यार्थी जितना सामाजिक और रचनात्मक रूप से जुड़ता है, उतने ही उसके अनुभव विस्तृत होते हैं।

लेकिन क्या सक्रिय विद्यार्थी की कोई एक ही परिभाषा हो सकती है?
क्या वही विद्यार्थी अच्छा और ज़िम्मेदार है जो हर कार्यक्रम में उपस्थित हो? जो हर बार आगे आये? जो हर ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ले? जो हर प्रस्ताव पर ‘हाँ’ कह दे?
मुझे लगता है, यहाँ हमें थोड़ा ठहरकर सोचना चाहिए क्योंकि विद्यार्थी के सामने एक अनकही छवि धीरे-धीरे बनने लगती है— “अच्छा विद्यार्थी वह है जो हमेशा तैयार रहे।”
और फिर हममें से बहुत-से विद्यार्थी किसी काम को इसलिए भी स्वीकार करने लगते हैं कि हमें अच्छा विद्यार्थी बने रहना है। शिक्षक की दृष्टि में सक्रिय दिखायी देना अच्छा लगता है। अपना नाम बनना अच्छा लगता है। प्रशंसा मिलना अच्छा लगता है।
इन इच्छाओं में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन जब प्रशंसा की इच्छा हमारे निर्णय की जगह लेने लगे, तब प्रश्न पैदा होता है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपनी इच्छा से कम और अपनी बनाई हुई छवि को बचाने के लिए अधिक काम कर रहे हैं?
किसी संस्था में कुछ विद्यार्थी बार-बार सामने आते हैं तो धीरे-धीरे उनकी पहचान ‘सक्रिय विद्यार्थी’ के रूप में बनने लगती है। उन्हें ज़िम्मेदारियाँ मिलती हैं, उनकी प्रशंसा होती है और कई बार सम्मान, प्रमाणपत्र या किसी अवसर में प्राथमिकता भी मिलती है। यह सब प्रोत्साहन अपने आप में ग़लत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब विद्यार्थी को यह महसूस होने लगे कि इस पहचान को बनाये रखने के लिए उसे हर बार आगे आना ही होगा। तब सक्रियता केवल रुचि नहीं रहती, धीरे-धीरे वह अपनी बनायी हुई छवि को बनाये रखने की ज़िम्मेदारी भी बन जाती है।
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दबाव हमेशा दिखायी नहीं देता
दबाव का सबसे आसान रूप वह है जिसमें कोई हमें साफ-साफ कहे—“तुम्हें यह करना ही होगा।”
लेकिन दबाव का एक बहुत हल्का रूप भी होता है, जिसे पहचानना कठिन है।
किसी शिक्षक को बुरा न लगे।
किसी समूह से अलग न दिखें।
दूसरे हमसे आगे न निकल जाएँ।
हमारा नाम सक्रिय विद्यार्थियों में बना रहे।
लोग यह न सोचें कि हम सहयोग नहीं करते।
इन भावनाओं में से कोई भी अपने आप में ग़लत नहीं है। समस्या तब है जब हम इनके कारण अपने वास्तविक मन की आवाज़ सुनना बंद कर दें।
तब बाहर से कोई हमें हाँ कहने के लिए बाध्य नहीं कर रहा होता, लेकिन भीतर हमने स्वयं पर एक ऐसी अपेक्षा रख दी होती है जिससे निकलना कठिन लगता है।
यही शायद सहमति के लोकतंत्र का सबसे सूक्ष्म पक्ष है—व्यक्ति को हमेशा धकेलना नहीं पड़ता; कई बार उसे केवल इतना सिखा देना पर्याप्त होता है कि उसे किस दिशा में चलना चाहिए।
यहाँ संस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी विद्यार्थी को यह अनुभव होने लगे कि ‘हाँ’ कहने पर उसे पहचान, प्रशंसा और अवसर मिलेंगे, जबकि ‘नहीं’ कहने पर उसे कम जिम्मेदार या कम सक्रिय समझा जा सकता है, तो वह अपने निर्णय को केवल अपनी इच्छा के आधार पर नहीं ले पाएगा। इसलिए स्वतंत्रता केवल विकल्प सामने रख देने से नहीं आती; यह भी ज़रूरी है कि अलग विकल्प चुनने पर व्यक्ति को असमान सम्मान या अवसर का सामना न करना पड़े।
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दिशा भी हमारी होनी चाहिए
मेरे लिए इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या केवल स्वयं चलना ही स्वतंत्रता है? शायद नहीं।
यदि मैं अपने पैरों से चल रही हूँ, लेकिन मुझे यह सोचने का अवसर ही नहीं मिला कि मुझे किस दिशा में जाना है, तो मेरी गति भले ही मेरी हो, दिशा मेरी नहीं कही जा सकती।
शिक्षा का उद्देश्य केवल हमें सक्रिय बनाना नहीं होना चाहिए। उसे हमें यह समझने की क्षमता भी देनी चाहिए कि किस काम में शामिल होना है, क्यों होना है और किस सीमा तक होना है। विद्यार्थी की स्वतंत्रता को केवल उसकी भागीदारी की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
कभी-कभी सोच-समझकर कहा गया ‘नहीं’, बिना सोचे कहे गये दस ‘हाँ’ से अधिक लोकतांत्रिक हो सकता है।
लेकिन आत्मनिर्णय का अर्थ यह भी नहीं कि विद्यार्थी केवल अपनी सुविधा के अनुसार हर बात स्वीकार या अस्वीकार करे। अपने निर्णय के कारणों को समझना, विकल्पों पर विचार करना और अपने निर्णय की ज़िम्मेदारी लेना भी उतना ही आवश्यक है। अपनी स्वतंत्रता को समझने वाला विद्यार्थी दूसरों की स्वतंत्रता का भी सम्मान करता है। इसलिए आत्मनिर्णय मनमानी नहीं, बल्कि विवेक के साथ अपने निर्णय लेने की क्षमता है।
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‘नहीं’ से डर क्यों?
शायद इसलिए कि हमें बचपन से ‘हाँ’ को सहयोग और ‘नहीं’ को विरोध समझने की आदत पड़ गयी है या डाल दी गयी है। और फिर कहीं न कहीं ‘नहीं’ के साथ ज़िद, असहमति या अनुशासनहीनता जैसे अर्थ जोड़े जाते हैं।
लेकिन हर ‘नहीं’ विद्रोह नहीं होता। कई बार ‘नहीं’ का अर्थ केवल इतना होता है— “मैंने सोचा है और इस बार मेरी परिस्थिति मुझे इसकी अनुमति नहीं देती।” या— “मैं इस निर्णय से सहमत नहीं हूँ, लेकिन मैं आपका सम्मान करता/करती हूँ।”
लोकतंत्र का सौंदर्य इसी में है कि असहमति व्यक्ति को शत्रु नहीं बनाती। वह संवाद का एक आवश्यक रूप हो सकती है।
यदि किसी संस्था में सभी लोग हमेशा सहमत दिखायी दें, तो यह ज़रूरी नहीं कि वहाँ बहुत अच्छा लोकतंत्र है। यह भी संभव है कि वहाँ असहमति व्यक्त करने का साहस धीरे-धीरे कम हो गया हो। किसी विद्यार्थी का ‘नहीं’ कहना संस्था के लिए केवल एक असुविधा नहीं होना चाहिए। कभी-कभी वही ‘नहीं’ संस्था को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का अवसर देती है। स्वतंत्र सहमति वहीं संभव है जहाँ असहमति के लिए भी जगह हो।
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सिर्फ़ व्यस्त नहीं, जाग्रत विद्यार्थी
आज विद्यार्थी के पास करने के लिए बहुत कुछ है। कार्यक्रमों की संख्या बढ़ रही है, अवसर बढ़ रहे हैं, मंच बढ़ रहे हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ बची रहनी चाहिए—सोचने का समय क्योंकि लगातार व्यस्त रहना और जागरूक रहना एक ही बात नहीं है।
व्यस्त विद्यार्थी के पास बहुत-सी गतिविधियाँ हो सकती हैं। जाग्रत विद्यार्थी के पास प्रश्न होते हैं। वह पूछता है—
मैं यह क्यों कर रहा हूँ?
क्या मैं सचमुच इसे करना चाहता हूँ?
क्या इसका कोई दूसरा रास्ता भी है?
क्या मैं इससे असहमत हो सकता हूँ?
और यदि मैं असहमत हूँ, तो क्या मैं अपनी बात कह सकता हूँ?
मेरे लिए शिक्षा की सफलता शायद यहीं है क्योंकि हमें केवल ऐसा विद्यार्थी नहीं चाहिए जो हर निर्देश को कुशलता से पूरा कर दे। हमें ऐसा विद्यार्थी चाहिए जो आवश्यकता पड़ने पर निर्देश की सार्थकता पर भी विचार कर सके।
और शायद यहीं विद्यार्थी और नागरिक के बीच का अंतर भी दिखायी देता है। शिक्षा यदि केवल निर्देशों का पालन करना सिखाएगी, तो वह हमें व्यवस्था के लिए उपयोगी या शायद उपकरण मात्र बना सकती है; लेकिन यदि वह प्रश्न करना, विकल्प देखना और निर्णय की ज़िम्मेदारी लेना सिखाएगी, तभी वह हमें एक विवेकशील नागरिक बनने की ओर ले जाएगी। लोकतंत्र को केवल आज्ञाकारी विद्यार्थी नहीं, विचार करने वाले नागरिक चाहिए।
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सहभागिता बचाना है, लेकिन चुनाव के साथ
यह कहना ग़लत होगा कि संस्थागत कार्यक्रम केवल दबाव पैदा करते हैं। कार्यक्रम हमें जोड़ते हैं, हमें मंच देते हैं, हमारी झिझक कम करते हैं और कई बार हमारे भीतर छिपी प्रतिभा को सामने लाते हैं। सामूहिक अनुभवों से व्यक्ति बहुत कुछ सीखता है इसलिए समस्या सहभागिता नहीं है।
समस्या तब है जब सहभागिता को स्वतंत्रता का पर्याय मान लिया जाये। किसी विद्यार्थी का किसी कार्यक्रम में उत्साह से शामिल होना सुंदर है लेकिन उतना ही सुंदर वह क्षण भी होना चाहिए जब वही विद्यार्थी किसी प्रस्ताव पर प्रश्न कर सके।
उसे यह विश्वास होना चाहिए कि— “यदि मैं ‘हाँ’ कहूँगा तो मेरी बात सुनी जाएगी, और यदि मैं ‘नहीं’ कहूँगा तब भी मेरा सम्मान बना रहेगा।” यही विश्वास किसी संस्था को वास्तव में लोकतांत्रिक बनाता है।
और शायद इसी कारण किसी कार्यक्रम में केवल विद्यार्थियों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना ज़रूरी है कि उस कार्यक्रम की विषयवस्तु, उद्देश्य और भूमिका तय करने में विद्यार्थियों की कोई आवाज़ थी या नहीं। यदि विद्यार्थी केवल पहले से तय गतिविधि को पूरा करने के लिए बुलाये गये हैं, तो वह सहभागिता हो सकती है, लेकिन उसमें आत्मनिर्णय का तत्व कितना है—यह अलग प्रश्न है।
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मेरी ‘हाँ’ और मेरी ‘नहीं’
मैं विद्यार्थी हूँ और इसलिए इस प्रश्न से बाहर खड़ी होकर इसे नहीं देख सकती। मैं भी उन्हीं परिस्थितियों का हिस्सा हूँ जिनकी बात कर रही हूँ। मैं यह नहीं कहती कि हर बार हम पर दबाव होता है। न ही यह कि हर संस्थागत अपेक्षा ग़लत है।
मैं केवल इतना कहना चाहती हूँ कि विद्यार्थी को अपनी इच्छा पहचानने का अवसर भी मिलना चाहिए क्योंकि यदि शिक्षा हमें अपने निर्णय लेने की क्षमता नहीं देती, तो फिर वह हमें कितना भी सक्रिय क्यों न बना दे, सार्थकता कुछ अधूरी रह जाती है।
हमें ऐसे विद्यार्थी चाहिए जो संस्था से जुड़े हों, लेकिन अपनी चेतना के साथ। जो सामूहिकता का हिस्सा बनें, लेकिन अपनी स्वतंत्र सोच खोकर नहीं। जो शिक्षक का सम्मान करें, लेकिन प्रश्न करने का साहस भी रखें। और जो आवश्यकता पड़ने पर यह कह सकें— “मैं सहमत नहीं हूँ।”
और इस वाक्य के बाद भी संवाद सुचारु बना रहे।
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अंततः लोकतंत्र कहाँ है?
शायद लोकतंत्र केवल संसदों, चुनावों और राजनीतिक संस्थाओं में नहीं रहता। उसका एक छोटा-सा रूप हमारे कक्षाओं, गलियारों, बैठकों और रोज़मर्रा के निर्णयों में भी दिखायी देता है।
जहाँ किसी विद्यार्थी की सहमति को केवल उसकी उपस्थिति से नहीं, उसकी स्वतंत्र इच्छा से समझा जाये; जहाँ उसकी सक्रियता का सम्मान हो, लेकिन उसकी दूरी को अपराध न बनाया जाये; जहाँ उसे नेतृत्व करने का अवसर मिले और नेतृत्व पर प्रश्न करने का भी; जहाँ शिक्षक की बात का सम्मान हो, लेकिन विद्यार्थी की आवाज़ भी सुनी जाये।
और सबसे बढ़कर—जहाँ ‘हाँ’ और ‘नहीं’ के बीच किसी विद्यार्थी की गरिमा तय न होती हो।
मेरे लिए ‘सहमति का लोकतंत्र’ इसी प्रश्न का नाम है। हम कितनी बार दूसरों के साथ खड़े हुए—यह महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या आवश्यकता पड़ने पर हम अपने विचार के साथ खड़े हो सकते हैं?
अपने पैरों पर चलना स्वतंत्रता की शुरूआत हो सकती है, लेकिन अपनी दिशा स्वयं चुनना उसकी परिपक्वता है। और शायद शिक्षा की सबसे बड़ी सफलता भी यही सिखाना होगी।
सच्चा लोकतंत्र वह नहीं, जहाँ सब सहमत दिखायी दें; सच्चा लोकतंत्र वह है जहाँ असहमति के बावजूद सम्मान बचा रहे—और सहमति के पीछे विवेक की अपनी आवाज़ हो।

दीपा शर्मा
सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल में एम.ए. तृतीय सेमेस्टर हिंदी साहित्य की छात्रा। कॉलेज की पत्रिका व अख़बारों में कुछ रचनाएं प्रकाशित। भाषा और लेखन के क्षेत्र में ही भविष्य बनाने के लिए उत्सुक।
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